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Tuesday, 10 July 2018

**** हिन्दी सिनेमा में हाशिये की यौनिकता ****

हाशिये की लैंगिक पहचान या हाशिये की यौनिकता को फिल्मों का विषय बनाने वाली फिल्में अभी खुद सिनेमा के हाशिये पर हैं। इसके बावजूद ये फ़िल्में समाज की मानसिकता में हो रहे बदलावों को दिखाने और बदलावों के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी भाषा से इतर विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी इस तरह की उल्लेखनीय फिल्में बनाई जा रही हैं।
बया (अप्रैल-जून-2018) 
संपादक- गौरीनाथ
हिंदी सिनेमा में हाशिये का समाज : 1(विशेषांक) 
अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन- II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

Monday, 19 March 2018

****हिंदी सिनेमा को सई परांजपे का योगदान****

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सई परांजपे की फिल्मों की रेंज बहुत व्यापक है । उन्होंने कृषकों, मजदूरों, बेरोज़गार युवकों, अकेली स्त्रियों, शारिरिक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों आदि की समस्यायों को अपने सिनेमा में पूरी शिद्धत से उतारा है । सई की बहुत बड़ी खासियत यह है कि उनकी फिल्मों की जान इनके कथातत्व मात्र नहीं हैं, बल्कि बहुत सतर्कता से किया गया दृश्य संयोजन, कैमरे से उतारे गये सरल प्रतीक और इसके पीछे की बेहतर सोच है। सई एक ऐसी फिल्मकार हैं, जिन्होंने पुरूष वर्चस्व के इस क्षेत्र में न सिर्फ अपना एक मुकाम बनाया बल्कि वो हिन्दी सिनेमा को सार्थक दिशा देने वाले और इसकी ऐतिहासिक परंपरा को वास्तव में समृद्ध करने वाले अग्रणी निर्देशकों में से एक हैं ।
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['आजकल' (मार्च-2018 अंक) में प्रकाशित]

Tuesday, 19 December 2017

_____ कविता की बात सुनाती कविताएँ _____

वेणु गोपाल की कविताओं में विचार का पक्ष अधिक मुखर रहा है। मेरी समझ से इसका कारण उनकी स्पष्ट पक्षधरता है। नक्सल जैसी उग्रवामपंथी विचारधारा से सक्रिय तौर पर सम्बद्ध कवि की वैचारिक प्रखरता स्वाभाविक है। कविता को शोषण के विरूद्ध और साम्यवाद के पक्ष में इस्तेमाल करने की जो तकनीक प्रगतिशील कविता के दौर में विकसित हुई थी, नक्सल क्रांति के दौर में उसे पर्याप्त व्यावहारिक आधार मिला। हिन्दी साहित्य में वेणु गोपाल की पहली मुकम्मल पहचान इसी दौर के दायित्वबोध से आबद्ध, अभिव्यक्ति के भारी खतरे उठा सकने वाले कवि के बतौर हुई थी।
(मासिक पत्रिका ‘अक्षरपर्व’ के दिसम्बर'2017 अंक में प्रकाशित)

Monday, 28 August 2017

*****हिन्दी सिनेमा में उच्च शिक्षा का संकट*****

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एक सवाल यह उठ सकता है कि उच्च शिक्षा की समस्याएं या संकट फिल्मकारों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण होने चाहिए? इसका सरल सा उत्तर एक प्रश्न है, और वह यह है कि उच्च शिक्षा की समाज के लिए जो महत्वपूर्ण भूमिका होती है, या होनी चाहिए उसकी तुलना में आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी ऐसी स्थिति क्यों है, कि समाज को उसका वाज़िब परिणाम नहीं मिल रहा? यदि यह समस्या है, तो इसकी तह तक जाने की ज़रूरत है।
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Friday, 28 April 2017

******वर्चस्ववादी संस्कृति के विरूद्ध फ़ैज़******

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दुनिया भर के दुख-दर्द को महसूस करने और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से उसका विश्लेषण करने की प्रक्रिया किसी को भी वर्चस्ववादी संस्कृति का प्रबल विरोधी बना देने के लिए पर्याप्त होती   है। वर्चस्व किसी वर्ग का होकिसी समुदाय का होकिसी लिंग का होकिसी देश का अथवा किसी अराजक राजनितिक शक्ति का हो या किसी अन्य तरह का हो हर तरह के वर्चस्व के खिलाफफ़ैज़ अपनी संवेदना और अपने वैज्ञानिक साम्यवादी दृष्टिकोण के कारण प्रतिरोध की समानांतर संस्कृति रच पाने में कामयाब हो पाते हैं।
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