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Friday, 3 May 2019

'फोनी' के सामने डटा ओडिशा

ओडिशा के पुरी तट से टकराने के बाद चक्रवाती तूफ़ान फोनी (fani) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। तटीय इलाकों में मूसलाधार बारिश हो रही है और 200 कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज हवाएँ चल रही हैं। ख़बरों के मुताबिक ओडिशा में बीस साल बाद इतना बड़ा तूफ़ान आया है। हमारे परिवार के कई सदस्य भी कल दोपहर तक पुरी में थे। वापसी की उनकी ट्रेन कल रात की थी, जो रद्द कर दी गयी। लेकिन कल दोपहर को चलायी गयी एक स्पेशल ट्रेन से उन्हें वापसी की टिकट मिल सकी, तो हम लोगों की जान में जान आई। पर्यटक तो फिर भी अपने-अपने घरों को वापस लौट गए होंगे, लेकिन असल चिंता उन लोगों की है, जिनका घर ही पुरी या अन्य तटीय इलाकों में है।
बहुत खूबसूरत और प्राकृतिक सम्पदा के धनी ओडिशा के साथ इस तरह की त्रासदी बार-बार न होती तो वह भारत के संपन्न राज्यों में गिना जाता। लेकिन जिस जीवटता से ओडिशा के लोग इस तरह की आपदाओं का सामना करते हैं, इसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। चूँकि मौसम विभाग ने समय रहते अलर्ट जारी कर दिया था और समय रहते लाखों लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दिया गया है, इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नुकसान कम से कम होगा। लेकिन इसके बावजूद पेड़ों, बिजली वगैरह के खंभों और कच्चे घरों-दुकानों के उखड़ने-टूटने से होने वाले नुकसान को तो नहीं ही रोका जा सकेगा। जो लोग अब भी खतरे वाले इलाकों में रहने के लिए विवश हैं, उन्हें हिम्मत, धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। इस कठिन वक्त में पूरा देश ओडिशा के साथ खड़ा है। हम प्रार्थना कर रहे हैं कि यह तूफ़ान आपकी मजबूती से टकराकर बेहद कमज़ोर हो जाए और जान-माल की कोई हानि न हो!

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Saturday, 18 August 2018

केरल में बाढ़ की त्रासदी

केरल को लोग उसकी समृद्ध प्राकृतिक विरासत के लिए भी जानते हैं। नदियां, समुद्र, हरी-भरी धरती और पहाड़ों की अद्भुत खूबसूरती केरल को एक अलग पहचान देती है। केरल के विषय में किसी की यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि प्रकृति ने मानों एक बड़े कैनवास पर हरे रंग की सुंदर चित्रकारी की हो!
वही केरल इस समय बाढ़ की भारी विभीषिका से जूझ रहा है। कई लोग मारे गए हैं, बहुत सारे लोग विस्थापित हो रहे हैं। लोग भुखमरी और बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। कुल मिलाकर केरल की एक बड़ी आबादी भयंकर संकट का सामना कर रही है और जान-माल का बहुत नुकसान हो रहा है। केरल के लोग सामान्य: इस तरह की बाढ़ के आदी नहीं रहे हैं, इसलिए यह एक नए तरह का खतरा है! आशंका होती है कि वहां के सहज पारितंत्र के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ की जा रही है और व्यावसायिक दोहन या लाभ के इस तरह की गलतियां की जा रही हैं जो नहीं की जानी चाहिए थीं! इसके अलावा जो स्थिति है उससे यह भी पता चलता है कि किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी कम तैयारियां की गई थीं!
जो भी हो इस समय एकजुट होकर केरल को इस आपदा से उबरने में मदद करना हम सबकी प्राथमिकता में होना चाहिए। इसके बाद केरल को उसी स्वाभाविक केरल की स्थिति में लाने की ज़रूरत होगी जहां प्रकृति केरलवासियों की सबसे सच्ची सहचरी होती है, संहार करने वाली नहीं!! 

Wednesday, 23 May 2018

ब्यास नदी त्रासदी

पंजाब की पांच प्रमुख नदियों में 'ब्यास' वह एकमात्र नदी है जिसे मैंने देखा है और एक से अधिक बार देखा है। यह अपने वात्सल्य के लिए जानी जाती है और इसकी खूबसूरती मन मोहने वाली है। पिछले दो-तीन दिन से लगातार एक खबर आ रही है कि बटाला के पास एक शुगर मिल में शीरे का टैंकर फट गया। शीरे का उपयोग शुगर रिफाइन करने में किया जाता है। कथित तौर पर इस लाखों लीटर केमिकल को ब्यास नदी में बहा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस केमिकल की वजह से ब्यास नदी में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो गई लिहाजा कई जलीय जीव खासतौर पर लाखों मछलियां मरकर नदी के ऊपर तैरने लगीं। यही नहीं एक बड़े दायरे में ब्यास नदी का पानी गाढ़ा काला और बेहद दुर्गंधयुक्त हो चुका है। किनारे पर बसने वाले गांवों के सैकड़ों पालतू पशुओं की भी इस पानी को पीकर मौत हो गयी है और कई गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं।
कृषि के लिए इस नदी पर निर्भर एक बड़ी आबादी भी इससे बहुत अधिक प्रभावित हुई है। ब्यास चूंकि पंजाब से बहते हुए राजस्थान तक जाती है इसलिए बहुत बड़ी संख्या में जनजीवन इससे प्रभावित हुआ है।‌ इसके अतिरिक्त ब्यास नदी का धार्मिक महत्व भी है, उस दृष्टि से इस नदी में स्नान करने आने वाले लोग और पर्यटन के लिए आने वाले लोगों को भी भारी तकलीफ उठानी पड़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिनों तक यदि भारी मात्रा में लगातार इस नदी में जल नहीं छोड़ा गया, तब तक यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। विशेषज्ञों का हालांकि यह भी साफ़ मानना है कि इस त्रासदी के बाद नदी के पारितंत्र को पूर्व की स्थिति में आने के लिए कुछ वर्षों तक का समय लग जायेगा! यह मन को बहुत दुःख देने वाली स्थिति है।
हमारे देश में वैसे तो बिरले लोगों को ही पर्यावरण की परवाह होती है और उसमें भी विभिन्न औद्योगिक इकाइयां तो तमाम गाइडलाइंस के बावजूद पर्यावरण विशेष तौर पर जल स्रोतों को प्रदूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं। लेकिन बटाला के पास शुगर मिल प्रबंधन ने अपनी बेहद गैरज़िम्मेदाराना हरकत से एक ही बार में आसपास के पूरे पारितंत्र को जिस तरह से भारी संकट में डाल दिया है, वह बहुत अधिक चिंता का विषय है और प्रबंधन द्वारा अपने इस कृत्य को आसानी से अंजाम देने से यह संदेह गहराता है कि इस तरह की और भी घटनाएं हो सकती हैं। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि इस घटना के लिए जिम्मेदार प्रबंधन पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए और इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए कि प्रबंधन और प्रशासन की मिलीभगत की वजह से असली दोषियों की बजाय मजदूरों को प्रताड़ित न होना पड़े। फिलहाल इस बात की ज़रूरत है कि ब्यास नदी के उपचार के लिए युद्धस्तर पर उपाय किए जाएं और आगे से इस तरह की घटनाएं न हों इसके लिए तमाम सतर्कता उपाय अपनाए जाएं।