Showing posts with label हैदराबाद विश्वविद्यालय. Show all posts
Showing posts with label हैदराबाद विश्वविद्यालय. Show all posts

Saturday, 9 March 2019

सफाई पसंद चायवाला

हमारी यूनिवर्सिटी (हैदराबाद विश्वविद्यालय) की एक कैंटीन के बाहर एक छोटे से कोने में ये चाय की दुकान है। इस दुकान पर मैं जब-जब जाती हूँ, वहाँ की साफ़-सफाई और उसके चमचमाते बर्तनों को देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब होता है! मैंने अक्सर चाय की दुकानों पर देखा है कि उनके बर्तनों और चूल्हे पर उबली हुई चाय की निशानी दिनभर बनी रहती है बल्कि उसमें लगातार इज़ाफा होता रहता है, लेकिन इस दुकान के पतीले, केतलियाँ, चूल्हे इस मामले में अपवाद हैं। 
दुकान पर दिनभर चाय बनती रहती है, एक साथ दो-तीन पतीलों और केतलियों में चाय-दूध हर वक्त उबलता रहता है। ग्राहक भी दिनभर आते रहते हैं और एक ही लड़का है, जो ये सब सम्भालता है। इस दुकान की एक और खासियत ये है कि पूरी यूनिवर्सिटी में सबसे अच्छी चाय यहीं मिलती है। मैं जब भी यहाँ चाय पीने जाती हूँ तो अक्सर उसकी साफ़-सफाई की तारीफ किये बिना नहीं रह पाती। मुझे लगता है कि ये मैं इतनी बार दोहरा चुकी हूँ कि अब मेरी तारीफ के बाद उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आती! जैसे कि आज शाम फिर मैंने तारीफ करते हुए पूछा कि भैया आप इतना साफ़ कैसे रख लेते हैं, मेरे तो घर के बर्तन भी इतने साफ़ नहीं रहते! उसने बड़ी सादगी से उत्तर दिया कि इनका ज़रा सा भी गन्दा रहना मुझे पसंद नहीं है!

Thursday, 21 February 2019

मेरी लघुकथा 'समोसा' :)

कहानी, कविता जैसी साहित्यिक विधाओं की मैं एक तरह से मन्त्रमुग्ध पाठक रही हूँ। मुझे लगता रहा है कि यह सब लिखना कम से कम मेरे वश की बात नहीं है! मैं कुछ टिप्पणियां या लेख लिखकर अपनी बात कह पाऊं यही बहुत लगता है। हां किस्सागोई का आकर्षण और लघुकथाओं का आकार इस फॉर्म में अपनी बात कहने के लिए कभी-कभी प्रेरित ज़रूर करता रहा है, लेकिन मुझे पता है कि लघुकथा वास्तव में एक बहुत ही कॉम्पैक्ट विधा है, और यह बहुत अधिक रचनात्मक कुशलता की मांग करती है, जिसका मुझमें नितांत अभाव है।
एक शाम मेरी आँखों के सामने एक घटना घटी। मैने एक मासूम बच्चे को अपने ही माता-पिता के भाषाई हीनताबोध का शिकार बनते हुए देखा था। मैंने उस बच्चे को सहमते हुए देखा और देखते-देखते ही उसकी सहजता जिस तरह गायब हो गयी, उसने मुझे खासा विचलित किया था। उस दिन इस घटना को मैंने यूँ ही नोट करके रख लिया था। बाद में इसे ही थोड़ी सी काट-जोड़ के साथ मैंने एक लघुकथा की शक्ल देनी चाही। हालांकि मुझे पूरा संदेह रहा कि यह लघुकथा बन भी सकी है या नहीं!
पिछले दिनों रचनाकार.आर्ग' ने एक लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया था। मैंने इस रचना को उस प्रतियोगिता में भेज दिया। आज ईमेल से सूचना मिली कि प्रथम, द्वितीय या तृतीय तो नहीं लेकिन विशेष पुरस्कार के लिए जिन चार लघुकथाओं को चुना गया, उसमें मेरी लघुकथा- समोसाभी है। मुझे तो इसी बात की ख़ुशी है कि मैंने जो लिखा उसे कम से कम लघुकथा के रूप में पहचाना गया! संयोग ही है कि इस लघुकथा के पीछे भाषाई हीनता बोध की एक घटना है, और आज मातृभाषा दिवस भी है।


Tuesday, 2 October 2018

कैंपस गाँधीजी, दो अक्टूबर से जुड़े संयोग!

आज से ठीक एक साल पहले इसी दिन कैंपस में टहलते हुए सामने से अचानक मुझे धोती पहने, हाथ में लाठी पकड़े, नंगे पाँव चल रहे एक बाबा दिखे थे। उनके पास से गुजरते ही मुझे कुछ ध्यान आया। मुड़ कर देखा तो बाबा की छवि मुझे गांधी जी जैसी लगी थी। मैंने झट से अपने मोबाइल कैमरे से पीछे से उनकी एक तस्वीर उतार ली। 2 अक्टूबर के दिन ऐसा घटित होना मुझे खूबसूरत संयोग लगा था। मैंने इसे हमारे कैंपस में गांधी जीशीर्षक के साथ पोस्ट किया था।
इसके बाद कभी-कभार वे बाबा टहलते-टहलते दिख जाया करते थे। लेकिन पिछले बहुत दिनों से उन्हें नहीं देखा था। कल शाम टहलते हुए वे मुझे सामने से आते हुए दिखे। मुझे लगा सामने से उनकी तस्वीर उतारूँ, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उन्हें यह पता चले। इस कोशिश में फोटो बहुत ब्लर आई!
लेकिन आज देर रात कहिये या एकदम सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मैं फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी कि हमारे इन गाँधी बाबाकी तस्वीर मुझे फेसबुक पर दिख गयी! वे हमारे कैंपस की एक दुकान के बाहर बैठ कर आराम कर रहे थे। कैंपस में चुनावी मौसम है, और उसी सिलसिले में किसी की खींची गयी तस्वीर में बाबा उतर आए!

[यहाँ तीनों तस्वीरें लगा रही हूँ। एक सबसे पहली जो पिछले 2 अक्टूबर को खींची थी। दूसरी तस्वीर कल शाम की है, और तीसरी तस्वीर जो सुबह के साढ़े तीन बजे अचानक से मुझे फेसबुक पर दिखाई दी।]

Sunday, 8 April 2018

'सुकून' मेले में इस बार

   हैदराबाद विश्वविद्यालय में हर साल मार्च-अप्रैल के महीने में तीन दिन के लिए लगने वाले सुकून मेले का आज तीसरा दिन था। पहले दिन मैं कुछ व्यस्तताओं के कारण मेले में नहीं जा सकी। दूसरी शाम पहुँचते ही तेज आँधी और बारिश आ गयी जिस वजह से सारे स्टॉल और झूले वगैरह बंद कर देने पड़े और निराश होकर भीग-भाग कर सबको हॉस्टलस और घरों को लौटना पड़ा। आज मौसम अच्छा था इसलिए आज की शाम मेले में रौनक थी और सभी ने मेले का अपने-अपने तरीके से आनंद उठाया।
मैं मेले के अपने प्रिय इलाके जहाँ बलून पर निशाना लगाने और जुआ खेलने का काम होता है पहुंची। जमकर निशाना साधा और जुए में अधिकाँश रकम डूब गयी फिर भी प्लास्टिक बॉल वाले जुए में एक की-रिंग जीता।इसके बाद पचास रूपए लगाकर कुल 20 रिंग्स फेंके, लेकिन इस बात का मुझे बहुत दुःख है कि सिर्फ एक बार रिंग निशाने पर लगा, वह भी संयोग से और एक प्लास्टिक की स्प्रिंग चूड़ियाँ मेरे हिस्से आयीं।

इस मेले में यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी तरह-तरह के स्टॉल लगाते हैं। इस बार खाने-पीने के दो स्टॉल बहुत ख़ास थे। मोमोज़ मुझे बेहद पसंद हैं लेकिन हैदराबाद में यह बहुत कम ही मिलते हैं। दो-चार लड़कियों ने मिलकर मोमोज़ का स्टॉल लगाया था और उनके स्टॉल पर उचित दर पर बेहद लज़ीज़ मिक्स वेज पनीर मोमोज़ मिल रहे थे। इस स्टॉल के पास ही एक लिट्टी-चोखे का स्टॉल था जिसे  दो-तीन लड़के मिलकर चला रहे थे। जो लिट्टी वहाँ मिल रही थी वह सेकी हुई लिट्टी नहीं थी, बहुत हलके तेल में फ्राइड थी लेकिन स्वादिष्ट थी और साथ में जो चटनी और चोखा मिल रहा था वह भी लाजवाब था।

इस बीच सुकून के मेन स्टेज पर लगातार कार्यक्रम चल रहे थे। इन तीन दिनों में पर्याप्त सांस्कृतिक महत्त्व के कार्यक्रमों के अतिरिक्त धूम-धड़ाके वाले कार्यक्रम भी खूब चलते रहते हैं। कल की आँधी और बरसात से प्रतिभागी कलाकारों, विक्रेताओं और विद्यार्थियों का जो हर्जा हुआ उसकी भरपाई के लिए मेले की अवधि एक दिन और बढ़ा दी गयी है। यानि जिस मेले को आज ख़त्म हो जाना था वह कल ख़त्म होगा और लोगों को एक और दिन मेले को एन्जॉय करने का मौका मिलेगा।

Friday, 6 April 2018

हैदराबाद विश्वविद्यालय में तकनीकी शब्दावली के महत्त्व पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

हैदराबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के विकास में हिंदी की भूमिका एवं तकनीकी शब्दावली का महत्त्वविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हुआ। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इस तरह के विषय थोड़े बोझिल होते हैं लेकिन लगातार हुई चर्चा-परिचर्चा को सुनने और उसमें अपनी भागीदारी निभाने के बाद हमें लगा कि यह विषय महत्वपूर्ण है, और इस पर, खासतौर पर तकनीकी शब्दावली के विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा-परिचर्चा की आवश्यकता है।
अकादमिक संगोष्ठियों में जिस तरह की लूटमार और ठगी मची रहती है, यदि आप उसके अपवाद की बात करना चाहें तो हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में होने वाले सेमिनारों का ज़िक्र कर सकते हैं। अब तक मैंने अपने विभाग में हुई जितनी संगोष्ठियों को देखा है, उनमें कभी रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं वसूला जाता और न मैंने कभी किसी को यह शिकायत करते सुना है कि उन्हें प्रपत्र प्रस्तुत करने का मौका नहीं दिया गया। सेमिनार के प्रमाणपत्र चूँकि अकादमिक महत्त्व के होते हैं इसलिए मुख्य सत्रों के समानांतर सत्र चलाकर भी शोधार्थियों को प्रमाणपत्र हासिल करने के अवसर दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त दो दिनों तक लगातार चाय-नाश्ता, और सादगी से बना खाना-पीना जो कुछ भी होता है, वह सभी वक्ताओं, श्रोताओं, कर्मचारियों, मजदूरों और यहाँ तक कि उस समय पहुँच गये किसी भी आगंतुक के लिए मुफ्त उपलब्ध रहता है।
लेकिन इस बार का सेमिनार और भी कई मायनों में ख़ास रहा। मेरी जानकारी में यहाँ पहली बार शोधार्थियों को समानांतर सत्र की बजाय मुख्य सत्र में अन्य विद्वानों के साथ प्रपत्र प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया और उन्हें भी बहुत महत्त्व के साथ सुना और सराहा गया। इस बार इस कार्यक्रम का पूरा खर्चा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोगने उठाया था और मेरे खयाल से इसका पूरा सदुपयोग हमारे विभाग ने किया। इस बार हम लोगों के लिए एक सरप्राइज भी था और वह यह कि शब्दावली आयोग ने समस्त शोधार्थियों और प्रतिभागियों के लिए एक किट भिजवायी थी जिसमें एक सुन्दर सा लैपटॉप बैग, कुछ किताबें और एक नोटबुक थी। बाकी जगहों के जो मेरे अनुभव हैं और जितनी मेरी जानकारी है कि बिना दो सौ-पाँच सौ-हजार वसूले तो एक मामूली सा फोल्डर भी कहीं नहीं दिया जाता। हिंदी विभाग ने शब्दावली आयोग के साथ तालमेल बिठाकर निस्संदेह एक अच्छा और उपयोगी आयोजन किया है। वे सभी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष रूप से भी इस संगोष्ठी को सफल बनाने में दिन-रात मेहनत की।

Tuesday, 20 March 2018

खतरे में हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर की सुरक्षा

बीते शुक्रवार की शाम हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक खौफनाक घटना घटी। परिसर के भीतर एक छात्रा के साथ चार अज्ञात लोगों ने मिलकर बलात्कार करने की कोशिश की। उस वक्त लड़की के साथ उसका एक दोस्त भी था और किसी तरह वे दोनों वहां से बचकर भाग पाने में कामयाब हो सके| मारपीट और हाथापाई से दोनों को गंभीर चोटें आयीं। इस घटना की एफआईआर नजदीकी थाने में दर्ज करायी गयी है, लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। ऐसा माना जा रहा है कि ये चारों ही लोग कैंपस के बाहर के लोग थे, जो कैंपस में अनिधिकृत तरीके से घुसे थे। उन लोगों ने कैंपस में दाखिल होने के लिए और फिर भागने के लिए संभवत: उन रास्तों का इस्तेमाल किया, जो सुरक्षा कर्मियों की निगरानी में नहीं हैं और पक्की चारदीवारी की बजाय प्राकृतिक अवरोधों (जैसे बड़े पत्थर और घने जंगल आदि) पर निर्भर हैं। 
इस घटना से यह साफ़ हो गया है कि कैंपस की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही लचर है और उसमें खतरनाक सेंधमारी की जा सकती है। साथ ही यह कि कैंपस के छात्र-छात्राएं भारी असुरक्षा खतरे का सामना कर रहे हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय का परिसर लगभग 2300 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें आने-जाने वाले लोगों की निगरानी के लिए सिर्फ निर्धारित प्रवेश द्वारों पर सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर निश्चिंत नहीं रहा जा सकता है। पहली ज़रूरत तो यह है कि उन हिस्सों को पक्की मजबूत और ऊँची दीवारों से घेरा जाये जिन हिस्सों को प्राकृतिक अवरोधों पर निर्भर रहते हुए घेराव में शामिल नहीं किया गया है। मौजूदा चारदीवारों को भी अधिक सुरक्षा उपायों से लैस किये जाने की ज़रुरत है। इसके अलावा उन जगहों पर जहाँ परिसर की सीमाएँ खत्म होती हैं और जहाँ से सुरक्षा में सेंधमारी की अधिक आशंका है, वहाँ-वहाँ निगरानी के लिए सुरक्षा पोस्ट स्थापित किये जाएँ और सीसीटीवी कैमरे लगाये जायें।
कैंपस असुरक्षा पर इसलिए लगातार बात करना और ध्यान खींचना ज़रूरी होता है, ताकि इसे अधिक से अधिक सुरक्षित रखने के लिए एक दबाव बनाया जा सके। हैदराबाद विश्वविद्यालय का परिसर अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसर माना जाता रहा है, लेकिन इस घटना से यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि कभी-कभी जो कैंपस सुरक्षित दिखता है उसका कुछ श्रेय उपद्रवियों और अपराधियों की थोड़ी-बहुत भलमनसाहत को भी जाता है। लेकिन जब इस तरह के तत्व अपने इरादों को अंजाम देने के लिए सक्रिय होते हैं तो सुरक्षित होने का सारा भ्रम तोड़ कर रख देते हैं, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था की लगातार समीक्षा किये जाने की ज़रूरत होती है।
कैंपस के भीतर इससे पहले भी कभी-कभी बाहरी तत्वों के द्वारा उपद्रव और छेड़खानी की घटनाएँ सामने आती रही हैं। दो-ढाई साल पहले मेरी एक दोस्त के साथ एक ऐसी ही घटना घटी थी, जब वो कैंपस के एक सुदूर हिस्से में दोपहर के समय बाइक से अपने दोस्त के साथ घूमने गयी हुई थी। कार में सवार चार-पाँच लोगों ने उनका न सिर्फ बहुत देर तक पीछा किया, बल्कि लगातार फब्तियाँ कसते रहे और हाथ से छूने की भी कोशिश कई बार की। समय रहते मेरी दोस्त और उसके साथी ने एक सुरक्षा पोस्ट पर जाकर इस बात की शिकायत कर दी और सुरक्षाकर्मियों के तुरंत सक्रिय हो जाने के कारण वे लोग पकड़ लिए गये थे। लेकिन हमेशा ऐसे परिणाम आयें ये ज़रूरी नहीं। ये कार सवार कैंपस के ही किसी गेट से दाखिल हुए थे और उनके बाहर निकलने का भी रास्ता किसी न किसी गेट से ही होता इसलिए भी उन्हें पकड़ने में आसानी हुई, लेकिन जो घटना बीते शुक्रवार को हुई है वहाँ सुरक्षाकर्मियों की पहुँच कठिन थी।
इसे केवल संयोग ही कहा जा सकता है कि शुक्रवार की शाम को वह छात्रा अपने साथी के साथ यौन हमले से बचकर भाग पाने में कामयाब हो सकी। इस घटना से तुरंत सबक लिए जाने की ज़रुरत है नहीं तो किसी भारी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता! यह भी ज़रूरी है कि आसपास के इलाकों में सघन पूछताछ की जाए। उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएँ और जो भी दोषी हैं, उन्हें चिन्हित कर उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाये। जो कुछ भी हुआ वह हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए चिंता ही नहीं शर्म का विषय भी है।

Sunday, 1 October 2017

अग्रेज़ियत का एक प्रसंग

कुछ महीने पहले की बात है, हमारे पड़ोस के एक विश्वविद्यालय (मौलाना आज़ाद उर्दू विश्वविद्यालय) में आयोजित किसी सेमिनार में हिस्सा लेने अमेरिका की नॉर्थ केरोलिना यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने वाले जॉन शील्ड काल्डवेल भी आये थे। समय निकाल कर वे हमारे हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों से भी बातचीत करने आए। हिन्दी के एक विदेशी प्रोफेसर को सुनने की जिज्ञासा लिए जमा हुए विद्यार्थियों के लिए निर्धारित कमरा छोटा पड़ गया था। मैं थोड़ी देर से पहुँची थी और दरवाजे के बाहर से ही खड़ी होकर उन्हें सुन रही थी।
अमेरिका में हिंदी पढ़ाने के अनुभव और समस्याओं पर बात करने के बाद प्रश्नोत्तर का सिलसिला शुरू हुआ। इसी क्रम में प्रो. काल्डवेल ने यह जानना चाहा कि अगर आप अमेरिकी बच्चों की हिंदी पढ़ाने की कक्षा में जाएँगे, तो वहां आप उन्हें अभिवादन के लिए क्या कहेंगे और थैंक्यू के लिए क्या कहेंगे? कुछ देर के लिए कमरे में चुप्पी रही लेकिन तभी कुर्सी पर बैठे एक शोधार्थी ने उठकर कहा सर हम उन्हें हेलोकहेंगे ! और थैंक्यूके लिए शुक्रियाकहेंगे। प्रो. काल्डवेल ने कहा कि आप भारतीय फ़ोन पर बातचीत करते हुए तो हेलोको अपना ही चुके हैं, लेकिन क्या हिन्दी सिखाने की कक्षा में भी अभिवादन के लिए हेलोही कहेंगे! शोधार्थी ने उत्तर दिया कि हेलोएक तरह से अंतर्राष्ट्रीय शब्द है, और इसे पूरी दुनिया में हर कोई समझता है। मैंने दरवाजे के बाहर से ही इस तरह बोलने की कोशिश की कि आवाज उन तक पहुँच सके। मैंने कहा- सर, अभिवादन के लिए हम उन्हें नमस्तेकहेंगे और थैंक्यू के लिए धन्यवादया शुक्रियाकुछ भी! उन्होंने इस ज़वाब पर संतोष व्यक्त किया।
मैं सोचती हूँ कि उस दिन संभवतः प्रो. काल्डवेल के अनुभव में एक नयी बात यह जुड़ी होगी कि भारतीय छात्र अभिवादन के लिए भी अपनी भाषा के शब्दों को असमर्थ मानने लगे हैं। बहुत संभव है कि अपने इस अनुभव का ज़िक्र वे कई जगह करेंगे! मेरे लिए अधिक चिंता का विषय यह है कि जिस शोधार्थी ने उन्हें ऐसा कहा वह अपेक्षाकृत सजग और प्रबुद्ध शोधार्थियों में गिना जाता है, और उसी ने बाद में बताया कि उसने जो कुछ कहा वह अनायास नहीं था, उसके लगातार चिंतन मनन और अनुभव का निचोड़ था!
_______________
#University of Hyderabad #Hindi #English #English Domination

Monday, 30 January 2017

मेरी फेसबुक डायरी में रोहित वेमुला प्रसंग और आंदोलन


17.01.2016
हैदराबाद विश्वविद्यालय से निष्कासित पाँच दलित छात्रों में से कथित रूप से एक की आत्महत्या बेहद दुखद है । प्रतिरोध का रास्ता आत्महत्या तक तो नहीं जाता! मन बहुत विचलित है!
19.01.2016
आज हैदराबाद विश्वविद्यालय में उमड़ा विशाल जनसमूह आक्रोश और विरोध से अधिक तमाशे और अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भुनाने का मंच बन गया है !!

20.01.2016
आज की प्रेस कांफ्रेंस में आपके 'सुवचनों' पर प्रतिक्रिया देते हुए आपसे ऐसा कहा जा सकता था कि आप क्या जाने कि कैंपस किन सपनों और किन उद्देश्यों के साथ जाया जाता है । आप क्या जाने कि कैंपस के छात्रों की समस्याएँ क्या होती हैं । क्योंकि कैम्पस में इन्हीं सपनों और उद्देश्यों के साथ जाने का आपको अवसर ही नहीं मिला ।
लेकिन मेरी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं हो सकती है । अपने अनुभवों से जानती हूँ कि ऐसी बातें समझने के लिए शैक्षणिक योग्यता नहीं संवेदनशीलता ही पर्याप्त है!
#SmritiIraniPressConference #RohithVemula
20.01.2016
स्मृति ईरानी दिल्ली में बैठकर प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से खाई-अघाई औरतों की तरह रोहित की हत्या पर जिस तरह के घटिया बयान दे रही हैं, अगर वो यह समझती हैं कि इस तरह से वो खुद को या अपनी सरकार को बचा ले जाएंगी तो कान खोलकर सुन लीजिए हमारी "आदरणीय शिक्षा मंत्री जी" ऐसा हम होने नहीं देंगे!!
#स्मृतिईरानीमुर्दाबाद

21.01.2017

रोहित का परिवार आर्थिक रूप से रोहित पर ही निर्भर था । ऐसा आज रोहित के छोटे भाई के बयान से पता चला । पिछले सात महीने से रोहित की स्कालरशिप रूकी हुई थी जिसके चलते उस पर काफी कर्ज़ भी हो गया था ।
अब जब रोहित नहीं है और बड़े-बड़े नेता, संस्थाएँ, राजनीतिक पार्टियाँ उसके लिए न्याय की बात करते हुए लगातार सामने आ रही हैं, तब भी रोहित के परिवार के लिए अब तक किसी भी तरह की आर्थिक सहायता क्यों नहीं उपलब्ध कराई जा सकी है? कोई और नहीं तो यहाँ आज आए दिल्ली के मुख्यमंत्री ऐसी घोषणा कर सकते थे ।
अभी तो आंदोलन चल रहा है जब कुछ दिन बाद आंदोलन शांत पड़ जाएगा तब रोहित के परिवार की सुध लेने वाला, उनकी मदद करने वाला कौन होगा!!

26.01.2016
हैदराबाद विश्वविद्यालय की ज्वाइन्ट एक्शन कमेटी फॉर सोशल जस्टिस ने कल आल इन्डिया यूनिवर्सिटी स्ट्राइक का आह्वान किया है । रोहित वेमुला मामले में चल रहे आंदोलन के देशव्यापी होने की दिशा में यह महत्वपूर्ण दिन होगा ।
लगातार चल रहे इस आंदोलन के जिस एक पक्ष पर बहुत कम चर्चा हो रही है, वह है अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठे छात्र-छात्राओं की बात । इनमें से दो को आज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है और दो लड़कियों की हालत भी चिंताजनक है । अनिश्चित काल की भूख हड़ताल पर बैठना नैतिक मजबूती और साहस से ही संभव होता है । हम सभी को न्याय की इस लड़ाई में इनके साथ खड़ा होना चाहिए । हालाँकि मैं यह चाहूँगी कि भूख हड़ताल के कारण अपने जीवन को संकट मे डालने के बजाय प्रतिरोध के अन्य कारगर तरीकों को अपना कर अन्यायी व्यवस्था के वजूद के समक्ष संकट खड़े किये जाएँ ।
#RohitVemula #AllIndiaUniversityStrike

28.01.2017
हैदराबाद विश्वविद्यालय का वह एक भी विद्यार्थी 'लायक' नहीं है जिसे ठीक 'अभी' क्लास जाकर पढ़ने-लिखने की बहुत अधिक चिंता सताने लगी है! जिस समय प्रोटेस्ट को लगातार चलाए रखने की जरूरत है, तब कुछ शिक्षक और विद्यार्थी औपचारिक कक्षाओं को बहाल करने की मांग करने लगे हैं । जबकि पढ़ने-पढ़ाने के लिए औपचारिक कक्षाओं की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत होती है । विश्वविद्यालय में ऐसी जगहों का अभाव नहीं है जहाँ अनौपचारिक तरीके से पढ़ने-पढ़ाने का काम किया जा सकता है । इस तरह से की जाने वाली पढ़ाई-लिखाई अपने आप में एक प्रतिरोध भी होगा । लाइब्रेरी, रिडिंग रूम, लेबोरेट्री जैसी जगहें जरूर खुली होनी चाहिए जिनका दूसरा कोई विकल्प नहीं है । कुछ कार्यालयी गतिविधियाँ भी चलती रहनी चाहिए ताकि स्कॉलरशिप सहित विद्यार्थियों के अन्य बेहद जरूरी काम नहीं रूकें । लेकिन हमें औपचारिक कक्षाओं का लगातार बहिष्कार करना चाहिए । यह हमारे हाथ में है और यही हमारी ताकत भी है । जरूरी है कि हम इस समय स्वार्थी होने से बचें ।
#ProtestAndStudentUnityLongLive #JusticeForRohitVemula

30.01.2016
काश अपने जन्मदिन की शुभकामनाएँ लेने के लिए तुम जिन्दा होते !

31.01.2016
..तो सिर्फ़ स्मृति ईरानी ही नहीं सुषमा स्वराज भी 'महामर्द' निकली !!
#Vidrohi #JusticeForRohitVemula

22.03.2016

रोहित वेमुला आत्महत्या के बाद पूरा विश्वविद्यालय शोक में डूबा हुआ था । आक्रोश में था । आप विद्यार्थियों से संवाद करने की कोशिश किये बिना अपने इस्तीफे की मांग के बरअक्स झांसा देने के लिए लम्बी छुट्टी पर चले गये । जब आपको अपने विश्वस्त सूत्रों से पता चला होगा और आप आश्वस्त हो गये होंगे कि मामला शांत हो रहा है, तो चुपके से वापस आ गये । आपने इस बार भी संवाद करने और विद्यार्थियों का मूड भाँपने की कोशिश नहीं की ।
थोपी हुई जबरदस्ती की हुकूमत बन कर आएंगे तो क्या लोग फूल माला लिये खड़े मिलेंगे? क्या यहाँ के विद्यार्थी भेड़-बकरी हैं? ज्यादा चातर बनने के बजाय इस्तीफा दीजिए और नैतिक ताक़त रखते हैं तो निर्दोष साबित होने तक किसी भी तरह के प्रशासनिक पद से दूर रहिए ।
जैसी जानकारी आ रही है, खाना-पीना और इंटरनेट सुविधा बंद करने की जुर्रत कर रहे हैं आप? पुलिसिया दमन की भी फिराक में हैं । आत्मघाती मत बनिए । इस बार गलती करेंगे तो माता स्मृति भी नहीं बचा पाएँगी आपको । छुपने तक की जगह नहीं मिलेगी ।
#StudentUnityLongLive #HcuVcGoBack

24.03.2016
विशाल विरोध सभा के बाद विद्यार्थियों के रोष भरे नारों से गूंजता विश्वविद्यालय परिसर और जबरन वीसी बने बैठे क्रूर तानाशाह अप्पा राव का धू-धू कर जलता पुतला ।
#UniversityofHyderabad #AppaRaoGoBack #StudentUnitiyLongLive

25.03.2016
"23 मार्च-शहीद दिवस  । 23 मार्च- होली-रंगों का त्यौहार । इस दिन जिस आदमी ने आन्दोलन करते हुए छात्रों के खून से होली खेली है उसे और उन शिक्षकों को जो विद्यार्थियों के बजाय प्रशासन के साथ खड़े हैं, चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ।
जिस वीसी को यहाँ के विद्यार्थी प्यार नहीं करते, आदर नहीं करते यदि वह चुल्लू भर पानी में नहीं डूब सकता तो कम से कम उसे अपना पद तो छोड़ ही देना चाहिेए । लेकिन ये पावर-हंग्री लोग कभी ऐसा नहीं करेंगे!"
[हैदराबाद विश्वविद्यालय में आज शाम की प्रतिरोध सभा में बोलते हुए प्रो. चमन लाल]

 26.03.2016
आज शाम कैंडल मार्च के बाद चल रही प्रतिरोध सभा में एक साथी ने स्वीकार किया (हम पहले से भी जानते थे) कि वह नरेन्द्र मोदी का घोर प्रशंसक था । उसने कहा कि विश्वविद्यालयों में दमन और इसपर सरकार का संवेदनहीन रुख उसे भीतर तक तोड़ गया है । उसने आगे जो कहा उसका आशय यह था कि वह अब मोदी के मायाजाल से बाहर आ गया है । वह साथी मोदी जी की शातिर भाषा का दिव्यचक्षुहै । उसने कल की प्रतिरोध सभा में अप्पा राव के अलावा नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी मुर्दाबाद के भी रोष भरे नारे लगाए थे ।  
अपनी ही करतूत से मोदी सरकार डूब रही है । मोदी की चमक फीकी पड़ रही है । यह अप्पाराव और विश्वविद्यालय प्रशासन फिर क्या ठहरा बल !!
#UniversityofHyderabad #AppaRaoGoBack #StudentUnityLongLive

27.03.2106
नॉर्थ कैंपस से साउथ कैंपस तक के कैंडल मार्च में आज विद्यार्थियों की जबरदस्त भागीदीरी रही । एक वक्ता ने आज की प्रतिरोध सभा को संबोधित करते हुए कहा कि – “पहले दिन प्रतिरोध सभा में लोगों की भागीदारी बहुत कम थी । पुलिसिया दमन और गिरफ्तारियों के बाद कैंपस के आम छात्रों में जबरदस्त भय का माहौल था । रोज-ब-रोज यह संख्या बढ़ी और आज चौथे दिन इतनी संख्या में विद्यार्थियों का इकट्ठा होना तानाशाह अप्पा राव के खौफ से कैंपस के आजाद होते जाने का सबूत है ।
ऐसी उम्मीद है कि गिरफ़्तार साथियों को कल बेल मिल जाएगी । कैंपस उनकी अगवानी के लिए उत्साह के साथ तैयार है । उम्मीद है कि कल से आंदोलन की गति और भी तेज होगी ।
कल फिजिक्स डिपार्टमेंट में एक महत्वपूर्ण सेमिनार शुरू होने जा रहा है । यह सेमिनार निर्बाध चले ऐसा सभी चाहते हैं । लेकिन आंदोलनकारी छात्र चाहते हैं कि इस सेमिनार के उद्घाटन समारोह से अप्पाराव को दूर रखा जाए । इस आशय का संदेश लेकर एक शांतिपूर्ण मार्च कल सुबह फिजिक्स डिपार्टमेंट तक के लिए निकाला जाएगा ।
न्याय, आत्मसम्मान और एक अनचाहे तानाशाह वीसी से मुक्ति के लिए चल रहे आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए छात्रों से औपचारिक कक्षाओं के बहिष्कार की भी अपील की गयी है । ग़ौरतलब है कि पिछले चार दिनों से प्रशासन ने खुद कक्षाएँ स्थगित रखी थी ।
#UniversityofHyderabad #ReleaseStudentsAndFacultyofUOH #AppaRaoGoBack #StudentUnityLongLive

28.03.2016
आज सुबह विश्वविद्यालय के मुख्यद्वार के बाहर तक विद्यार्थियों की एक बड़ी रैली निकाली गयी । बाहर लम्बे समय तक प्रतिरोध के नारे लगे । किसी बाहरी व्यक्ति के कैंपस आने पर प्रतिबंध लगा हुआ है । ऐसे में यह रैली प्रतीकात्मक रूप से यह भी बताती है कि, चाह कर भी हमें बाहर की दुनिया से अलग नहीं किया जा सकता है ।
किसी आंदोलन के क्रम में नुक्कड़ नाटक और अन्य सांस्कृतिक प्रतिरोध भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । कल प्रोग्रेसिव थियेटर ग्रुप की ओर से एकलव्यनामक जिस नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन रात के 11:30 बजे गर्ल्स हॉस्टल के बाहर हुआ था, आज सुबह उसी का प्रदर्शन प्रशासनिक भवन के बाहर किया गया । आज रात 09:30 बजे दक्षिणी परिसर में भी इस नाटक का प्रदर्शन होगा ।
गिरफ्तार सभी साथियों को आज शाम बेल मिल गयी है । संभवतः उन्हें कल रिहा किया जाएगा । आंदोलन में एक नया उत्साह आ गया है । प्रतिरोध की संस्कृति ज़िन्दाबाद ।
#UniversityofHyderabad #AppaRaoGoBack #StudentUnityLongLive #WeWantJustice

17.01.2017

एक वर्ष बीत गया लेकिन न्याय का प्रश्न ज्यों का त्यों बरकरार है!!
#RohithVemula #OneYearOfTheInstitutionalMurder #JusticeForRohithVemula
___________