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Sunday, 5 April 2020

'शिकारा' देखने के बाद

कश्मीर का दर्द दशकों पुराना है। एक खुशहाल वादी में जो कई दशकों तक पर्यटन और हिन्दी फिल्मों की शूटिंग का पसंदीदा लोकेशन रहा- उस पर न जाने किस की नज़र लग गयी। धीरे धीरे वहाँ की फिज़ा में घृणा और असंतोष का जहर फैलता चला गया। इसके साथ ही पुलिस और फौज का हस्तक्षेप भी बढ़ता चला गया। हमारे पड़ोस के एक पाकदेश ने भी धरती की जन्नत को जहन्नुम की ओर धकेलने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे कश्मीर कभी नहीं सुलझने वाली समस्या की तरह स्थापित हो गया। कश्मीर दर्दगाह हो गया। दहशतगर्दी, मुठभेड़, पुलिसिया और फौजी अभियानों, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं आदि के बीच आम कश्मीरी पिसता चला गया। खैर 'दर्दगाह' ही सही इसकी अपनी अस्मिता रही है, यह गुमनाम नहीं रहा है। लेकिन इसके साथ गुमनामी की कथा भी जुड़ी हुई है।
इस दर्दगाह के बारे में सोचते हुए कई बार हम उन दर्दगाहोंके बारे में नहीं सोच पाते जो यहाँ से दरबदर हैं। वास्तव में कश्मीर समस्या में कश्मीरी पंडितों का दर्द हाशिये पर ही रहा है। एक मिथक की तरह इसके कई-कई संस्करण और कई-कई व्याख्याएँ मिलती हैं। इस समस्या की ठीक तस्वीर हमारे सामने कभी उभर ही नहीं पाई। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म शिकाराइस स्थिति में एक सार्थक हस्तक्षेप करती है।
1990 के दशक में कश्मीर में क्या हुआ था कि कश्मीरी पंडितों को अपना खूबसूरत आशियाना छोड़ कर प्रतिकूल जलवायु वाले शहरों की ओर पलायन करना पड़ा था? वहाँ सगे-सम्बंधियों जैसे और सहजीवियों की तरह रहने वाले हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन की रेखा कैसे खिंच गयी? कैसे पड़ोसी ही स्वार्थी होकर हैवानियत पर उतर आए? निर्वासित लोगों पर क्या-क्या बीती? कश्मीर की कश्मीरियत पर सिर्फ कश्मीरी मुसलमानों का हक़ है; यह कब से और क्योंकर प्रस्तावित किया जाने लगा? ऐसे कई सवालों के उत्तर इस एक फिल्म में हैं।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नहीं बनायी गयी है। प्रतिशोध की भावना इस फिल्म में कहीं नहीं है। यह फिल्म कश्मीरी पंडितों की समस्या का जिम्मेदार किसी धर्म को नहीं बल्कि भटके हुए लोगों को ठहराती है। यह फिल्म वास्तव में घृणा के खिलाफ है। इस फिल्म का मुख्यपात्र अमेरिका के राष्ट्रपति को बार-बार पत्र लिखकर मिलने की इच्छा जताता है ; मिलकर वह उनसे बस इतना पूछ लेना चाहता है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में वे हथियार क्यों भेजे जो वादियों तक पहुँचकर उसके सीने को छलनी करते गए!
फिल्म इस विश्वास के साथ खत्म होती है कि एक दिन अपने ही घर में भटके हुए लोग ठौर ठिकाने पा जाएँगे और कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पंडित भी अपने घरों को लौट पाएँगे। एक खूबसूरत प्रेमकथा के सहारे जैसे घृणा को सात परत नीचे पाताल में दफन कर दिया गया हो। अभिनय, कहानी, फिल्मांकन सब बेहतरीन है। ऐसी फिल्में उजाले की ओर ले जाती हैं।

Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Monday, 23 March 2020

कोरोना काल में असंवेदनशीलता

महामारी (Covid19) के समय में काम/ सेवा करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के लिए हमारे देश की जनता ने कल शाम जिस जोश के साथ तालियाँ-थालियाँ बजाई थीं; वो देखने लायक था! लेकिन क्या सच में हम ऐसे समय में उन लोगों को धन्यवाद कर रहे थे??
आँखों देखी घटना बता रही हूँ। पास के एक अपार्टमेंट के लोगों ने कल शाम पूरे उत्साह के साथ खूब थालियाँ-तालियाँ पीटीं थीं। आज सुबह उसी अपार्टमेंट के तीसरे-चौथे फ्लोर से कुछ लोग कूड़ा लेने आयी गाड़ी पर 'कोरोना' के डर से अपनी बालकनी से ही कूड़ा फेंकने लगे। कूड़ा इधर-उधर बिखर रहा था और गाड़ी के साथ आए सफाई कर्मचारियों पर भी गिर रहा था। कुछ लोग सड़कों पर कूड़ा फेंंक रहे थे, और सफाई कर्मचारियों को कह रहे थे; उठा के गाड़़ी में डाल दो! एक सफाई कर्मचारी नीचे से चिल्लाई- 'बेटा हम भी तो इंसान हैं!'
थाली-ताली और शंख की ध्वनियों से कल शाम गूँजने वाली कृतज्ञता आज कूड़े की शक्ल में इस तरह बरस रही थी!
ये मानवता के संकट की झलकी भर है। इस संकट के समय में आगे असंवेदनशीलता का न जाने कैसा-कैसा रूप देखना पड़े।

Friday, 20 March 2020

थाॅट प्रवोकिंग फिल्म है 'थप्पड़'


अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म 'आर्टिकल 15' मुझे बेहद पसंद आई थी और एक सकारात्मक फिल्म लगी थी। बाद के दिनों में जब 'थप्पड़' का ट्रेलर रिलीज़ हुआ ; तब से फिल्म देखने की जिज्ञासा थी।

फिल्म रिलीज़ हुई पर देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कुछ खास नहीं मिल रही थी। किसी ने कहा कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा के दिखाया है, तो कोई कह रहा था फालतू ड्रामा है। आज 'थप्पड़' पर फिल्म बनी है; अब कल को उंगली पर फिल्म बनेगी कि तुमने मुझपर उंगली कैसे उठाई! मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी; क्योंकि फिल्म देखी नहीं थी।

फाइनली फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देखने के बाद लगा कि इसे सही मायनों में काबिले तारीफ और ज़रूरी फिल्म कहा जा सकता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे फिल्म में जिस-जिस तरह के लूप होल्स की आशंका थी, शुक्र है फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था। अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जो वह दिखाना चाहते थे, उन्हें उसमें सौ प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। जब आप 'थप्पड़' देखकर उठेंगे तो बहुत सारी चीज़ों पर, बातों पर सोचने के लिए मजबूर होंगे। सही मायनों में 'थाॅट प्रवोकिंग' फिल्म है। जहाँ बात थप्पड़ की होकर भी थप्पड़ की नहीं है। बात जो गलत हुआ उसको 'शिट हैपेन्स' कहकर टालने, गलती को अस्वीकारने, ग्लानि बोध न होने और माफी न मांगने की है और फिल्म में इसे दिखाने में निर्देशक कहीं चूके नहीं हैं।
फिल्म का अभिनय पक्ष भी उम्दा है। पहली बार स्क्रीन पर दिखे पवैल गुलाटी ने मंझा हुआ अभिनय किया है। 'आँखों देखी' के बाऊजी की बेटी बनी माया सराओ को इसमें वकील की भूमिका में पहचानना मुश्किल है; उनका अभिनय भी बेहतर है। बाकी पूरी स्टार कास्ट ने भी काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अनुभव सिन्हा की खासियत है कि उनकी फिल्में बेहद स्पष्ट होती हैं। जो वो कहना चाहते हैं उसमें कहीं भी आपको अस्पष्टता देखने को नहीं मिलती। उनकी पिछली फिल्मों 'मुल्क'और 'आर्टिकल 15' से भी इसे समझा जा सकता है। ये स्पष्टता ही आम से आम दर्शक को भी फिल्म से जोड़ने में सहायता करती है।
'थप्पड़' हमारे समाज को दिखाती है। समाज की उन बारीक चीज़ों को कवर करती चलती है; जिनके बारे में हमारा पितृसत्तात्मक समाज सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। फिल्म आपको बहुत कुछ देकर जाती है।

Sunday, 5 January 2020

पंकज कपूर की 'हैप्पी'


लम्बे अरसे से पंकज कपूर अभिनीत फिल्म हैप्पीका इंतज़ार कर रही थी; बहुत साल पहले इस फिल्म का सिर्फ पोस्टर भर देखा था। फिर सालों तक सर्च करती रही; लेकिन न तो उस फिल्म की चर्चा कहीं सुनी, न ही ट्रेलर वगैरह देखने को कहीं मिला। लेकिन अभी कुछ दिन पहले ज़ी5 पर ये फिल्म अचानक से दिखाई दी। पता चला कि कई तरह की दिक्कतों से जूझते हुए इस फिल्म को परदे पर रिलीज़ करना संभव नहीं हो सका तो अंतत: 25 दिसम्बर को यह फिल्म ज़ी5 पर रिलीज़ की गयी। साल 2019 ने बेहतर हिंदी फिल्मों के ख़याल से लगभग निराश ही किया; ऐसे में साल के अंत तक पहुँचते-पहुँचते हैप्पीदेखना संतोषप्रद रहा।
पंकज कपूर अपनी हर फिल्म में कुछ अलग, कुछ नया करने के लिए जाने-जाते हैं। इस फिल्म में भी उनका अभिनय बेहतरीन है। उल्लेखनीय यह है कि इसकी कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। निर्देशक भावना तलवार ने काबिले तारीफ काम किया है। इससे पहले धर्मफिल्म से भी वो अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। फिल्म हैप्पीपूरी की पूरी ब्लैक एंड व्हाइट इफैक्ट के साथ बनायी गयी है। फिल्म के मुख्य किरदार हैप्पी पर और फिल्म पर चार्ली चैपलिन और उनकी फिल्मों का प्रभाव भी महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म का मुख्य किरदार एक बहुत ही सकारात्मक संवाद को फिल्म में कई बार दोहराता है। उसे यहाँ लिख देने का लोभ मुझसे छूट नहीं रहा है- दोस्तों ये जो ज़िन्दगी नाम की डिश है न, इसमें सबसे ज़रुरी मसाला होता है स्माइल का। इस्माइल प्लीज़ :)  

Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।

Monday, 18 November 2019

डॉ. फ़िरोज़ की नियुक्ति का विरोध और जगन्नाथ-लवंगी प्रसंग


बीएचयू में संस्कृत के सहायक प्राध्यापक के रूप में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों में से कुछ छात्रों के विचार एक न्यूज़ चैनल की वीडियो फुटेज के माध्यम से जानने को मिले। अधिकांश छात्रों ने बताया कि वे काशी की परंपरा और गरिमा को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोई विधर्मी और अनार्य उन्हें धर्म पढ़ाए-सिखाए ये उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने पक्ष को अधिक मजबूती से पेश करने के लिए एक छात्र ने पंडितराज जगन्नाथ से जुड़े प्रसंग का ज़िक्र करते हुए कहा कि आचार्य जगन्नाथ भले ही बहुत प्रतिष्ठित विद्वान और धर्मज्ञ रहे हों, लेकिन काशी के समाज ने उनका भी इसलिए बहिष्कार कर दिया था; क्योंकि उन्होंने एक यवन (मुसलमान) कन्या से शादी की थी। अफसोस है कि उस छात्र ने इस प्रसंग का अधूरा ज़िक्र किया!
लोगों के बीच यह प्रसंग जिस रूप में सुरक्षित है, वास्तव में वह आत्मा की गांठे खोल देने वाला है। कहते हैं कि पंडितराज जगन्नाथ का लवंगी नाम की जिस लड़की से प्रेम हुआ था, वह शाहजहाँ के परिवार में पली-बढ़ी एक अनाथ कन्या थी। उसके माता-पिता मुसलमान थे।
लवंगी से विवाह के बाद आचार्य जगन्नाथ काशी लौटे। काशी के विद्वानों ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया, उनका बहिष्कार कर दिया और स्थिति यह हो गई कि एक बेहद योग्य और विद्वान व्यक्ति का जीवन-यापन तक दूभर हो गया। ऐसी स्थिति में बहुत क्षुब्ध होकर पंडितराज ने कहा कि काशी के पंडित उनका बहिष्कार करने वाले कोई नहीं होते; काशी के द्वारा उन्हें और उनके विवाह को स्वीकारने-अस्वीकारने का निर्णय सिर्फ माँ गंगा कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि काशी का समाज गंगा तट पर आकर खुद अपनी आँखों से देख सकता है कि माँ गंगा उन्हें ठुकराती हैं या स्वीकारती हैं।
तय तिथि को नियत घाट पर काशी निवासियों की पूरी भीड़ जमा हो गई। लवंगी के साथ पंडितराज जगन्नाथ भी घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठ गए। इसके बाद पंडितराज ने गंगा की स्तुति में श्लोक लिखने शुरू किए। कहा जाता है कि उनके एक-एक श्लोक रचने और पढ़ने के साथ गंगा का जल स्तर भी एक-एक सीढ़ी ऊपर आता जाता। इस तरह उन्होंने कुल 52 श्लोकों की रचना की और गंगा का जल उस अंतिम बावनवी सीढ़ी तक पहुँच गया जहाँ पंडितराज और लवंगी बैठे हुए थे। अपने आह्वान पर गंगा के उन तक पहुँचने पर पंडितराज भाव विह्वल हो गए और उनका गला रूंध गया। रूंधे गले से उन्होंने प्रार्थना की कि माँ गंगे उन्हें और लवंगी को स्वीकार कर अपनी शरण में लें। तब पूरी भीड़ के बीच से गंगा ने दोनों को इस तरह से समेटा जैसे कोई माँ अपने बच्चों को गोद में उठा रही हो। इसके बाद कुछ क्षणों में ही गंगा का जलस्तर सामन्य हो गया।
यह प्रसंग धर्म सम्प्रदाय के कृत्रिम कट्टर विभाजन को नकार कर मनुष्य की गरिमा को स्थापित करता है। कहा जा सकता है कि मनुष्यता को स्थापित करने के लिए जगन्नाथ और लवंगी ने अपना बलिदान दिया था!
लेकिन कहते हैं कि काशी के कट्टर विद्वान समाज पर इस बलिदान का भी कोई विशेष असर नहीं पड़ा था। डॉ.फिरोज की नियुक्ति का विरोध करते हुए एक छात्र द्वारा पंडितराज जगन्नाथ के प्रसंग का अधूरा जिक्र; इसी बात को साबित करता है कि वह कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी कायम है!!

Wednesday, 28 August 2019

अशांत कश्मीर, पाकिस्तानी सत्ताधारियों की दुर्भावना और आज़ादी का मतलब


कश्मीर को अशांत बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पाकिस्तान की सरकारों की है। इतिहास गवाह है कि कश्मीरियों के विश्वास को सबसे पहले पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने ही तोड़ा। और अब भी वे आज़ाद कश्मीर के नाटक के नाम पर एक गुलाम कश्मीर को भोग रहे हैं। अगर POK आज़ाद होता तो किस हक़ से इमरान खान पाकिस्तान के स्वंत्रता दिवस पर वहाँ पाकिस्तान का झंडा फहराने गए थे? अपने ही संकल्प से पीछे हटकर पाकिस्तान ने POK में बहुत सारे गैर कश्मीरियों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया हुआ है। कश्मीर से पाकिस्तानियों को इतना ही प्यार होता तो वे अक्साई चीन का हिस्सा चीन को उपहार में नहीं दे देते। अब जब पाकिस्तान में विपक्ष के नेता बिलावल भुट्टो और इमरान खान की पूर्व पत्नी का बयान आया है कि पहले पाकिस्तान के सत्ताधारी श्रीनगर को पाकिस्तान में मिलाने की बात किया करते थे लेकिन अब वो अपने POK को बचाने के लिए भी जूझ रहे हैं; तो साफ़ हो जाता है कि पाकिस्तान किस निगाह से कश्मीर को देखता रहा है। हे महानुभावों गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आतंकवाद से निपटो। मानवाधिकार की बहाली के लिए मन से प्रयास करो। दोनों ही मुल्कों की सत्ता के लिए युद्धोंन्माद, सीमा विवाद जैसे मुद्दे अपने ही देश की जनता के आवश्यक मुद्दों से ध्यान भटकाने की सबसे बड़ी साजिश है।
कश्मीर पर जोर-जबरदस्ती बंद होनी चाहिए। वहाँ पर मानवाधिकार को जिस तरह से ताक पर रख दिया गया है, वह बेहद तकलीफदेह है। यह भी ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट धारा 370 पर एक संतुलित और संवेदनशील निर्णय दे। कश्मीरी आवाम को भी इस बात पर विचार करना चाहिए कि कश्मीर की आज़ादी कोई झांसा तो नहीं है, जिसकी बदौलत हमेशा के लिए अशांति और पिछड़ापन बरक़रार रखा जा सके; और राजनीतिक रोटियाँ सिकती रहें। हम सब इसकी बहुत दर्दनाक कीमत चुकाते आ रहे हैं। कश्मीरियों के आज़ादी के नारों में लम्बे समय से एक यह नारा भी सुना जाता है; जिसमें कहा जाता है- आज़ादी का मतलब क्याऔर जो मतलब बताया जाता है; वह कश्मीरियततो कत्तई नहीं है! यह बात साफ़ होनी चाहिए कि अब यह उप-महाद्वीप एक और पाकिस्तानके निर्माण का सदमा और घाव बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है!
हम एक धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्र हैं। हमें न तो भारत पर कोई हिंदूवादी दावा मंजूर है, न कश्मीर पर कोई इस्लामी दावा। ये दोनों ही स्थितियाँ हमें नर्क की तरफ धकेलने वाली स्थितियां हैं। आज़ादी का मतलब- इस देश में अमन, चैन और नागरिक अधिकारों के साथ जीना है- यही हमारा ध्येय होना चाहिए और इसके  लिए हमें मिलजुल कर कदम से कदम मिलाकर संघर्ष करते रहना होगा।

Thursday, 15 August 2019

नहीं रहीं विद्या सिन्हा

70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो ग़लत नहीं होगा।
जिसने भी रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे लिए’, पति पत्नी और वोजैसी फ़िल्में देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या सिन्हा किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मका हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों, टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

Saturday, 29 June 2019

निर्देशक अनुभव सिन्हा का सचमुच कमाल का काम है- ‘आर्टिकल-15’

2019 में पहली बार सिनेमा हॉल तक गयी और खुशी है कि कुछ सार्थक देख कर लौटी। लगभग 2 घंटे की फिल्म बिना किसी भाषण, बिना किसी जबरदस्ती ठूंसे विमर्श के वह सब बता देती है, जिसकी उससे अपेक्षा हो। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है- समाज, राजनीति, व्यवस्था सबका सच, सबकी परतें खुलती चली जाती हैं। अभिनय, संवाद, सिनेमेटोग्राफी सब में फिल्म को उम्दा कहा जा सकता है।
सुना है कि कुछ जगह ब्राह्मणों ने इस फिल्म का विरोध किया है। मुझे तो इसका कोई औचित्य नहीं लगता। विरोध करने वालों को यह फिल्म देखनी चाहिए, मुझे उम्मीद है कि इससे उन्हें खुद को बेहतर बना पाने में कुछ न कुछ मदद ज़रूर मिलेगी।
एक और बात जिसका उल्लेख होना चाहिए, वह यह कि इस फिल्म के एकदम शुरू में गीत -'कहब त लग जाई धक से' भी शामिल है, जिसे दिल्ली के जन आंदोलनों में अक्सर गाया और सुना जाता है!

Tuesday, 18 June 2019

जादूगर चंचल लाहिरी का आखिरी स्टंट


कोलकाता के मशहूर जादूगर चंचल लाहिरी की ख़बरें कल से पढ़ रही थी कि; जंजीरों और रस्सियों से बँध कर, सात तालों में कैद होकर उन्होंने खुद को हुगली नदी में उतारवाया था। अपना जादुई करतब दिखाते हुए उन्हें जंजीरों-तालों से खुद को आज़ाद करके; नदी से सकुशल बाहर आना था। लेकिन अफ़सोस कि चंचल बाहर नहीं आ सके। उनकी मृत्यु की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन जब तक शव नहीं मिल जाता, तब तक निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता था। खबर पढ़ कर मन बेहद विचलित हुआ। कल से उसी तरफ ध्यान लगा हुआ था। अभी पता चला कि उनका शव मिल गया है। यानी करतब दिखाने के उनके जुनून ने आखिर उन्हें लील लिया।
दुखद ये है कि यह कोई पहला ऐसा वाकया नहीं है। हमारे यहाँ बहुत से जादूगर और जोकर जादू और करतब दिखाते हुए मौत के मुँह में समा गये। बहुत सारी फिल्मों में भी ऐसे त्रासदपूर्ण दृश्य फिल्माए गये हैं। मेरे ख़याल से ऐसे जानलेवा करतब नहीं दिखाने चाहिए। जान से कीमती तो कुछ नहीं होता। लोग अधिक से अधिक तालियाँ बजायेंगे और कुछ पैसे देकर अपने घर चले जायेंगे। आपका हासिल क्या है? ज़ोखिम उठाकर करतब दिखाना, बच गये तो किस्मत, न बचे तो दुर्भाग्य!!
चंचल लाहिरी के बारे में सोच रही हूँ, कि पानी के अन्दर अपनी ज़िन्दगी बचाने के लिए उस वक्त उन्होंने न जाने कितने प्रयास किये होंगे! इस तरह के जानलेवा करतबों के प्रदर्शन पर न सिर्फ प्रशासन द्वारा पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए बल्कि दर्शकों को भी कुछ नया, कुछ थ्रिलिंग देखने के लोभ से बचना चाहिए। आपके थ्रिल के लिए किसी की जान चली जाए, इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता!!

Sunday, 26 May 2019

बेहद अफ़सोसनाक है पायल ताडवी की 'आत्महत्या'


मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की 23 साल की छात्रा पायल की आत्महत्या की घटना बेहद-बेहद दुखद है। यह और भी अधिक अफसोसनाक है कि पायल को आत्महत्या के लिए उकसाने का इल्ज़ाम जिन तीन लोगों पर है, वो तीनों कथित तौर पर जातीय अहंकार से ग्रस्त 'लड़कियाँ' ही हैं! खबरों के मुताबिक पायल ताडवी ने इन्हीं तीन लड़कियों के जातिसूचक और आरक्षण के प्रति अपमानजनक तानों और प्रताड़ना से परेशान होकर यह कदम उठाया। प्रशासन से पायल ने समय रहते शिकायत भी की थी, लेकिन उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया।
आवश्यकता है कि इस घटना की निष्पक्ष तरीके से जाँच हो और दोषियों को कोई रियायत न बरती जाए। यदि तीनों लड़कियों पर लगा आरोप सही है तो कहा जा सकता है कि वास्तव में एक संभावना से भरी भावी डॉक्टर को उन लड़कियों ने मौत के मुँह में धकेल दिया, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ज़रूर मिला था, लेकिन वो कहीं से डॉक्टर बनने लायक नहीं थीं। जातिवादी कॉलेज प्रशासन पर भी सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए!

Saturday, 11 May 2019

अलवर गैंग रेप और न्याय का संघर्ष

अलवर में गैंगरेप की शिकार हुई महिला ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक साथ उदास भी करती हैं और प्रेरित भी। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीती और जिस स्थिति से वह गुज़र रही हैं, उसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। उन्होंने एक और बात यह कही कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह किसी और के साथ न हो, इसलिए दोषियों को बेहद कड़ी सजा दी जाए। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया। वह गहरे दुःख में बोल रही हैं, बावजूद इसके वह अपनी मजबूती को बटोरने का प्रयास भी कर रही हैं।
महिला के पति की हिम्मत भी प्रेरित करती है, जो अपनी पत्नी के साथ न सिर्फ डट कर खड़े हैं, बल्कि अपराधियों को दंड दिलाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं। पति के साथ भी मारपीट हुई थी और उन्हें बंधक बनाकर उनके सामने ही उनकी पत्नी का बारी-बारी से बलात्कार किया गया, उसका विडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल भी कर दिया गया। पति का कहना है कि घरवाले माने या न माने लेकिन वे न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना के बाद भी अलवर जिले में ही रेप की कुछ और जघन्य घटनाएँ सामने आयीं। अपराधियों का हौसला आखिर इतना बुलंद कैसे है? कानून का डर किसी अपराधी में रह ही नहीं गया है। अपराधियों को बिना देरी सख्त से सख्त सजा दी जाए और इस तरह का एक भी अपराधी कानून की गिरफ्त से न छूटे तभी इस तरह के अपराध रुकेंगे। होता यह है कि ऐसे कई अपराधी बार-बार अपराध भी करते हैं और छुट्टे घूमते भी रहते हैं!

Saturday, 27 April 2019

पेप्सिको वालों की बपौती नहीं है 'आलू'

पेप्सिको ने एक खास किस्म (FC5) के आलू की खेती करने पर गुजरात के चार किसानों पर करोड़ों रूपये के हर्जाने का मुकद्दमा दायर किया है। पेप्सिको का कहना है कि इस खास किस्म के आलू को उसने रजिस्टर्ड करवा रखा है, और उससे अनुमति लिए बिना कोई इसे नहीं उगा सकता। लेकिन पेप्सिको इंडिया ने जो अपनी आंतरिक इच्छा ज़ाहिर की है वो ये है कि यदि ये किसान उससे एग्रीमेंट करके इस किस्म के आलू उगाएं और फिर उन्हें ही बेच दें तो वे अपना मुकद्दमा वापस ले लेंगे। किसानों का पक्ष है कि उन्हें यदि पता होता कि इस किस्म के आलू पर किसी का पेटेंट है, तो वो इसकी खेती कभी नहीं करते। लेकिन इसके साथ ही इन किसानों ने ये भी कहा है कि पेप्सिको ने उनसे पहले भी संपर्क किया था और ये कहा था कि वे उन्हें आलू बेचें, लेकिन वे इतनी कम दर देने को तैयार हैं, जो किसानों को मुनासिब नहीं लगता।
मैं अपनी छोटी सी बुद्धि से जो समझ पा रही हूं, वो ये है कि जिस तरह से अंग्रेज किसानों से नील की खेती जबरदस्ती करवाया करते थे, और फिर उससे पैसा बनाते थे, वास्तव में पेप्सिको भी कुछ वैसा ही चाह रही है।
पेप्सिको के पोटेटो चिप्स की खपत भारतीय बाज़ारों में लगातार बढ़ रही है और इसलिए अधिक उत्पादन और अधिक मुनाफे के लिए उनकी बड़ी चाहत है कि उन्हें सस्ती दरों पर आलू मुहैया कराने वाले एक तरह से बंधुआ किसानों की फौज मिल जाए।
सुनो पेप्सिको वालों, बेहतर यह है कि अपने पोटेटो चिप्स और कोक की दुकान समेटो और दफा हो जाओ। यहां के किसान तुम्हारे गुलाम नहीं हैं! वे आलू भी सदियों से उगा रहे हैं और ऑर्गेनिक पोटेटो चिप्स बनाने की तकनीक भी उनके पास सदियों से है। एक तो तुम किसानों का हक मार रहे हो, तुर्रा यह कि उन्हीं को चोर बताकर, उन्हीं से सीनाज़ोरी कर रहे हो, ये सब नाकाबिले बर्दाश्त है!

[नोट - विडंबना यह है कि नील की खेती से किसानों को मुक्त कराने वाले गांधी के गुजरात के किसानों के साथ यह सब हो रहा है और 56 इंच का सीने रखने का दावा करने वाले और देश के किसानों की उदारता का बखान करने वाले हमारे प्रधानमंत्री भी वहीं के हैं।]

Monday, 22 April 2019

ईस्टर के मौके पर श्रीलंका में आत्मघाती बम हमले

ईस्टर के दिन‌ श्रीलंका में आतंकवादियों ने चर्च और होटलों को निशाना बनाते हुए सिलसिलेवार आत्मघाती बम हमले किए। 300 के लगभग निहत्थे-निर्दोष लोग मारे गए और सैंकड़ों अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इनमें सभी उम्र के लोग शामिल थे। इनमें से अधिकांश लोग प्रार्थना के लिए आए थे, या सद्भावना से उत्सव मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे। शुरूआती जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि इन हमलों को एक इस्लामिक आतंकी संगठन ने अंजाम दिया है।
कितना बर्बर और कितना कायरना कृत्य है ये! इसका हासिल क्या होगा? निर्दोष-निहत्थे नागरिकों को मारकर ऐसे संगठन अपने होने का सिर्फ और सिर्फ अहसास कराते रह सकते हैं, इसके अलावा इनका कोई न्यायसंगत लक्ष्य नहीं है, और यदि कोई पागलपन भरा लक्ष्य है भी तो वो कभी हासिल नहीं होने वाला। यदि इस तरह के काम किसी 'जन्नत' की चाह में और 'उनहत्तर कुंवारी रूहों' को भोगने की लालसा में किए जा रहे हों तो उस जन्नत का तो किसी को नहीं पता लेकिन उन जहन्नुमों में आग लगे, जहां ऐसी लालसाएँ जगा-जगा कर इस तरह के 'जिहादी' तैयार किए जाते हैं!!

Friday, 1 March 2019

फिल्म निर्माताओं में देशभक्ति, युद्ध और आतंकी हमले भुनाने की होड़

फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइककी कमाई थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बात से सिनेमा का व्यापार करने वाले बाकी लोग प्रेरणा न लें, यह भला कैसे हो सकता है! अभी पुलवामा में हुई हमले की दर्दनाक घटना को कुछ दिन भी नहीं बीतें हैं, भारतीय वायुसेना के एयर स्ट्राइक के दावे के बाद सीमा पर बनी तनाव की स्थिति ख़त्म भी नहीं हुई है, कई विमानों के क्रैश होने और सेना के जवानों सहित कई लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं, ठीक उसी समय यह खबर आ रही है कि पुलवामा की घटना, बालाकोट एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तानी हिरासत में लिए जाने की घटना पर फिल्में बनाने के लिए प्रोडक्शन हाउसों के बीच टाइटल रजिस्टर करवाने की होड़ मची हुई है! 

मतलब हिंदी सिनेमा के निर्माताओं के लालची दिमाग इस दुखद समय को भी भुनाने के लिए पूरी तरह तत्पर और प्रयत्नशील हैं। इस तरह की घटनाएँ उनके लिए मसाला भर हैं। इसमें और अधिक नमक-मिर्च लगाकर परोसने में तो उन्हें महारत हासिल है ही। इन मुनाफाखोरों के लिए यह सिर्फ अकूत पैसा कमाने का मौका है। देशभक्ति का टॉनिक मिलाकर ये लोग सेना के प्रति देश की जनता की भावनाओं को भुनाएंगे और सोने पे सुहागा यह होगा कि ये बैठे-बिठाये मि. प्राइम मिनिस्टर को फिल्म का हीरो भी बना देंगे! यानी हर तरह से फील गुड एंडिंग!
इतना सब कहने का एक मतलब यह भी है कि देशप्रेम के जज़्बे से प्रेरित होकर जब आप ऐसी फ़िल्में देखने का प्लान बनाते हैं, तो आप सिर्फ आर्थिक ठगी का शिकार ही नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि भावनाओं से खेलने वाले लोगों के द्वारा बेवकूफ भी बन रहे होते हैं। इस तरह का खेल समझ लेने बाद कोई पूछे ‘how’s the josh’? तो क्या कहेंगे भला!!

Friday, 23 November 2018

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता बनाम अब्राह्मणवादी पितृसत्ता!


मुझे लगता है कि वर्चस्व और शोषण की बुनियाद पर खड़ी हर विचारधारा अनिवार्यतः पितृसत्तात्मक मूल्यों की भी पोषक होती है। इसलिए जब मैं ब्राह्मणवाद शब्द सुनती हूं तो उसमें मुझे निश्चित रूप से पितृसत्ता की भी भयानक गूंज सुनाई देती है। लेकिन पितृसत्ता की व्यापकता को अकेले ब्राह्मणवाद कवर नहीं कर सकता! इसलिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की की गई आलोचना महत्त्वपूर्ण होते हुए भी पितृसत्ता के एक सीमित संदर्भ की ही आलोचना है।‌ दुनियाभर की बात तो छोड़िए अगर सिर्फ भारत में ही पितृसत्ता की सारी ज़िम्मेदारी ब्राह्मणवाद पर होती तो ब्राह्मणवाद के मुखर आलोचक गैर ब्राह्मण नेताओं, लेखकों (जिनमें कई दलित लेखक भी शामिल हैं) की पत्नियां, प्रेमिकाएं, बेटियां आदि उन्हीं से प्रताड़ित नहीं होती!! इन बातों के दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध हैं।
मैं कई सुशिक्षित ब्राह्मण ही नहीं गैर ब्राह्मण लड़कों को भी जानती हूं , जो ब्राह्मणवाद की जड़ें खोद देने का दावा किये फिरते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी प्रेमिकाओं को अंत में सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वो उनकी जाति, धर्म या समुदाय से ताल्लुक नहीं रखती थीं! आज जब वही लोग 'Smash Brahmnical Patriarchy' का पोस्टर शेयर करते हुए मुझे दिख रहे हैं, तो मैं यही अर्थ लगा पा रही हूं कि उस पोस्टर में उनके सरोकार का शब्द सिर्फ 'ब्राह्मणवाद' या 'ब्राह्मण' भर है, अगर उनकी गौण अभिरूचि पितृसत्ता में है भी तो वे उसे ब्राह्मणवाद का विषय मान कर अपने भीतर की पितृसत्ता को सकारात्मक पितृसत्ता मानते हैं। हो सकता है ऐसे पुरुषों को अपनी वाली पितृसत्ता, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से निपटने के लिए निहायत ही ज़रूरी लगती होगी! आखिर लोहा ही तो लोहे को काटता है न!!
इस फोटो के ट्विटर पर शेयर होने के बाद कुछ लोगों ने प्रतिवाद किया। प्रतिक्रिया में कई लोगों ने  Smash Brahminical Patriarchy के पोस्टर के साथ सोशल मीडिया पर  अपना प्रोफाइल फोटो अपडेट किया। इस से सम्बंधित बीबीसी की एक खबर का लिंक : https://www.bbc.com/hindi/india-46281808

Tuesday, 20 November 2018

कई कसौटियों पर खरी उतरती है 'मोहल्ला अस्सी'


'पीहू' की कमाई की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' का पिछड़ना इस बात का संकेत नहीं है कि 'मोहल्ला अस्सी' पसंद नहीं की जा रही। दरअसल इसका उल्टा है, सारा खेल प्रमोशंस का है। 'पीहू' के प्रमोशंस और प्रमोशनल स्टंट्स की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' के प्रमोशंस आपको दिखेंगे ही नहीं होंगे! आखिर कब तक प्रमोशंस फिल्म को चलाएंगे! कम से कम फिल्म रिलीज़ के शुरुआती तीन दिनों तक तो हम प्रमोशंस के धोखे से लूटे ही जा सकते हैं!
'मोहल्ला अस्सी' के फिल्मांकन का सूक्ष्म से सूक्ष्म अन्वेषण भी आपको निराश नहीं करेगा। धर्मनाथ पांडे की ग़रीबी आपको उनके साफ-सुथरे कुर्ते में नहीं बल्कि उसके टूटे हुए बटनों में दिखेगी! इसी तरह उनकी पत्नी सावित्री को उनकी दोहराई जाने वाली मामूली किस्म की साड़ियों में देखेंगे। पप्पू की दुकान पर कुल्हड़ में मिलने वाली चाय दौर बदलने पर कांच के गिलास में मिलने लगती है! यही नहीं फिल्म के बैकग्राउंड में बजने वाले श्लोक, अध्यापकीय व्याख्या के लिए लिए गए श्लोक, रामचरितमानस की चौपाइयां और कई बार बहुत साधारण से लगने वाले संवाद भी गूढ़ और व्यापक अर्थों को व्यंजित करते हैं, अगर इन्हें समझा जा सके। बहरहाल कहने को ऐसी बहुत सी बातें हैं लेकिन इन्हें किसी और से सुनने की बजाय खुद देखकर ज़्यादा अच्छे से महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म के कैमरामैन विजय अरोड़ा के काम की तारीफ इस रूप में भी हो रही है कि उन्होंने बनारस या अस्सी को बहुत ही जीवंत रूप से उतारा है।
कुछ लोगों को इस फिल्म का कई-कई पहलुओं को छूना इसकी कमज़ोरी लग रही है, लेकिन वास्तव में यह इस फिल्म की खासियत है कि वो बहुत सारे पहलुओं को सफलतापूर्वक समेट पाती है और एक के बाद एक आने वाले दृश्य कहीं से असंगत नहीं लगते। हां ये ज़रूर है कि इन सभी पहलुओं को समझने के लिए आपके पास देश, समाज, इतिहास, राजनीति, धर्म आदि की बुनियादी जानकारी का होना ज़रूरी है।
साहित्य और सिनेमा की विद्यार्थी होने के नाते मेरी दिलचस्पी जिस बात में सबसे अधिक रही मैं अब उस पर आती हूं। मूल उपन्यास के लेखक काशीनाथ सिंह ने फिल्म देखने के बाद यह प्रतिक्रिया दी है कि फिल्मकार ने मूल कथानक के साथ बिना कोई तोड़-मरोड़ किए एक उम्दा फिल्म बनाई है जो उनके उपन्यास से भी अधिक जीवंत है।

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Sunday, 18 November 2018

निराश करती है विनोद कापड़ी की फिल्म 'पीहू'!

आने वाले हफ्ते के बाकी दिनों की व्यस्तता पहले से निर्धारित थीइसलिए कल शाम पीहू’ और मोहल्ला अस्सी’ दोनों ही फ़िल्में बैक टू बैक देखनी पड़ी। ज़िन्दगी में पहली बार बड़े पर्दे पर एक ही दिन में दो फ़िल्में देखीं। दरअसल दोनों ही फिल्मों का लम्बे समय से इंतज़ार था और मुझे लग रहा था कि इनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
जो पहली फिल्म देखी वो विनोद कापड़ी निर्देशित पीहू’ थी। इससे पहले विनोद कापड़ी मिस टनकपुर हाज़िर हों’ बनाकर तारीफें बटोर चुके हैं। इसलिए पीहू’ से अपेक्षाएं स्वाभाविक थी लेकिन इस फिल्म ने निराश किया। मुझे नहीं पता कि कुछ लोग किन भावनाओं में बहकर इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैंमुझे तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ भावनाओं को भुनाने वाली लगी। सुनने में यह भी आया है कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इस फिल्म को पुरस्कार और तारीफें भी मिली हैं, यह भी मेरे लिए आश्चर्य की बात ही है! फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि इस पूरी घटना को महज़ एक सम्वेदनशील रिपोर्ट के रूप में भी छापा या दिखाया जाता तो वह इस फिल्म से कम प्रभावी नहीं होता। यह फिल्म जो सन्देश देना चाहती हैवो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैलेकिन इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए आपको इस फिल्म को अनावश्यक रूप से लगभग दो घंटे तक झेलना पड़े तो यह बेमानी लगता है।
एक ही लोकेशन और सिचुएशन पर पूरी फिल्म को शूट करना कम खर्चीला ज़रूर होता हैलेकिन वह सचमुच बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता हैउसमें बहुत सावधानी की जरुरत होती है। विनोद कापड़ी और उनकी टीम इस मसले पर काफी लचर साबित हुई है। इस फिल्म में एक से बढ़कर एक असंगत दृश्यों की भरमार है। कई बार तो ऐसा लगा कि जब जिस चीज़ को दिखाना होता है वो चीज़ उस दृश्य में हाज़िर हो जाती है। मसलन बीच घर में बच्ची को फिनायल की बोतल मिल जाती हैइसी तरह बच्ची के हाथ से दूध की बोतल गिर जाने पर उसे वहीं पर पोछा भी मिल जाता है! मुझे लगता है कि निर्देशक ने सोचा होगा कि इन पहलुओं पर कोई बारीकी से ध्यान नहीं देगा जबकिसच यह है कि फिल्म के दौरान यह सारी चीज़ें बहुत डिस्टर्ब करती हैं और यह कोई बारीक नहीं बल्कि साफ़ दिखने वाला अंतर है। एक दृश्य में बच्ची अपनी मृत माँ के ज़ख़्मी चेहरे पर बहुत सारी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाती है और अगले कुछ दृश्यों में वह क्रीम कभी चेहरे पर दिखाई देती हैऔर कभी गायब हो जाती है। ये कुछ संकेत भर हैंइस फिल्म में ऐसी गलतियों की भरमार है। गौर से देखेगें तो इस फिल्म के कई दृश्य और घटनाएँ आपको अतार्किक लगेंगी। एक दृश्य को लेकर हालांकि मैं कोई एक्सपर्ट कमेंट नहीं कर सकती लेकिन मेरे लिए यह ताज्जुब और जिज्ञासा का विषय ज़रूर है कि क्या नींद की चार गोलियां खाकर भी दो साल की बच्ची को महज़ तीन-चार घंटे की नार्मल नींद ही आएगीऔर उसके बाद उठकर वह पूरी तरह एक्टिव हो सकती हैइस फिल्म में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि यह मेडिकली प्रूव्ड होमुझे इसकी जानकारी नहीं है। मेरे खयाल से फिल्म की पटकथा बहुत दुरूस्त नहीं है। इस पर बहुत मेहनत करने की जरूरत थी जिसे शायद बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। शायद बहुत सारा ध्यान एक छोटी बच्ची को फिल्माने की चुनौतियों से निपटने पर ही लगा दिया गया।
एक छोटी बच्ची से प्रभावी अभिनय करवाना सचमुच बहुत कठिन काम है। इस फिल्म की बड़ी खासियत भी यही बताई जा रही थी वो कि एक बहुत छोटी बच्ची से निर्देशक ने चुनौती भरा अभिनय करवाया है। इसमें कोई शक नहीं कि पीहू विश्वकर्मा सचमुच बहुत प्यारी बच्ची हैऔर हर बच्चे की तरह उसकी सहज हरकतें लोगों को पसंद आती हैं और इसे उतारने के लिए निर्देशक और पूरी टीम ने बहुत मेहनत भी की होगीलेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसके बावजूद निर्देशक ने फिल्मांकन का कोई बहुत महीन काम नहीं किया है। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों ने छोटे-छोटे बच्चों से बहुत असाधारण काम करवाए हैं। एक उदाहरण के लिए 1966 में प्रदर्शित हुई चेतन आनंद की एक बहुत ही साधारण फिल्म आखिरी ख़त’ का जिक्र किया जा सकता है जिसमें महज़ सवा साल के बच्चे से बहुत बेहतरीन अभिनय करवाया गया है। वास्तव में बहुत साधारण स्तर के निर्देशकों ने भी चाइल्ड आर्टिस्ट्स से बहुत बेहतर काम करवाए हैं।
पीहू’ के प्रमोशन में इस तरह की भावनात्मक अपील की जा रही है कि जो अपने परिवार से प्यार करते हैं वो यह फिल्म देखने ज़रूर जाएँ। लेकिन फिल्म देखने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि आर्थिक लाभ के लिए यह एक किस्म का भावनात्मक दोहन भर है। इस फिल्म को वो लोग ज़रूर देखने जाएँ जो फ़िल्में देखकर अपनी राय बनाने में यकीन करते हों और हर बार की तरह कहूँगी कि हो सकता है उनकी राय मुझसे अलग हो। जहाँ तक परिवार से प्यार करने का प्रश्न है और यदि आप वो करते हैंतो आपके लिए कोई समस्या ही नहीं है। हम सबको अपने-अपने जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए। शकमतभेदमामूली झगड़ों की वज़ह से इसे तबाह नहीं कर लेना चाहिए। हमें इन सारी चीजों से निपटना आना चाहिए। यहाँ तक कि संबंधों के बीच जब यह लगने लगे कि जीवनयापन दूभर हो रहा हैतब जीने के नए और उत्साहजनक तरीके और रास्ते तैयार कर लेने चाहिए। यह जीवन जीने के लिए मिला हैइसके साथ कुछ उत्तरदायित्व बंधे हुए हैंहमें उन सबका सम्मान करना चाहिए।
दूसरी देखी गयी फिल्म मोहल्ला अस्सी’ ने निराश नहीं किया। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म बहुत सारे प्रक्रियागत झंझटों और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझते हुए प्रदर्शित हुई है। इसपर विस्तार से दूसरे पोस्ट में लिखूँगी। बहरहाल इतना जरूर कहूँगी कि यह फिल्म देखने लायक है। साहित्य पर फिल्म बना पाने की हिम्मत कम फिल्मकार करते हैं। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ हिम्मत करते हैं बल्कि इसे एक अच्छी फिल्म में तब्दील करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। उनकी पहली फिल्म पिंजर’ भी इसका उदाहरण है। हम अपने पैसे खर्च कर इस तरह कि फिल्में देखेंगे तभी फिल्माकारों में इस तरह की फिल्में बनाने की हिम्मत बची रहेगी।