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Tuesday, 4 August 2020

अलविदा अल्काज़ी साहब! आप याद किए जाते रहेंगे

इब्राहिम अल्काज़ी भारतीय रंगमंच की दुनिया के शीर्षस्थों में शुमार थे। रंगमंच की दुनिया और उसकी शख्सियतों की मैं बेहद मामूली जानकार हूँ। लेकिन अल्काज़ी साहब का नाम इतने शीर्षस्थ अभिनेताओं को इतने आदर के साथ लेते देखा कि मान लेना पड़ा कि वे निश्चित तौर पर बहुत खास व्यक्ति हैं। नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, गोविंद नामदेव, हिमानी शिवपुरी, डॉली आहलूवालिया और भी कई दिग्गज अभिनेता-निर्देशक अपने कौशल के विकास में उनकी बड़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं। इन सबकी बातों से जो एक कॉमन बात उभर कर आती है, वह यह है कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों में अल्काज़ी साहब कठोर अनुशासन के हिमायती होने के बावजूद अपने एक-एक छात्र की प्रगति, बॉडी लैंग्वेज, व्यवहार आदि पर ध्यान रखते थे, और अपने ऑब्जर्वेशन के आधार पर ही उनसे अकेले में बुलाकर बात करते और उनकी समस्या के समाधान का प्रयास करते थे। उनकी सही प्रतिभा को पहचान पाने में मदद करते थे।

एक-एक छात्र पर ध्यान देना, उनकी कमियाँ-कमज़ोरियाँ देख पाना और उन्हें ठीक करने का प्रयास करना, हर एक छात्र की असली प्रतिभा को पहचान जाना; ये एक बहुत बड़ी बात होती है। अल्काज़ी साहब के बारे में जब जब सुना हमेशा मन में आया कि काश मैं भी किसी ऐसे गुरू, किसी शिक्षक से मिल पाती। यह एक सौभाग्य है, जो सबको नहीं मिलता। लेकिन हाँ, मन में यह ज़रूर आता है कि कमोबेश ऐसी शिक्षक ज़रूर बन सकूँ।

श्रद्धांजलि अल्काज़ी साहब! आप याद किये जाते रहेंगे।

Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।

Sunday, 26 May 2019

बेहद अफ़सोसनाक है पायल ताडवी की 'आत्महत्या'


मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की 23 साल की छात्रा पायल की आत्महत्या की घटना बेहद-बेहद दुखद है। यह और भी अधिक अफसोसनाक है कि पायल को आत्महत्या के लिए उकसाने का इल्ज़ाम जिन तीन लोगों पर है, वो तीनों कथित तौर पर जातीय अहंकार से ग्रस्त 'लड़कियाँ' ही हैं! खबरों के मुताबिक पायल ताडवी ने इन्हीं तीन लड़कियों के जातिसूचक और आरक्षण के प्रति अपमानजनक तानों और प्रताड़ना से परेशान होकर यह कदम उठाया। प्रशासन से पायल ने समय रहते शिकायत भी की थी, लेकिन उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया।
आवश्यकता है कि इस घटना की निष्पक्ष तरीके से जाँच हो और दोषियों को कोई रियायत न बरती जाए। यदि तीनों लड़कियों पर लगा आरोप सही है तो कहा जा सकता है कि वास्तव में एक संभावना से भरी भावी डॉक्टर को उन लड़कियों ने मौत के मुँह में धकेल दिया, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ज़रूर मिला था, लेकिन वो कहीं से डॉक्टर बनने लायक नहीं थीं। जातिवादी कॉलेज प्रशासन पर भी सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए!

Sunday, 14 October 2018

प्रश्नपत्र तैयार करने वालों की बीमार मानसिकता!

हाल ही में सम्पन्न दिल्ली नगर निगम की प्राइमरी टीचर भर्ती परीक्षा के लिए तैयार प्रश्नपत्र में जाति सम्बंधित आपत्तिजनक प्रश्न पूछा गया है। पिछले दिनों इसी तरह का एक प्रश्न हरियाणा में आयोजित किसी परीक्षा में भी पूछा गया था। इन प्रश्नों को सूक्ष्मता से देखने पर इनमें जातिवाद ही नहीं लिंग, रंग और नस्ल से जुड़े दुराग्रह एकसाथ नज़र आते हैं। ऐसे प्रश्न तैयार करने वाले कौन लोग हैं? किस सोच के तहत ऐसे प्रश्न तैयार किये जाते हैं? इससे चयन समितियों की खतरनाक मानसिकता और पूर्वाग्रह के साथ-साथ दुस्साहस का भी पता चलता है! संविधान का क्या खूब मखौल उड़ाया जा रहा है। जिम्मेदार लोगों पर कड़ी अनुशासनात्मक कारवाई होनी चाहिए। इस तरह की बीमार मानसिकता का उन्मूलन बहुत आवश्यक है।

Wednesday, 5 September 2018

गुरु कुम्हार शिष कुंभ

हमें हायर सेकेंडरी स्कूल के दिनों में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने वाले सर को आज याद कर रही हूँ। वे क्लास में जब-जब किसी बच्चे को किसी बात पर डांटते या पीटते (हालांकि वे पीटते बहुत कम थे, और वह भी सिर्फ लड़कों को बल्कि ढीठ लड़कों को) तो उसके तुरंत बाद वे कबीर का एक दोहा लगभग हर बार सुनाया करते – “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि गढि काढैं खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
मैं अब सोचती हूँ कि वे डांट तो देते थे, लेकिन उसके बाद उनके भीतर शायद कोई अपराध बोध रह जाता था, या उन्हें इसका अफ़सोस होता था या कम से कम यह कि मार-फटकार का काम उनके लिए आनंद का विषय नहीं था, जैसा कई शिक्षकों के लिए हुआ करता है! वे न केवल कबीर का यह दोहा सुनाया करते थे, बल्कि हर बार इसका अर्थ भी बताया करते थे। वे कहते थे कि गुरु जब डांटता है, या आपको कड़ाई से कुछ समझाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपसे प्यार नहीं करता बल्कि ऐसा वो इसलिए करता है कि आप के गढ़े जाने में कोई कमी न रह जाये!
वे अच्छा पढ़ाते थे, लेकिन आज मैं उन्हें उनके पढ़ाने के लिए याद नहीं कर रही हूँ, न ही उनके डांटने-फटकारने के लिए बल्कि कबीर का दोहा सुनाते हुए और उसका अर्थ समझाते हुए उनके चेहरे पर जो भाव उभरा करते थे मैं उन भावों को याद कर रही हूँ। उनमें जैसे पीड़ा, विवशता, सद्भावना, पारंपरिक कर्त्तव्यबोध और भय सब मिले-जुले होते थे। शिक्षक के रूप में यह उनकी अपनी सीमा का भी परिचायक था लेकिन साथ ही उनकी संवेदनशीलता का भी!

Tuesday, 22 May 2018

निपाह वायरस और चिकित्सा अनुसंधान की हकीकत

खबरों से पता चला है कि 'निपाह' वायरस का पहला मामला 1998 में सामने आया था और नई सदी की शुरुआत में हमारे देश के बंगाल प्रांत के सीमावर्ती इलाकों में इसने अपना कहर बरपाया था। अब लगभग दो दशक के अंतराल के बाद केरल में बेहद भयंकर शक्ल में इसने फिर से दस्तक दी है। केरल में इस 'निपाह' वायरस की चपेट में आकर मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है और इससे होने वाली हर मौत बेहद दर्दनाक है और रूह को झकझोर देने वाली है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी वेबसाइट पर सूचना लगा रखी है कि इस वायरस की कोई वेक्सीन या कोई इलाज अब तक विकसित नहीं किया जा सका है! इसका साफ मतलब है कि दुनिया भर में चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान कार्यों में भारी गिरावट आई है और भारत में तो इसकी स्थिति इतनी बद्तर है कि कोई उम्मीद ही नहीं की जा सकती। वैसे भी दुनिया भर में अब लोगों को बचाने की बजाय खत्म करने के बारे में नए-नए अनुसंधान हो रहे हैं और इसमें कामयाबियां भी मिल रही हैं!!

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर

19वीं सदी के शुरुआती दशकों की यह बात है, जब जर्मनी में रहने वाले एक यहूदी दम्पत्ति ने अपनी संतान के जन्म से कुछ वर्ष पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। कहते हैं कि उनकी संतान ने अपनी छह वर्ष की उम्र में ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया था। बाद के दिनों में यहूदी माता-पिता की इस संतान कार्ल मार्क्स ने, धर्म के अफीम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करते हुए लिखा।
मार्क्स के दुनिया को अलविदा कहने के दशकों बाद दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि जर्मनी में, हिटलर के दौर में धर्म के नाम पर नाज़ियों ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया, और वह इतिहास के सबसे बड़े और जघन्यतम नरसंहारों में से एक माना जाता है।
धर्म को अफीम होते हुए हमारे देश के लोगों ने भी लगातार देखा है। मुल्क की आज़ादी के साथ ही जब धर्म के नाम पर इस मुल्क के टुकड़े किए जाने लगे, तब अधिकांश प्रभावित लोगों ने देखा कि जो पहले अच्छे पड़ोसी और मित्र हुआ करते थे, धर्म के नाम पर एक-दूसरे के प्रति घोर अमानवीयता दिखाने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगा और थोड़ी भी हिचक नहीं हुई!
धर्म का यही अफीमी रूप हमारे देश के लोगों ने तब भी देखा जब पंजाब में धर्म के नाम पर अलग मुल्क तैयार करने के लिए गोलियां और बारूद इक्कट्ठे किए जाने लगे और भारी हिंसा का सहारा लिया जाने लगा। 
1984 में लोगों ने देखा कि किस तरह देश की राजधानी में एक धर्म विशेष के लोगों का कत्लेआम हुआ और इतिहास के सीने पर एक कभी नहीं भरने वाला ज़ख्म उभर आया।
अफीम खाए लोगों को आप उन तस्वीरों में भी देख सकते हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान ली गई थी। इसके अलावा समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से जूझने की इस देश को आदत सी हो गई है।
धर्म की अफीम अब भी दुनिया भर की हवा में तैर रही है और हमारे देश में तो इसका असर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यदि यह सच नहीं है तो यह सोचिए कि गुजरात के भीषण साम्प्रदायिक नरसंहार के समय नकारात्मक भूमिका निभाने वाले राज्य के मुखिया आज कैसे केन्द्र की सत्ता संभाल रहे हैं? कि आखिर कैसे नकारात्मक भूमिकाओं में उनके सबसे बड़े सहयोगी वर्तमान लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं?
इसे भी धर्म की अफीम का असर ही तो कहेंगे कि ठीक अभी जिस समय उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था तबाह की जा रही है, तब लोग अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लगी दशकों पुरानी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर भारी विवाद खड़ा करने की जुगत में हैं। मकसद यही है कि इस उन्माद में बुनियादी समस्याएं कहीं दब जाएं।
मार्क्स ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से इतिहास और अपने समकाल पर विचार किया था, इसलिए उनके विश्लेषण सटीक भविष्यवाणी की तरह साबित हुए। बहुत ही श्रमपूर्वक, बहुत ही ईमानदारी और मनुष्य की बेहतरी की नीयत से किए गए मार्क्स के चिंतन और लेखन का ही यह असर है कि आज वे अपने जन्म के 200 साल बाद भी इस दुनिया की बेहतरी के लिए सोचने वाली युवतम से युवतम पीढ़ी के सबसे बड़े वैचारिक मित्र और मार्गदर्शक बने हुए हैं और इसमें कोई शक नहीं कि यह सिलसिला कभी थमने वाला नहीं है।

Thursday, 3 May 2018

जश्न में कटिहार एसपी की हवाई फायरिंग गंभीर प्रकृति का अपराध है

बिहार के कटिहार जिले में एसपी और डीएम की फेयरवेल पार्टी में 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' गीत गाते, झूमते डीएम के साथ गलबहियां किए एसपी के द्वारा ताबड़तोड़ हवाई फायरिंग करने का एक वीडियो सामने आया है। जब सार्वजनिक उत्सवों में गैर कानूनी हवाई फायरिंग की वजह से लगातार निर्दोष लोगों की जानें जा रही हैं, तब कानून व्यवस्था का जिम्मा उठाने वाले एक पुलिस अधिकारी का ऐसा आचरण और जिलाधिकारी का इस आचरण से अप्रभावित रहना, दोनों ही दुखद और शर्मनाक ही नहीं ताकत के नशे में किये गये बेहद गंभीर अपराध हैं।
यदि इसके बाद इन अधिकारियों के सस्पेंशन का ऑर्डर आता है तो वह काफी नहीं है। इन अधिकारियों का टर्मिनेशन होना चाहिए और कम से कम एसपी को तो सलाखों के पीछे होना चाहिए। इन अधिकारियों ने साबित किया है कि यह अपने पदों को संभालने के कत्तई योग्य नहीं हैं। यदि इनपर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई तो समाज में इस घटना का नकारात्मक असर पड़ेगा। उत्सवों में हवाई फायरिंग करने वाले प्रोत्साहित होंगे और निर्दोष लोगों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेगा!!

[नोट : आजकल मीडिया में इस तरह की फायरिंग को 'हर्ष फायरिंग' कहने का चलन चल निकला है! यह भाषा से लेकर विचार के स्तर तक भारी दिवालियेपन को दिखाता है। इससे भी बाहर आने की सख्त ज़रूरत है।]

Saturday, 14 April 2018

ओस्मानिया यूनिवर्सिटी और इफ्लू से लौटकर

कल एक परीक्षा के सिलसिले में सिकंदराबाद के पास के एक इलाके में जाना हुआ। विभाग के कई अन्य साथी भी वहां परीक्षा देने आये हुए थे। वापसी में हम छ: लोग एक साथ थे। लोकल ट्रेन लेने के लिए हम लोग बस से निकले और बस से उतरकर स्टेशन तक की दूरी हमने पैदल ही तय करने की सोची। इसका बहुत अच्छा परिणाम यह मिला कि चलते-चलते हम उस इलाके में दाखिल हुए जहाँ ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के किसी डिपार्टमेंट का रास्ता दिखाने वाला साइन बोर्ड लगा हुआ था, यानी कि हम ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के इलाके में थे। पिछले चार-पांच साल से हैदराबाद में होने के बावजूद यहाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय ओस्मानिया में जाने का मौका अब तक नहीं मिल पाया था। जबकि मेरी यह इच्छा हमेशा से रही है कि हैदराबाद के जितने भी प्रमुख विश्वविद्यालय हैं उन्हें कम से कम एक बार ज़रूर देख लूँ। कल का दिन इस लिहाज़ से बहुत सफल साबित हुआ। हमने तत्काल तय किया कि इस संयोग का फायदा उठाते हुए ओस्मानिया यूनिवर्सिटी घूम लिया जाये।
      टहलते हुए हमने कुछ डिपार्टमेंट और कुछ हॉस्टल्स देखे, लेकिन हमारे लिए जो महत्त्व का था वो आर्ट्स कॉलेज को देखना था जहाँ हम पूछ-पूछ कर पहुंच गये। यह आर्ट्स कॉलेज एक बहुत ही भव्य इमारत में है, इस भवन का निर्माण 1934 में शुरु हुआ था और 1939 में इसका उद्घाटन हुआ। इसका मॉडल तैयार करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों की एक टीम ने कई यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका, जापानमिस्र और तुर्की जैसे देशों का दौरा किया था और अंत में एक बहुत ही कलात्मक संरचना वाले भवन का निर्माण किया गयाजिसमें विभिन्न देशों की स्थापत्य कला का मिश्रण दिखाई देता है। मानविकी (Humanities) के सभी विभाग इसी भवन में स्थित हैंजिनमें हिंदी विभाग भी शामिल है।
हालांकि इतनी भव्य इमारत के बावजूद जो चहल-पहल इसके इर्द-गिर्द दिखनी चाहिए थी वह गायब थी और लड़कियाँ तो इक्का-दुक्का ही कहीं-कहीं दिख रही थीं। ओस्मानिया एक क्लोज़ कैंपस नहीं है और इस वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय की तरह यहाँ भी बाहर की गाड़ियाँ और लोग बेधड़क आ-जा रहे थे। जितनी देर हम ओस्मानिया घूमते रहे हमें यही लगा कि अच्छे-खासे क्षेत्रफल और अच्छे भौगौलिक परिवेश में होने के बावजूद शिक्षण संस्थानों का जैसा माहौल होना चाहिए उसका वहां अभाव है। यह भी हो सकता है कि यह सिर्फ उस दिन विशेष का अनुभव हो और जैसा मुझे महसूस हुआज़रूरी नहीं कि वही वास्तविकता हो।

ओस्मानिया में घूमते हुए ही हमें पता चला कि हैदराबाद का एक अन्य प्रमुख विश्वविद्यालय इफ्लू’ (English and Foreign Languages University) पास में ही ठीक सड़क के दूसरी तरफ स्थित है। यह एक और संयोग था तो हम सबने तय किया कि लगे हाथ वहाँ भी घूम लिया जाये। हैदराबाद विश्वविद्यालय से एम.ए करने वाला एक छात्र उस्मान जो अब वहाँ पीएचडी कर रहा है, उसने इफ्लू में हमारीअगवानी की और अपनी यूनिवर्सिटी में हमें घुमाया। इफ्लू बहुत बड़ा कैंपस नहीं है लेकिन वह जितने दायरे में फैला हुआ वह अपने आप में सम्पूर्ण और सुव्यवस्थित है। यहाँ आकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पता चली, वह यह कि इस विश्वविद्यालय में लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा बहुत अधिक है (एक छात्र के मुताबिक लगभग चौगुनी) और इसीलिए यहाँ लड़कों के लिए एक हॉस्टल है वहीं लड़कियों के लिए तीन या चार हॉस्टल हैं। यह वाकई बड़े आश्चर्य और ख़ुशी की बात है। 
इस यूनिवर्सिटी की जो सबसे बड़ी खासियत है वह यहाँ का माहौल है, खासतौर पर लड़के-लड़कियों के साथ होने, घूमने, पसंद के कपड़े पहनने और सुरक्षा वगैरह को लेकर ये कैंपस बहुत ही अच्छा माना जाता है और यहाँ छात्रों के व्यक्तिगत जीवन की निगरानी करने या दखल देने जैसी बातें नहीं सुनने को मिलती। हालाँकि यह बात कुछ रूढ़िवादी शिक्षकों को चुभती भी है, लेकिन वे सिवाय चिढ़ने के कुछ कर नहीं सकते! ऐसी ही एक शिक्षिका से कल वहाँ रूबरू होने का मौका भी मिला। मेरे इतना भर कहने पर कि इफ्लू मुझे बहुत अच्छा कैंपस लगा, उन्होंने कहा कि हाँ कुछ ज्यादा ही अच्छा है! अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा! शाम के बाद तो यह विश्वविद्यालय इंग्लैंड बन जाता हैउन्होंने आगे कहा इतनी अधिक पश्चात्यता उचित नहीं’!
ओस्मानिया और इफ्लू एकदम पड़ोसी विश्वविद्यालय हैं जो बिलकुल आमने-सामने हैं, इसके बावजूद दोनों जगह के माहौल में जो बहुत बड़ा अंतर है उससे यह पता चलता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के माहौल को मजबूत इरादों के साथ मनचाहे तरीके से ढाला जा सकता है। इफ्लू में छात्रों को जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता है उसका सकारात्मक परिणाम इस तरह भी दिखता है कि यहाँ अराजकता की बजाय छात्रों में एक तरह का अनुशासन है। लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं के बराबर है और उनके बीच असामनता या संदेह की बजाय दोस्ताना रिश्ता है। मेरे खयाल से हर विश्वविद्यालय को माहौल के स्तर पर इफ्लू जैसा ही होना चाहिए। इस तरह के माहौल में ही समुचित विकास और कुंठा रहित अच्छी सोच का निर्माण संभव है।

Friday, 6 April 2018

हैदराबाद विश्वविद्यालय में तकनीकी शब्दावली के महत्त्व पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

हैदराबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के विकास में हिंदी की भूमिका एवं तकनीकी शब्दावली का महत्त्वविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हुआ। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इस तरह के विषय थोड़े बोझिल होते हैं लेकिन लगातार हुई चर्चा-परिचर्चा को सुनने और उसमें अपनी भागीदारी निभाने के बाद हमें लगा कि यह विषय महत्वपूर्ण है, और इस पर, खासतौर पर तकनीकी शब्दावली के विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा-परिचर्चा की आवश्यकता है।
अकादमिक संगोष्ठियों में जिस तरह की लूटमार और ठगी मची रहती है, यदि आप उसके अपवाद की बात करना चाहें तो हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में होने वाले सेमिनारों का ज़िक्र कर सकते हैं। अब तक मैंने अपने विभाग में हुई जितनी संगोष्ठियों को देखा है, उनमें कभी रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं वसूला जाता और न मैंने कभी किसी को यह शिकायत करते सुना है कि उन्हें प्रपत्र प्रस्तुत करने का मौका नहीं दिया गया। सेमिनार के प्रमाणपत्र चूँकि अकादमिक महत्त्व के होते हैं इसलिए मुख्य सत्रों के समानांतर सत्र चलाकर भी शोधार्थियों को प्रमाणपत्र हासिल करने के अवसर दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त दो दिनों तक लगातार चाय-नाश्ता, और सादगी से बना खाना-पीना जो कुछ भी होता है, वह सभी वक्ताओं, श्रोताओं, कर्मचारियों, मजदूरों और यहाँ तक कि उस समय पहुँच गये किसी भी आगंतुक के लिए मुफ्त उपलब्ध रहता है।
लेकिन इस बार का सेमिनार और भी कई मायनों में ख़ास रहा। मेरी जानकारी में यहाँ पहली बार शोधार्थियों को समानांतर सत्र की बजाय मुख्य सत्र में अन्य विद्वानों के साथ प्रपत्र प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया और उन्हें भी बहुत महत्त्व के साथ सुना और सराहा गया। इस बार इस कार्यक्रम का पूरा खर्चा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोगने उठाया था और मेरे खयाल से इसका पूरा सदुपयोग हमारे विभाग ने किया। इस बार हम लोगों के लिए एक सरप्राइज भी था और वह यह कि शब्दावली आयोग ने समस्त शोधार्थियों और प्रतिभागियों के लिए एक किट भिजवायी थी जिसमें एक सुन्दर सा लैपटॉप बैग, कुछ किताबें और एक नोटबुक थी। बाकी जगहों के जो मेरे अनुभव हैं और जितनी मेरी जानकारी है कि बिना दो सौ-पाँच सौ-हजार वसूले तो एक मामूली सा फोल्डर भी कहीं नहीं दिया जाता। हिंदी विभाग ने शब्दावली आयोग के साथ तालमेल बिठाकर निस्संदेह एक अच्छा और उपयोगी आयोजन किया है। वे सभी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष रूप से भी इस संगोष्ठी को सफल बनाने में दिन-रात मेहनत की।

Tuesday, 3 April 2018

लिखना मेरे लिए ज़िन्दा बने रहने की कोशिश है

मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) का एक बहुत ही प्रसिद्द कथन है कि हमारी ज़िन्दगी उस दिन ख़त्म होनी शुरू हो जाती है, जिस दिन से हम उन चीज़ों को लेकर चुप रहना शुरू कर देते हैं, जो हमारे लिए मायने रखती हैं। मुझे लगता है कि ज़िन्दगी के खत्म होने लगने की इस तरह की शुरुआत को लेकर हमें सतर्क रहना चाहिए, मेरे खयाल से मेरा लिखना इसी सिलसिले में किया जाने वाला प्रयास है।
मायने रखने वाली बातों पर हमारी ज़रूरी प्रतिक्रिया का सिर्फ दर्ज होना काफी नहीं है। ज़रूरी है कि ऐसी बातें निकलकर दूर तलक भी जाएं। ऐसी बातें हमखयालों तक ही नहीं, असहमत लोगों तक भी पहुंचे ताकि संवाद बना रहे, कुछ बेहतर परिणाम की गुंजाइश बची रहे। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी पहुंच आसान हुई है।
सीधे किसी सामाजिक-राजनीतिक मसले पर लिखने के अतिरिक्त जब मैं फिल्मों, अन्य कलाओं, साहित्य और संस्कृति पर भी लिखती हूं, तब भी इसके लिए मुझे जो बात सबसे अधिक लिखने के लिए प्रेरित करती है, वह इन क्षेत्रों में मौजूद जनपक्षधर धाराएं हैं। समाज की बेहतरी के बजाय सामाज का दोहन करने के लिए तैयार कला, साहित्य और सांस्कृतिक उत्पाद की चमक-दमक मुझे भारी कोफ्त होती है।
सवाल यह है कि हमारे लिखने का क्या कोई असर होता है? मैं सोचती हूं कि बहुत कम ही सही, तब भी असर तो होता है। जब कुछ लोग असहमति जताते हुए अपनी प्रतिक्रियायों में बेहद अतार्किक और असभ्य होने लगते हैं, तब लगता है कि जो अभिव्यक्त करना चाहा था वह सही तरह से अभिव्यक्त हुआ है। जब कुछ पाठकों को लगता है कि इस तरह से सोचना भी ज़रूरी है, तब भी सार्थकता का बोध होता है।
हमारा उद्देश्य तब भी सफल होता है जब हमारी बातें हमारी तरह से सोचने वाले लोगों को थोड़ी और हिम्मत देती हैं, और उन्हें लगता है कि वे अकेले नहीं हैं। जब इन बातों में से कुछ भी नहीं हो तब भी एक संतोष होता है कि हमने अपनी वह अभिव्यक्ति सार्वजनिक की जो सार्वजनिक करना हमारा दायित्व था। यह कुछ और नहीं तो हमें थोड़ा और मज़बूत तो बना ही देता है।रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियों में इस बात को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है- कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा/ न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का/ मेरे अंदर एक कायर टूटेगा।
ज़ुल्मतों के दौर में प्रतिबद्धता को बचाए रखना सबसे कठिन चुनौती होती है, लेकिन इसे हर हाल में बचाए रखना ज़रूरी है।
[ मूल रूप से वेब पोर्टल 'यूथ की आवाज़' के 10 वर्ष पूरे होने पर लिखी गयी टिप्पणी। यहाँ उसका संशोधित अश प्रस्तुत किया जा रहा है।]

Wednesday, 14 March 2018

स्टीफन हॉकिंग के निधन पर

पाठ्यक्रम के एक विषय के रूप में विज्ञान भले ही अक्सर सर से ऊपर गया हो और अक्सर एक्ज़ाम में इसने रूलाया हो, लेकिन बावजूद इसके इस विषय के प्रति एक आकर्षण रहा है। न्यूटन का गिरते हुए सेब को देखकर 'लॉ ऑफ ग्रेविटी' का सिद्धांत प्रतिपादित करना हो, या डार्विन के 'बायलॉजिकल इवॉल्यूशन' का सिद्धांत हो या आइंस्टीन का 'थियरी ऑफ रिलेटिविटी! इस तरह के सिद्धातों ने दुनिया के विकास में लोगों की सोच को सही दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है।
स्टीफन हॉकिंग एक ऐसे ही भौतिकविद रहे हैं, जिन्होंने ब्रहाण्ड को समझने में हमारी खासी मदद की है और इसकी उलझी हुई गुत्थी के कई सिरों को सुलझाने का ताउम्र प्रयास करते रहे हैं।
हॉकिंग दुनियाभर के लिए इसलिए भी प्रेरणास्रोत रहे हैं कि अपनी बहुत अधिक शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वो सब कर दिखाया जो शारीरिक रूप से सक्षम वैज्ञानिकों के लिए भी आदर्श है। 21 साल की उम्र में उन्हें मोटर न्यूरॉन बीमारी ने जकड़ लिया। इसके बाद धीरे-धीरे उनके शरीर के अधिकांश हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया था। इस भयंकर चुनौती के बावजूद वे विज्ञान की उन्नति और मनुष्य की बेहतरी के लिए काम करते रहे। उनका व्यक्तित्व हर किसी के लिए आकर्षण और आश्चर्य का विषय रहा है।
वे कहा करते थे कि मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है। मुझे अभी बहुत काम करना है। इसी जिजीविषा के सहारे वे मोटर न्यूराॅन जैसी जानलेवा बीमारी को दशकों तक मात देते रहे। स्टीफन हाॅकिग की किताब 'द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' मैंने नहीं पढ़ी है, लेकिन कहा जाता है कि इसमें बिगबैंग थियरी और ब्लैक होल के सिद्धांत को इतनी सरलता से समझाया है कि यह दुनिया में सर्वाधिक बिकने वाली लोकप्रिय किताबों में शुमार है।
76 साल की उम्र में आज उन्होंने इस दुनिया को अलविदा भले ही कह दिया हो, लेकिन अपने योगदान के माध्यम से वे हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Wednesday, 17 January 2018

लैंगिक भेदभाव और निजता का हनन करने वाले आवेदन प्रारूप

(1)
08.01.2018
अभी पुणे विश्वविद्यालय के एक सेमिनार में भागीदारी के लिए एक रजिस्ट्रेशन फॉर्म भर रही थी, जहाँ नाम के पीछे अनिवार्य रूप से प्रिफिक्स लगाना था और विकल्प में Mr, Ms और Mrs में से एक को चुनना था। यानी यह कि औपचारिक डॉक्यूमेंट्स में भी सिर्फ प्रिफिक्स से यह पता किया जा सकता है कि स्त्री विवाहित है या अविवाहित! लेकिन यह बात Mr पुरुषों पर लागू नहीं होती! 
हिन्दी में भी इसे क्रमशः श्री, सुश्री और श्रीमती लिखा जाता है। मेरे खयाल से Ms या Mrs कोई एक प्रिफिक्स ही विवाहित-अविवाहित सभी स्त्रियों के लिए होना चाहिए। नहीं तो विवाहित पुरुषों के लिए भी कोई अलग प्रिफिक्स होना चाहिए। ऐसा नहीं होना सीधे लैंगिक भेदभाव से जुड़ता है और दुर्भाग्य से बड़े-बड़े प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थान भी इस फॉर्मेट का अनुसरण करते हैं।
(2)
17.01.2018

मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग ने असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्तियाँ निकाली हैं। इसका ऑनलाइन आवेदन पत्र अभी देख रही थी। इसमें एक कॉलम में आवेदक को 'विवाह का विवरण' भरना है। जिसमें विवाह की दिनांक सहित कई प्रश्न हैं, जैसे : क्या आवेदक महिला विधवा/ तलाकशुदा/ परित्यक्ता है', 'क्या आवेदक महिला के एक से अधिक पति जीवित हैं', इसके अतिरिक्त पति का नाम, पति का उपनाम, पति का जन्मस्थान, पति की राष्ट्रीयता, ऐसे तमाम प्रश्न जिनका इनसे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, पूछे जा रहे हैं। 
इसमें दो चीज़ें जो मुझे बुरी तरह अखर रही हैं, उनमें पहली है कि ऐसा विवरण किसी भी व्यक्ति की निजता का हनन है और किसी भी नौकरी के आवेदन के लिए ऐसे विवरण मांगे जाने का कोई औचित्य नहीं है! दूसरी बात जो बेहद बुरी लगी वो यह कि यहाँ पूछे जा रहे यह सभी सवाल केवल महिला आवेदकों के लिए हैं! यही प्रश्न पुरुष आवेदकों से क्यों नहीं पूछे जा रहे कि 'क्या आवेदक विधुर/ तलाकशुदा/ परित्यक्त है' या कि क्या आवेदक की एक से अधिक पत्नियां जीवित हैं'? आवेदक की पत्नी का नाम, जन्मस्थान आदि' क्या है।
राज्य सरकार की किन्हीं नौकरियों में ऐसे प्रश्नों का पूछा जाना बेहद शर्मनाक है, यह एक साथ निजता के हनन और लैंगिक भेदभाव दोनों का प्रश्न है।

Monday, 28 August 2017

*****हिन्दी सिनेमा में उच्च शिक्षा का संकट*****

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एक सवाल यह उठ सकता है कि उच्च शिक्षा की समस्याएं या संकट फिल्मकारों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण होने चाहिए? इसका सरल सा उत्तर एक प्रश्न है, और वह यह है कि उच्च शिक्षा की समाज के लिए जो महत्वपूर्ण भूमिका होती है, या होनी चाहिए उसकी तुलना में आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी ऐसी स्थिति क्यों है, कि समाज को उसका वाज़िब परिणाम नहीं मिल रहा? यदि यह समस्या है, तो इसकी तह तक जाने की ज़रूरत है।
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Friday, 19 May 2017

एक फिल्म जिसमें विषय का उचित निर्वाह हुआ है

हिन्दी मीडियमफिल्म अपनी कसावट में कहीं-कहीं थोड़ी चूकी हुई जरूर लगती है, लेकिन ये चूक बेहद मामूली हैं । इस फिल्म के निर्देशक की इस बात के लिए तारीफ़ ज़रूर होगी कि उन्होंने इसे मनोरंजक बनाये रखने के लिए, लगभग सभी तत्वों का इस्तेमाल करते हुए भी, उस पर हिंदी फिल्मों के चालू फॉर्मूलों को हावी नहीं होने दिया है ।
इरफ़ान ख़ान, सबा क़मर और दीपक डोबरियाल सहित सभी कलाकारों का अभिनय बेहद उम्दा है । लेकिन सिर्फ इसीलिए नहीं, इस फिल्म को जीनत लखानी और निर्देशक साकेत चौधरी की लिखी एक अच्छी कहानी और पटकथा पर बनी फिल्म देखने के खयाल से भी जाना चाहिए । शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी समस्या पर यह फिल्म बनायी गयी है। इस तरफ हिन्दी फिल्म निर्माताओं का ध्यान नहीं के बराबर गया है । देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश की जो दुर्दशा है, उसके एक बड़े जिम्मेवार तबक़े को पहचानने में यह फिल्म बहुत मददगार है ।



#HindiMedium #IrfanKhan #SabaQamar #EducationSystem #HindiCinema

Friday, 17 March 2017

तिवारी जी की तमीज़

मनोज तिवारी की पहली पहचान एक गवैये की थी और इसी पहचान के बल पर वे नेता बने, लेकिन जिसने बगल वाली जान मारेलीजैसे गीत से अपनी पहचान बनाई हो उसमें कला की कितनी समझ होगी और उसमें कला के प्रति कितना सम्मान होगा यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है!
बीते शुक्रवार (10 मार्च) को यमुना विहार के एक नगर निगम स्कूल के कार्यक्रम में उन्होंने अपनी इसी मूढ़ता का परिचय दिया । हुआ यह कि उस कार्यक्रम का मंच सञ्चालन कर रही एक शिक्षिका ने इलाके के सांसद और कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मनोज तिवारी को मंच पर बुलाते हुए यह आग्रह किया कि वह बच्चों को दो पंक्तियाँ भी गाकर सुनाएँ । इस बात पर मनोज तिवारी बुरी तरह भड़क गए और उन्होंने शिक्षिका को कहा कि आपको सांसद से बात करने की तमीज नहीं है, यहाँ दो करोड़ के सीसीटीवी कैमरे लग रहे हैं और आप सांसद को गाना गाने के लिए कह रही हैं! यहाँ कोई नाटक नौटंकी नहीं चल रहा है । यह कहते हुए उन्होंने शिक्षिका को मंच से उतरने पर मजबूर कर दिया और साथ ही उनपर कारवाई करने के भी निर्देश दिए ।
मनोज तिवारी जैसे लोगों के लिए कला वह सीढ़ी होती है जिसपर पैर रखकर उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ साधते हुए आगे बढ़ना होता है । उसदिन कार्यक्रम में मनोज तिवारी ने न सिर्फ शिक्षिका का बल्कि गायन कला का भी अपमान किया और गायन के प्रति उस दिन जो उनकी घृणा प्रकट हुई वह खुद उनकी अपने उस गवैये व्यक्तित्व के प्रति घृणा है जिसने उन्हें लोकप्रियता दिलाई और जिसके सहारे आज वह टार्ज़न बने कूदते हैं! लेकिन यह बात समझने लायक बुद्धि तिवारी जी में होती तो यह अफसोसनाक घटना ही क्यों घटती!!

#ManojTiwari #AbusingSchoolTeacher #10March2017 ##YamunViharNagarNigamSchool

Thursday, 22 December 2016

हिन्दी सिनेमा के लिए अबतक अजनबी रामानुजन

हमारे देश के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन (22.12.1887-26.04.1920) को हिन्दी सिनेमा ने अब तक अपना विषय बनाने के लायक नहीं समझा है! 2014 में उन पर केन्द्रित एक तमिल फिल्म रामानुजनबनाई गयी जिसे ज्ञान राजशेखरन ने लिखा और निर्देशित किया है । 2015 में उनपर एक ब्रिटिश-अमेरिकी फिल्म बनी, जो 1991 में राबर्ट केनिगल द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी- द मैन हू न्यू इनफिनिटीके आधार पर इसी नाम से बनायी गयी।
रामानुजन की तीक्ष्ण प्रतिभा का जितना उपयोग हो सकता था वह उनकी अभावग्रस्त पृष्ठभूमि और ब्रिटिशकालीन भारत की शिक्षाव्यवस्था की वजह से नहीं हो सका । उनकी आयु मात्र तीन दशक की नहीं होती यदि हालात उन्हें मौत तक नहीं धकेलते । रामानुजन का जीवन संघर्षों से भरा रहा । आज हम ब्रिटिश भारत में नहीं हैं । लेकिन आज भी प्रतिभाएँ हालात की वजह से नष्ट हो रही हैं, उनका उचित उपयोग नहीं हो रहा है। उनकी परवाह नहीं की जा रही है ।
आज भी हिन्दी सिनेमा उद्योग कुछ अपवादों के रहते हुए भी हमारे देश की मृत चेतना का सटीक प्रतिबिम्ब (Reflection) है!

रामानुजन पर बनी तमिल फिल्म का ट्रेलर


'द मैन हू न्यू इनफिनिटी' का ट्रेलर


#Ramanujan, The Man Who Knew Infinity, Tamil Films, English Films, Hindi Cinema, Gnana Rajasekaran, Robert Kanigel 

Thursday, 20 October 2016

बाज़ार में चाय वाला

पिछले दिनों पाकिस्तान के इस्लामाबाद में चाय की दुकान पर काम करने वाले एक लड़के अरशद खान की तस्वीर किसी स्थानीय फोटोग्राफर ने एक सोशल साइट पर डाली और वह वायरल हो गयी । एक चाय बेचने वाले की नीली सहमी आँखों वाली खूबसूरती लोगों को भा गयी । कहा गया कि पाकिस्तान की युवतियां उसकी ‘दीवानी’ हो गयीं । सोशल मीडिया पर उसके खूब चर्चे हो रहे हैं । मेरे खयाल से इसकी दो वज़हे हैं । एक तो यह कि एक चाय बेचने वाले की शक्ल और सूरत अच्छी हो सकती है, शायद यह लोगों की कल्पनाओं से बाहर का विषय हो गया है । यह इस ओर इशारा करता है कि लोग जमीनी हक़ीकत से लगातार दूर होते जा रहे हैं और लोगों ने अपनी एक आभासी दुनिया बुन ली है । आर्थिक पिछड़ापन और सुंदरता ऐसे लोगों को परस्पर विरोधी पहलू लगते हैं । दूसरी वज़ह है, सोशल मीडिया की भेड़ धसान । यह ट्रेंड करवाने वाले लोग कौन हैं, हम नहीं जानते, लेकिन ट्रेंड हो रही चीजों की खबरे आती हैं और फिर बाकी लोग उसे लगातार ट्रेंड करवाने में जुट जाते हैं । चाय वाले की खूबसूरती पर हो रहे चर्चों के और भी कई छुपे पहलुओं पर बात की जा सकती है, लेकिन फिलहाल इसे रहने देते हैं ।
इतना तय है कि सोशल मीडिया हमारे समय की बड़ी ताकत बन कर उभर चुका है । उस लड़के पर एक प्रतिष्ठित अमेरिकन वेबसाइट ने स्टोरी की और फिर कई और स्टोरीज उसपर की गयीं । एनडीटीवी की एक खबर के अनुसार एक स्थानीय टीवी चैनल से बात करते हुए अरशद ने बताया कि एक दिन में मिली यह प्रसिद्धि उसे अच्छी तो लगती है , लेकिन वह अपने काम के समय लोगों के जमा हो जाने और अपने फोटो खींचे जाने से इसलिए चिढ़ा हुआ है, क्योंकि इस सब से उसके काम में खलल पड़ता है । बीबीसी की एक खबर के अनुसार उसके चाचा भी अचानक उसे मिल रही तवज्जो से चिंतित हैं । अरशद का सत्रह भाई-बहनों सहित, बहुत बड़ा परिवार है और इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी भी बड़ी है ।
नयी खबर यह आई है कि उसे मॉडलिंग असाइनमेंट मिलने शुरू हो गये हैं । बाज़ार को अच्छी तरह पता होता है कि उसे क्या भुनाना है । चाय वाला चाय की दुकान से अब बाज़ार में आ गया है । अब तक उसकी मेहनत उसका सहारा थी । अब उसकी किस्मत कि वह आगे बढ़ जाए या फिर से कहीं गुम हो जाए । बाज़ार निर्मम होता है । वह मुनाफे के लिए किसी का भी इस्तेमाल करना बखूबी जानता है और इस्तेमाल करके फेंकना भी !! संभव है कि अरशद बाजार की प्रकृति के साथ तालमेल बिठा ले या यह भी हो सकता कि वह तबाह हो जाए । यह भी हो सकता है कि इस्लामाबाद के इतवारी बाज़ार में वह फिर से चाय बेचता हुआ नज़र आए । एक कठोर सच यह भी है कि बाज़ार ही नहीं वे लोग भी किसी के सगे नहीं होते जो सोशल मीडिया के बनते-बहते ट्रेंड में हाथ धोने के आदि होते हैं ।

# Pakistani Chai Wala, Arshad, Social Media Viral, Modeling

Tuesday, 27 September 2016

नांगलोई में शिक्षक की हत्या महज एक बानगी है

प्रतीकात्मक तस्वीर :एनडीटीवी से साभार
दिल्ली के नांगलोई इलाके के एक स्कूल में बारहवीं के दो विद्यार्थियों द्वारा अपने अन्य चार साथियों के साथ मिलकर अपने एक शिक्षक की हत्या का मामला सामने आया है । सुल्तानपुरी रोड का यह स्कूल इसके विद्यार्थियों के कारनामों की वजह से पूरे इलाके में कुख्यात है । यहाँ जब दोपहर की शिफ्ट के लड़कों की शाम को छुट्टी होती है, उस वक्त उस पूरे इतने बड़े रोड से पैदल या रिक्शे से निकल पाना बहुत भयावह होता है । झुण्ड के झुण्ड बेलगाम विद्यार्थी, सरेआम सड़क पर लड़कियो, औरतों से छेड़-छाड़ करते हुए, एक दूसरे को या किसी को भी गन्दी-गन्दी गालियाँ देते हुए, राह चलते लोगों को परेशान करते, मारपीट करते हुए, निकलते हैं । तब सड़कों पर इनका राज होता है । कोई पीसीआर वैन तक सड़क पर गश्ती के लिए नहीं होती है । यह सब मेरा अपना देखा-जाना हुआ है । यह कल्पना करना कठिन नही है कि इस स्कूल के शिक्षक किन परिस्थितियों में काम करते होंगे ।
दरअसल यह स्कूल और छात्रों द्वारा शिक्षक की हत्या की घटना महज एक बानगी है । ऐसे कई स्कूल हैं (कमोबेश दिल्ली के सारे सरकारी स्कूलों और खास तौर पर दोपहर की पाली के स्कूलों का यही हाल है) अगर समय रहते सचेत नहीं हुआ गया तो ऐसी कई घटनाएं और भी होंगी । इस तरह की अपराधिक प्रवृत्ति के पीछे कारण जो भी हो, इसको नज़रअंदाज करना ठीक नहीं है । इन स्कूलों में नियमित काउंसलिंग होनी चाहिए । मनोचिकित्सकों से मदद लेनी चाहिए । विद्यार्थियों के आचरण पर जरूरत भर निगरानी भी रखी जानी चाहिए । गलत करने पर इनमें कानून व्यवस्था के खौफ का होना भी जरूरी है । इन सब पर जितनी जल्दी हो सके सरकार को काम करना चाहिए अन्यथा और भी बुरे परिणाम सामने आएँगे ।

सम्बंधित ख़बर का लिंक : 
2. http://inkhabar.com 

# Nangloi School, Teacher murdered by students, Crime among teenagers, Unsafe Nangloi area, Need of attention and psychological assistance , 
Boys of evening schools, Violence in students