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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Thursday, 6 February 2020

लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन


एम.ए. के दिनों में पढ़ा था उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी'। तब इसने चमत्कृत किया था। जुदा कथ्य, सहज-सरल-प्रवाहमयी भाषा और बेहद प्रभावित करने वाला शिल्प। इसके लेखक थे- कृष्ण बलदेव वैद। उन्होंने विभिन्न गद्य विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है और हिन्दी साहित्य जगत में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही है। साथ ही वे हिन्दी के उन लेखकों की परंपरा से भी थे; जिनकी पढ़ाई-लिखाई और आजीविका की भाषा अंग्रेज़ी थी, लेकिन जिन्होंने लेखन के लिए हिन्दी को अपना माध्यम चुना। आज उनका निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Saturday, 1 June 2019

नहीं रही भारत की इकलौती वन-मानुष बिन्नी

चिड़ियाघर (Zoo) जाने से मैं बचती रहती हूँ क्योंकि वहाँ जाने पर मेरा मन अक्सर उदास हो जाता है और कई बार बहुत व्यथित और विचलित भी। सितम्बर 2016 में मैं पुरी-भुवनेश्वर की यात्रा पर गयी थी। एक डेली ट्रिप बस में जब हम घूमने निकले तो उसका अंतिम पड़ाव ‘नन्दन कानन’ था। जहाँ मेरा एक-आध घंटा बीता। ‘नन्दन कानन’ की ख्याति से बचपन से परिचित रही हूँ। मेरी जानकारी में यह एशिया का सबसे विशाल (Largest) ज़ूलॉजिकल पार्क है।
इस चिड़ियाघर ने भी उतना ही निराश किया जितना किसी अन्य चिड़ियाघर में जाकर मैं निराश हुई थी। मैंने सोचा था कि क्योंकि यह बहुत विशाल चिड़ियाघर माना जाता है तो यहाँ पशु-पक्षियों के घूमने फिरने के लिए ज़्यादा जगह होगी और अपेक्षाकृत वे अधिक आज़ाद होंगे। लेकिन वास्तव में यहाँ भी लगभग सभी पशु-पक्षी एक बदतर कैदी जीवन ही जी रहे थे। ये सब देखकर मुझे बस यही लगता है कि चिड़ियाघर जैसी चीज़ होनी ही नहीं चाहिए! किसी पशु-पक्षी के बारे में जानने-समझने और उनसे परिचित होने की अब बहुत सारी मानव-निर्मित तकनीकें विकसित हो चुकी हैं।
‘नन्दन कानन’ में तब मेरा ध्यान जिस एक पशु ने सबसे अधिक खींचा था, वह वन-मानुष था। वह एक बड़े से बेंचनुमा पत्थर पर बैठा हुआ था। अपने दायरे में वह अकेला था और जैसे कोई मनुष्य गहरी चिंता या सोच में डूबा हुआ चेहरे पर हाथ रखकर बैठा होता है, वह वन-मानुष ठीक उसी तरह बैठा हुआ था। उसका वजन भी सामान्य से अधिक लग रहा था। बाड़े के बाहर आते-जाते, शोर मचाते और उसकी तस्वीरें लेते लोगों से उसे तिनका भी फर्क नहीं पड़ रहा था। यहाँ तक कि उसके इर्द-गिर्द धमाचौकड़ी कर रहे बन्दर भी उसे विचलित नहीं कर पा रहे थे। कुल मिलकर यह वैसा ही था जैसे कोई बेहद हताश व्यक्ति कहीं अकेले इस तरह बैठ गया हो कि पूरी दुनिया उसके लिए बेमानी हो गयी हो! उस वन-मानुष की इस दशा और इस मुद्रा की याद मुझे अक्सर कई बार आती रही है।
कल रात अचानक से एक खबर पर नज़र पड़ी कि ‘नन्दन-कानन’ के उस वन-मानुष की मौत हो गयी है। कल ही मुझे कुछ नयी बातें पता चली वह यह कि वह वन-मानुष मादा थी और भारत की इकलौती वन-मानुष थी। उसका नाम ‘बिन्नी’ था और वह 41 साल की थी। पिछले लगभग एक साल से वह काफी बीमार थी और उसका इलाज भी चल रहा था। वन-मानुष की औसत आयु 45 वर्ष मानी जाती है, इस लिहाज़ से उसकी उम्र कम नहीं थी लेकिन सच तो यह है कि नितांत अकेलेपन और कैद ने बहुत पहले ही उससे उसकी सहजता और उत्साह छीन लिया था। हमें यह ज़रूर सोचना चाहिए कि हम ‘मानुष’, भारत के इस अंतिम वन-मानुष के कितने बड़े गुनाहगार हैं!

Wednesday, 28 November 2018

आंवला नहीं आंवड़ा!

यह आंवला नहीं है और जो मुझे स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया और मैंने सही-सही याद रखा है, तो यह आंवड़ा है। सुविधा के लिए इसे आंवले का छोटा भाई मान लीजिए, जो अपने बड़े भाई से कई मायनों में अलहदा है।
मुरब्बे के अलावा आंवले से बना कुछ और मुझे पसंद नहीं, फिर कच्चे आंवले को नमक-मिर्च पाउडर के साथ खाने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। आंवले में भरपूर खटास ही नहीं एक कसैलापन भी होता है, जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त है।
बात आंवडों की करते हैं। मैसूर के टूरिस्ट प्लेसेज़ पर डिस्पोजेबल ग्लास में नमक और मिर्च पाउडर में सने छोटे-छोटे आंवड़ों को ऊपर तक भरकर बेचा जा रहा था। हालांकि सौरभ ने इसे खरीदा आंवला समझ कर ही था, लेकिन जब खाकर इसका स्वाद कुछ अलग लगा तो उन्होंने मुझे और हमारे साथ घूमने निकले दो और साथियों प्रमोद और अजित को भी इन्हें चखने के लिए दिया। यह हम सभी को इतना मज़ेदार लगा कि हमने इसे जमकर खाया और दिलचस्प यह था कि उस दस या बीस रूपये में खरीदे गए ग्लास में छोटे-छोटे इतने आंवड़े थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
आंवले का कसैलापन इसमें बिल्कुल भी नहीं था और आंवले की तुलना में यह मुलायम भी था। हल्का मीठापन लिए और ढेर सारा खट्टापन लिए यह आवड़ा खाने में इतना मज़ेदार था कि अभी जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूं, तब भी इसे सोच-सोचकर मेरे मुंह में पानी आ रहा है।
आंवड़े की तस्वीर तब तो नहीं उतार पाई थी, लेकिन संयोग से कुछ देर बाद इस आंवड़े का एक पेड़ ही कहीं दिख गया और नीचे कुछ आंवड़े भी गिरे हुए थे। आंवड़े और उसके पेड़ की तस्वीर यहां साझा कर रही हूं। ताकि आप इसे पहचान लें और जब कभी मैसूर जाने का मौका मिले तो इसे ज़रूर चखें।

Wednesday, 5 September 2018

गुरु कुम्हार शिष कुंभ

हमें हायर सेकेंडरी स्कूल के दिनों में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने वाले सर को आज याद कर रही हूँ। वे क्लास में जब-जब किसी बच्चे को किसी बात पर डांटते या पीटते (हालांकि वे पीटते बहुत कम थे, और वह भी सिर्फ लड़कों को बल्कि ढीठ लड़कों को) तो उसके तुरंत बाद वे कबीर का एक दोहा लगभग हर बार सुनाया करते – “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि गढि काढैं खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
मैं अब सोचती हूँ कि वे डांट तो देते थे, लेकिन उसके बाद उनके भीतर शायद कोई अपराध बोध रह जाता था, या उन्हें इसका अफ़सोस होता था या कम से कम यह कि मार-फटकार का काम उनके लिए आनंद का विषय नहीं था, जैसा कई शिक्षकों के लिए हुआ करता है! वे न केवल कबीर का यह दोहा सुनाया करते थे, बल्कि हर बार इसका अर्थ भी बताया करते थे। वे कहते थे कि गुरु जब डांटता है, या आपको कड़ाई से कुछ समझाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपसे प्यार नहीं करता बल्कि ऐसा वो इसलिए करता है कि आप के गढ़े जाने में कोई कमी न रह जाये!
वे अच्छा पढ़ाते थे, लेकिन आज मैं उन्हें उनके पढ़ाने के लिए याद नहीं कर रही हूँ, न ही उनके डांटने-फटकारने के लिए बल्कि कबीर का दोहा सुनाते हुए और उसका अर्थ समझाते हुए उनके चेहरे पर जो भाव उभरा करते थे मैं उन भावों को याद कर रही हूँ। उनमें जैसे पीड़ा, विवशता, सद्भावना, पारंपरिक कर्त्तव्यबोध और भय सब मिले-जुले होते थे। शिक्षक के रूप में यह उनकी अपनी सीमा का भी परिचायक था लेकिन साथ ही उनकी संवेदनशीलता का भी!

Saturday, 6 January 2018

ओम पुरी : अप्रत्याशित अनुपस्थिति के एक साल

आज से ठीक एक साल पहले, 6 जनवरी 2017 की सुबह लोगों को यह दुखद खबर मिली थी कि ओम पुरी नहीं रहे। यह खबर बेहद अप्रत्याशित थी, क्योंकि ओम पुरी अभिनय के क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे और अपने कुछ बयानों के कारण उन दिनों वे मीडिया की ख़बरों में भी बने हुए थे। ओम पुरी और सिनेमा के चाहने वालों के लिए यह एक बड़ा धक्का था। ओम पुरी हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जा सकते हैं, जिनके बिना समृद्ध हिंदी सिनेमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
पंजाब के एक छोटे से कस्बे में पले-बढ़े ओम पुरी का बचपन बहुत अभावों में बीता। बाद के दिनों में ओम पुरी को यह स्वीकारने में कभी हिचक नहीं हुई कि उनका बचपन बहुत ही घुटा हुआ था, जिसकी छाप उनपर लम्बे समय तक रही। वे फ़ौज में भरती होना चाहते थे, संयोगों ने उन्हें थियेटर की तरफ मोड़ा और फिर वहाँ जगी अभिरुचि और जुनून ने उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामातक पहुँचाया। यहाँ पहुँचने से पहले तक ओम पुरी ने पढ़ाई जारी रखते हुए अपनी आजीविका के लिए भी बहुत संघर्ष किया। उन्होंने कभी किसी वकील के यहाँ मुंशी का काम किया, तो कभी कॉलेज में लैब असिस्टेंट की नौकरी की। एनएसडी पहुँच कर भी उनके लिए चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई थीं। उनकी पढ़ाई-लिखाई पंजाबी माध्यम से हुई थी और वे अंग्रेज़ी में बहुत असहज थे, जबकि एनएसडी का माहौल पूरी तरह अंग्रेजीदां हुआ करता था। बहुत मेहनत से उन्होंने इस चुनौती को पार किया। वे फक्र से बताया करते थे, कि बाद के दिनों में उन्होंने लगभग दो दर्जन अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेज़ी फिल्मों में भी काम किया। 
यह इन दोनो संस्थानों के प्रशिक्षण का ही कमाल था कि जब स्क्रीन पर ओम और नसीर जैसे कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो सिनेमा के दर्शकों को एक अनूठा अनुभव मिला। उस दौर तक कुछ अपवादों को छोड़कर चेहरे-मोहरे और डील-डौल ही हिंदी सिनेमा के नायकों की पहचान हुआ करता था। नसीरुद्दीन और ओम पुरी जैसे कलाकारों ने उस मिथक को तोड़ने में बहुत बड़ा योगदान दिया। नसीरुद्दीन ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया कि एनएसडी के दिनों की ओम पुरी और उनकी एक तस्वीर देखकर शबाना आज़मी ने कहा था कि ‘दो ऐसे बदशक्ल इंसान ज़ुर्रत कैसे कर सकते हैं एक्टर बनने की!’ बेशक शबाना ने यह बात मज़ाक में कही होगी, लेकिन दरअसल इसमें हिंदी सिनेमा उद्योग और उसके दर्शकों की मानसिकता की अच्छी अभिव्यक्ति हुई है।
हिंदी सिनेमा की क्लासिक कही जा सकने वाली कई फिल्मों में ओम पुरी ने अभिनय किया और उनका यह अभिनय इतना प्रभावशाली है कि दर्शकों के मन पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाता है। हिंदी सिनेमा का सबसे ज़मीनी और सबसे उम्दा दौर माने जाने वाले सामानांतर सिनेमा को जिन कुछ अभिनेताओं ने सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया, ओम पुरी उनमें से एक हैं। उस दौर की फिल्मों में ओम पुरी, नसीरुद्दीन, शबाना और स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों की इतनी प्रभावी, सफल और विविधता से भरी पुनरावृत्ति हुई है कि कई बार ऐसा लगता है, कि ये लोग न होते तो शायद समानांतर सिनेमा न होता!
‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’, ‘तमस’ और ‘धारावी’ जैसी फिल्मों में केन्द्रीय भूमिका निभाते हुए ओम पुरी ने जो यादगार अभिनय किया है, उसकी मिसालें दी जाती हैं। ओम पुरी ने कई महत्वपूर्ण फिल्मों में अपनी सहायक व छोटी-छोटी भूमिकाओं से भी दर्शकों को बहुत प्रभावित किया। अर्थपूर्ण सिनेमा के प्रति निष्ठा रखने के बावजूद ओम पुरी ने अपनी आजीविका के लिए उन व्यावसायिक फिल्मों में भी काम करने से परहेज़ नहीं किया जिन्हें चलताऊ किस्म की फ़िल्में कहा जा सकता है। ऐसी फिल्मों में भी अपनी भूमिकाओं का निर्वाह उन्होंने बहुत शिद्दत से किया है और इस बात के लिए उनकी तारीफ भी की जाती है। इन फिल्मों में काम करने के कारण ही वे हिंदी सिनेमा के दर्शकों से लगातार रूबरू होते रहे और कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जब उनके पास काम नहीं रहा हो।
ओम पुरी को इस बात का हमेशा मलाल रहा कि वे जितनी अच्छी भूमिकाएँ करने की क्षमता रखते थे, वैसी भूमिकाएँ उन्हें बहुत कम मिलीं। नसीरुद्दीन शाह को संबोधित एक वीडियो सन्देश में उन्होंने कहा था कि ‘उन लोगों के काम की तारीफ विदेशों में भी होती है, लेकिन अपने ही देश के फिल्मकार अच्छी-अच्छी भूमिकाएँ अपने निकटतम लोगों को बाँट देते हैं और बची-खुची भूमिकाएँ उन लोगों के हिस्से आती हैं।’ ओम पुरी यह भी कहा करते थे कि उम्दा विदेशी फिल्मों को देखकर उनके मन में यह कसक उठती है कि अगर उन्हें ऐसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिले तो वे साबित कर सकते हैं कि वे किसी उम्दा विदेशी अभिनेता से कमतर नहीं हैं। उन्हें जब कभी उम्दा अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में काम करने का मौका मिला तो उन्होंने अपने इस दावे को साबित भी किया।
ओम पुरी के बेहद आत्मीय मित्र होने के बावजूद उनके देहांत पर नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि ‘ओम को उनके दर्द से मुक्ति मिली है’ तो इस बात को समझने में कोई मुश्किल नहीं रह जाती कि वे अपने निजी जीवन में बहुत अधिक समस्याओं का सामना कर रहे थे। उनकी दूसरी पत्नी नंदिता पुरी, इकलौते बेटे के साथ उनसे अलग रहा करती थी। ओम पुरी का अपने बेटे से बहुत अधिक लगाव था और यह दूरी उन्हें भावनात्मक रूप से बहुत व्यथित रखती थी। पहली पत्नी सीमा कपूर से अलग होने का गहरा अपराधबोध भी उन्हें घेरे रहता था। निजी जीवन में आत्मीयता का जो अभाव था, उसका असर उनकी जीवनशैली और उनके स्वास्थ्य पर भी गंभीर रूप से पड़ा था। एक तरफ वे फिल्मों में व्यस्त रहते थे, वहीं दूसरी तरफ वे भारी अकेलेपन और रिक्तता के शिकार थे। वे चाहते थे कि कोई न कोई बातचीत करने वाला अक्सर उनके साथ बना रहे। कथित रूप से अपनी आखिरी शाम को वे अपने बेटे से मिलने गये थे, लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो पायी थी।
सच यही है कि एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता को हमने असमय ही खो दिया। अपने आखिरी दिनों तक उनमें बेहतर काम करने की ललक थी। निश्चित रूप से यदि वे जीवित होते तो हिंदी सिनेमा के दर्शकों को उनकी और भी कई बेहतरीन भूमिकाएँ देखने को मिलतीं। ओम पुरी ने हिंदी सिनेमा को जो योगदान दिया है, उसके लिए हिंदी सिनेमा हमेशा उनका ऋणी रहेगा।

Sunday, 31 December 2017

100वें पोस्ट के बहाने पुनरीक्षण और आभार

अगस्त 2014 में जब मैंने यह ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब एक तरह से ब्लॉग का ज़माना जा चुका था। वह 21वीं सदी का पहला दशक था, जब हिंदी लेखकों और पाठकों के लिए ब्लॉग की दुनिया तेज़ी से खुलने लगी थी और ब्लॉग बहसों, संवाद, विमर्शों और अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन गए थे। उस दशक तक तो मेरा इन्टरनेट से ठीक से परिचय भी नहीं हुआ था। अपने एम.ए के दिनों तक मेरे पास जो फ़ोन था वो सिर्फ कॉल सुनने, कॉल करने के काम आता था। मेरे घर में पहला कंप्यूटर 2011 में आया, तब मैं एम.ए अंतिम वर्ष में थी और लगभग उन्हीं दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर में इन्टरनेट का उपयोग करना भी सीख रही थी। यानि कुल मिलाकर मेरी इन्टरनेट के साथ जो संगति है, वह पिछले मात्र पाँच-छ: सालों की है। 2013 में हैदराबाद विश्वविद्यालय आने के बाद यह संगति अधिक प्रगाढ़ हुई। ज़रूरत पड़ने पर यहाँ मैंने अपने लिए एक लैपटॉप भी खरीदा और विश्वविद्यालय की ओर से असीमित इन्टरनेट की सुविधा भी मिल रही थी।
जिस दौर में मैंने लिखना शुरू किया वह ब्लॉग के उतार का युग था या नहीं इससे कोई बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मुझ जैसे नये लेखकों के लिए यह बड़ी बात थी कि हमें किसी शब्द संख्या में बंधें बिना अपनी मर्ज़ी से इन्टरनेट पर लिखने का स्पेस मिल रहा था और वह भी बिना कोई शुल्क दिए! सबसे बड़ी बात यह थी कि मुझे जो लिखना था उसे सार्वजनिक करने के लिए मुझे किसी पत्रिका और उसे चलाने वालों के अहंकार से दो-चार होने की ज़रूरत नहीं थी। यानी कि मैं जो लिख रही थी उसके सार्वजनिक होने में महज़ एक क्लिक का फासला था। मेरी लिखी हुई चीज़ों तक लोग गूगल सर्च करके पहुँच सकते थे। जिस इन्टरनेट की दुनिया का उपयोग मैं जानकारी हासिल करने के लिए कर रही थी, उस दुनिया को बहुत नगण्य ही सही मैं अपना थोड़ा-बहुत योगदान दे सकने की स्थिति में भी थी।
मैंने इस ब्लॉग के माध्यम से कोई महत्वपूर्ण काम किया हो ऐसा नहीं है, लेकिन इसने मेरे लेखन को प्रोत्साहित किया और अपने ब्लॉग के नाम और अपने घोषित एजेंडे के अनुरूप मैंने जब जो उचित समझा, जो मन ने कहा वह सब यहाँ लिखा। इसलिए मेरे ब्लॉग में कई लेख आकार में बहुत छोटे तो कुछ बहुत बड़े भी हैं। इसी तरह लेखों की प्रकृति में भी विभिन्नता रही है। सिनेमा में रूचि रखने और सिनेमा का शोधार्थी होने के नाते सिनेमा पर और इसी तरह स्त्री होने के नाते स्त्रियों से सम्बद्ध विषयों पर बेशक मैंने अधिक लिखा है, लेकिन इसके अलावा मुझे जब जिस किसी विषय पर लिखने की ज़रूरत महसूस हुई है, मैंने बेझिझक लिखा है।
ब्लॉग लेखन शुरू करना उत्साहजनक था, लेकिन लिखा हुआ पाठकों तक पहुँचे यह आवश्यक था। इसमें फेसबुक से बड़ी सहायता मिली, जहाँ मैं अपने लिखे हुए लेख के कुछ अंश सहित ब्लॉग लिंक शेयर करती थी और इससे हर लेख को फ्रेंडलिस्ट से पाठक मिलते रहते थे। यह सिलसिला अब भी जारी है। मेरा खयाल है कि फेसबुक के माध्यम से ही लोगों ने जाना की ‘जो मन में आया’ नामक ब्लॉग भी मेरे लेखन का एक ठिकाना है। कई व्यावहारिक कारणों से मैंने अपनी फेसबुक फ्रेंडलिस्ट बहुत हद तक सीमित रखी है। मैं मानती हूँ कि फ्रेंडलिस्ट में शामिल लोगों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है, उसमें कम संख्या में ही सही संजीदा और संवेदनशील लोग हों।
हालांकि ऐसा नहीं है कि मेरे ब्लॉग को लेकर फेसबुक पर मुझे बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिलती रही हो। मेरे आम फेसबुक पोस्ट की तुलना में ब्लॉग पोस्ट को शेयर करने पर मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ परिमाण में बहुत कम होती हैं, लेकिन फिर भी यह इतनी प्रभावी ज़रूर होती हैं कि मुझे लिखते रहने की उर्जा मिलती रहे। मेरे कई ब्लॉग पोस्ट तो कई बार फेसबुक पर मेरे किसी विषय पर लिखे हुए पोस्ट का संशोधित परिवर्धित रूप ही होते हैं, और निश्चित रूप से इसमें वहाँ मिली प्रतिक्रियायों की भी भूमिका होती है।
तारीफ़ ही नहीं आलोचना भी सिखाती है, और मैं इन दोनों को ही बहुत महत्वपूर्ण मानती हूँ। इसको लेकर मैं पर्याप्त गंभीर रही हूँ और इसलिए अपनी फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में ऐसे लोगों को शामिल नहीं रखना चाहती जो फेसबुक पर सक्रिय रहते हुए भी लम्बे समय तक मेरे प्रति सायास उदासीनता बरतते हुए नज़र आते हों। मैंने अपना यह विचार कभी छुपाया भी नहीं है, इसके बावजूद फ्रेंडलिस्ट रिवाईज़ करते रहने के कारण कई लोगों ने मन ही मन मुझे अपना शत्रु समझ लिया, जबकि ऐसा मानना अनावश्यक है। असल में मेरे लिए यह एक सैद्धांतिक और ज़रूरी व्यावहारिक मसला है।
ब्लॉग लेखन शुरू करने के बाद ही मेरे लिए अपना लिखा हुआ लोगों तक पहुंचाने के अन्य कई माध्यम भी खुले। ओम थानवी के सम्पादन काल तक ‘जनसत्ता’ में ब्लॉग लेखकों के लिए एक कॉलम हुआ करता था, जिसमें कई बार मेरे लेख प्रकाशित हुए और उससे भी ब्लॉग में अभिरुचि रखने वाले कई लोगों ने जाना कि मैं नियमित ब्लॉग लिखती हूँ और उनमें से कई लोग गूगल प्लस के माध्यम से मेरे ब्लॉग से जुड़े। बाद के दिनों में मुझे कुछ अन्य इन्टरनेट प्लेटफॉर्म्स पर भी अपने लिखे हुए को साझा करने का मौका मिला, जिसमें ‘स्त्रीकाल’ और ‘यूथ की आवाज़’ उल्लेखनीय हैं।
लगभग साढ़े तीन साल बाद 2017 के एकदम अंत में अपना यह 100वां पोस्ट करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब खुद भी यह उम्मीद नहीं थी कि नियमित लिखती रह पाऊँगी। चाहती हूँ कि आगे भी लिखती रहूँ। लेखन आजीविका का भी साधन बन जाए तो बहुत अच्छा है, लेकिन जब तक ऐसा न हो तब तक, यह भी कम बड़ा सुख नहीं है कि अपना लिखा हुआ उन लोगों तक पहुँचे जिनके लिए हम लिख रहे हैं। जिन लोगों ने प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियायों से उत्साह बढ़ाया, जिन लोगों ने ज़रूरी आलोचना की उन सब का बहुत शुक्रिया। यह आत्मीय सहयोग आगे भी बनाये रखें और मेरे लिए यह कामना करें कि मैं अनवरत लिखती रह सकूँ। मैं अभी अपनी थोड़ी-बहुत सार्थकता यदि कहीं महसूस कर पाती हूँ, तो वह मेरे लिखने-पढ़ने में ही है। समस्त पाठकों और मित्रों का ह्रदय से आभार। 

Monday, 4 December 2017

हमेशा याद किये जायेंगे शशि कपूर

18 मार्च 1938 को कोलकाता में जन्में शशि कपूर फिल्मों के अलावा थिएटर से भी गहरा जुड़ाव रखते थे। उनकी पत्नी जेनिफ़र भी एक थिएटर आर्टिस्ट थीं और दोनों के बीच मुलाकात भी कलकत्ता में तब हुई थी, जब जेनिफ़र अपने पिता के थिएटर ग्रुप और शशि अपने पिता के थिएटर ग्रुप में सक्रिय थे।
प्रतिष्ठित पृथ्वी थिएटर को भी फिर से खड़ा करने में पृथ्वीराज कपूर के इस सबसे छोटे बेटे शशि और बहु जेनिफ़र ने ही अपना योगदान दिया। इसके अलावा सिनेमा में शशि कपूर की अपनी एक पहचान और लोकप्रियता रही है। बाल कलाकार के रूप में हालांकि उन्होंने अपनी पहली फिल्म 1948 में ही की थी। लेकिन एक वयस्क अभिनेता के बतौर वे साठ के दशक से नब्बे के दशक तक हिंदी और अंग्रेजी सिनेमा में लगातार सक्रिय रहे। 'दीवार' जैसी लोकप्रिय फिल्म में अपनी छाप छोड़ने वाले शशि कपूर ने कई संजीदा फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। नब्बे का दशक जिसे उनके अभिनय का अंतिम पड़ाव कह सकते हैं, में भी उन्होंने कुछ ऐसी फ़िल्में की हैं, जिनमें उनके अभिनय की तारीफ की जाती है, जैसे 'इन कस्टडी' (1993) और 'जिन्नाह' (1998)।

शशि ने लम्बी बीमारी के बाद आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसा माना जाता है कि 1984 में पत्नी जेनिफ़र के देहांत के बाद वे भावनात्मक स्तर पर बहुत टूट गए थे और अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहने लगे थे। एक दौर में अपनी फिटनेस के लिए जाने जाने वाले शशि का वजन भी बाद के दिनों में बहुत बढ़ गया था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि कई सालों से वे दोपहर का खाना नहीं खाते थे, लेकिन पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने बिना सोचे-विचारे कभी भी कुछ भी खाया। वे कहते थे कि जेनिफ़र नहीं रही तो किसके लिए फिट दिखना!
भारतीय सिनेमा और थिएटर की दुनिया में शशि कपूर हमेशा याद किये जाते रहेंगे। अलविदा और हार्दिक श्रद्धांजलि।

5 दिसम्बर को 'यूथ की आवाज़ (YKA)' पर भी प्रकाशित 
#ShashiKapoor #InCustody #Jinnah #Deewar #Jeniffer #PrithviTheatre 

Sunday, 1 October 2017

अग्रेज़ियत का एक प्रसंग

कुछ महीने पहले की बात है, हमारे पड़ोस के एक विश्वविद्यालय (मौलाना आज़ाद उर्दू विश्वविद्यालय) में आयोजित किसी सेमिनार में हिस्सा लेने अमेरिका की नॉर्थ केरोलिना यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने वाले जॉन शील्ड काल्डवेल भी आये थे। समय निकाल कर वे हमारे हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों से भी बातचीत करने आए। हिन्दी के एक विदेशी प्रोफेसर को सुनने की जिज्ञासा लिए जमा हुए विद्यार्थियों के लिए निर्धारित कमरा छोटा पड़ गया था। मैं थोड़ी देर से पहुँची थी और दरवाजे के बाहर से ही खड़ी होकर उन्हें सुन रही थी।
अमेरिका में हिंदी पढ़ाने के अनुभव और समस्याओं पर बात करने के बाद प्रश्नोत्तर का सिलसिला शुरू हुआ। इसी क्रम में प्रो. काल्डवेल ने यह जानना चाहा कि अगर आप अमेरिकी बच्चों की हिंदी पढ़ाने की कक्षा में जाएँगे, तो वहां आप उन्हें अभिवादन के लिए क्या कहेंगे और थैंक्यू के लिए क्या कहेंगे? कुछ देर के लिए कमरे में चुप्पी रही लेकिन तभी कुर्सी पर बैठे एक शोधार्थी ने उठकर कहा सर हम उन्हें हेलोकहेंगे ! और थैंक्यूके लिए शुक्रियाकहेंगे। प्रो. काल्डवेल ने कहा कि आप भारतीय फ़ोन पर बातचीत करते हुए तो हेलोको अपना ही चुके हैं, लेकिन क्या हिन्दी सिखाने की कक्षा में भी अभिवादन के लिए हेलोही कहेंगे! शोधार्थी ने उत्तर दिया कि हेलोएक तरह से अंतर्राष्ट्रीय शब्द है, और इसे पूरी दुनिया में हर कोई समझता है। मैंने दरवाजे के बाहर से ही इस तरह बोलने की कोशिश की कि आवाज उन तक पहुँच सके। मैंने कहा- सर, अभिवादन के लिए हम उन्हें नमस्तेकहेंगे और थैंक्यू के लिए धन्यवादया शुक्रियाकुछ भी! उन्होंने इस ज़वाब पर संतोष व्यक्त किया।
मैं सोचती हूँ कि उस दिन संभवतः प्रो. काल्डवेल के अनुभव में एक नयी बात यह जुड़ी होगी कि भारतीय छात्र अभिवादन के लिए भी अपनी भाषा के शब्दों को असमर्थ मानने लगे हैं। बहुत संभव है कि अपने इस अनुभव का ज़िक्र वे कई जगह करेंगे! मेरे लिए अधिक चिंता का विषय यह है कि जिस शोधार्थी ने उन्हें ऐसा कहा वह अपेक्षाकृत सजग और प्रबुद्ध शोधार्थियों में गिना जाता है, और उसी ने बाद में बताया कि उसने जो कुछ कहा वह अनायास नहीं था, उसके लगातार चिंतन मनन और अनुभव का निचोड़ था!
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#University of Hyderabad #Hindi #English #English Domination

Saturday, 9 September 2017

वे गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहते थे!

एम.ए के दिनों में पाश (09 सितम्बर 1950 - 23 मार्च 1988) से परिचय हुआ था, उनकी कुछ कविताएँ हिन्दी में पढ़ी सुनी, लेकिन उन्हें जब गंभीरता से पढ़ना चाहा तब पता चला कि वे पंजाबी भाषा के कवि हैं। (यह मेरे लिए फक्र करने की बात थी!)
हिन्दी में उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा ही नहीं था, कि अनूदित कविताएँ पढ़ रही हूँ! बल्कि इसके विपरीत जब उन्हें पंजाबी में पढ़ने की कोशिश करती हूँ, तो वे कविताएँ मुझे अनूदित लगती हैं।
मुझे लगता है, एक सच्चे, जुझारू और ईमानदार व्यक्ति की रचनाएँ जिस भाषा में भी अनूदित कर दी जाएँ, वह उसी भाषा की लगने लगती हैं। यह संयोग था कि मैंने पाश को पहले हिन्दी में पढ़ा! निसंदेह इसमें एक बड़ी भूमिका चमनलाल सहित उन सभी अनुवादकों की भी है, जिन्होंने बड़े मनोयोग से पाश की कविताओं का अनुवाद कर उन्हें हिंदी पाठकों के समक्ष रखा।
पाश यदि जीवित होते तो आज अपने जीवन के 68वें साल में प्रवेश करते। वे बेशक एक लम्बा जीवन नहीं जी सके, लेकिन उन्होंने एक बड़ा जीवन जिया! इसलिए तो वे हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं। 

पाश की कविता अब विदा लेता हूँ’ (अनूदित) से कुछ अंश 
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"धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूँज जाना-
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया"
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"सब भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना।"

#PASH #BIRTHDAY #23MARCH #PUNJABI KAVI #CHAMANLAL

Friday, 8 September 2017

उनका वह गुनगुनाना

फिल्म इजाज़त के लिए गुलज़ार ने एक गीत लिखा और उसे फिल्म के संगीतकार आर.डी बर्मन के पास लेकर गये। गीत के बोल, उसका फॉर्म और नये तरह के रूपक आर.डी बर्मन के पल्ले नहीं पड़ रहे थे। वे बुरी तरह चिढ़ गये और बोले कि कल को तुम अखबार से कोई खबर उठा लाओगे और कहोगे कि इस पर धुन बना दो तो क्या मैं बनाने बैठ जाउंगा? गुलज़ार उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन जिद्दी पंचम दा को कौन समझा सकता था भला!
इन दोनों की बातचीत को कोई और भी सुन रहा था। बातचीत के दौरान ही लिखा हुआ गीत उनके हाथों में आया और उन्होंने यूँ ही उसे गुनगुनाने की कोशिश की। यह इतना प्रभावी था कि आर.डी बर्मन ने उनसे एक बार फिर इसे गुनगुनाने को कहा। एक संगीतकार ने इस गुनगुनाहट में इस गीत का मर्म पा लिया और आज वह गीत गुलज़ार के लिखे सबसे बेहतरीन गीतों में शुमार है।
'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' को गुनगुनाने वाले उस शख्स का नाम जानते हैं आप? वे थीं, मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोंसले। बाद में उन्होंने ही इस गीत को गाया भी। आशा की नैसर्गिक संगीत प्रतिभा का परिचय देने में अकेले यह प्रसंग भी समर्थ है।
आशा ने अनेक भाषाओं में हज़ारों गीत गाये हैं। माना जाता है कि उनकी गायकी का रेंज बहुत बड़ा है। उनका जबरदस्त एनर्जी लेवल भी उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके चाहने वालों की बड़ी तादाद है। हिन्दी सिनेमा को उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है और यह हमेशा ही उल्लेखनीय रहेगा। 


#AshaBhonsle #Birthday #RDBurman #PanchamDa #Gulzar #Ijazat #MerakuchSamaan

Sunday, 30 July 2017

अजित कुमार और स्नेहमयी चौधरी को याद करते हुए

हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि गद्यकार अजित कुमार 18 जुलाई 2017 को इस संसार से विदा हो गये । उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद 29 जुलाई 2017 को उनकी जीवन संगिनी और हिन्दी की स्थापित कवयित्री स्नेहमयी चौधरी का भी निधन हो गया है । इन दोनों से मेरी संक्षिप्त लेकिन अमिट यादें जुड़ी हुई हैं । इन्हें याद करते हुए क्रमशः 18 जुलाई और 30 जुलाई को लिखे गये मेरे फेसबुक पोस्ट यहाँ ब्लॉग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

फरवरी’2014 में अजित कुमार जी से अपने एम.फिल शोध के दौरान मिलना हुआ था । मुझे हिन्दी के कुछ साहित्यकारों-आलोचकों के साक्षात्कार लेने थे । अजित जी एक फ़ोन कॉल पर ही बेहद सरलता से उपलब्ध हो गए थे । उन्होंने साक्षात्कार के लिए अपने घर पर बुलाया । मैं अपनी एक दोस्त राखी के साथ उनके घर पहुँची । उन्होंने बहुत ही प्रसन्नता और उत्साह से स्वागत किया । इसके बाद बिना किसी भूमिका के उन्होंने मुद्दे पर बात करनी शुरू कर दी थी । हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व पर केन्द्रित मेरे शोध कार्य को लेकर उनका बेहद सकारात्मक रवैया मुझे बहुत अच्छा लगा था । उनसे दो-तीन दिन पहले मेनेजर पांडेय से हुई बातचीत से मैं थोड़ी निराश हो गई थी ।
साक्षात्कार के दौरान बाएँ से राखी, अजित कुमार और मैं
तय समय के अतिरिक्त उनसे बहुत सी बातें हुईं । इतनी अधिक उम्र के बावजूद उनकी सक्रियता प्रभावित करने वाली थी । लिखने और टाइप करने में असुविधा के कारण उनकी एक सहायक डिक्टेशन लिया करती थी, लेकिन उनका लेखन अनवरत था । उनकी आवाज़ में एक खनक थी और उस पर उम्र का अधिक प्रभाव नहीं पड़ा था ।
अंत में उन्होंने हमारे लिए चाय बनावाई । इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी स्नेहमयी चौधरी को आवाज़ दी । उनकी स्थिति मुझे अजित जी से अधिक नाज़ुक लगी थी । वे खुद से चल भी नहीं पा रही थीं । उन्हें कमरे के दरवाज़े से हाथ पकड़ कर अजित जी लाए । हमारा परिचय कराया । एक कवियत्री के रूप में उनका परिचय देते हुए उन दोनों से जुड़ी और भी कई बातें की ।
अजित जी से वह एक मात्र मुलाकात और साक्षात्कार मुझे उनके प्रति आभारी बनाता है । आज (18.07.2017) सुबह उठते ही उनके देहांत की दुखद सूचना मिली । उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि ।

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अजित कुमार को इस दुनिया से गए तेरह दिन भी नहीं हुए थे, कि कल देर रात (29.07.2017) उनकी जीवन संगिनी और चर्चित कवयित्री स्नेहमयी चौधरी ने भी इस संसार को विदा कह दिया!
यदि कोई दूसरी दुनिया होती होगी, तो आप दोनो वहां भी एक-दूसरे का यूं ही खयाल रखते हुए, खूब खुश रहें! हार्दिक श्रद्धांजलि स्नेहमयी!

Tuesday, 23 May 2017

यादों में माधुरी जी

15 दिसम्बर 1958 को महाराष्ट्र के पुणे में जन्मी माधुरी उमराणीकर ने पुणे विश्विद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई के अतिरिक्त रूसी भाषा में एडवांस्ड डिप्लोमा किया था। मृत्युपर्यंत वे भारत के एक महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा संस्थान बीडीएल, हैदराबाद के रूसी अनुवाद प्रभाग में कार्यरत रहीं। मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी और रूसी भाषाओं पर उनका प्रायः समान अधिकार था। इन भाषाओं की शब्द-संपदा में उनकी विशेष अभिरूचि और विशेषज्ञता थी। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने रूसी भाषा से हिन्दी और मराठी में कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक अनुवाद किये थे। इनमें से कुछ ही उनके जीवनकाल में प्रकाशित हो सके थे।

हैदराबाद में मैथिलीभाषी प्रवासियों की ‘देसिल बयना’ नामक एक संस्था है। हैदराबाद आकर सौरभ इस संस्था से जुड़ गये थे। हमारी शादी के बाद मैं भी अक्सर उनके साथ इस संस्था के कार्यक्रमों में जाने लगी।  माधुरी जी से मेरी पहली भेंट इसी संस्था की एक मासिक गोष्ठी में हुई थी। हम संस्था के अध्यक्ष चन्द्रमोहन कर्ण जी के आवास पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले थे। अपनी व्यस्तताओं और कम अभिरूचि के कारण माधुरी जी संस्था के सामान्य कार्यक्रमों में प्रायः नहीं आती थी। उस दिन का कार्यक्रम इस अर्थ में विशेष था कि कार्यक्रम के बाद कर्ण जी ने सभी सदस्यों और उनके परिजनों के लिए एक छोटा सा भोज भी रखा था। उस दिन संस्था के लगभग सभी सदस्यों से मेरी पहली मुलाकात हो रही थी। सभी ने बहुत स्नेह और अपनेपन से स्वागत किया था। उसी दिन बिना किसी औपचारिक भूमिका के माधुरी जी ने जो कहा, वह मन को छू गया था, उन्होंने कहा- ‘कभी भी माँ की याद आये तो मेरे घर चली आना।’ इस पहली भेंट में ही हमारे बीच एक आत्मीयता स्थापित हो गयी थी।
मेरी ही तरह माधुरी जी की मातृभाषा भी मैथिली नहीं थी। उनकी मातृभाषा मराठी थी। उनके पति मोहन मुरारी झा संस्था के सक्रिय सदस्य हैं। इस तरह माधुरी जी का भी संस्था से जुड़ाव हो ही गया था। उनके आवास पर सम्पन्न हुई एक मासिक गोष्ठी में उनके आत्मीय आतिथ्य की सौरभ आज भी चर्चा करते हैं। उनकी हाज़िर जवाबी, हास्यबोध और स्पष्टवादिता की तारीफ भी उन्हें जानने वाले लगभग सभी लोग करते हैं।
उनके साथ कुछ-कुछ अंतराल पर मेरी कुल तीन मुलाकातें ही हैं। दो मुलाकातें देसिल बयना के कार्यक्रमों में हुईं। तीसरी मुलाकात संस्था की एक सदस्य शारदा झा के एक हिन्दी कविता संकलन के लोकार्पण के अवसर पर हुई थी। यह संकलन क्रियेटिव कैंपस नामक जिस प्रकाशन संस्था से प्रकाशित हुआ था, उसकी स्थापना कुछ दिनों पहले ही माधुरी जी के पति मोहन जी ने की थी। उस दिन उनके पैर में चोट की वजह से सूजन थी फिर भी वह प्रसन्नचित्त थीं। उस दिन बहुत लम्बा समय हमने साथ में बिताया। माधुरी जी डायबिटिक थीं और उन्हें ब्लडप्रेशर से जुड़ी शिकायते भी थीं, इसलिए अपने साथ में दवाईयां लेकर चला करती थीं। उन्होंने मुझसे पूछा- यहाँ कुछ खाने को मिलेगा आसपास? खोजने पर सामने ही छोटी सी कैंटीन दिखाई दे रही थी। मैंने कहा कि यहाँ पूछ लेते हैं, कुछ मिल जाये शायद। उन्होंने वड़ा खाया और अपनी दवाईयाँ ली। मैंने चाय पी। इसी दौरान उन्होंने मुझे कहा कि- ‘संस्था के लोग मुझे बार-बार कहते हैं कि मैं मैथिली में भी कुछ लिखने की कोशिश करूँ। मैं मैथिली समझ तो लेती हूँ लेकिन इस भाषा में लिख पाना संभव नहीं लगता। मैंने उनसे कहा कि आप जिस भाषा में सहज हैं, और जिसमें बेहतर लिख सकती हैं, उसी भाषा में लिखिए।
मुझे याद है कि उस कार्यक्रम में शरीक एक महिला ने जब उनसे मजाक करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद तो आप आराम करेंगी। बेटे की शादी करवा कर फुर्सत से बहु से सेवा करवाएंगी! तब उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया था कि- “मेरे पास इतना समय कहाँ है! रिटायरमेंट के बाद बहुत सारे काम हैं जो मुझे करने हैं,अभी से उन कामों की लिस्ट बनाती जा रही हूँ।” लगभग दो वर्षो के बाद वे अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होने वाली थीं।
वह मुलाकात उनसे मेरी अंतिम मुलाकात थी। कुछ दिनों बाद यह सूचना मिली कि वे गंभीर रूप से बीमार हैं, और एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। हम समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक इतनी गंभीर हालत कैसे हो गयी! पिछली मुलाकात में ही वे इतनी उर्जा से भरी हुई दिखी थीं। पता चला कि अपनी नियमित जाँच के लिए वे खुद ही अपने बेटे के साथ अस्पताल गयी थीं। वहाँ जरूरी समझ कर डाक्टरों ने उन्हें भर्ती होने की सलाह दी। लगभग एक सप्ताह बाद उन्हें स्वस्थ मानकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। लेकिन एक-दो दिन बाद ही उनकी तबियत फिर से बिगड़ गयी। इस कारण से उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। हम उनसे मिलने अस्पताल गये। वे आई.सी.यू में थीं, इसलिए उन्हें देख भी नहीं पाए। उस दिन सिर्फ मोहन जी से मिलकर और हाल-चाल पूछ कर हम लौट आए। इसके बाद हम लगातार मोहन जी से हाल-चाल पूछते रहते थे। कभी उनकी हालत में सुधार की खबर आती तो कभी गिरावट की। मस्तिष्क में रक्त के थक्के जमने और शरीर के विभिन्न अंगों के क्रमशः काम नहीं कर पाने की सूचना डाक्टरों ने दी थी। एक सुविधा और साधन सम्पन्न अस्पताल के विशेषज्ञ डाक्टरों की पूरी टीम बेहतरी के लिए काम कर रही थी। माधुरी जी की जिजीविषा पर भी हमें भरोसा था। लेकिन लगभग दो महीने तक संघर्ष करते रहने के बाद 12 अक्टूबर 2016 को माधुरी जी इस दुनिया से विदा हो गयीं।
यह स्तब्ध करने वाला था। उनसे हुई आखिरी मुलाकात बार-बार याद आ रही थी। कहने को उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था। एकदम नया-नया परिचय था जो एक जुड़ाव में बदल गया था। पारदर्शी रेप्रीजेटर में रखे उनके  पार्थिव शरीर के पास मैं दो-तीन घंटे तक बैठी रही। यह शायद रिक्तता की सत्यता और उसे स्वीकार न कर पाने की बीच की स्थिति थी, या यह शायद सच स्वीकारने की प्रक्रिया का हिस्सा था!!
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माधुरी जी के गुजर जाने के बाद मोहन जी से हमें उनके अप्रकाशित साहित्यिक अनुवाद कार्यों का पता चला। हम सभी की यह इच्छा थी कि उनके ये अनुवाद लोगों के बीच जाएँ। यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि रूसी भाषा के कथा साहित्य के उनके द्वारा किये गये लगभग दर्जन भर हिन्दी अनुवादों में से लेफ़ तल्सतोय की सात अनूदित कहानियों का संकलन इसी महीने (मई’2017) में प्रकाशित हो चुका है। इस संकलन की सातों कहानियों से इसके प्रकाशन के पूर्व ही गुजरने का मुझे अवसर मिला था। हालांकि अपने अनुवादों को दूसरी बार देख सकने का भी अवसर उन्हें ठीक से नहीं मिल सका फिर भी आश्चर्यजनक तौर पर इन अनुवादों में त्रुटियाँ नहीं के बराबर थीं। मोहन जी ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि अनुवाद से पहले किसी मूल रूसी कहानी को वे तब तक कई बार पढ़ती थीं, जब तक वह उन्हें आत्मसात न हो जाए। शायद यही कारण है कि उनके अनुवाद बहुत ही स्तरीय हैं। इन अनुवादों को पढ़ते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि हम अनूदित साहित्य पढ़ रहे हैं। लेफ़ तल्सतोय की जो सात अनूदित कहानियाँ इसमें संकलित हैं वे हैं : (1.) इंसान को कितनी जमीन चाहिए (2.) इंसान किस वज़ह से जिन्दा रहता है (3.) दो बुढ़ऊ (4.) तीन साधु (5.) ईश्वर देखते हैं किन्तु प्रतीक्षा करते हैं (6.) चिंगारी जो घर करो जला दे (7.) कॉकेशस का कैदी।

संभव है इनमें से कुछ कहानियाँ आपने पहले पढ़ी हों लेकिन माधुरी जी के अनुवाद की सजीवता इन्हें पहले के अनुवादों से अलग करती है। ये अनुवाद हमें मूल रूसी कहानियों के निकट ले जाते हैं। मुझे आशा है कि माधुरी जी अपने इस अनुवाद कार्य के माध्यम से हमेशा हिन्दी के पाठकों के बीच रहेंगी। प्रकाशित संकलन में यह सूचना है कि उनके कुछ महत्वपूर्ण मराठी साहित्यिक अनुवाद अभी तक अप्रकाशित हैं। मुझे विश्वास है कि ये अनुवाद भी अपने प्रकाशन के बाद मराठी अनुवाद साहित्य को पर्याप्त समृद्ध करेंगे। 

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Monday, 30 January 2017

मेरी फेसबुक डायरी में रोहित वेमुला प्रसंग और आंदोलन


17.01.2016
हैदराबाद विश्वविद्यालय से निष्कासित पाँच दलित छात्रों में से कथित रूप से एक की आत्महत्या बेहद दुखद है । प्रतिरोध का रास्ता आत्महत्या तक तो नहीं जाता! मन बहुत विचलित है!
19.01.2016
आज हैदराबाद विश्वविद्यालय में उमड़ा विशाल जनसमूह आक्रोश और विरोध से अधिक तमाशे और अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भुनाने का मंच बन गया है !!

20.01.2016
आज की प्रेस कांफ्रेंस में आपके 'सुवचनों' पर प्रतिक्रिया देते हुए आपसे ऐसा कहा जा सकता था कि आप क्या जाने कि कैंपस किन सपनों और किन उद्देश्यों के साथ जाया जाता है । आप क्या जाने कि कैंपस के छात्रों की समस्याएँ क्या होती हैं । क्योंकि कैम्पस में इन्हीं सपनों और उद्देश्यों के साथ जाने का आपको अवसर ही नहीं मिला ।
लेकिन मेरी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं हो सकती है । अपने अनुभवों से जानती हूँ कि ऐसी बातें समझने के लिए शैक्षणिक योग्यता नहीं संवेदनशीलता ही पर्याप्त है!
#SmritiIraniPressConference #RohithVemula
20.01.2016
स्मृति ईरानी दिल्ली में बैठकर प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से खाई-अघाई औरतों की तरह रोहित की हत्या पर जिस तरह के घटिया बयान दे रही हैं, अगर वो यह समझती हैं कि इस तरह से वो खुद को या अपनी सरकार को बचा ले जाएंगी तो कान खोलकर सुन लीजिए हमारी "आदरणीय शिक्षा मंत्री जी" ऐसा हम होने नहीं देंगे!!
#स्मृतिईरानीमुर्दाबाद

21.01.2017

रोहित का परिवार आर्थिक रूप से रोहित पर ही निर्भर था । ऐसा आज रोहित के छोटे भाई के बयान से पता चला । पिछले सात महीने से रोहित की स्कालरशिप रूकी हुई थी जिसके चलते उस पर काफी कर्ज़ भी हो गया था ।
अब जब रोहित नहीं है और बड़े-बड़े नेता, संस्थाएँ, राजनीतिक पार्टियाँ उसके लिए न्याय की बात करते हुए लगातार सामने आ रही हैं, तब भी रोहित के परिवार के लिए अब तक किसी भी तरह की आर्थिक सहायता क्यों नहीं उपलब्ध कराई जा सकी है? कोई और नहीं तो यहाँ आज आए दिल्ली के मुख्यमंत्री ऐसी घोषणा कर सकते थे ।
अभी तो आंदोलन चल रहा है जब कुछ दिन बाद आंदोलन शांत पड़ जाएगा तब रोहित के परिवार की सुध लेने वाला, उनकी मदद करने वाला कौन होगा!!

26.01.2016
हैदराबाद विश्वविद्यालय की ज्वाइन्ट एक्शन कमेटी फॉर सोशल जस्टिस ने कल आल इन्डिया यूनिवर्सिटी स्ट्राइक का आह्वान किया है । रोहित वेमुला मामले में चल रहे आंदोलन के देशव्यापी होने की दिशा में यह महत्वपूर्ण दिन होगा ।
लगातार चल रहे इस आंदोलन के जिस एक पक्ष पर बहुत कम चर्चा हो रही है, वह है अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठे छात्र-छात्राओं की बात । इनमें से दो को आज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है और दो लड़कियों की हालत भी चिंताजनक है । अनिश्चित काल की भूख हड़ताल पर बैठना नैतिक मजबूती और साहस से ही संभव होता है । हम सभी को न्याय की इस लड़ाई में इनके साथ खड़ा होना चाहिए । हालाँकि मैं यह चाहूँगी कि भूख हड़ताल के कारण अपने जीवन को संकट मे डालने के बजाय प्रतिरोध के अन्य कारगर तरीकों को अपना कर अन्यायी व्यवस्था के वजूद के समक्ष संकट खड़े किये जाएँ ।
#RohitVemula #AllIndiaUniversityStrike

28.01.2017
हैदराबाद विश्वविद्यालय का वह एक भी विद्यार्थी 'लायक' नहीं है जिसे ठीक 'अभी' क्लास जाकर पढ़ने-लिखने की बहुत अधिक चिंता सताने लगी है! जिस समय प्रोटेस्ट को लगातार चलाए रखने की जरूरत है, तब कुछ शिक्षक और विद्यार्थी औपचारिक कक्षाओं को बहाल करने की मांग करने लगे हैं । जबकि पढ़ने-पढ़ाने के लिए औपचारिक कक्षाओं की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत होती है । विश्वविद्यालय में ऐसी जगहों का अभाव नहीं है जहाँ अनौपचारिक तरीके से पढ़ने-पढ़ाने का काम किया जा सकता है । इस तरह से की जाने वाली पढ़ाई-लिखाई अपने आप में एक प्रतिरोध भी होगा । लाइब्रेरी, रिडिंग रूम, लेबोरेट्री जैसी जगहें जरूर खुली होनी चाहिए जिनका दूसरा कोई विकल्प नहीं है । कुछ कार्यालयी गतिविधियाँ भी चलती रहनी चाहिए ताकि स्कॉलरशिप सहित विद्यार्थियों के अन्य बेहद जरूरी काम नहीं रूकें । लेकिन हमें औपचारिक कक्षाओं का लगातार बहिष्कार करना चाहिए । यह हमारे हाथ में है और यही हमारी ताकत भी है । जरूरी है कि हम इस समय स्वार्थी होने से बचें ।
#ProtestAndStudentUnityLongLive #JusticeForRohitVemula

30.01.2016
काश अपने जन्मदिन की शुभकामनाएँ लेने के लिए तुम जिन्दा होते !

31.01.2016
..तो सिर्फ़ स्मृति ईरानी ही नहीं सुषमा स्वराज भी 'महामर्द' निकली !!
#Vidrohi #JusticeForRohitVemula

22.03.2016

रोहित वेमुला आत्महत्या के बाद पूरा विश्वविद्यालय शोक में डूबा हुआ था । आक्रोश में था । आप विद्यार्थियों से संवाद करने की कोशिश किये बिना अपने इस्तीफे की मांग के बरअक्स झांसा देने के लिए लम्बी छुट्टी पर चले गये । जब आपको अपने विश्वस्त सूत्रों से पता चला होगा और आप आश्वस्त हो गये होंगे कि मामला शांत हो रहा है, तो चुपके से वापस आ गये । आपने इस बार भी संवाद करने और विद्यार्थियों का मूड भाँपने की कोशिश नहीं की ।
थोपी हुई जबरदस्ती की हुकूमत बन कर आएंगे तो क्या लोग फूल माला लिये खड़े मिलेंगे? क्या यहाँ के विद्यार्थी भेड़-बकरी हैं? ज्यादा चातर बनने के बजाय इस्तीफा दीजिए और नैतिक ताक़त रखते हैं तो निर्दोष साबित होने तक किसी भी तरह के प्रशासनिक पद से दूर रहिए ।
जैसी जानकारी आ रही है, खाना-पीना और इंटरनेट सुविधा बंद करने की जुर्रत कर रहे हैं आप? पुलिसिया दमन की भी फिराक में हैं । आत्मघाती मत बनिए । इस बार गलती करेंगे तो माता स्मृति भी नहीं बचा पाएँगी आपको । छुपने तक की जगह नहीं मिलेगी ।
#StudentUnityLongLive #HcuVcGoBack

24.03.2016
विशाल विरोध सभा के बाद विद्यार्थियों के रोष भरे नारों से गूंजता विश्वविद्यालय परिसर और जबरन वीसी बने बैठे क्रूर तानाशाह अप्पा राव का धू-धू कर जलता पुतला ।
#UniversityofHyderabad #AppaRaoGoBack #StudentUnitiyLongLive

25.03.2016
"23 मार्च-शहीद दिवस  । 23 मार्च- होली-रंगों का त्यौहार । इस दिन जिस आदमी ने आन्दोलन करते हुए छात्रों के खून से होली खेली है उसे और उन शिक्षकों को जो विद्यार्थियों के बजाय प्रशासन के साथ खड़े हैं, चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ।
जिस वीसी को यहाँ के विद्यार्थी प्यार नहीं करते, आदर नहीं करते यदि वह चुल्लू भर पानी में नहीं डूब सकता तो कम से कम उसे अपना पद तो छोड़ ही देना चाहिेए । लेकिन ये पावर-हंग्री लोग कभी ऐसा नहीं करेंगे!"
[हैदराबाद विश्वविद्यालय में आज शाम की प्रतिरोध सभा में बोलते हुए प्रो. चमन लाल]

 26.03.2016
आज शाम कैंडल मार्च के बाद चल रही प्रतिरोध सभा में एक साथी ने स्वीकार किया (हम पहले से भी जानते थे) कि वह नरेन्द्र मोदी का घोर प्रशंसक था । उसने कहा कि विश्वविद्यालयों में दमन और इसपर सरकार का संवेदनहीन रुख उसे भीतर तक तोड़ गया है । उसने आगे जो कहा उसका आशय यह था कि वह अब मोदी के मायाजाल से बाहर आ गया है । वह साथी मोदी जी की शातिर भाषा का दिव्यचक्षुहै । उसने कल की प्रतिरोध सभा में अप्पा राव के अलावा नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी मुर्दाबाद के भी रोष भरे नारे लगाए थे ।  
अपनी ही करतूत से मोदी सरकार डूब रही है । मोदी की चमक फीकी पड़ रही है । यह अप्पाराव और विश्वविद्यालय प्रशासन फिर क्या ठहरा बल !!
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27.03.2106
नॉर्थ कैंपस से साउथ कैंपस तक के कैंडल मार्च में आज विद्यार्थियों की जबरदस्त भागीदीरी रही । एक वक्ता ने आज की प्रतिरोध सभा को संबोधित करते हुए कहा कि – “पहले दिन प्रतिरोध सभा में लोगों की भागीदारी बहुत कम थी । पुलिसिया दमन और गिरफ्तारियों के बाद कैंपस के आम छात्रों में जबरदस्त भय का माहौल था । रोज-ब-रोज यह संख्या बढ़ी और आज चौथे दिन इतनी संख्या में विद्यार्थियों का इकट्ठा होना तानाशाह अप्पा राव के खौफ से कैंपस के आजाद होते जाने का सबूत है ।
ऐसी उम्मीद है कि गिरफ़्तार साथियों को कल बेल मिल जाएगी । कैंपस उनकी अगवानी के लिए उत्साह के साथ तैयार है । उम्मीद है कि कल से आंदोलन की गति और भी तेज होगी ।
कल फिजिक्स डिपार्टमेंट में एक महत्वपूर्ण सेमिनार शुरू होने जा रहा है । यह सेमिनार निर्बाध चले ऐसा सभी चाहते हैं । लेकिन आंदोलनकारी छात्र चाहते हैं कि इस सेमिनार के उद्घाटन समारोह से अप्पाराव को दूर रखा जाए । इस आशय का संदेश लेकर एक शांतिपूर्ण मार्च कल सुबह फिजिक्स डिपार्टमेंट तक के लिए निकाला जाएगा ।
न्याय, आत्मसम्मान और एक अनचाहे तानाशाह वीसी से मुक्ति के लिए चल रहे आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए छात्रों से औपचारिक कक्षाओं के बहिष्कार की भी अपील की गयी है । ग़ौरतलब है कि पिछले चार दिनों से प्रशासन ने खुद कक्षाएँ स्थगित रखी थी ।
#UniversityofHyderabad #ReleaseStudentsAndFacultyofUOH #AppaRaoGoBack #StudentUnityLongLive

28.03.2016
आज सुबह विश्वविद्यालय के मुख्यद्वार के बाहर तक विद्यार्थियों की एक बड़ी रैली निकाली गयी । बाहर लम्बे समय तक प्रतिरोध के नारे लगे । किसी बाहरी व्यक्ति के कैंपस आने पर प्रतिबंध लगा हुआ है । ऐसे में यह रैली प्रतीकात्मक रूप से यह भी बताती है कि, चाह कर भी हमें बाहर की दुनिया से अलग नहीं किया जा सकता है ।
किसी आंदोलन के क्रम में नुक्कड़ नाटक और अन्य सांस्कृतिक प्रतिरोध भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । कल प्रोग्रेसिव थियेटर ग्रुप की ओर से एकलव्यनामक जिस नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन रात के 11:30 बजे गर्ल्स हॉस्टल के बाहर हुआ था, आज सुबह उसी का प्रदर्शन प्रशासनिक भवन के बाहर किया गया । आज रात 09:30 बजे दक्षिणी परिसर में भी इस नाटक का प्रदर्शन होगा ।
गिरफ्तार सभी साथियों को आज शाम बेल मिल गयी है । संभवतः उन्हें कल रिहा किया जाएगा । आंदोलन में एक नया उत्साह आ गया है । प्रतिरोध की संस्कृति ज़िन्दाबाद ।
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17.01.2017

एक वर्ष बीत गया लेकिन न्याय का प्रश्न ज्यों का त्यों बरकरार है!!
#RohithVemula #OneYearOfTheInstitutionalMurder #JusticeForRohithVemula
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