Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Sunday, 24 May 2020

जड़ी-बूटी युक्त गरम पानी पीने वाले प्रदेश से हम कुछ तो सीखें


भारत के जिन राज्यों में कोरोना संक्रमण के शुरूआती मामले देखे गये थे, उनमें केरल भी शामिल था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस तरह की खबर बार-बार ध्यान खींच रही है कि भारत में कोरोना से कारगर तरीके से निपटने में केरल सबसे अग्रणी रहा है। कोरोना पीड़ितों की रिकवरी दर और नये संक्रमणों की रोकथाम को लेकर केरल की खूब तारीफ हो रही है। इसके लिए केरल सरकार और स्थानीय प्रशासन के प्रबंधन और सक्रियता की तो तारीफ हो रही है- मलयाली जीवनशैली की कुछ अन्य विशेषताओं ने भी लोगों का ध्यान खूब खींचा है। इन्हीं में एक है वहाँ की स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग नजरिये के साथ विकसित हुई खान-पान की संस्कृति। उनकी खान पान की स्वस्थ आदतों को; मजबूत इम्यून सिस्टम का कारण मानकर; केरल वालों की खूब तारीफ हो रही है। हो भी क्यों न!
अपनी केरल यात्रा की यादें अब भी ताज़ा है। 2018 अंत में जब केरल गयी थी तब दिसम्बर में उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की तुलना में वहाँ ठीक विपरीत मौसम था। चिलचिलाती धूप और पसीने से तर-ब-तर कर देने वाला मौसम! कभी-कभी राहत पहुँचाती बारिश की फुहारें! लेकिन इस गरम मौसम में भी एक मलयाली मानुष को आप त्रिशुर स्टेशन पर आइआरसीटीसी कैंटीन में गरम पानी के बदले ठंडा पानी परोसने पर टोकते हुए और नाराजगी जाहिर करते हुए सुनेंगे तो आपको कैसा लगेगा? मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा क्योंकि यह मेरी वापसी के समय का प्रसंग था; और तब तक मैं स्थानीय खान पान की आदतों से न सिर्फ परिचित हो गयी थी बल्कि पिछले तीन दिनों से उसी खान पान का लुत्फ भी उठा रही थी। इसलिए समझ पा रही थी कि कुछ-कुछ लाल रंग लिए गरम पानी यहाँ के स्वास्थ्य सजग लोगों के जीवन का सहज हिस्सा है।
केरल बेहतरीन गुणवत्ता के मसालों का प्रचूर मात्रा में उत्पादन करने वाला राज्य है। इसके बावजूद कम से कम मेरा अपना अनुभव यही रहा कि यहाँ भोजन बनाने में तेल-मसालों का बहुत कम उपयोग किया जाता है। इस बात का अनुभव आपको वहाँ के हर छोटे-बड़े रेस्टोरेंट में होगा। सब्जियां तो प्रायः लगभग उबली हुई होती थीं। मैं जहाँ ठहरी हुई थी वहाँ हर बार भोजन के साथ मीठे के नाम पर सिर्फ केला ही परोसा गया। सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के साथ- पका केला, उबला हुआ केला या फिर भुना हुआ या फिर केले से ही बना कुछ और। ऐसा माना जाता है कि केला मीठा खाने की इच्छा की पूर्ति तो करता है और साथ ही भोजन को पचाने में भी बहुत मदद करता है। चावल के नाम पर वहाँ अधिकतर लोग मोटा चावल खाना ही पसंद करते हैं। चावलों में मोटे चावल स्वास्थ्य के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाते हैं।
[यह तस्वीर मैंने एक दिन त्रिशुर में खाने से पहले थी]

अब फिर से गरम पानी का ज़िक्र। केरल के खान-पान में मुझे सबसे ज्यादा जिस चीज़ ने आकर्षित किया था; वह यहाँ परोसे जाने वाला पानी ही था। मुझे बाताया गया कि वहाँ लोग साल के बारहों महीने खाने के साथ गरम पानी ही पीना पसंद करते हैं। पारंपरिक तौर पर भी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मत से भी ठंडे पानी की जगह गरम पानी का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत-बहुत अधिक लाभकारी माना जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ सादा गरम पानी कहाँ; औषधीय गुणों वाले खास किस्म की जड़ी-बूटियों के साथ उबाला हुआ पानी इस्तेमाल किया जाता है और यही कारण है कि उस पानी का रंग लालिमा लिए होता है। खाने के साथ, खाने से पहले और खाने के बाद जड़ी-बूटी युक्त हल्के लाल रंग का पानी पीना। जब पहली बार मुझे वह पानी पीने को मिला तो मुझे लगा कि पानी गंदा तो नहीं, शायद ग्लास अच्छे से साफ नहीं किया गया हो। मैंने वो पानी सिंक में फेंककर दूसरे ग्लास में जग से फिर से पानी उड़ेला। फिर से पानी का वही रंग और गरमाहट तो थी ही। लेकिन तभी देखा कि सामने वाले टेबल पर उसी रंग का पानी ग्लास में उड़ेल कर मजे से पिया जा रहा है। डरते-डरते मैंने भी पानी को हल्का सा टेस्ट किया और वह पानी मुझे अच्छा ही लगा। सादा गरम पानी मुझसे पिया नहीं जाता रहता तो उन जड़ी बूटियों का ही कमाल कहेंगे कि वह पानी मुझे ठीक लगा, बल्कि धीरे-धीरे बहुत स्वादिष्ट लगने लगा था। मैं खाने के मेज पर उस पानी के परोसे जाने का इंतजार किया करती थी। खाना कम खाया जाता था और वह पानी कई ग्लास पी जाती थी। हर बार पानी पीते हुए यही सोचती थी कि कुछ दिन य़हाँ रह जाऊं तो मैं ये गरम पानी पी-पी कर ही स्वस्थ और एकदम पतली हो जाउंगी।
जहाँ मिठाई के नाम पर ज्यादातर किस्म-किस्म के उबाले या भुने, पके या कच्चे केले से बने व्यंजन खाये जाते हों, और गर्मी में भी गरम और जड़ी-बूटी युक्त पानी पिया जाता हो, वहाँ की खान पान की संस्कृति तो अनुकरणीय होगी ही।
हम लोगों की आदतें तो ये हैं कि कोरोना काल में बाज़ार बंद हुए तो हम सब खुद ही वो सारी चीज़ें घरों में ही बनाने लग गये। बेहिसाब तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीज़ें- मानो पकौड़े-समौसे-मिठाईयों की दुकान और ढ़ाबे हमने अपने-अपने किचन में ही खोल लिये थे। इसकी कीमत भी कोई और नहीं हम ही चुकाएँगे। खान-पान के मामले में हम केरल से थोड़ा-कुछ तो सीखें!

Monday, 20 April 2020

गुलमोहर तुझसे मेरा रिश्ता क्या है!


गुलमोहर अचानक खिलते हैं। किसी सुबह उठो तो पता चलता है कि वह पेड़ जो बीते कल तक सिर्फ हरी पत्तियों और टहनियों का पर्याय था, अचानक फूलों से लद गया होता है। फूलों का रंग भी ऐसा कि सबका ध्यान अपनी ओर खींच ले लेकिन वैसा चटक भी नहीं जैसे पलाश के फूल होते हैं! एक संतुलन भरा सम्मोहन! इसलिए भी गुलमोहर, गुलमोहर है। वह एक सरप्राइज़ की तरह आता है!
लेकिन मुझ जैसों के लिए जिसे इस मौसम में अपने पुराने कैंपस (हैदराबाद विश्वविद्यालय) के गुलमोहर की याद शिद्दत से आ रही हो, यह किसी भी सरप्राइज़ से बड़ा; वाकई बहुत बड़ा सरप्राइज़ था कि आज सुबह खिड़की खोलने पर लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर पेड़ पर लदे फूल जैसे कह रहे थे, विश्वास करो मैं गुलमोहर ही हूँ! यह एक ऐसा अद्भुत अनुभव था; जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। मैं गुलमोहर के पेड़ पहचानती हूँ; लेकिन इतने दिनों से पता नहीं क्यों उस पेड़ पर कभी नज़र ही नहीं पड़ी और इसलिए इस बार गुलमोहर के फूलों ने ही उस पेड़ से परिचय करवाया। वैसे भी गुलमोहर के पेड़ों की साल भर की तपस्या का हासिल इन दिनों में खिलने वाले ये फूल ही तो होते हैं! जो देखा उसे खिड़की से ही कैमरे में उतारने की कोशिश की, जैसा उतर सका साझा कर रही हूँ।

Sunday, 5 April 2020

'शिकारा' देखने के बाद

कश्मीर का दर्द दशकों पुराना है। एक खुशहाल वादी में जो कई दशकों तक पर्यटन और हिन्दी फिल्मों की शूटिंग का पसंदीदा लोकेशन रहा- उस पर न जाने किस की नज़र लग गयी। धीरे धीरे वहाँ की फिज़ा में घृणा और असंतोष का जहर फैलता चला गया। इसके साथ ही पुलिस और फौज का हस्तक्षेप भी बढ़ता चला गया। हमारे पड़ोस के एक पाकदेश ने भी धरती की जन्नत को जहन्नुम की ओर धकेलने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे कश्मीर कभी नहीं सुलझने वाली समस्या की तरह स्थापित हो गया। कश्मीर दर्दगाह हो गया। दहशतगर्दी, मुठभेड़, पुलिसिया और फौजी अभियानों, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं आदि के बीच आम कश्मीरी पिसता चला गया। खैर 'दर्दगाह' ही सही इसकी अपनी अस्मिता रही है, यह गुमनाम नहीं रहा है। लेकिन इसके साथ गुमनामी की कथा भी जुड़ी हुई है।
इस दर्दगाह के बारे में सोचते हुए कई बार हम उन दर्दगाहोंके बारे में नहीं सोच पाते जो यहाँ से दरबदर हैं। वास्तव में कश्मीर समस्या में कश्मीरी पंडितों का दर्द हाशिये पर ही रहा है। एक मिथक की तरह इसके कई-कई संस्करण और कई-कई व्याख्याएँ मिलती हैं। इस समस्या की ठीक तस्वीर हमारे सामने कभी उभर ही नहीं पाई। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म शिकाराइस स्थिति में एक सार्थक हस्तक्षेप करती है।
1990 के दशक में कश्मीर में क्या हुआ था कि कश्मीरी पंडितों को अपना खूबसूरत आशियाना छोड़ कर प्रतिकूल जलवायु वाले शहरों की ओर पलायन करना पड़ा था? वहाँ सगे-सम्बंधियों जैसे और सहजीवियों की तरह रहने वाले हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन की रेखा कैसे खिंच गयी? कैसे पड़ोसी ही स्वार्थी होकर हैवानियत पर उतर आए? निर्वासित लोगों पर क्या-क्या बीती? कश्मीर की कश्मीरियत पर सिर्फ कश्मीरी मुसलमानों का हक़ है; यह कब से और क्योंकर प्रस्तावित किया जाने लगा? ऐसे कई सवालों के उत्तर इस एक फिल्म में हैं।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नहीं बनायी गयी है। प्रतिशोध की भावना इस फिल्म में कहीं नहीं है। यह फिल्म कश्मीरी पंडितों की समस्या का जिम्मेदार किसी धर्म को नहीं बल्कि भटके हुए लोगों को ठहराती है। यह फिल्म वास्तव में घृणा के खिलाफ है। इस फिल्म का मुख्यपात्र अमेरिका के राष्ट्रपति को बार-बार पत्र लिखकर मिलने की इच्छा जताता है ; मिलकर वह उनसे बस इतना पूछ लेना चाहता है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में वे हथियार क्यों भेजे जो वादियों तक पहुँचकर उसके सीने को छलनी करते गए!
फिल्म इस विश्वास के साथ खत्म होती है कि एक दिन अपने ही घर में भटके हुए लोग ठौर ठिकाने पा जाएँगे और कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पंडित भी अपने घरों को लौट पाएँगे। एक खूबसूरत प्रेमकथा के सहारे जैसे घृणा को सात परत नीचे पाताल में दफन कर दिया गया हो। अभिनय, कहानी, फिल्मांकन सब बेहतरीन है। ऐसी फिल्में उजाले की ओर ले जाती हैं।

Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Monday, 23 March 2020

कोरोना काल में असंवेदनशीलता

महामारी (Covid19) के समय में काम/ सेवा करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के लिए हमारे देश की जनता ने कल शाम जिस जोश के साथ तालियाँ-थालियाँ बजाई थीं; वो देखने लायक था! लेकिन क्या सच में हम ऐसे समय में उन लोगों को धन्यवाद कर रहे थे??
आँखों देखी घटना बता रही हूँ। पास के एक अपार्टमेंट के लोगों ने कल शाम पूरे उत्साह के साथ खूब थालियाँ-तालियाँ पीटीं थीं। आज सुबह उसी अपार्टमेंट के तीसरे-चौथे फ्लोर से कुछ लोग कूड़ा लेने आयी गाड़ी पर 'कोरोना' के डर से अपनी बालकनी से ही कूड़ा फेंकने लगे। कूड़ा इधर-उधर बिखर रहा था और गाड़ी के साथ आए सफाई कर्मचारियों पर भी गिर रहा था। कुछ लोग सड़कों पर कूड़ा फेंंक रहे थे, और सफाई कर्मचारियों को कह रहे थे; उठा के गाड़़ी में डाल दो! एक सफाई कर्मचारी नीचे से चिल्लाई- 'बेटा हम भी तो इंसान हैं!'
थाली-ताली और शंख की ध्वनियों से कल शाम गूँजने वाली कृतज्ञता आज कूड़े की शक्ल में इस तरह बरस रही थी!
ये मानवता के संकट की झलकी भर है। इस संकट के समय में आगे असंवेदनशीलता का न जाने कैसा-कैसा रूप देखना पड़े।

Friday, 20 March 2020

थाॅट प्रवोकिंग फिल्म है 'थप्पड़'


अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म 'आर्टिकल 15' मुझे बेहद पसंद आई थी और एक सकारात्मक फिल्म लगी थी। बाद के दिनों में जब 'थप्पड़' का ट्रेलर रिलीज़ हुआ ; तब से फिल्म देखने की जिज्ञासा थी।

फिल्म रिलीज़ हुई पर देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कुछ खास नहीं मिल रही थी। किसी ने कहा कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा के दिखाया है, तो कोई कह रहा था फालतू ड्रामा है। आज 'थप्पड़' पर फिल्म बनी है; अब कल को उंगली पर फिल्म बनेगी कि तुमने मुझपर उंगली कैसे उठाई! मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी; क्योंकि फिल्म देखी नहीं थी।

फाइनली फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देखने के बाद लगा कि इसे सही मायनों में काबिले तारीफ और ज़रूरी फिल्म कहा जा सकता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे फिल्म में जिस-जिस तरह के लूप होल्स की आशंका थी, शुक्र है फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था। अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जो वह दिखाना चाहते थे, उन्हें उसमें सौ प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। जब आप 'थप्पड़' देखकर उठेंगे तो बहुत सारी चीज़ों पर, बातों पर सोचने के लिए मजबूर होंगे। सही मायनों में 'थाॅट प्रवोकिंग' फिल्म है। जहाँ बात थप्पड़ की होकर भी थप्पड़ की नहीं है। बात जो गलत हुआ उसको 'शिट हैपेन्स' कहकर टालने, गलती को अस्वीकारने, ग्लानि बोध न होने और माफी न मांगने की है और फिल्म में इसे दिखाने में निर्देशक कहीं चूके नहीं हैं।
फिल्म का अभिनय पक्ष भी उम्दा है। पहली बार स्क्रीन पर दिखे पवैल गुलाटी ने मंझा हुआ अभिनय किया है। 'आँखों देखी' के बाऊजी की बेटी बनी माया सराओ को इसमें वकील की भूमिका में पहचानना मुश्किल है; उनका अभिनय भी बेहतर है। बाकी पूरी स्टार कास्ट ने भी काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अनुभव सिन्हा की खासियत है कि उनकी फिल्में बेहद स्पष्ट होती हैं। जो वो कहना चाहते हैं उसमें कहीं भी आपको अस्पष्टता देखने को नहीं मिलती। उनकी पिछली फिल्मों 'मुल्क'और 'आर्टिकल 15' से भी इसे समझा जा सकता है। ये स्पष्टता ही आम से आम दर्शक को भी फिल्म से जोड़ने में सहायता करती है।
'थप्पड़' हमारे समाज को दिखाती है। समाज की उन बारीक चीज़ों को कवर करती चलती है; जिनके बारे में हमारा पितृसत्तात्मक समाज सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। फिल्म आपको बहुत कुछ देकर जाती है।

Thursday, 6 February 2020

लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन


एम.ए. के दिनों में पढ़ा था उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी'। तब इसने चमत्कृत किया था। जुदा कथ्य, सहज-सरल-प्रवाहमयी भाषा और बेहद प्रभावित करने वाला शिल्प। इसके लेखक थे- कृष्ण बलदेव वैद। उन्होंने विभिन्न गद्य विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है और हिन्दी साहित्य जगत में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही है। साथ ही वे हिन्दी के उन लेखकों की परंपरा से भी थे; जिनकी पढ़ाई-लिखाई और आजीविका की भाषा अंग्रेज़ी थी, लेकिन जिन्होंने लेखन के लिए हिन्दी को अपना माध्यम चुना। आज उनका निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Sunday, 5 January 2020

पंकज कपूर की 'हैप्पी'


लम्बे अरसे से पंकज कपूर अभिनीत फिल्म हैप्पीका इंतज़ार कर रही थी; बहुत साल पहले इस फिल्म का सिर्फ पोस्टर भर देखा था। फिर सालों तक सर्च करती रही; लेकिन न तो उस फिल्म की चर्चा कहीं सुनी, न ही ट्रेलर वगैरह देखने को कहीं मिला। लेकिन अभी कुछ दिन पहले ज़ी5 पर ये फिल्म अचानक से दिखाई दी। पता चला कि कई तरह की दिक्कतों से जूझते हुए इस फिल्म को परदे पर रिलीज़ करना संभव नहीं हो सका तो अंतत: 25 दिसम्बर को यह फिल्म ज़ी5 पर रिलीज़ की गयी। साल 2019 ने बेहतर हिंदी फिल्मों के ख़याल से लगभग निराश ही किया; ऐसे में साल के अंत तक पहुँचते-पहुँचते हैप्पीदेखना संतोषप्रद रहा।
पंकज कपूर अपनी हर फिल्म में कुछ अलग, कुछ नया करने के लिए जाने-जाते हैं। इस फिल्म में भी उनका अभिनय बेहतरीन है। उल्लेखनीय यह है कि इसकी कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। निर्देशक भावना तलवार ने काबिले तारीफ काम किया है। इससे पहले धर्मफिल्म से भी वो अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। फिल्म हैप्पीपूरी की पूरी ब्लैक एंड व्हाइट इफैक्ट के साथ बनायी गयी है। फिल्म के मुख्य किरदार हैप्पी पर और फिल्म पर चार्ली चैपलिन और उनकी फिल्मों का प्रभाव भी महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म का मुख्य किरदार एक बहुत ही सकारात्मक संवाद को फिल्म में कई बार दोहराता है। उसे यहाँ लिख देने का लोभ मुझसे छूट नहीं रहा है- दोस्तों ये जो ज़िन्दगी नाम की डिश है न, इसमें सबसे ज़रुरी मसाला होता है स्माइल का। इस्माइल प्लीज़ :)  

Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।