अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं
उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में
फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी
से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ
के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे
लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद
पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए;
लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह
आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।
मुझसे बातचीत में
मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर
विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे
राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना
हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग
एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।
मृदुला जी के साहित्य
को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित
उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी
फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम
हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 मेंबनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण
है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।
आज खबर आई कि मृदुला
सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके
रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के
प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को
भावभीनी श्रद्धांजलि।
"इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास
कमज़ोर हो न"
पूरा बचपन स्कूलों में हम ये प्रार्थना गाते हुए
ही बड़े हुए। और मेरे खयाल से हर किसी को यह प्रार्थना सुंदर लगती होगी। आज भी
शायद कुछ स्कूलों में दिन की शुरुआत इसी प्रार्थना से होती है। गीतकार अभिलाष ने
फिल्म 'अंकुश'
के लिए जब यह गीतनुमा प्रार्थना लिखी होगी, तब
उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी लिखी यह प्रार्थना देशभर के शैक्षणिक
संस्थानों का हिस्सा बन जाएगी। जब कभी विद्यालयों में लंबी-लंबी कतारों में करबद्ध
होकर आँखें मूँदे खड़े विशाल युवा जनसमूह को वे अपनी लिखी पंक्तियाँ दोहराते;
सुनते-देखते होंगे तो निश्चय ही उनका ह्रदय गर्व से प्रफुल्लित हो
उठता होगा!
एक लंबे अरसे से कैंसर से लड़ते हुए आज गीतकार
अभिलाष का निधन हो गया। उन्हें उनकी प्रार्थना की पंक्तियों के साथ श्रद्धांजलि।
वे हमेशा इस प्रार्थना के जरिए, याद किए जाते रहेंगे। नमनय़
भारत के जिन राज्यों
में कोरोना संक्रमण के शुरूआती मामले देखे गये थे, उनमें
केरल भी शामिल था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस तरह की खबर बार-बार ध्यान खींच रही
है कि भारत में कोरोना से कारगर तरीके से निपटने में केरल सबसे अग्रणी रहा है।
कोरोना पीड़ितों की रिकवरी दर और नये संक्रमणों की रोकथाम को लेकर केरल की खूब
तारीफ हो रही है। इसके लिए केरल सरकार और स्थानीय प्रशासन के प्रबंधन और सक्रियता
की तो तारीफ हो रही है- मलयाली जीवनशैली की कुछ अन्य विशेषताओं ने भी लोगों का
ध्यान खूब खींचा है। इन्हीं में एक है वहाँ की स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग नजरिये
के साथ विकसित हुई खान-पान की संस्कृति। उनकी खान पान की स्वस्थ आदतों को; मजबूत इम्यून सिस्टम का कारण मानकर; केरल वालों की
खूब तारीफ हो रही है। हो भी क्यों न!
अपनी
केरल यात्रा की यादें अब भी ताज़ा है। 2018 अंत में जब केरल गयी थी तब दिसम्बर में
उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की तुलना में वहाँ ठीक विपरीत मौसम था।
चिलचिलाती धूप और पसीने से तर-ब-तर कर देने वाला मौसम! कभी-कभी राहत पहुँचाती
बारिश की फुहारें! लेकिन इस गरम मौसम में भी एक मलयाली मानुष को आप त्रिशुर स्टेशन
पर आइआरसीटीसी कैंटीन में गरम पानी के बदले ठंडा पानी परोसने पर टोकते हुए और नाराजगी
जाहिर करते हुए सुनेंगे तो आपको कैसा लगेगा? मुझे कुछ भी
अजीब नहीं लगा क्योंकि यह मेरी वापसी के समय का प्रसंग था; और तब तक मैं स्थानीय
खान पान की आदतों से न सिर्फ परिचित हो गयी थी बल्कि पिछले तीन दिनों से उसी खान
पान का लुत्फ भी उठा रही थी। इसलिए समझ पा रही थी कि कुछ-कुछ लाल रंग लिए गरम पानी
यहाँ के स्वास्थ्य सजग लोगों के जीवन का सहज हिस्सा है।
केरल
बेहतरीन गुणवत्ता के मसालों का प्रचूर मात्रा में उत्पादन करने वाला राज्य है।
इसके बावजूद कम से कम मेरा अपना अनुभव यही रहा कि यहाँ भोजन बनाने में तेल-मसालों
का बहुत कम उपयोग किया जाता है। इस बात का अनुभव आपको वहाँ के हर छोटे-बड़े
रेस्टोरेंट में होगा। सब्जियां तो प्रायः लगभग उबली हुई होती थीं। मैं जहाँ ठहरी
हुई थी वहाँ हर बार भोजन के साथ मीठे के नाम पर सिर्फ केला ही परोसा गया। सुबह के
नाश्ते,
दोपहर के भोजन और रात के खाने के साथ- पका केला, उबला हुआ केला या फिर भुना हुआ या फिर केले से ही बना कुछ और। ऐसा माना
जाता है कि केला मीठा खाने की इच्छा की पूर्ति तो करता है और साथ ही भोजन को पचाने
में भी बहुत मदद करता है। चावल के नाम पर वहाँ अधिकतर लोग मोटा चावल खाना ही पसंद
करते हैं। चावलों में मोटे चावल स्वास्थ्य के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर माने
जाते हैं।
[यह तस्वीर मैंने एक दिन त्रिशुर में खाने से पहले थी]
अब
फिर से गरम पानी का ज़िक्र। केरल के खान-पान में मुझे सबसे ज्यादा जिस चीज़ ने
आकर्षित किया था; वह यहाँ परोसे जाने वाला पानी
ही था। मुझे बाताया गया कि वहाँ लोग साल के बारहों महीने खाने के साथ गरम पानी ही
पीना पसंद करते हैं। पारंपरिक तौर पर भी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मत से भी
ठंडे पानी की जगह गरम पानी का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत-बहुत अधिक
लाभकारी माना जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ सादा गरम पानी कहाँ; औषधीय गुणों वाले खास किस्म की जड़ी-बूटियों के साथ उबाला हुआ पानी
इस्तेमाल किया जाता है और यही कारण है कि उस पानी का रंग लालिमा लिए होता है। खाने
के साथ, खाने से पहले और खाने के बाद जड़ी-बूटी युक्त हल्के
लाल रंग का पानी पीना। जब पहली बार मुझे वह पानी पीने को मिला तो मुझे लगा कि पानी
गंदा तो नहीं, शायद ग्लास अच्छे से साफ नहीं किया गया हो।
मैंने वो पानी सिंक में फेंककर दूसरे ग्लास में जग से फिर से पानी उड़ेला। फिर से
पानी का वही रंग और गरमाहट तो थी ही। लेकिन तभी देखा कि सामने वाले टेबल पर उसी
रंग का पानी ग्लास में उड़ेल कर मजे से पिया जा रहा है। डरते-डरते मैंने भी पानी
को हल्का सा टेस्ट किया और वह पानी मुझे अच्छा ही लगा। सादा गरम पानी मुझसे पिया
नहीं जाता रहता तो उन जड़ी बूटियों का ही कमाल कहेंगे कि वह पानी मुझे ठीक लगा,
बल्कि धीरे-धीरे बहुत स्वादिष्ट लगने लगा था। मैं खाने के मेज पर उस
पानी के परोसे जाने का इंतजार किया करती थी। खाना कम खाया जाता था और वह पानी कई
ग्लास पी जाती थी। हर बार पानी पीते हुए यही सोचती थी कि कुछ दिन य़हाँ रह जाऊं तो
मैं ये गरम पानी पी-पी कर ही स्वस्थ और एकदम पतली हो जाउंगी।
जहाँ
मिठाई के नाम पर ज्यादातर किस्म-किस्म के उबाले या भुने, पके या कच्चे केले से बने व्यंजन खाये जाते हों, और
गर्मी में भी गरम और जड़ी-बूटी युक्त पानी पिया जाता हो, वहाँ
की खान पान की संस्कृति तो अनुकरणीय होगी ही।
हम
लोगों की आदतें तो ये हैं कि कोरोना काल में बाज़ार बंद हुए तो हम सब खुद ही वो
सारी चीज़ें घरों में ही बनाने लग गये। बेहिसाब तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीज़ें- मानो पकौड़े-समौसे-मिठाईयों की दुकान और ढ़ाबे हमने अपने-अपने किचन में ही खोल लिये थे। इसकी कीमत भी कोई और नहीं हम ही
चुकाएँगे। खान-पान के मामले में हम केरल से थोड़ा-कुछ तो सीखें!
70-80 के दशक में
हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद
करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के
नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी
गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने
यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की
फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो
ग़लत नहीं होगा।
जिसने
भी ‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे
लिए’, पति पत्नी और वो’ जैसी फ़िल्में
देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या
सिन्हा किसी ‘बड़ी बॉलीवुड फिल्म’ का
हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों,
टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं
पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने
पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में
बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले
कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि
के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग
उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ
समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे
भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में
पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा
कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन
की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है।
उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।
यह
आंवला नहीं है और जो मुझे स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया और मैंने सही-सही याद
रखा है,
तो यह आंवड़ा है। सुविधा के लिए इसे आंवले का छोटा भाई मान लीजिए,
जो अपने बड़े भाई से कई मायनों में अलहदा है।
मुरब्बे
के अलावा आंवले से बना कुछ और मुझे पसंद नहीं, फिर कच्चे
आंवले को नमक-मिर्च पाउडर के साथ खाने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। आंवले
में भरपूर खटास ही नहीं एक कसैलापन भी होता है, जो मेरे लिए
नाकाबिले बर्दाश्त है।
बात
आंवडों की करते हैं। मैसूर के टूरिस्ट प्लेसेज़ पर डिस्पोजेबल ग्लास में नमक और
मिर्च पाउडर में सने छोटे-छोटे आंवड़ों को ऊपर तक भरकर बेचा जा रहा था। हालांकि
सौरभ ने इसे खरीदा आंवला समझ कर ही था, लेकिन जब खाकर इसका स्वाद कुछ अलग लगा तो
उन्होंने मुझे और हमारे साथ घूमने निकले दो और साथियों प्रमोद और अजित को भी
इन्हें चखने के लिए दिया। यह हम सभी को इतना मज़ेदार लगा कि हमने इसे जमकर खाया और
दिलचस्प यह था कि उस दस या बीस रूपये में खरीदे गए ग्लास में छोटे-छोटे इतने
आंवड़े थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
आंवले
का कसैलापन इसमें बिल्कुल भी नहीं था और आंवले की तुलना में यह मुलायम भी था।
हल्का मीठापन लिए और ढेर सारा खट्टापन लिए यह आवड़ा खाने में इतना मज़ेदार था कि
अभी जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूं, तब भी इसे सोच-सोचकर
मेरे मुंह में पानी आ रहा है।
आंवड़े
की तस्वीर तब तो नहीं उतार पाई थी, लेकिन संयोग
से कुछ देर बाद इस आंवड़े का एक पेड़ ही कहीं दिख गया और नीचे कुछ आंवड़े भी गिरे
हुए थे। आंवड़े और उसके पेड़ की
तस्वीर यहां साझा कर रही हूं। ताकि आप इसे पहचान लें और जब कभी मैसूर जाने का मौका
मिले तो इसे ज़रूर चखें।
भारतीय
चित्रकला के बड़े प्रवर्त्तक राजा रवि वर्मा के जीवन पर बनी केतन मेहता की फिल्म 'रंगरसिया' में दो प्रसंग ऐसे हैं जो आधुनिकता और
तकनीकी उन्नति के प्रति रवि वर्मा के सम्मान, अभिरूचि और
उदारता को दिखाते हैं। रवि वर्मा ने जब कैमरे से खींची हुई तस्वीरों को पहली बार
देखा तो चित्रकला की तुलना में श्रम और समय की भारी बचत और अधिक सटीक छायांकन को
देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।
दूसरा
प्रसंग यह है कि मुंबई (तब के बंबई) में जब 1896 में पहली
बार ल्युमिरे बंधुओं ने फिल्म का प्रदर्शन किया था तो उन्होंने बंबई के तमाम गणमान्य
नागरिकों को यह प्रर्दशन देखने के लिए आमंत्रित किया। राजा रवि वर्मा भी इस
प्रर्दशन को देखने के लिए आमंत्रित किए गए थे। उन्होंने जब पर्दे पर चलती हुई
तस्वीरों को देखा तो वे बहुत अधिक आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने बहुत प्रसन्नतापूर्वक
कहा कि अब तक तो चित्र सिर्फ उतारे जाते थे, लेकिन इस
अविष्कार में तो चित्र हम सब की तरह चल-फिर रहे हैं! वाह! लाजवाब।
उसी
प्रर्दशन में उन्होंने देखा कि एक नवयुवक ल्युमिरे बंधुओं को फिल्म प्रर्दशन में
बड़े उत्साह के साथ हर तरह से सहयोग कर रहा था। बाद में इस युवक ने रवि वर्मा के
सहायक चित्रकार के रूप में भी काम किया। जब रवि वर्मा की आर्थिक स्थिति खराब होने
लगी थी तो उन्होंने अपना प्रेस बेच दिया था। इससे उन्हें जो राशि मिली उसका एक
अच्छा-खासा हिस्सा अपने उस सहयोगी युवक को भी दिया था, जिसमें उन्होंने फिल्म कला के प्रति अभिरुचि और ललक देखी थी, ताकि वह अपनी इस अभिरुचि और ललक को दिशा दे सके। उस युवक की यात्रा आगे
भी सरल नहीं रही लेकिन उस युवक में फिल्म कला के प्रति इतना अगाध समर्पण था कि
उसने तमाम आर्थिक व अन्य चुनौतियों को पार करते हुए भारतीय फिल्म कला को स्थापित
करने वाले व्यक्ति के रूप में ख्याति पाई। उस युवक का नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के
था, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से भी जाना जाता है। आज
दादासाहेब फाल्के का 148वां जन्मदिन है।
मुझे
आज याद दादसाहेब को करना था लेकिन इस पोस्ट का एक बड़ा हिस्सा रवि वर्मा पर
केन्द्रित हो गया, इसका कारण यह है कि रवि वर्मा
की फाल्के को आर्थिक सहायता देकर फिल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की जो घटना
है वह इसलिए भी हमेशा याद की जानी चाहिए, कि यह एक पारंपरिक
कला विधा से जुड़ी बड़ी हस्ती का एक आधुनिक कला विधा को स्थापित करने में दिया गया
योगदान भी है। ऐसा विरले ही होता है! इसलिए जब कभी भारतीय फिल्मों की चर्चा हो,
उसके जनक दादासाहेब फाल्के के संघर्षों और योगदान की चर्चा हो तो उस
चर्चा में राजा रवि वर्मा का ज़िक्र अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
पाठ्यक्रम
की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी
ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में
थी,
तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती
थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से
पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के
लिए मिल जाती थी।
लेकिन
वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध
लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती
थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस
लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें
नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और
दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन
सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके
से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के
मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी
में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने
का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों
से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से
एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता
है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय
हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्रनाम
का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें
देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा,
शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय
इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो,
मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह
किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत
ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक,
मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये
क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी
ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी
नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब
लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी
कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये,
तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की ‘किताब’ वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर
अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में
किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की
बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो
बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी
नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय
के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का
जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और
व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे
लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना,
उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे
निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी
यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर
किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच
आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक
ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब
किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि
किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे
उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!
फारुख शेख़ ने ग्रेजुएशन के लिए मुंबई के सेंट ज़ेवियर
कॉलेज में एडमिशन लिया था, जो अपने अंग्रेजीदां माहौल के लिए जाना जाता था। वहाँ के
थिएटर ग्रुप भी सिर्फ अंग्रेज़ी के नाटक किया करते थे। थिएटर से रूचि रखने वाले
फारुख को यह बात चुभती थी। उसी कॉलेज में एक साल बाद शबाना आज़मी ने भी एडमिशन
लिया। उन दोनों का जब आपस में परिचय हुआ तो उस कॉलेज में हिंदी रंगमंच की
पृष्ठभूमि तैयार हुई। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। एक अंग्रेजीदां कॉलेज में इन
लोगों ने जो हिंदी रंगमंच तैयार किया, उसकी धूम इस तरह मचने
लगी कि तमाम प्रतियोगिताओं में कॉलेज का अंग्रेजी रंगमंच उनके हिंदी रंगमंच से
पिछड़ जाया करता था। जबकि एक कड़वी हकीकत यह थी कि कॉलेज सिर्फ अंग्रेजी नाटक करने
वालों को ही फंड दिया करता था और हिंदी नाटक करने वाले छात्रों के लिए खर्च की
भारी जिम्मेदारी खुद फारुख उठाते थे।
संभवत:
कॉलेज में हिंदी रंगमंच के माध्यम से इन लोगों की जो सक्रियता रही उसी ने शबाना को
पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट तक पहुँचाया और फारुख ने अपने खानदानी वकालती पेशे को
अपनाने की बजाय अभिनय को अपनी निष्ठा और समर्पण का विषय बनाया और रंगमंच से जुड़े
रहते हुए वे हिंदी सिनेमा से भी जुड़ गये। जहाँ उन्होंने कई उम्दा फिल्मों में
यादगार अभिनय किया। जिनमें ‘गर्म हवा’, ‘शतरंज के खिलाडी’, ‘गमन‘, ‘उमराव
जान’, ‘साथ-साथ’, ‘कथा’, ‘चश्मेबद्दूर’, ‘बाज़ार’ सहित कई
फ़िल्में शामिल हैं।
कहा
जाता है कि फारुख अभिनय के लिए मशक्कत नहीं किया करते थे बल्कि वे अभिनय करने को
एन्जॉय किया करते थे और अभिनय उनके लिए जीवन को सेलिब्रेट करने का ही एक ज़रिया था।
इसके अलावा उनके लगभग सभी जानने वाले उनके बारे में जो एक बात समानरूप से कहते हैं, वह यह कि फारुख दिल के बहुत ही खूबसूरत इंसान थे। उन्हें कुछ फिल्मों में
निर्देशित करने वाली सई परांजपे उनके नेक स्वभाव के कारण ही उन्हें ‘चाइल्ड ऑफ़ गॉड’ कहा करती हैं।
कॉलेज
के दिनों में व्यक्तिगत प्रयासों से विकसित किये गये हिंदी रंगमंच से ही फारुख के
जीवन के एक और बहुत महत्वपूर्ण हिस्से की तार जुड़ती है। नाटकों के लिए बैक स्टेज
अरेंजमेंट के लिए बहुत मेहनत करने वाले विद्यार्थियों में एक रूपा नाम की लड़की भी
हुआ करती थी। यही रूपा रंगमंच के बैक स्टेज से निकल कर व्यावहारिक जीवन के फ्रंट
स्टेज पर फारुख की जीवन संगिनी बनकर शामिल हुईं। वैसे यह कहना भी गलत नहीं होगा कि
फारुख का बैक स्टेज रूपा जीवन भर संभालती रहीं।
फारुख
शेख का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के अमरोली में हुआ था। 27 दिसम्बर 2013 को
दुबई में उनका देहांत हो गया था। यदि वे जीवित होते तो आज अपना 70वां जन्मदिन मना
रहे होते। उन्हें याद करते हुए गूगल ने भी आज एक खूबसूरत डूडल बनाया है। उनकी
स्मृति को नमन।
अभिनेता
नरेंद्र झा के निधन की खबर स्तब्ध करने वाली है। तंदरुस्ती, उत्साह, उर्जा और
सकारात्मकता से भरे एक व्यक्ति का अचानक इस दुनिया को विदा कह देना बहुत खलने वाला
होता है। नरेंद्र की अभिनय क्षमता के विविध आयामों से अभी लोगों का परिचय होना
शुरू ही हुआ था, कि उनकी जगह उनकी अनुपस्थिति ने ले ली है। वे महज़ 55 साल के थे और
आज सुबह कथित तौर पर कार्डियक अरेस्ट की वजह से उनकी मौत हो गयी।
नरेंद्र
झा की यात्रा बिहार के मधुबनी जिले के कोइलख गाँव से शुरू होती है। ऐसा माना जाता
है कि मिथिला की कला और सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखने वाले कुछ एक गाँवों में
कोइलख भी शामिल है। नरेंद्र गाँव में होने वाले नाटकों को बचपन से ही देखा करते थे
और अवसर मिलने पर छोटी-मोटी भूमिकाएँ भी किया करते थे। कुछ और नहीं तो दो दृश्यों
के बीच में गीत गा लेने का अवसर मिलने पर भी उन्हें बहुत संतोष होता था। अपने भीतर
रंगमंच से प्रेम और अभिनय संस्कार का बीज बोने का श्रेय वे गाँव के इन्हीं नाटकों
को देते थे।
दसवीं तक की पढ़ाई गाँव में करने के बाद, इंटर की
पढ़ाई के लिए वे दरभंगा गये फिर पटना सेग्रेजुएशन की
डिग्री लेकर वे पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय आए लेकिन एक साल बाद
ही उन्होंने डीयू छोड़कर जेएनयू में दाखिला ले लिया और वहीं से अपना पोस्ट
ग्रेजुएशन पूरा किया। परिजनों की अपेक्षा के अनुरूप उन्होंने सिविल सर्विसेज़ की
तैयारी भी शुरू की, लेकिन उनका मन इस ओर नहीं रम सका। उनके मन को तो अभिनय की
दुनिया में रमना था! अपनी नयी मंजिल निर्धारित कर लेने के बाद उन्होंने श्रीराम सेंटर,
दिल्ली से एक्टिंग में डिप्लोंमा किया और फिर मुंबई आ गये। अच्छी कद-काठी और
चेहरे-मोहरे के कारण उन्हें शुरू में ही मॉडलिंग असाइनमेंट मिलने लगे। नरेंद्र के
मुताबिक इससे जो आमदनी होती थी, उससे उनमें मुम्बई में ठहर कर संघर्ष करने का
हौसला बना रहा। इसी बीच उन्हें टीवी धारावाहिकों में काम मिलने लगा और उन्होंने
मॉडलिंग छोड़ कर इस तरफ अपना ध्यान लगाना शुरू कर दिया। शुरूआती दौर में ‘शान्ति’
जैसे लोकप्रिय धारवाहिक ने उन्हें प्रशंसा दिलाई। उन्होंने बीस से भी अधिक टीवी
धारवाहिकों में काम किया है, जिनमें ‘जय हनुमान’, ‘सास भी कभी बहु थी’, ‘आम्रपाली’,
‘रावण’, ‘सविंधान’ आदि शामिल हैं।
2004 में धारावाहिक ‘रावण’ में निभाई गयी उनकी मुख्य भूमिका की बहुत अधिक
तारीफ़ हुई। राज्यसभा टीवी के लिए श्याम बेनेगल के निर्देशन में संविधान निर्माण पर
केन्द्रित धारवाहिक में नरेंद्र ने ‘मोहम्मद अली जिन्नाह’ की भूमिका निभाई, इसमें किये
उनके अभिनय ने भी लोगों को बहुत प्रभावित किया।
टीवी
पर काम करते हुए ही उन्हें बॉलीवुड में भी काम मिलने लगा था। 2003 में रिलीज़ हुई
फिल्म ‘फनटूश’ से उन्होंने बड़े परदे पर अपनी उपस्थिति दर्ज
करवायी। 2004 में आई नेताजी सुभाष चन्द्र बोस में कैप्टन ‘हबीब’ की निभाई उनकी
भूमिका से निर्देशक श्याम बेनेगल इतने प्रभावित हुए कि इसके बाद से वे नरेंद्र को
हबीब के नाम से ही बुलाने लगे। धीरे-धीरे नरेंद्र को बड़े बजट की फिल्मों में भी
काम मिलना शुरू हो गया था। इनमें ‘हैदर’, ‘हमारी अधूरी कहानी’,
‘घायल वन्स अगेन’, ‘मोहनजोदारो’, ‘फ़ोर्स 2’, ‘रईस’, काबिल जैसी फ़िल्में
शामिल हैं।
बड़े
परदे पर उन्हें अक्सर छोटी भूमिकाएं ही मिलीं, लेकिन अपनी उन भूमिकाओं से भी वे छाप
छोड़ पाने में कामयाब होते रहे। एक मैथिली पत्रकार के द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या
कारण है कि फिल्मों में आपकी छोटी भूमिकाएँ भी लोगों को याद रह जाती हैं? इसका विनम्रतापूर्वक
जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस बात का अधिकाँश श्रेय उनके हिस्से में आई भूमिका
के लिए लिखी स्क्रिप्ट को जाता है, जिसमें खुद इतनी सम्भावना होती है कि अगर कोई ठीक-ठाक
एक्टिंग कर लें तो उसकी छाप दर्शकों के मन पर रह जाती है।
फिल्म
‘हैदर’ में डॉ हिलाल मीर की भूमिका को उन्होंने इतनी शिद्दत से निभाया है कि उनके
बेहतरीन अभिनय के उदाहरण के रूप में इसका ज़िक्र किया जा सकता है। इस फिल्म में उनके
बॉडी लैंग्वेज, एक्सप्रेशंस और संवाद अदायगी के मेल से जो प्रभाव पैदा किया है, वह
लम्बे समय तक ज़हन में रह जाता है।
नरेंद्र
के पास फ़िलहाल कई फिल्म असाइनमेंट्स थे। उन्होंने दक्षिण भारतीय की फिल्मों में भी
काम किया है। अपनी मातृभाषा मैथिली की फिल्मों में भी वे काम करना चाहते थे, लेकिन
इसके लिए वे बेहतर स्क्रिप्ट का इंतज़ार कर रहे थे। सिनेमा में काम करने के साथ-साथ
वे लगातार टीवी पर भी सक्रिय रहे। वे बताया करते थे कि उनका पहला आकर्षण सिनेमा नहीं
टीवी ही था और शुरुआत में वे खुद की कल्पना एक टीवी स्टार के बतौर ही किया करते थे।
एकाध
फिल्मों में नरेंद्र मुख्य किरदार में भी रहे, लेकिन इन फिल्मों की स्क्रिप्ट और
निर्देशन का पक्ष बहुत मजबूत नहीं था और इसलिए ये फ़िल्में पसंद नहीं की गयीं। वास्तव
में नरेंद्र की अभिनय क्षमता का इस्तेमाल करना हिंदी सिनेमा ने अभी ठीक से शुरू भी
नहीं किया था। नरेंद्र में यह सम्भावना थी कि वह कई चुनौतीपूर्ण किरदारों को बहुत
ही खूबसूरती से परदे पर उतार सकते थे। शायद आने वाले दिन उनकी निभायी जा रही बहुत
सारी यादगार भूमिकाओं के होते! लेकिन ऐसा होना नियति को मंज़ूर नहीं था। एक अच्छा
अभिनेता जब असमय इस दुनिया को विदा कह देता है, तो दरअसल वह अपने दर्शकों को भारी
अधूरेपन में छोड़ जाता है, एक ऐसा अधूरापन जो कभी नहीं भरता!
आज
से ठीक एक साल पहले, 6 जनवरी 2017 की सुबह लोगों
को यह दुखद खबर मिली थी कि ओम पुरी नहीं रहे। यह खबर बेहद अप्रत्याशित थी, क्योंकि ओम पुरी अभिनय के क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे और अपने कुछ
बयानों के कारण उन दिनों वे मीडिया की ख़बरों में भी बने हुए थे। ओम पुरी और सिनेमा
के चाहने वालों के लिए यह एक बड़ा धक्का था। ओम पुरी हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों
में गिने जा सकते हैं, जिनके बिना समृद्ध हिंदी सिनेमा की
कल्पना भी नहीं की जा सकती।
पंजाब
के एक छोटे से कस्बे में पले-बढ़े ओम पुरी का बचपन बहुत अभावों में बीता। बाद के
दिनों में ओम पुरी को यह स्वीकारने में कभी हिचक नहीं हुई कि उनका बचपन बहुत ही
घुटा हुआ था, जिसकी छाप उनपर लम्बे समय तक रही। वे फ़ौज
में भरती होना चाहते थे, संयोगों ने उन्हें थियेटर की तरफ
मोड़ा और फिर वहाँ जगी अभिरुचि और जुनून ने उन्हें ‘नेशनल
स्कूल ऑफ़ ड्रामा’ तक पहुँचाया। यहाँ पहुँचने से पहले तक ओम
पुरी ने पढ़ाई जारी रखते हुए अपनी आजीविका के लिए भी बहुत संघर्ष किया। उन्होंने
कभी किसी वकील के यहाँ मुंशी का काम किया, तो कभी कॉलेज में
लैब असिस्टेंट की नौकरी की। एनएसडी पहुँच कर भी उनके लिए चुनौतियाँ खत्म नहीं हुई
थीं। उनकी पढ़ाई-लिखाई पंजाबी माध्यम से हुई थी और वे अंग्रेज़ी में बहुत असहज थे,
जबकि एनएसडी का माहौल पूरी तरह अंग्रेजीदां हुआ करता था। बहुत मेहनत
से उन्होंने इस चुनौती को पार किया। वे फक्र से बताया करते थे, कि बाद के दिनों में उन्होंने लगभग दो दर्जन अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेज़ी
फिल्मों में भी काम किया।
यह
इन दोनो संस्थानों के प्रशिक्षण का ही कमाल था कि जब स्क्रीन पर ओम और नसीर जैसे
कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो सिनेमा के दर्शकों को एक अनूठा अनुभव मिला।
उस दौर तक कुछ अपवादों को छोड़कर चेहरे-मोहरे और डील-डौल ही हिंदी सिनेमा के नायकों
की पहचान हुआ करता था। नसीरुद्दीन और ओम पुरी जैसे कलाकारों ने उस मिथक को तोड़ने
में बहुत बड़ा योगदान दिया। नसीरुद्दीन ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया कि एनएसडी के
दिनों की ओम पुरी और उनकी एक तस्वीर देखकर शबाना आज़मी ने कहा था कि ‘दो ऐसे बदशक्ल
इंसान ज़ुर्रत कैसे कर सकते हैं एक्टर बनने की!’ बेशक शबाना ने यह बात मज़ाक में कही
होगी, लेकिन दरअसल इसमें हिंदी सिनेमा उद्योग और उसके दर्शकों की मानसिकता की
अच्छी अभिव्यक्ति हुई है।
हिंदी
सिनेमा की क्लासिक कही जा सकने वाली कई फिल्मों में ओम पुरी ने अभिनय किया और उनका
यह अभिनय इतना प्रभावशाली है कि दर्शकों के मन पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाता है।
हिंदी सिनेमा का सबसे ज़मीनी और सबसे उम्दा दौर माने जाने वाले सामानांतर सिनेमा को
जिन कुछ अभिनेताओं ने सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया, ओम पुरी उनमें से एक हैं। उस
दौर की फिल्मों में ओम पुरी, नसीरुद्दीन, शबाना और स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों की
इतनी प्रभावी, सफल और विविधता से भरी पुनरावृत्ति हुई है कि कई बार ऐसा लगता है, कि
ये लोग न होते तो शायद समानांतर सिनेमा न होता!
‘आक्रोश’,
‘अर्धसत्य’, ‘तमस’ और ‘धारावी’ जैसी फिल्मों में केन्द्रीय भूमिका निभाते हुए ओम
पुरी ने जो यादगार अभिनय किया है, उसकी मिसालें दी जाती हैं। ओम पुरी ने कई
महत्वपूर्ण फिल्मों में अपनी सहायक व छोटी-छोटी भूमिकाओं से भी दर्शकों को बहुत
प्रभावित किया। अर्थपूर्ण सिनेमा के प्रति निष्ठा रखने के बावजूद ओम पुरी ने अपनी
आजीविका के लिए उन व्यावसायिक फिल्मों में भी काम करने से परहेज़ नहीं किया जिन्हें
चलताऊ किस्म की फ़िल्में कहा जा सकता है। ऐसी फिल्मों में भी अपनी भूमिकाओं का
निर्वाह उन्होंने बहुत शिद्दत से किया है और इस बात के लिए उनकी तारीफ भी की जाती
है। इन फिल्मों में काम करने के कारण ही वे हिंदी सिनेमा के दर्शकों से लगातार
रूबरू होते रहे और कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जब उनके पास काम नहीं रहा हो।
ओम
पुरी को इस बात का हमेशा मलाल रहा कि वे जितनी अच्छी भूमिकाएँ करने की क्षमता रखते
थे, वैसी भूमिकाएँ उन्हें बहुत कम मिलीं। नसीरुद्दीन शाह को संबोधित एक वीडियो
सन्देश में उन्होंने कहा था कि ‘उन लोगों के काम की तारीफ विदेशों में भी होती है,
लेकिन अपने ही देश के फिल्मकार अच्छी-अच्छी भूमिकाएँ अपने निकटतम लोगों को बाँट
देते हैं और बची-खुची भूमिकाएँ उन लोगों के हिस्से आती हैं।’ ओम पुरी यह भी कहा
करते थे कि उम्दा विदेशी फिल्मों को देखकर उनके मन में यह कसक उठती है कि अगर
उन्हें ऐसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिले तो वे साबित कर सकते हैं कि वे किसी
उम्दा विदेशी अभिनेता से कमतर नहीं हैं। उन्हें जब कभी उम्दा अंतर्राष्ट्रीय
फिल्मों में काम करने का मौका मिला तो उन्होंने अपने इस दावे को साबित भी किया।
ओम
पुरी के बेहद आत्मीय मित्र होने के बावजूद उनके देहांत पर नसीरुद्दीन शाह ने कहा
कि ‘ओम को उनके दर्द से मुक्ति मिली है’ तो इस बात को समझने में कोई मुश्किल नहीं
रह जाती कि वे अपने निजी जीवन में बहुत अधिक समस्याओं का सामना कर रहे थे। उनकी
दूसरी पत्नी नंदिता पुरी, इकलौते बेटे के साथ उनसे अलग रहा करती थी। ओम पुरी का
अपने बेटे से बहुत अधिक लगाव था और यह दूरी उन्हें भावनात्मक रूप से बहुत व्यथित
रखती थी। पहली पत्नी सीमा कपूर से अलग होने का गहरा अपराधबोध भी उन्हें घेरे रहता
था। निजी जीवन में आत्मीयता का जो अभाव था, उसका असर उनकी जीवनशैली और उनके
स्वास्थ्य पर भी गंभीर रूप से पड़ा था। एक तरफ वे फिल्मों में व्यस्त रहते थे, वहीं
दूसरी तरफ वे भारी अकेलेपन और रिक्तता के शिकार थे। वे चाहते थे कि कोई न कोई
बातचीत करने वाला अक्सर उनके साथ बना रहे। कथित रूप से अपनी आखिरी शाम को वे अपने
बेटे से मिलने गये थे, लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो पायी थी।
सच
यही है कि एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता को हमने असमय ही खो दिया। अपने आखिरी दिनों
तक उनमें बेहतर काम करने की ललक थी। निश्चित रूप से यदि वे जीवित होते तो हिंदी
सिनेमा के दर्शकों को उनकी और भी कई बेहतरीन भूमिकाएँ देखने को मिलतीं। ओम पुरी ने
हिंदी सिनेमा को जो योगदान दिया है, उसके लिए हिंदी सिनेमा हमेशा उनका ऋणी रहेगा।
मैं
करीब सात-आठ साल की रही होउंगी जब पहली बार टीवी पर ‘उमराव जान’ देखी थी। तब समझ
में तो क्या ही आया होगा, लेकिन तब की देखी उस फिल्म की धुंधली स्मृतियाँ आज भी
दिमाग में कहीं दर्ज हैं। करुणा की जिस पराकाष्ठा को इस फिल्म में उभारा गया है,
उसने उस छोटी सी उम्र में भी मुझे प्रभावित बेहद किया होगा, और शायद इसीलिए आजतक
मैंने जितनी भी बार उमराव जान देखी है, हर बार ऐसा लगता है, जैसे कभी अधूरी छूट
गयी फिल्म को पूरा देखने बैठी हूँ!
एक
तमिल भाषी लड़की जिसने हिंदी भी बेहद प्रयासों के बाद बोलनी सीखी, उसने इस फिल्म में
उर्दू बोली है, और न सिर्फ बोली है, बल्कि उसके लखनवी लहज़े और भंगिमाओं को हुबहू
उतार पाने में पूरी तरह सफल रही हैं। हिंदी सिनेमा के पास गर्व करने के लिए जो
चुनिन्दा फ़िल्में हैं, उनमें ‘उमराव जान’ का नाम भी लिया जाता है। इस फिल्म के
निर्देशक मुज्ज़फर अली ने हालांकि कई और फ़िल्में बनाई, लेकिन ‘उमराव जान’ जैसी
फिल्म वे दुबारा कभी नहीं बना सके। ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपनी सारी निर्देशन
कला इसी फिल्म में झोंक दी हो।
यह
फिल्म मुझे इसलिए भी बेहद पसंद है, क्योंकि ये साहित्यिक कृति पर बनी है। उमराव
जान’ किसी लेखक की कल्पना का पात्र* है, ये लगता ही नहीं है । हमेशा यही महसूस होता
है कि किसी ज़माने में एक उमराव जान रही होगी, उसी की कहानी लेखक ने लिखी है। हिंदी सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ही ऐसी हैं
जो साहित्यिक कृति को बखूबी सिनेमा में उतार सकी हैं। ‘उमराव जान’ इसमें भी एक कदम
आगे हैं, क्योंकि ये फिल्म मिर्ज़ा हदी रुसवा के ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास से भी कहीं
अधिक प्रभावी है।
इस
फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोग उसी शिद्दत से सुनते हैं। ख़य्याम ने इस फिल्म के लिए
संगीत दिया था। वे रेखा से इस कदर प्रभावित हैं, कि कहते हैं ‘अगर किसी को उमराव
जान को देखना हो तो, वो रेखा को देख ले, क्यूंकि यही उमराव जान हैं’। शहरयार के
लिखे गीत और ख़य्याम के संगीत ने इस फिल्म को सम्पूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई
है। इस फिल्म में अमीर खुसरो के लिखे ‘काहे को ब्याहे बिदेस’ गीत का भी बहुत
सार्थक उपयोग किया गया है।
रेखा
बेहद ईमानदारी के साथ अपने साक्षात्कारों में ये कहती हैं कि, मैं अपनी निजी
ज़िन्दगी में जिस समय जैसे हालातों से गुज़र रही होती हूँ, उसका रिफ्लेक्शन उस समय
मेरे निभाए जा रहे किरदारों पर भी पड़ता है। वे बताती हैं कि जिस समय वो ‘उमराव
जान’ कर रही थीं, उस समय शायद वे अपने निजी
जीवन में कुछ ऐसे ही मिलते-जुलते अनुभवों से गुजर रही थीं, जिनसे उमराव गुजरती हैं।
‘उमराव जान’ में जान फूँक देने वाली रेखा ने कई अन्य फिल्मों में भी किरदारों की विविधता को उम्दा अदायगी से जीवंत बना कर हिन्दी सिनेमा को समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण
योगदान दिया है।
___________
[*कई लोग इस बात से मतांतर रखते
हैं कि उमराव जान एक काल्पनिक पात्र है। इसकी वास्तविकता को लेकर उनके अपने तर्क
भी होते हैं। इस लिहाज से उमराव जान की काल्पनिकता या वास्तविकता बहस का विषय हो
सकती है, लेकिन अवध के इतिहास, संस्कृति और समाज के जानकार विद्वानों ने प्रायः अपनी
किताबों और लेखों में उमराव जान को एक काल्पनिक पात्र ही माना है।] #Rekha #UmraoJaan #10October Rekha's Birthday #Khayyam #Shahrayar #AmirKhusro #MuzzafarAli #UmraoJaanAda #MirzaHadiRusva
एम.ए
के दिनों में पाश (09 सितम्बर 1950 - 23 मार्च
1988) से परिचय हुआ था, उनकी कुछ
कविताएँ हिन्दी में पढ़ी सुनी, लेकिन उन्हें जब गंभीरता से
पढ़ना चाहा तब पता चला कि वे पंजाबी भाषा के कवि हैं। (यह मेरे लिए फक्र करने की
बात थी!)
हिन्दी
में उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा ही नहीं था, कि
अनूदित कविताएँ पढ़ रही हूँ! बल्कि इसके विपरीत जब उन्हें पंजाबी में पढ़ने की
कोशिश करती हूँ, तो वे कविताएँ मुझे अनूदित लगती हैं।
मुझे
लगता है, एक सच्चे, जुझारू और
ईमानदार व्यक्ति की रचनाएँ जिस भाषा में भी अनूदित कर दी जाएँ, वह उसी भाषा की लगने लगती हैं। यह संयोग था कि मैंने पाश को पहले हिन्दी
में पढ़ा! निसंदेह इसमें एक बड़ी भूमिका चमनलाल सहित उन सभी अनुवादकों की भी है,
जिन्होंने बड़े मनोयोग से पाश की कविताओं का अनुवाद कर उन्हें हिंदी
पाठकों के समक्ष रखा।
पाश
यदि जीवित होते तो आज अपने जीवन के 68वें साल में प्रवेश करते। वे बेशक एक लम्बा
जीवन नहीं जी सके, लेकिन उन्होंने एक बड़ा जीवन
जिया! इसलिए तो वे हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं।
पाश की कविता ‘अब विदा लेता हूँ’ (अनूदित)
से कुछ अंश
हिन्दी
के प्रतिष्ठित कवि गद्यकार अजित कुमार 18 जुलाई 2017 को इस संसार से विदा हो गये ।
उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद 29 जुलाई 2017 को उनकी जीवन संगिनी और हिन्दी की
स्थापित कवयित्री स्नेहमयी चौधरी का भी निधन हो गया है । इन दोनों से मेरी
संक्षिप्त लेकिन अमिट यादें जुड़ी हुई हैं । इन्हें याद करते हुए क्रमशः 18 जुलाई
और 30 जुलाई को लिखे गये मेरे फेसबुक पोस्ट यहाँ ब्लॉग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है।
फरवरी’2014 में अजित कुमार जी से अपने एम.फिल शोध के दौरान मिलना हुआ था । मुझे
हिन्दी के कुछ साहित्यकारों-आलोचकों के साक्षात्कार लेने थे । अजित जी एक फ़ोन कॉल
पर ही बेहद सरलता से उपलब्ध हो गए थे । उन्होंने साक्षात्कार के लिए अपने घर पर
बुलाया । मैं अपनी एक दोस्त राखी के साथ उनके घर पहुँची । उन्होंने बहुत ही
प्रसन्नता और उत्साह से स्वागत किया । इसके बाद बिना किसी भूमिका के उन्होंने
मुद्दे पर बात करनी शुरू कर दी थी । हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व पर
केन्द्रित मेरे
शोध कार्य को लेकर उनका बेहद सकारात्मक रवैया मुझे बहुत अच्छा लगा था । उनसे
दो-तीन दिन पहले मेनेजर पांडेय से हुई बातचीत से मैं थोड़ी निराश हो गई थी ।
साक्षात्कार के दौरान बाएँ से राखी, अजित कुमार और मैं
तय
समय के अतिरिक्त उनसे बहुत सी बातें हुईं । इतनी अधिक उम्र के बावजूद उनकी
सक्रियता प्रभावित करने वाली थी । लिखने और टाइप करने में असुविधा के कारण उनकी एक
सहायक डिक्टेशन लिया करती थी, लेकिन उनका
लेखन अनवरत था । उनकी आवाज़ में एक खनक थी और उस पर उम्र का अधिक प्रभाव नहीं पड़ा
था ।
अंत
में उन्होंने हमारे लिए चाय बनावाई । इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी स्नेहमयी चौधरी
को आवाज़ दी । उनकी स्थिति मुझे अजित जी से अधिक नाज़ुक लगी थी । वे खुद से चल भी
नहीं पा रही थीं । उन्हें कमरे के दरवाज़े से हाथ पकड़ कर अजित जी लाए । हमारा
परिचय कराया । एक कवियत्री के रूप में उनका परिचय देते हुए उन दोनों से जुड़ी और
भी कई बातें की ।
अजित
जी से वह एक मात्र मुलाकात और साक्षात्कार मुझे उनके प्रति आभारी बनाता है । आज
(18.07.2017) सुबह उठते ही उनके देहांत की दुखद सूचना मिली । उन्हें विनम्र
श्रद्धांजलि ।
xxxxxxxx
अजित
कुमार को इस दुनिया से गए तेरह दिन भी नहीं हुए थे, कि कल देर रात (29.07.2017) उनकी जीवन संगिनी और चर्चित कवयित्री स्नेहमयी
चौधरी ने भी इस संसार को विदा कह दिया!
यदि
कोई दूसरी दुनिया होती होगी, तो आप दोनो
वहां भी एक-दूसरे का यूं ही खयाल रखते हुए, खूब खुश रहें! हार्दिक
श्रद्धांजलि स्नेहमयी!
15
दिसम्बर 1958 को महाराष्ट्र के पुणे में जन्मी माधुरी उमराणीकर ने पुणे विश्विद्यालय
से बीए और एलएलबी की पढ़ाई के अतिरिक्त रूसी भाषा में एडवांस्ड डिप्लोमा किया था।
मृत्युपर्यंत वे भारत के एक महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा संस्थान बीडीएल, हैदराबाद के
रूसी अनुवाद प्रभाग में कार्यरत रहीं। मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी और रूसी भाषाओं पर
उनका प्रायः समान अधिकार था। इन भाषाओं की शब्द-संपदा में उनकी विशेष अभिरूचि और
विशेषज्ञता थी। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने रूसी भाषा से हिन्दी और मराठी में
कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक अनुवाद किये थे। इनमें से कुछ ही उनके जीवनकाल में
प्रकाशित हो सके थे।
हैदराबाद
में मैथिलीभाषी प्रवासियों की ‘देसिल बयना’ नामक एक संस्था है। हैदराबाद आकर सौरभ इस
संस्था से जुड़ गये थे। हमारी शादी के बाद मैं भी अक्सर उनके साथ इस संस्था के
कार्यक्रमों में जाने लगी। माधुरी जी से
मेरी पहली भेंट इसी संस्था की एक मासिक गोष्ठी में हुई थी। हम संस्था के अध्यक्ष
चन्द्रमोहन कर्ण जी के आवास पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले थे। अपनी
व्यस्तताओं और कम अभिरूचि के कारण माधुरी जी संस्था के सामान्य कार्यक्रमों में
प्रायः नहीं आती थी। उस दिन का कार्यक्रम इस अर्थ में विशेष था कि कार्यक्रम के
बाद कर्ण जी ने सभी सदस्यों और उनके परिजनों के लिए एक छोटा सा भोज भी रखा था। उस
दिन संस्था के लगभग सभी सदस्यों से मेरी पहली मुलाकात हो रही थी। सभी ने बहुत स्नेह
और अपनेपन से स्वागत किया था। उसी दिन बिना किसी औपचारिक भूमिका के माधुरी जी ने
जो कहा, वह मन को छू गया था, उन्होंने कहा- ‘कभी भी माँ की याद आये तो मेरे घर चली
आना।’ इस पहली भेंट में ही हमारे बीच एक आत्मीयता स्थापित हो गयी थी।
मेरी
ही तरह माधुरी जी की मातृभाषा भी मैथिली नहीं थी। उनकी मातृभाषा मराठी थी। उनके
पति मोहन मुरारी झा संस्था के सक्रिय सदस्य हैं। इस तरह माधुरी जी का भी संस्था से
जुड़ाव हो ही गया था। उनके आवास पर सम्पन्न हुई एक मासिक गोष्ठी में उनके आत्मीय
आतिथ्य की सौरभ आज भी चर्चा करते हैं। उनकी हाज़िर जवाबी, हास्यबोध और स्पष्टवादिता
की तारीफ भी उन्हें जानने वाले लगभग सभी लोग करते हैं।
उनके
साथ कुछ-कुछ अंतराल पर मेरी कुल तीन मुलाकातें ही हैं। दो मुलाकातें देसिल बयना के
कार्यक्रमों में हुईं। तीसरी मुलाकात संस्था की एक सदस्य शारदा झा के एक हिन्दी
कविता संकलन के लोकार्पण के अवसर पर हुई थी। यह संकलन क्रियेटिव कैंपस नामक जिस
प्रकाशन संस्था से प्रकाशित हुआ था, उसकी स्थापना कुछ दिनों पहले ही माधुरी जी के
पति मोहन जी ने की थी। उस दिन उनके पैर में चोट की वजह से सूजन थी फिर भी वह
प्रसन्नचित्त थीं। उस दिन बहुत लम्बा समय हमने साथ में बिताया। माधुरी जी डायबिटिक
थीं और उन्हें ब्लडप्रेशर से जुड़ी शिकायते भी थीं, इसलिए अपने साथ में दवाईयां लेकर
चला करती थीं। उन्होंने मुझसे पूछा- यहाँ कुछ खाने को मिलेगा आसपास? खोजने पर
सामने ही छोटी सी कैंटीन दिखाई दे रही थी। मैंने कहा कि यहाँ पूछ लेते हैं, कुछ
मिल जाये शायद। उन्होंने वड़ा खाया और अपनी दवाईयाँ ली। मैंने चाय पी। इसी दौरान
उन्होंने मुझे कहा कि- ‘संस्था के लोग मुझे बार-बार कहते हैं कि मैं मैथिली में भी
कुछ लिखने की कोशिश करूँ। मैं मैथिली समझ तो लेती हूँ लेकिन इस भाषा में लिख पाना
संभव नहीं लगता। मैंने उनसे कहा कि आप जिस भाषा में सहज हैं, और जिसमें बेहतर लिख
सकती हैं, उसी भाषा में लिखिए।
मुझे
याद है कि उस कार्यक्रम में शरीक एक महिला ने जब उनसे मजाक करते हुए कहा कि रिटायरमेंट
के बाद तो आप आराम करेंगी। बेटे की शादी करवा कर फुर्सत से बहु से सेवा करवाएंगी!
तब उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया था कि- “मेरे पास इतना समय कहाँ है! रिटायरमेंट
के बाद बहुत सारे काम हैं जो मुझे करने हैं,अभी से उन कामों की लिस्ट बनाती जा रही
हूँ।” लगभग दो वर्षो के बाद वे अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होने वाली थीं।
वह
मुलाकात उनसे मेरी अंतिम मुलाकात थी। कुछ दिनों बाद यह सूचना मिली कि वे गंभीर रूप
से बीमार हैं, और एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। हम समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक
इतनी गंभीर हालत कैसे हो गयी! पिछली मुलाकात में ही वे इतनी उर्जा से भरी हुई दिखी
थीं। पता चला कि अपनी नियमित जाँच के लिए वे खुद ही अपने बेटे के साथ अस्पताल गयी
थीं। वहाँ जरूरी समझ कर डाक्टरों ने उन्हें भर्ती होने की सलाह दी। लगभग एक सप्ताह
बाद उन्हें स्वस्थ मानकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। लेकिन एक-दो दिन बाद ही
उनकी तबियत फिर से बिगड़ गयी। इस कारण से उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती होना
पड़ा था। हम उनसे मिलने अस्पताल गये। वे आई.सी.यू में थीं, इसलिए उन्हें देख भी
नहीं पाए। उस दिन सिर्फ मोहन जी से मिलकर और हाल-चाल पूछ कर हम लौट आए। इसके बाद
हम लगातार मोहन जी से हाल-चाल पूछते रहते थे। कभी उनकी हालत में सुधार की खबर आती
तो कभी गिरावट की। मस्तिष्क में रक्त के थक्के जमने और शरीर के विभिन्न अंगों के
क्रमशः काम नहीं कर पाने की सूचना डाक्टरों ने दी थी। एक सुविधा और साधन सम्पन्न
अस्पताल के विशेषज्ञ डाक्टरों की पूरी टीम बेहतरी के लिए काम कर रही थी। माधुरी जी
की जिजीविषा पर भी हमें भरोसा था। लेकिन लगभग दो महीने तक संघर्ष करते रहने के बाद
12 अक्टूबर 2016 को माधुरी जी इस दुनिया से विदा हो गयीं।
यह
स्तब्ध करने वाला था। उनसे हुई आखिरी मुलाकात बार-बार याद आ रही थी। कहने को उनसे
मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था। एकदम नया-नया परिचय था जो एक जुड़ाव में बदल गया था। पारदर्शी
रेप्रीजेटर में रखे उनके पार्थिव शरीर के
पास मैं दो-तीन घंटे तक बैठी रही। यह शायद रिक्तता की सत्यता और उसे स्वीकार न कर
पाने की बीच की स्थिति थी, या यह शायद सच स्वीकारने की प्रक्रिया का हिस्सा था!!
________
माधुरी
जी के गुजर जाने के बाद मोहन जी से हमें उनके अप्रकाशित साहित्यिक अनुवाद कार्यों
का पता चला। हम सभी की यह इच्छा थी कि उनके ये अनुवाद लोगों के बीच जाएँ। यह बताते
हुए प्रसन्नता हो रही है कि रूसी भाषा के कथा साहित्य के उनके द्वारा किये गये
लगभग दर्जन भर हिन्दी अनुवादों में से लेफ़ तल्सतोय की सात अनूदित कहानियों का
संकलन इसी महीने (मई’2017) में प्रकाशित हो चुका है। इस संकलन की सातों कहानियों
से इसके प्रकाशन के पूर्व ही गुजरने का मुझे अवसर मिला था। हालांकि अपने अनुवादों
को दूसरी बार देख सकने का भी अवसर उन्हें ठीक से नहीं मिल सका फिर भी आश्चर्यजनक
तौर पर इन अनुवादों में त्रुटियाँ नहीं के बराबर थीं। मोहन जी ने इस किताब की
भूमिका में लिखा है कि अनुवाद से पहले किसी मूल रूसी कहानी को वे तब तक कई बार
पढ़ती थीं, जब तक वह उन्हें आत्मसात न हो जाए। शायद यही कारण है कि उनके अनुवाद
बहुत ही स्तरीय हैं। इन अनुवादों को पढ़ते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि हम अनूदित
साहित्य पढ़ रहे हैं। लेफ़ तल्सतोय की जो सात अनूदित कहानियाँ इसमें संकलित हैं वे
हैं :
(1.) इंसान को कितनी जमीन चाहिए (2.) इंसान किस वज़ह से जिन्दा रहता है (3.) दो बुढ़ऊ (4.) तीन साधु (5.)
ईश्वर देखते हैं किन्तु प्रतीक्षा करते हैं (6.) चिंगारी जो घर करो जला दे (7.) कॉकेशस का कैदी।
संभव
है इनमें से कुछ कहानियाँ आपने पहले पढ़ी हों लेकिन माधुरी जी के अनुवाद की सजीवता
इन्हें पहले के अनुवादों से अलग करती है। ये अनुवाद हमें मूल रूसी कहानियों के
निकट ले जाते हैं। मुझे आशा है कि माधुरी जी अपने इस अनुवाद कार्य के माध्यम से
हमेशा हिन्दी के पाठकों के बीच रहेंगी। प्रकाशित संकलन में यह सूचना है कि उनके
कुछ महत्वपूर्ण मराठी साहित्यिक अनुवाद अभी तक अप्रकाशित हैं। मुझे विश्वास है कि
ये अनुवाद भी अपने प्रकाशन के बाद मराठी अनुवाद साहित्य को पर्याप्त समृद्ध
करेंगे।