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Saturday, 22 December 2018

"ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, यह तो सिर्फ किताब है"

ग्रैजुएशन के दिनों में जब मैं लाइब्रेरी में किसी किताब को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते परेशान हो जाती थी और अपनी यह परेशानी लाइब्रेरियन को जाकर बताती थी तो वे किताब ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मेरे साथ किताबों के रैक तक आते थे और किताब ढूंढ़ते हुए अक्सर हर बार कहा करते थे कि 'अरे ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, ये तो सिर्फ किताब है।' और कुछ देर बाद वह किताब मिल ही जाती थी।
इस मामले में मैं खुद को बहुत हद तक खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अक्सर लाइब्रेरियों में वो सामग्रियां भी बड़ी सहजता से मिल जाती हैं, जो साधारणतया लोगों की नज़रों से चूक जाती हैं और कई बार तो लाइब्रेरी के केटलॉग में भी शामिल नहीं होतीं! लेकिन अब भी कभी-कभी कुछ सामग्रियां ढूंढ़ते हुए बहुत परेशान हो जाती हूं और कई बार तो निराश भी! लेकिन जब-जब ऐसी स्थिति होती है तो मुझे लाइब्रेरियन सर की कहीं हुई वहीं बात याद आ जाती है कि 'ढूंढ़ने से तो...' और इसे इत्तेफाक ही कहूंगी कि इसके बाद जब मैं फिर से ढूंढ़ने के काम में जुटती हूं, तो अक्सर मुझे इच्छित सामग्री मिल ही जाती है!

Monday, 23 April 2018

ताकि किताबों की संस्कृति बची रहे

पाठ्यक्रम की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में थी, तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के लिए मिल जाती थी।
लेकिन वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्र नाम का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा, शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो, मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक, मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये, तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की किताब वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना, उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!

Saturday, 2 July 2016

उस दिन का बाकी

11 मई 2014, रविवार की सुबह मैं बहुत परेशान थी । हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी एडमीशन के लिए इंटरव्यू होना था । इंटरव्यू में सिनॉप्सिस की  प्रिंट कॉपी लेकर जानी थी, जो मेरे पास नहीं थी । उन दिनों मैं एम.फिल के काम में बहुत व्यस्त थी । स्वाभाविक था कि पीएचडी सिनॉप्सिस के लिए बहुत समय नहीं मिल पा रहा था । मैंने सोचा था शनिवार शाम तक सिनॉप्सिस तैयार करके  प्रिंट ले लूँगी । रविवार को कैंपस की फोटोकॉपी या कम्प्यूटर प्रिंटिंग की दुकानें अक्सर बंद रहती हैं । सिनॉप्सिस तैयार करते हुए लेकिन वक्त का ध्यान ही नहीं रहा और रात के आठ-साढ़े आठ बज गये । तब तक कम्पयूटर प्रिटिंग की सभी दुकाने बंद हो चुकी थी । अब सुबह ही कुछ हो सकता था ।
सुबह विभाग पहुँचने से पहले सभी प्रिटिंग की दुकाने साइकिल मार-मार के देख आई थी । आशंका के अनुरूप सारी दुकाने बंद थीं । अधिक घबराने का कारण यह था कि इंटरव्यू सूची में पहला नाम मेरा ही था । विश्वविद्यालय का एक कम्प्यूटर सेंटर है, जहाँ विद्यार्थियों के लिए प्री-पेड प्रिंट की सुविधा उपलब्ध है । यह रविवार को भी खुला होता है, लेकिन इसके खुलने का समय दस बजे होता है, जबकि ठीक दस बजे से मेरा इंटरव्यू तय था । मेरे पास एक ही विकल्प था कि विभाग में प्रिंटिंग के लिए अनुरोध करूँ । मैं सवा नौ बजते-बजते विभाग पहुँच गयी और बाशा जी (विभाग के मुख्य किरानी) से इस आशय का अनुरोध किया । पांच-छः पृष्ठों का ही प्रिंट लेना था लेकिन उन्होंने मना कर दिया । एम.फिल के दिनों से उनसे पहचान थी । कार्यालयी कार्यों के लिए अब तक उनसे ठीक-ठाक संवाद का अनुभव था । उस दिन वे अजनबी सरीखा व्यवहार कर रहे थे । उन्होंने कहा कि यदि विभागाध्यक्ष कह दें तो प्रिंट मिल जाएगा । उन दिनों प्रो. वी. कृष्णा हमारे विभागाध्यक्ष थे । अब उन्हीं का सहारा था । साढ़े नौ बज चुके थे । उनके आते ही मैंने उन्हें नमस्ते कहा, उन्हें बताया कि मैं विभाग से एम.फिल कर रही हूँ, यह भी बताया कि प्रिंट क्यों नहीं ले पायी । उन्होंने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया और कहा कि “इन सब चीज़ों की तैयारी पहले से कर के रखी जाती है, मैं कुछ नहीं जानता ।” उन्होंने प्रिंट देने से साफ़ इनकार कर दिया । वे मुझे नहीं पहचान पा रहे थे, यह दुखद नहीं था, लेकिन उस दिन का उनका व्यवहार बहुत बुरा था । वे भले गुस्सा होते, फटकारते लेकिन प्रिंट देने से तो मना नहीं करना चाहिए था । यदि वे मुझे किसी दूसरे विश्वविद्यालय से आयी हुई छात्रा समझ कर ऐसा व्यवहार कर रहे थे, तब तो वह और भी बुरा था । मेरे गाइड आ जाते तो उनके प्रिंटर से प्रिंट ले सकती थी, लेकिन वे अब तक नहीं आये थे । उन्हें फ़ोन करके यह सब बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी ।
यह हो सकता था कि मैं प्रिंट के लिए कम्प्यूटर सेंटर जाती और मेरी जगह बाद के क्रम के विद्यार्थी इंटरव्यू देने जाते । बाद में आकर मैं अपने इंटरव्यू के लिए आग्रह करती या बिना प्रिंट लिए ही इंटरव्यू के लिए चली जाती । दोनों ही स्थितियाँ इंटरव्यू के लिए मेरी अगंभीरता और घोर लापरवाही प्रकट करती । मेरा यह ‘इम्प्रैशन’ मुझे एड्मीशन न दिला पाने के लिए काफी होता । कॉम्पीटीशन भी इतना टफ था । जेआरएफ वाले छात्र ही अधिक थे । मैं तब जेआरएफ नहीं थी और मुझे उनके साथ कम्पीट करना था । इन्हीं सब ख्यालों, चिंताओं में उलझी मैं बेहद तनाव के साथ विभाग के ऑफिस से बाहर आई, जहाँ इंटरव्यू देने आये सभी छात्र जमा हो रहे थे । वहीं मैंने अपने एम.फिल के सहपाठियों से झेंप के साथ अपनी मुश्किल बतायी । अधिकांश सहपाठियों ने आश्चर्य जताया । सभी इंटरव्यू को लेकर प्रेशर में थे और मेरे मामले का अतिरिक्त तनाव वे नहीं लेना चाह रहे थे । इसलिए इधर-उधर हो गये । लेकिन एक सहपाठी विशाल ने कुछ देर सोचकर कहा कि आबिद के पास प्रिंटर है । आबिद भी मेरा सहपाठी ही था । दिल्ली विश्वविद्यालय में हमने एम.ए. भी साथ-साथ किया था । उस दिन आबिद का भी इंटरव्यू था लेकिन बाद में था, इसलिए वह अभी तक पहुँचा नहीं था । प्रिंट लेने कौन जाए और कैसे जाए यह समस्या थी । विशाल ने कहा कि उसके साथ उसका एक दोस्त आया है, मैं उसे अपनी पेनड्राइव दे दूँ तो वो बाइक से जाकर फटाफट प्रिंट ले आएगा । डूबते को तिनके का सहारा मिला था । दस बजने में आठ-दस मिनट ही बचे थे । उसे जाते-जाते मैंने कहा कि प्लीज जल्दी आइएगा । मैं यह भी सोच रही थी कि आबिद भी अगर हॉस्टल से निकल चुका होगा इंटरव्यू देने और उस लड़के को कमरा बंद मिला तो क्या होगा ! या आबिद ने प्रिंट देने से मना कर दिया, या बिजली नहीं हुई या फिर मेरी पेनड्राइव ही सही से ओपन नहीं हुई तो, वगैरह-वगैरह । जितनी भी आशंकाएँ मन में आ सकती थी, उस वक़्त आए जा रही थी । मेरी नज़र उसके जाने के बाद से गेट पर ही लगी हुई थी । तब तक लगभग सभी प्रोफ़ेसर आ चुके थे और विभागध्यक्ष के ऑफिस में जमा हो चुके थे । इसी बीच बुलावे की घंटी बजी । मेरी सांसें जैसे ऊपर की ऊपर ही रह गयी । मैं विभागाध्यक्ष के कक्ष की तरफ गयी तभी मुझे बताया गया कि घंटी का बजना उसका परिक्षण करने के लिए था । यह सुनकर थोड़ी राहत मिली और आँखें फिर से गेट की ओर टिक गयीं । यह सब लिखते-लिखते भी मैं उसी पल को जी रही हूँ । ह्रदय गति ठीक उसी दिन की तरह असमान्य हुए जा रही है । तीन-चार मिनट भी नहीं बीते होंगे कि दुबारा घंटी बजी । वह एक दम सिनेमाई दृश्य की तरह का संयोग था । एक तरफ घंटी बजी दूसरी तरफ वह लड़का आता हुआ दिखा । यह मेरे लिए कैसा क्षण रहा होगा यह मैं अब भी उसी तरह महसूस कर सकती हूँ, लेकिन समझा नहीं सकती । मैं भाग कर उस लड़के तक पहुँची, शुक्रिया कहा या नहीं अब याद नहीं है, उससे प्रिंट लिया और विभागाध्यक्ष के कक्ष की तरफ लपकी ।
वहाँ पहुँच कर मैं सामान्य होने की कोशिश कर रही थी । मैंने जब अपना सिनॉप्सिस आगे बढ़ाया तो वी.कृष्णा जी ने पहला सवाल ही यह पूछा कि आप तो कह रही थीं कि सिनॉप्सिस तैयार नहीं हैं, अब यह आपके पास कहाँ से आ गया ! मैंने कहा सर मैंने आपसे यह नहीं कहा था कि सिनॉप्सिस तैयार नहीं है यह कहा था कि दुकाने बंद होने की वजह से मैं प्रिंट नहीं ले सकी हूँ । हो सकता है उनके खराब व्यवहार की वजह उनकी गलतफहमी रही हो । इसके बाद उन्होंने पूछा कि फिर इतनी जल्दी प्रिंट कहाँ से मिल गया ? मैंने कहा एक दोस्त के पास प्रिंटर है, उसी से मिला । फिर सिनॉप्सिस पर बात हुई । अच्छी बातचीत हुई । अमीर खुसरो पर केन्द्रित शोध प्रस्ताव था, जिस पर व्यवहारिक दिक्कतों की आशंका के कारण मैं काम तो नहीं कर सकी लेकिन उस दिन निस्संदेह प्रस्तावित शोध विषय का प्रभाव ही था कि मेरा चयन हो सका । यह भी दिलचस्प ही है । इस पर किसी दिन अलग से लिखने की कोशिश करूँगी ।
विशाल सिंह एम.ए. के दिनों से हैदराबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहा था । वह एम.ए. में अपने बैच का टॉपर था । होनहार माना जाता था और पीएचडी प्रवेश के लिए सर्वाधिक योग्य भी । पता नहीं किस वजह से उसका चयन नहीं हो सका ! उससे मेरा संवाद बेहद कम था और उस दिन तो मैं उसकी एक कॉम्पीटीटर थी, यह जानते-समझते हुए भी उसने मेरी मदद की थी, यह बहुत बड़ी बात थी, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती । फिलहाल वह हैदराबाद के ही ‘इंगलिश एण्ड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहा है । मेरी दुआ है कि वह हमेशा बेहतर करे और सफल बने ।
आबिद हुसैन एम.ए. के दिनों से सहपाठी तो था लेकिन उससे एक तरह का दुराव ही रहा था । अब भी है । वह चाहता तो उस दिन प्रिंट न देने के लिए कोई बहाना कर देता लेकिन उसने ऐसा नहीं किया । उसका पीएचडी में चयन तो हुआ लेकिन बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय में एड्मीशन मिलने के कारण वह वहाँ चला गया ।
विशाल के उस दोस्त के बारे में तो कुछ भी नहीं जानती जो प्रिंट लेने गया था और समय से मेरे पास पहुँचा भी गया था !
उस दिन के लिए मैं इन लोगों के प्रति बहुत कृतज्ञ महसूस करती हूँ । ठीक से किसी को शुक्रिया भी नहीं कह पायी, उस दिन का वह बाकी शुक्रिया आज कह रही हूँ । बहुत-बहुत शुक्रिया ।

[ एक और प्रसंग है, जिसका जिक्र कर ही देती हूँ । उस दिन सौरभ का भी इंटरव्यू था । उनके पास भी प्रिंट नहीं था । वे साउथ कैंपस के एक ह़ॉस्टल में रुके थे । हम दोनों ने अपना सिनॉप्सिस एक दूसरे को मेल कर दिया था कि दोनों में जिसे पहले प्रिंट मिले, वह प्रिंट लेकर दूसरे को तुरंत सूचित कर दे । जब मैं प्रिंट के लिए साइकिल लेकर नार्थ कैंपस में भटक रही थी तब वे यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस और उसके ठीक पीछे के गोपनपल्ली बाजार में भटक रहे थे । वहाँ भी प्रिंट नहीं मिल सका था । कहीं और जाने का समय भी नहीं था और शहर भी अंजान था । उनका इंटरव्यू लिस्ट में सातवें या आठवें क्रम पर नाम था । अपने इंटरव्यू के ठीक बाद मैं साइकिल से कम्प्यूटर सेंटर तक गयी । प्रिटिंग के लिए मेरी दोस्त दीपिका ने अपनी प्री-पेड रसीद दी थी । उस दिन के लिए दीपिका का भी शुक्रिया कहना है । जल्दी में प्रिंट लेकर लौटी तब तक सौरभ ऑटो से विभाग पहुँच गये थे । वे थोड़े चिंतित तो थे लेकिन मेरी तरह उन्हें तनाव नहीं था । वे यहाँ के इंटरव्यू को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहे थे । अपने शैक्षणिक रिकॉर्ड की वजह से उन्हें कहीं न कहीं ऐसा लगता था, कि दिल्ली विश्वविद्यालय में उनका चयन हो ही जाएगा । हालाँकि यह उनकी ग़लतफ़हमी थी । वैसे जो हुआ अच्छा ही हुआ !]


# Department of Hindi, University of Hyderabad, Ph.D. Interview, Coporation of Classmates, Thanks giving