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Sunday, 24 May 2020

जड़ी-बूटी युक्त गरम पानी पीने वाले प्रदेश से हम कुछ तो सीखें


भारत के जिन राज्यों में कोरोना संक्रमण के शुरूआती मामले देखे गये थे, उनमें केरल भी शामिल था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस तरह की खबर बार-बार ध्यान खींच रही है कि भारत में कोरोना से कारगर तरीके से निपटने में केरल सबसे अग्रणी रहा है। कोरोना पीड़ितों की रिकवरी दर और नये संक्रमणों की रोकथाम को लेकर केरल की खूब तारीफ हो रही है। इसके लिए केरल सरकार और स्थानीय प्रशासन के प्रबंधन और सक्रियता की तो तारीफ हो रही है- मलयाली जीवनशैली की कुछ अन्य विशेषताओं ने भी लोगों का ध्यान खूब खींचा है। इन्हीं में एक है वहाँ की स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग नजरिये के साथ विकसित हुई खान-पान की संस्कृति। उनकी खान पान की स्वस्थ आदतों को; मजबूत इम्यून सिस्टम का कारण मानकर; केरल वालों की खूब तारीफ हो रही है। हो भी क्यों न!
अपनी केरल यात्रा की यादें अब भी ताज़ा है। 2018 अंत में जब केरल गयी थी तब दिसम्बर में उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की तुलना में वहाँ ठीक विपरीत मौसम था। चिलचिलाती धूप और पसीने से तर-ब-तर कर देने वाला मौसम! कभी-कभी राहत पहुँचाती बारिश की फुहारें! लेकिन इस गरम मौसम में भी एक मलयाली मानुष को आप त्रिशुर स्टेशन पर आइआरसीटीसी कैंटीन में गरम पानी के बदले ठंडा पानी परोसने पर टोकते हुए और नाराजगी जाहिर करते हुए सुनेंगे तो आपको कैसा लगेगा? मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा क्योंकि यह मेरी वापसी के समय का प्रसंग था; और तब तक मैं स्थानीय खान पान की आदतों से न सिर्फ परिचित हो गयी थी बल्कि पिछले तीन दिनों से उसी खान पान का लुत्फ भी उठा रही थी। इसलिए समझ पा रही थी कि कुछ-कुछ लाल रंग लिए गरम पानी यहाँ के स्वास्थ्य सजग लोगों के जीवन का सहज हिस्सा है।
केरल बेहतरीन गुणवत्ता के मसालों का प्रचूर मात्रा में उत्पादन करने वाला राज्य है। इसके बावजूद कम से कम मेरा अपना अनुभव यही रहा कि यहाँ भोजन बनाने में तेल-मसालों का बहुत कम उपयोग किया जाता है। इस बात का अनुभव आपको वहाँ के हर छोटे-बड़े रेस्टोरेंट में होगा। सब्जियां तो प्रायः लगभग उबली हुई होती थीं। मैं जहाँ ठहरी हुई थी वहाँ हर बार भोजन के साथ मीठे के नाम पर सिर्फ केला ही परोसा गया। सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के साथ- पका केला, उबला हुआ केला या फिर भुना हुआ या फिर केले से ही बना कुछ और। ऐसा माना जाता है कि केला मीठा खाने की इच्छा की पूर्ति तो करता है और साथ ही भोजन को पचाने में भी बहुत मदद करता है। चावल के नाम पर वहाँ अधिकतर लोग मोटा चावल खाना ही पसंद करते हैं। चावलों में मोटे चावल स्वास्थ्य के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाते हैं।
[यह तस्वीर मैंने एक दिन त्रिशुर में खाने से पहले थी]

अब फिर से गरम पानी का ज़िक्र। केरल के खान-पान में मुझे सबसे ज्यादा जिस चीज़ ने आकर्षित किया था; वह यहाँ परोसे जाने वाला पानी ही था। मुझे बाताया गया कि वहाँ लोग साल के बारहों महीने खाने के साथ गरम पानी ही पीना पसंद करते हैं। पारंपरिक तौर पर भी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मत से भी ठंडे पानी की जगह गरम पानी का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत-बहुत अधिक लाभकारी माना जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ सादा गरम पानी कहाँ; औषधीय गुणों वाले खास किस्म की जड़ी-बूटियों के साथ उबाला हुआ पानी इस्तेमाल किया जाता है और यही कारण है कि उस पानी का रंग लालिमा लिए होता है। खाने के साथ, खाने से पहले और खाने के बाद जड़ी-बूटी युक्त हल्के लाल रंग का पानी पीना। जब पहली बार मुझे वह पानी पीने को मिला तो मुझे लगा कि पानी गंदा तो नहीं, शायद ग्लास अच्छे से साफ नहीं किया गया हो। मैंने वो पानी सिंक में फेंककर दूसरे ग्लास में जग से फिर से पानी उड़ेला। फिर से पानी का वही रंग और गरमाहट तो थी ही। लेकिन तभी देखा कि सामने वाले टेबल पर उसी रंग का पानी ग्लास में उड़ेल कर मजे से पिया जा रहा है। डरते-डरते मैंने भी पानी को हल्का सा टेस्ट किया और वह पानी मुझे अच्छा ही लगा। सादा गरम पानी मुझसे पिया नहीं जाता रहता तो उन जड़ी बूटियों का ही कमाल कहेंगे कि वह पानी मुझे ठीक लगा, बल्कि धीरे-धीरे बहुत स्वादिष्ट लगने लगा था। मैं खाने के मेज पर उस पानी के परोसे जाने का इंतजार किया करती थी। खाना कम खाया जाता था और वह पानी कई ग्लास पी जाती थी। हर बार पानी पीते हुए यही सोचती थी कि कुछ दिन य़हाँ रह जाऊं तो मैं ये गरम पानी पी-पी कर ही स्वस्थ और एकदम पतली हो जाउंगी।
जहाँ मिठाई के नाम पर ज्यादातर किस्म-किस्म के उबाले या भुने, पके या कच्चे केले से बने व्यंजन खाये जाते हों, और गर्मी में भी गरम और जड़ी-बूटी युक्त पानी पिया जाता हो, वहाँ की खान पान की संस्कृति तो अनुकरणीय होगी ही।
हम लोगों की आदतें तो ये हैं कि कोरोना काल में बाज़ार बंद हुए तो हम सब खुद ही वो सारी चीज़ें घरों में ही बनाने लग गये। बेहिसाब तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीज़ें- मानो पकौड़े-समौसे-मिठाईयों की दुकान और ढ़ाबे हमने अपने-अपने किचन में ही खोल लिये थे। इसकी कीमत भी कोई और नहीं हम ही चुकाएँगे। खान-पान के मामले में हम केरल से थोड़ा-कुछ तो सीखें!

Saturday, 2 March 2019

दर्शनीय है भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय

मुंबई में हाल ही में फिल्म प्रभाग (Film Division of India) परिसर में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum of the Indian Cinema) का उद्घाटन हुआ है। पिछले दिनों एक सेमिनार और रिसर्च से जुड़े काम के सिलसिले में मेरा मुंबई जाना हुआ। किसी अनजान शहर में अकेले उतरने, वहाँ के ऑटो, टैक्सी, लोकल ट्रेन में अकेले सफ़र करने के अनुभव कुल मिलाकर बेहद अच्छे रहे। 
जिस दिन वहां पहुँची उसी दिन सबसे पहले इस म्यूज़ियम को ही देखने गयी। दो भवनों में समाया यह बेहद विशाल संग्रहालय सिनेमा की पूरी यात्रा को बेहद सुन्दर तरीके से दिखाता है। इस म्यूज़ियम में आप सिनेमा के शुरूआती दौर से लेकर अब तक के इतिहास को, सिनेमा बनने की प्रक्रिया को, इसके लिए उपयोग किये जाने वाले तकनीकी उपकरणों मसलन विभिन्न प्रकार के कैमरों, साउंड रिकॉर्डर्स, रीलों व शूटिंग के समय काम आने वाले अन्य विभिन्न उपकरणों, संपादन की तकनीकों वगैरह को बेहद नजदीक से देख और महसूस कर सकते हैं। इस संग्रहालय में घूमते हुए भारतीय सिनेमा की पूरी परंपरा को आप जैसे साकार देखते हैं। कई-कई जगहों पर तो आपको खुद इस रोमांच का हिस्सा बनने का भी मौका मिलता है। मसलन आप गाँधीजी के साथ बैठ कर फिल्म देखने जैसा अनुभव कर सकते हैं, तरह-तरह के बैकग्राउंड सेलेक्ट कर अपनी ऐसी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं कि देखकर लगेगा ही नहीं कि आप सचमुच उस लोकेशन पर नहीं हैं।
इस संग्रहालय के हर एक कोने में भारतीय सिनेमा के किसी न किसी तत्व की मौजूदगी है। यहाँ के वॉशरूम तक को सिनेमा का प्रभाव ली हुई कलात्मकता से संवारा गया है। सोने पे सुहागा यह है कि यहाँ के सभी स्टाफ बेहद विनम्र और सहयोगी स्वाभाव के हैं। अभी इस म्यूज़ियम के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, इसलिए यहाँ इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई दिए। लेकिन मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही यह मुम्बई के बेहद लोकप्रिय स्थानों में से एक होगा। कभी मुंबई जाइए और समय मिले तो म्यूज़ियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा ज़रूर जाइए। यह संग्रहालय अनूठा तो है ही, इसकी टिकट भी बेहद सस्ती है।

Wednesday, 28 November 2018

आंवला नहीं आंवड़ा!

यह आंवला नहीं है और जो मुझे स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया और मैंने सही-सही याद रखा है, तो यह आंवड़ा है। सुविधा के लिए इसे आंवले का छोटा भाई मान लीजिए, जो अपने बड़े भाई से कई मायनों में अलहदा है।
मुरब्बे के अलावा आंवले से बना कुछ और मुझे पसंद नहीं, फिर कच्चे आंवले को नमक-मिर्च पाउडर के साथ खाने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। आंवले में भरपूर खटास ही नहीं एक कसैलापन भी होता है, जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त है।
बात आंवडों की करते हैं। मैसूर के टूरिस्ट प्लेसेज़ पर डिस्पोजेबल ग्लास में नमक और मिर्च पाउडर में सने छोटे-छोटे आंवड़ों को ऊपर तक भरकर बेचा जा रहा था। हालांकि सौरभ ने इसे खरीदा आंवला समझ कर ही था, लेकिन जब खाकर इसका स्वाद कुछ अलग लगा तो उन्होंने मुझे और हमारे साथ घूमने निकले दो और साथियों प्रमोद और अजित को भी इन्हें चखने के लिए दिया। यह हम सभी को इतना मज़ेदार लगा कि हमने इसे जमकर खाया और दिलचस्प यह था कि उस दस या बीस रूपये में खरीदे गए ग्लास में छोटे-छोटे इतने आंवड़े थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
आंवले का कसैलापन इसमें बिल्कुल भी नहीं था और आंवले की तुलना में यह मुलायम भी था। हल्का मीठापन लिए और ढेर सारा खट्टापन लिए यह आवड़ा खाने में इतना मज़ेदार था कि अभी जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूं, तब भी इसे सोच-सोचकर मेरे मुंह में पानी आ रहा है।
आंवड़े की तस्वीर तब तो नहीं उतार पाई थी, लेकिन संयोग से कुछ देर बाद इस आंवड़े का एक पेड़ ही कहीं दिख गया और नीचे कुछ आंवड़े भी गिरे हुए थे। आंवड़े और उसके पेड़ की तस्वीर यहां साझा कर रही हूं। ताकि आप इसे पहचान लें और जब कभी मैसूर जाने का मौका मिले तो इसे ज़रूर चखें।

Monday, 26 November 2018

जॉन ज़ोफ्फने की बनाई टीपू सुल्तान की पेंटिंग

मैसूर के दरिया दौलत बाग महल (जिसे अब एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है) में टीपू सुल्तान की एक तस्वीर लगी हुई है, जिसे जॉन ज़ोफ्फने (John Zoffany) ने 1780 में तब बनाया था, जब टीपू तीस साल के युवा थे। देखने में साधारण लगने वाली इस पेंटिंग की खासियत यह है कि इसे आप दायें-बायें या सामने कहीं से भी देखें, आपको ऐसा लगेगा कि टीपू सुल्तान की आँखें आपकी ओर ही देख रही हैं। चाहे तो आप खुद आज़मा लें!


Thursday, 22 November 2018

राजा रवि वर्मा की कुछ मूल कला कृतियों का दीदार


पिछले दिनों मैसूर यात्रा का संयोग बना और इसी दौरान यह संयोग भी बना कि राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई कुछ मूल कलाकृतियों को पहली बार अपनी आंखों से देख सकी। यह मेरे लिए रोमांचित करने वाला क्षण था। हालांकि रवि वर्मा की बनाई बहुत सी मूल पेंटिंग्स 'जगमोहन पैलेस' और 'आर्ट गैलरी', मैसूर में लगी हुई हैं, लेकिन रिनोवेशन के कारण ये दोनों ही जगहें आम लोगों के लिए बंद थीं और इसलिए मैं इन्हें देखने से चूक गई, इस बात का मुझे बेहद मलाल है।
खैर उनकी बनाई कुछ पेंटिंग्स 'मैसूर पैलेस' की गैलरी में भी लगी हुई हैं। यहां लगी अधिकांश पेंटिंग्स में उन्होंने राज परिवार के सदस्यों को चित्रित किया है। रवि वर्मा द्वारा बनाई गई उन्हीं पेंटिंग्स में से एक, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है, यहां साझा कर रही हूं।

Saturday, 14 April 2018

ओस्मानिया यूनिवर्सिटी और इफ्लू से लौटकर

कल एक परीक्षा के सिलसिले में सिकंदराबाद के पास के एक इलाके में जाना हुआ। विभाग के कई अन्य साथी भी वहां परीक्षा देने आये हुए थे। वापसी में हम छ: लोग एक साथ थे। लोकल ट्रेन लेने के लिए हम लोग बस से निकले और बस से उतरकर स्टेशन तक की दूरी हमने पैदल ही तय करने की सोची। इसका बहुत अच्छा परिणाम यह मिला कि चलते-चलते हम उस इलाके में दाखिल हुए जहाँ ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के किसी डिपार्टमेंट का रास्ता दिखाने वाला साइन बोर्ड लगा हुआ था, यानी कि हम ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के इलाके में थे। पिछले चार-पांच साल से हैदराबाद में होने के बावजूद यहाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय ओस्मानिया में जाने का मौका अब तक नहीं मिल पाया था। जबकि मेरी यह इच्छा हमेशा से रही है कि हैदराबाद के जितने भी प्रमुख विश्वविद्यालय हैं उन्हें कम से कम एक बार ज़रूर देख लूँ। कल का दिन इस लिहाज़ से बहुत सफल साबित हुआ। हमने तत्काल तय किया कि इस संयोग का फायदा उठाते हुए ओस्मानिया यूनिवर्सिटी घूम लिया जाये।
      टहलते हुए हमने कुछ डिपार्टमेंट और कुछ हॉस्टल्स देखे, लेकिन हमारे लिए जो महत्त्व का था वो आर्ट्स कॉलेज को देखना था जहाँ हम पूछ-पूछ कर पहुंच गये। यह आर्ट्स कॉलेज एक बहुत ही भव्य इमारत में है, इस भवन का निर्माण 1934 में शुरु हुआ था और 1939 में इसका उद्घाटन हुआ। इसका मॉडल तैयार करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों की एक टीम ने कई यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका, जापानमिस्र और तुर्की जैसे देशों का दौरा किया था और अंत में एक बहुत ही कलात्मक संरचना वाले भवन का निर्माण किया गयाजिसमें विभिन्न देशों की स्थापत्य कला का मिश्रण दिखाई देता है। मानविकी (Humanities) के सभी विभाग इसी भवन में स्थित हैंजिनमें हिंदी विभाग भी शामिल है।
हालांकि इतनी भव्य इमारत के बावजूद जो चहल-पहल इसके इर्द-गिर्द दिखनी चाहिए थी वह गायब थी और लड़कियाँ तो इक्का-दुक्का ही कहीं-कहीं दिख रही थीं। ओस्मानिया एक क्लोज़ कैंपस नहीं है और इस वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय की तरह यहाँ भी बाहर की गाड़ियाँ और लोग बेधड़क आ-जा रहे थे। जितनी देर हम ओस्मानिया घूमते रहे हमें यही लगा कि अच्छे-खासे क्षेत्रफल और अच्छे भौगौलिक परिवेश में होने के बावजूद शिक्षण संस्थानों का जैसा माहौल होना चाहिए उसका वहां अभाव है। यह भी हो सकता है कि यह सिर्फ उस दिन विशेष का अनुभव हो और जैसा मुझे महसूस हुआज़रूरी नहीं कि वही वास्तविकता हो।

ओस्मानिया में घूमते हुए ही हमें पता चला कि हैदराबाद का एक अन्य प्रमुख विश्वविद्यालय इफ्लू’ (English and Foreign Languages University) पास में ही ठीक सड़क के दूसरी तरफ स्थित है। यह एक और संयोग था तो हम सबने तय किया कि लगे हाथ वहाँ भी घूम लिया जाये। हैदराबाद विश्वविद्यालय से एम.ए करने वाला एक छात्र उस्मान जो अब वहाँ पीएचडी कर रहा है, उसने इफ्लू में हमारीअगवानी की और अपनी यूनिवर्सिटी में हमें घुमाया। इफ्लू बहुत बड़ा कैंपस नहीं है लेकिन वह जितने दायरे में फैला हुआ वह अपने आप में सम्पूर्ण और सुव्यवस्थित है। यहाँ आकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पता चली, वह यह कि इस विश्वविद्यालय में लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा बहुत अधिक है (एक छात्र के मुताबिक लगभग चौगुनी) और इसीलिए यहाँ लड़कों के लिए एक हॉस्टल है वहीं लड़कियों के लिए तीन या चार हॉस्टल हैं। यह वाकई बड़े आश्चर्य और ख़ुशी की बात है। 
इस यूनिवर्सिटी की जो सबसे बड़ी खासियत है वह यहाँ का माहौल है, खासतौर पर लड़के-लड़कियों के साथ होने, घूमने, पसंद के कपड़े पहनने और सुरक्षा वगैरह को लेकर ये कैंपस बहुत ही अच्छा माना जाता है और यहाँ छात्रों के व्यक्तिगत जीवन की निगरानी करने या दखल देने जैसी बातें नहीं सुनने को मिलती। हालाँकि यह बात कुछ रूढ़िवादी शिक्षकों को चुभती भी है, लेकिन वे सिवाय चिढ़ने के कुछ कर नहीं सकते! ऐसी ही एक शिक्षिका से कल वहाँ रूबरू होने का मौका भी मिला। मेरे इतना भर कहने पर कि इफ्लू मुझे बहुत अच्छा कैंपस लगा, उन्होंने कहा कि हाँ कुछ ज्यादा ही अच्छा है! अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा! शाम के बाद तो यह विश्वविद्यालय इंग्लैंड बन जाता हैउन्होंने आगे कहा इतनी अधिक पश्चात्यता उचित नहीं’!
ओस्मानिया और इफ्लू एकदम पड़ोसी विश्वविद्यालय हैं जो बिलकुल आमने-सामने हैं, इसके बावजूद दोनों जगह के माहौल में जो बहुत बड़ा अंतर है उससे यह पता चलता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के माहौल को मजबूत इरादों के साथ मनचाहे तरीके से ढाला जा सकता है। इफ्लू में छात्रों को जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता है उसका सकारात्मक परिणाम इस तरह भी दिखता है कि यहाँ अराजकता की बजाय छात्रों में एक तरह का अनुशासन है। लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं के बराबर है और उनके बीच असामनता या संदेह की बजाय दोस्ताना रिश्ता है। मेरे खयाल से हर विश्वविद्यालय को माहौल के स्तर पर इफ्लू जैसा ही होना चाहिए। इस तरह के माहौल में ही समुचित विकास और कुंठा रहित अच्छी सोच का निर्माण संभव है।

Sunday, 8 April 2018

'सुकून' मेले में इस बार

   हैदराबाद विश्वविद्यालय में हर साल मार्च-अप्रैल के महीने में तीन दिन के लिए लगने वाले सुकून मेले का आज तीसरा दिन था। पहले दिन मैं कुछ व्यस्तताओं के कारण मेले में नहीं जा सकी। दूसरी शाम पहुँचते ही तेज आँधी और बारिश आ गयी जिस वजह से सारे स्टॉल और झूले वगैरह बंद कर देने पड़े और निराश होकर भीग-भाग कर सबको हॉस्टलस और घरों को लौटना पड़ा। आज मौसम अच्छा था इसलिए आज की शाम मेले में रौनक थी और सभी ने मेले का अपने-अपने तरीके से आनंद उठाया।
मैं मेले के अपने प्रिय इलाके जहाँ बलून पर निशाना लगाने और जुआ खेलने का काम होता है पहुंची। जमकर निशाना साधा और जुए में अधिकाँश रकम डूब गयी फिर भी प्लास्टिक बॉल वाले जुए में एक की-रिंग जीता।इसके बाद पचास रूपए लगाकर कुल 20 रिंग्स फेंके, लेकिन इस बात का मुझे बहुत दुःख है कि सिर्फ एक बार रिंग निशाने पर लगा, वह भी संयोग से और एक प्लास्टिक की स्प्रिंग चूड़ियाँ मेरे हिस्से आयीं।

इस मेले में यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी तरह-तरह के स्टॉल लगाते हैं। इस बार खाने-पीने के दो स्टॉल बहुत ख़ास थे। मोमोज़ मुझे बेहद पसंद हैं लेकिन हैदराबाद में यह बहुत कम ही मिलते हैं। दो-चार लड़कियों ने मिलकर मोमोज़ का स्टॉल लगाया था और उनके स्टॉल पर उचित दर पर बेहद लज़ीज़ मिक्स वेज पनीर मोमोज़ मिल रहे थे। इस स्टॉल के पास ही एक लिट्टी-चोखे का स्टॉल था जिसे  दो-तीन लड़के मिलकर चला रहे थे। जो लिट्टी वहाँ मिल रही थी वह सेकी हुई लिट्टी नहीं थी, बहुत हलके तेल में फ्राइड थी लेकिन स्वादिष्ट थी और साथ में जो चटनी और चोखा मिल रहा था वह भी लाजवाब था।

इस बीच सुकून के मेन स्टेज पर लगातार कार्यक्रम चल रहे थे। इन तीन दिनों में पर्याप्त सांस्कृतिक महत्त्व के कार्यक्रमों के अतिरिक्त धूम-धड़ाके वाले कार्यक्रम भी खूब चलते रहते हैं। कल की आँधी और बरसात से प्रतिभागी कलाकारों, विक्रेताओं और विद्यार्थियों का जो हर्जा हुआ उसकी भरपाई के लिए मेले की अवधि एक दिन और बढ़ा दी गयी है। यानि जिस मेले को आज ख़त्म हो जाना था वह कल ख़त्म होगा और लोगों को एक और दिन मेले को एन्जॉय करने का मौका मिलेगा।

Sunday, 18 March 2018

उगादि मेले में इस बार!

हमारी यूनिवर्सिटी (UOH) के ठीक पीछे गोपनपल्ली नाम का एक गाँव है, जहाँ लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास हर साल उगादिका मेला लगता है। उगादिमतलब युग की शुरुआत का दिन, यानि सृष्टि के आरम्भ का दिन, जो विक्रम संवत कैलेंडर का पहला दिन भी होता है।
मुझे इस मेले का इंतज़ार रहता है। इस मेले में मुझे सबसे अच्छा बलून पर निशाना लगाना लगता है, लेकिन इस बार निशानेबाजी की दुकानें गायब थीं। इस मेले में तरह-तरह के झूले भी लगा करते थे, लेकिन इस बार आसपास चल रहे कुछ कंस्ट्रक्शन वर्क की वजह से उन्हें भी परमिशन नहीं मिली। इसके अलावा इस मेले की एक और चीज़ मुझे पसंद है, वह है रिंग्स और बॉल फैंक कर सामान जीतना। उसमें मैं एक-आध सामान तो हर बार जीत ही लेती हूँ, हालांकि वो सामान किसी काम का नहीं होता फिर भी उस जीत का अपना मज़ा है। अफ़सोस इस बार मेले में वैसे स्टॉल्स भी नहीं थे। यानि मेरे लिए उत्साहजनक कुछ भी नहीं था! लेकिन इन सब के बावजूद मेले में कई दुकाने थीं और किसी और में हो न हो मेला देखने आये बच्चों में वही पुराना उत्साह था।

Thursday, 22 February 2018

कुछ वक्त नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के परिसर में


मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) हमारी यूनिवर्सिटी से महज़ तीन-चार किलोमीटर ही दूर है। करीब पांच वर्षों से हैदराबाद में होने के बावजूद इस यूनिवर्सिटी में जाने का कभी संयोग नहीं बन पाया था। आज वहां एक दो दिवसीय सेमिनार का पहला दिन था और मुझे लगा कि इसे 'मानू' घूमने का एक अच्छा बहाना बनाया जा सकता है।
इस यूनिवर्सिटी का अच्छा-खासा और बेहद सुव्यवस्थित परिसर है। यह परिसर प्राकृतिक रूप से भी समृद्ध और बेहद साफ-सुथरा है। यहां की सेंट्रल लाइब्रेरी में विभिन्न विषयों की किताबों के रख-रखाव और पढ़ने के लिए अलग-अलग कई कमरे बने हुए हैं, ऐसा किसी लाइब्रेरी में मैंने पहली बार देखा!
लेकिन इस विश्वविद्यालय में दो बातें मुझे बहुत खटकी भी। इतना साफ-सुथरा विश्वविद्यालय होने के बावजूद यहां कूड़ेदानों का भारी अभाव था। इतना कि चाय पीते हुए थोड़ी दूर निकल जाने के बाद खाली कप को ठिकाने लगाने के लिए मुझे उसे हाथ में लेकर लगभग पूरी यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाना पड़ गया!
दूसरी बात जो खटकी वह यह कि पूरे परिसर में मैं जितनी देर तक रही या घूमती रही, मुझे एकाधिक लड़के एकसाथ दिखे, एकाधिक लड़कियां एकसाथ दिखीं, लेकिन लड़के-लड़कियां एकसाथ नहीं दिखे तो ज़ाहिर है कि कोई कपल तो बिल्कुल भी नहीं दिखा!
हो सकता है कि यह महज़ संयोग हो लेकिन यदि यह महज़ संयोग नहीं था, तो इस स्थिति को बेहद अफसोसनाक कहा जा सकता है, और यह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि यह यूनिवर्सिटी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारी मोरल पुलिसिंग की जद में है। यह शंका मुझे इसलिए भी अधिक हो रही है कि मैं सौरभ के साथ थी और यूनिवर्सिटी में हमें बाइक पर साथ घूमते देखकर अधिकांश लोगों के चेहरे पर जो भाव उभर रहे थे, उससे मैं जितना समझ पाई वह यह कि वे लोग इस तरह के दृश्यों के अभ्यस्त नहीं थे!

Tuesday, 2 May 2017

बजवाड़े के किले तक पहुँच कर भी..

पिछले दिनों पंजाब के होशियारपुर कस्बे में जाना हुआ । सोचा कि आये ही हैं तो कोई घूमने लायक जगहें यहाँ हों, तो देख ली जाएँ । गूगल सर्च किया तो पता चला यहाँ एक किला है- बजवाड़ा किला। इसे देखने भरी दोपहरी भारी गर्मी में भी हम लोग बड़े उत्साह के साथ चल दिए! हम लोग टैक्सी से थे । पूछ-पूछ कर किसी तरह उस जगह तक पहुंचे, तो पता चला कि वहां तक गाड़ी नहीं जा सकती, लिहाज़ा हम लोग गाड़ी से उतर कर पैदल चल पड़े । हमारी सोच के एकदम विपरीत, किले का रास्ता बेहद संकरी सी गलियों से होकर जा रहा था । जैसे तैसे किले के पास पहुंचे । दरअसल उसे पास नहीं कहा जा सकता, बस ऐसी जगह पहुंच गए कि वहां से किला स्पष्ट दिख रहा था ।
इस ऐतिहासिक किले और उसके खंडित हिस्सों की देखकर रखरखाव का अभाव तो साफ दिखा ही, उस तक पहुँचने का कोई ठीक रास्ता तक नही था! किले से लगभग सौ मीटर के दायरे तक गेंहूँ के खेत थे । कह सकते हैं कि यह खेतों के बीच में खड़ा था । ये खेत लोहे के बाड़ों से घिरे हुए थे ।आसपास रिहायशी मकान तो थे लेकिन दूर-दूर तक कोई आदमी नज़र नहीं आ रहा था । कोई निर्देशिका, कोई सूचना पट्ट तक वहाँ उपलब्ध नहीं था । हमने किले के भीतर जाने का इरादा त्याग दिया । किसी ऐतिहसिक इमारत के इतना पास जाकर भी उसे पास से न देख सकने का मलाल मुझे हमेशा रहेगा । 

#Bajwara Fort,Hoshiarpur