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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Friday, 31 July 2020

सद्गति

आज हिन्दी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का 140वाँ जन्मदिन है। मुझे सुबह से बार-बार 'सद्गति' का ध्यान आ रहा है। इस कहानी को हिंदी की चुनिंदा प्रभावी और उम्दा कहानियों में शामिल किया जाता है।

'सद्गति' पर भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध निर्देशक सत्यजीत रे ने 45 मिनट की एक छोटी सी फिल्म बनाई है। जो शुरू से लेकर आखिर तक आपको बांधे रखती है और मात्र 45 मिनटों में उन सारी यंत्रणाओं, उन सारे अत्याचारों का अनुभव आपको करवा देती है; जो हमारे समाज में दलित कही जाने वाली जातियों पर होते रहे हैं। हिन्दी साहित्य पर बने सिनेमा में मैं 'सद्गति' को सबसे बेहतर रूपांतरणों में गिनती हूँ। मेरे खयाल से सभी को यह फिल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। मुझे इस बात का भी पूरा भरोसा है कि जब यह फिल्म बनी थी; उस समय यदि प्रेमचंद जीवित होते तो वे भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। दुर्भाग्य से अपने जीवनकाल में सिनेमा की दुनिया से जुड़े उनके अनुभव कड़वे रहे थे। इतने अधिक की उन्होंने विस्तार से लिखे अपने एक लेख में साहित्य को दूध कहते हुए तत्कालीन सिनेमा को ताड़ी की संज्ञा दे डाली थी!


Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Thursday, 6 February 2020

लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन


एम.ए. के दिनों में पढ़ा था उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी'। तब इसने चमत्कृत किया था। जुदा कथ्य, सहज-सरल-प्रवाहमयी भाषा और बेहद प्रभावित करने वाला शिल्प। इसके लेखक थे- कृष्ण बलदेव वैद। उन्होंने विभिन्न गद्य विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है और हिन्दी साहित्य जगत में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही है। साथ ही वे हिन्दी के उन लेखकों की परंपरा से भी थे; जिनकी पढ़ाई-लिखाई और आजीविका की भाषा अंग्रेज़ी थी, लेकिन जिन्होंने लेखन के लिए हिन्दी को अपना माध्यम चुना। आज उनका निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Tuesday, 26 March 2019

नहीं रहीं 'आपहुदरी' रमणिका गुप्ता


अभी आ रही खबरों से पता चला कि रमणिका गुप्ता नहीं रहीं। रमणिका जी ने जिस तरह का जीवन जीया वह बने बनाए खांचे का जीवन नहीं था। वे एक बेहद मजबूत एक्टिविस्ट और नेता थीं, जिन्होंने वंचितों और मज़दूरों के हक में आवाज़ उठाई और लगातार संघर्ष किया। झारखंड के कोयला खादान मजदूरों और आदिवासियों के हकों के लिए किये गए उनके काम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
रमणिका जी प्रखर लेखिका भी थीं और हिन्दी में 'युद्धरत आम आदमी' पत्रिका का लम्बे अरसे से संपादन करती आ रही थीं। रमणिका गुप्ता की मातृभाषा पंजाबी थी इसीलिए उन्होंने इस भाषा के शब्द 'आपहुदरी' को अपनी आत्मकथा का शीर्षक बनाया। आपहुदरी का अर्थ होता है 'अपने मन की करने वाली'। रमणिका जी ने इस शब्द के माध्यम से खुद को सही ही परिभाषित किया है। चूंकि वे स्वतंत्र प्रकृति की महिला थीं और निर्भीक थीं, इसलिए जैसा कि होता है, उनके ऊपर खूब कीचड़ भी उछाला गया लेकिन जिसने ठान लिया हो उसे इन सब चीज़ों से फर्क नहीं पड़ता! उन्हें अलविदा और श्रद्धांजलि।

Wednesday, 20 February 2019

नामवर सिंह का निधन

हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह जितने दशकों तक सक्रिय और प्रभावी रहे वह आश्चर्यचकित करता है! एक प्राध्यापक के बतौर भी उनकी जो प्रतिष्ठा रही है वह भी किसी अन्य अध्यापक के लिए रश्क का विषय हो सकती है। हिन्दी में बिरले ही ऐसे प्रोफेसर होंगे जो इतनी तैयारी और विशेषज्ञता के साथ क्लासरूम में आते हों कि उनके बोलकर पढ़ाए गए लगभग हर शब्द को किताब की शक्ल में ढाला जा सके! 
इस विद्वता और प्रतिष्ठा के अलावा नामवर सिंह का एक पक्ष हिन्दी विभाग की अकादमिक राजनीति से भी जुड़ता है।‌‌‌‌‌ हमने जब से विश्वविद्यालयों में पढ़ना शुरू किया, इसे किंवदंतियों की तरह सुनते रहे कि एक लम्बे दौर तक नामवर सिंह देशभर के विश्वविद्यालयों में होने वाली नियुक्तियों को प्रभावित करते रहे थे, इसलिए उनसे उपकृत लोगों की लम्बी सूची है तो निश्चित रूप से तिरस्कृत लोगों की भी लम्बी सूची होगी! दुखद रूप से उपकार और तिरस्कार का यह सिलसिला नियुक्ति प्रक्रियाओं में आज भी बदस्तूर जारी है। नामवर सिंह को याद करते हुए लोगों को यह पहलू भी याद आना ही चाहिए।
एक लम्बी ज़िन्दगी उन्हें मिली और सबसे बड़ी बात कि अंतिम कुछ दिनों को छोड़कर वे लगभग इस पूरी अवधि में स्वस्थ और सक्रिय रहे। वे कुछ दिनों से बीमार थे। आज सुबह ही यह खबर पढ़ी की कल रात उनका निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि!

Friday, 25 January 2019

नहीं रहीं कृष्णा सोबती

मुझे लगता है कि पंजाबी समाज और उसके लोक व्यवहार को उतना मैंने अपने अनुभवों से नहीं जाना, जितना कृष्णा सोबती के उपन्यासों से जानने का मौका मिला।
कृष्णा जी एक भरपूर और सार्थक ज़िन्दगी जी कर आज विदा हुईं। जीवन के आखिरी दिनों तक उनके जैसी सक्रियताप्रतिरोधी मुखरता और ज़िंदादिली कम लोगों को मिलती है।कृष्णा सोबती एक श्रेष्ठ रचनाकार के बतौर ही नहीं एक शानदार व्यक्तित्व के तौर पर भी याद रखी जाएंगी। विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 22 December 2018

"ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, यह तो सिर्फ किताब है"

ग्रैजुएशन के दिनों में जब मैं लाइब्रेरी में किसी किताब को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते परेशान हो जाती थी और अपनी यह परेशानी लाइब्रेरियन को जाकर बताती थी तो वे किताब ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मेरे साथ किताबों के रैक तक आते थे और किताब ढूंढ़ते हुए अक्सर हर बार कहा करते थे कि 'अरे ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, ये तो सिर्फ किताब है।' और कुछ देर बाद वह किताब मिल ही जाती थी।
इस मामले में मैं खुद को बहुत हद तक खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अक्सर लाइब्रेरियों में वो सामग्रियां भी बड़ी सहजता से मिल जाती हैं, जो साधारणतया लोगों की नज़रों से चूक जाती हैं और कई बार तो लाइब्रेरी के केटलॉग में भी शामिल नहीं होतीं! लेकिन अब भी कभी-कभी कुछ सामग्रियां ढूंढ़ते हुए बहुत परेशान हो जाती हूं और कई बार तो निराश भी! लेकिन जब-जब ऐसी स्थिति होती है तो मुझे लाइब्रेरियन सर की कहीं हुई वहीं बात याद आ जाती है कि 'ढूंढ़ने से तो...' और इसे इत्तेफाक ही कहूंगी कि इसके बाद जब मैं फिर से ढूंढ़ने के काम में जुटती हूं, तो अक्सर मुझे इच्छित सामग्री मिल ही जाती है!

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर

19वीं सदी के शुरुआती दशकों की यह बात है, जब जर्मनी में रहने वाले एक यहूदी दम्पत्ति ने अपनी संतान के जन्म से कुछ वर्ष पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। कहते हैं कि उनकी संतान ने अपनी छह वर्ष की उम्र में ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया था। बाद के दिनों में यहूदी माता-पिता की इस संतान कार्ल मार्क्स ने, धर्म के अफीम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करते हुए लिखा।
मार्क्स के दुनिया को अलविदा कहने के दशकों बाद दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि जर्मनी में, हिटलर के दौर में धर्म के नाम पर नाज़ियों ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया, और वह इतिहास के सबसे बड़े और जघन्यतम नरसंहारों में से एक माना जाता है।
धर्म को अफीम होते हुए हमारे देश के लोगों ने भी लगातार देखा है। मुल्क की आज़ादी के साथ ही जब धर्म के नाम पर इस मुल्क के टुकड़े किए जाने लगे, तब अधिकांश प्रभावित लोगों ने देखा कि जो पहले अच्छे पड़ोसी और मित्र हुआ करते थे, धर्म के नाम पर एक-दूसरे के प्रति घोर अमानवीयता दिखाने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगा और थोड़ी भी हिचक नहीं हुई!
धर्म का यही अफीमी रूप हमारे देश के लोगों ने तब भी देखा जब पंजाब में धर्म के नाम पर अलग मुल्क तैयार करने के लिए गोलियां और बारूद इक्कट्ठे किए जाने लगे और भारी हिंसा का सहारा लिया जाने लगा। 
1984 में लोगों ने देखा कि किस तरह देश की राजधानी में एक धर्म विशेष के लोगों का कत्लेआम हुआ और इतिहास के सीने पर एक कभी नहीं भरने वाला ज़ख्म उभर आया।
अफीम खाए लोगों को आप उन तस्वीरों में भी देख सकते हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान ली गई थी। इसके अलावा समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से जूझने की इस देश को आदत सी हो गई है।
धर्म की अफीम अब भी दुनिया भर की हवा में तैर रही है और हमारे देश में तो इसका असर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यदि यह सच नहीं है तो यह सोचिए कि गुजरात के भीषण साम्प्रदायिक नरसंहार के समय नकारात्मक भूमिका निभाने वाले राज्य के मुखिया आज कैसे केन्द्र की सत्ता संभाल रहे हैं? कि आखिर कैसे नकारात्मक भूमिकाओं में उनके सबसे बड़े सहयोगी वर्तमान लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं?
इसे भी धर्म की अफीम का असर ही तो कहेंगे कि ठीक अभी जिस समय उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था तबाह की जा रही है, तब लोग अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लगी दशकों पुरानी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर भारी विवाद खड़ा करने की जुगत में हैं। मकसद यही है कि इस उन्माद में बुनियादी समस्याएं कहीं दब जाएं।
मार्क्स ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से इतिहास और अपने समकाल पर विचार किया था, इसलिए उनके विश्लेषण सटीक भविष्यवाणी की तरह साबित हुए। बहुत ही श्रमपूर्वक, बहुत ही ईमानदारी और मनुष्य की बेहतरी की नीयत से किए गए मार्क्स के चिंतन और लेखन का ही यह असर है कि आज वे अपने जन्म के 200 साल बाद भी इस दुनिया की बेहतरी के लिए सोचने वाली युवतम से युवतम पीढ़ी के सबसे बड़े वैचारिक मित्र और मार्गदर्शक बने हुए हैं और इसमें कोई शक नहीं कि यह सिलसिला कभी थमने वाला नहीं है।

Monday, 23 April 2018

ताकि किताबों की संस्कृति बची रहे

पाठ्यक्रम की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में थी, तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के लिए मिल जाती थी।
लेकिन वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्र नाम का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा, शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो, मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक, मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये, तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की किताब वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना, उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!

Friday, 6 April 2018

हैदराबाद विश्वविद्यालय में तकनीकी शब्दावली के महत्त्व पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

हैदराबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के विकास में हिंदी की भूमिका एवं तकनीकी शब्दावली का महत्त्वविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हुआ। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इस तरह के विषय थोड़े बोझिल होते हैं लेकिन लगातार हुई चर्चा-परिचर्चा को सुनने और उसमें अपनी भागीदारी निभाने के बाद हमें लगा कि यह विषय महत्वपूर्ण है, और इस पर, खासतौर पर तकनीकी शब्दावली के विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा-परिचर्चा की आवश्यकता है।
अकादमिक संगोष्ठियों में जिस तरह की लूटमार और ठगी मची रहती है, यदि आप उसके अपवाद की बात करना चाहें तो हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में होने वाले सेमिनारों का ज़िक्र कर सकते हैं। अब तक मैंने अपने विभाग में हुई जितनी संगोष्ठियों को देखा है, उनमें कभी रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं वसूला जाता और न मैंने कभी किसी को यह शिकायत करते सुना है कि उन्हें प्रपत्र प्रस्तुत करने का मौका नहीं दिया गया। सेमिनार के प्रमाणपत्र चूँकि अकादमिक महत्त्व के होते हैं इसलिए मुख्य सत्रों के समानांतर सत्र चलाकर भी शोधार्थियों को प्रमाणपत्र हासिल करने के अवसर दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त दो दिनों तक लगातार चाय-नाश्ता, और सादगी से बना खाना-पीना जो कुछ भी होता है, वह सभी वक्ताओं, श्रोताओं, कर्मचारियों, मजदूरों और यहाँ तक कि उस समय पहुँच गये किसी भी आगंतुक के लिए मुफ्त उपलब्ध रहता है।
लेकिन इस बार का सेमिनार और भी कई मायनों में ख़ास रहा। मेरी जानकारी में यहाँ पहली बार शोधार्थियों को समानांतर सत्र की बजाय मुख्य सत्र में अन्य विद्वानों के साथ प्रपत्र प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया और उन्हें भी बहुत महत्त्व के साथ सुना और सराहा गया। इस बार इस कार्यक्रम का पूरा खर्चा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोगने उठाया था और मेरे खयाल से इसका पूरा सदुपयोग हमारे विभाग ने किया। इस बार हम लोगों के लिए एक सरप्राइज भी था और वह यह कि शब्दावली आयोग ने समस्त शोधार्थियों और प्रतिभागियों के लिए एक किट भिजवायी थी जिसमें एक सुन्दर सा लैपटॉप बैग, कुछ किताबें और एक नोटबुक थी। बाकी जगहों के जो मेरे अनुभव हैं और जितनी मेरी जानकारी है कि बिना दो सौ-पाँच सौ-हजार वसूले तो एक मामूली सा फोल्डर भी कहीं नहीं दिया जाता। हिंदी विभाग ने शब्दावली आयोग के साथ तालमेल बिठाकर निस्संदेह एक अच्छा और उपयोगी आयोजन किया है। वे सभी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष रूप से भी इस संगोष्ठी को सफल बनाने में दिन-रात मेहनत की।

Tuesday, 27 February 2018

चिड़ियाँ दा चंबा

पंजाबी का एक बेहद खूबसूरत और प्रसिद्ध लोकगीत है -'साड्डा चिड़ियां दा चम्बा वे बाबुल असां उड़ जाना'। बेटियां शादी के बाद अपने पिता के घर से विदा होकर जब पति के घर जाती हैं, उस समय यह गीत गाया जाता है। विवाह समारोह में अक्सर यह गीत बजता है और इसे सुन सुन कर रोने वाले लोगों को देख-देख कर मैं बड़ी हुई हूं।
कल यूट्यूब चैनल 'हिन्दी कविता' पर इसे सुनने का मौका मिला। दरअसल कल ही यह जाना कि इस लोकगीत को आधार बनाकर 'पाश' ने भी 'चिड़ियाँ दा चंबा' शीर्षक से एक कविता लिखी थी।
हालांकि पाश की यह कविता मुझे पहली बार सुनते हुए ही बहुत मर्मस्पर्शी और अलग लगी, लेकिन इसका अर्थ समझने के लिए मुझे इसे पांच-सात बार और सुनना पड़ा। तब भी जो समझ आया ज़रूरी नहीं कि वही सही समझ हो। कविता का असली मर्म तो कविता की बारिकियों को समझने वाले लोग ही बेहतर बता सकते हैं।
दरअसल मुझे यह कविता इसलिए भी अलग लगी कि पाश ने लड़कियों की विदाई के इस लोकगीत का जो यथार्थवादी पाठ इस कविता में किया है, वह बेहद प्रभावित करने वाला है। लोकगीत में लड़कियों को चिड़िया की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि विवाह होगा तो यह चिड़िया बाबुल के घर से एक लंबी उड़ान भरकर दूर देश चली जाएगी। लेकिन पाश इस कविता के माध्यम से कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। लम्बी उड़ान भरने का सुख उसके हिस्से में ही नहीं है। वह एक जगह से उड़ाकर दूसरी जगह एक पिंजरे में कैद कर दी जाएगी और उसका पूरा जीवन उसी पिंजरे में निकल जाएगा! स्त्री जीवन का एक बड़ा मार्मिक यथार्थ इस कविता में व्यक्त हुआ है।
प्रियंका सेतिया की आवाज़ में प्रसिद्ध लोकगीत का यह मुखड़ा और पाश की कविता दोनों को सुनना सच में बहुत करूणा से भर देने वाला है।

Sunday, 14 January 2018

‘1084वें की माँ’ की माँ

इस बात का ज़िक्र मैंने पहले भी एक लेख में किया है कि गोविन्द निहलानी निर्देशित हज़ार चौरासी की माँमैंने पहले देखी और महाश्वेता देवी के जिस मूल बांगला उपन्यास पर यह फिल्म आधारित है, उसका हिंदी अनुवाद ‘1084वें की माँ’ मैंने बाद में पढ़ा। यह फिल्म रूपांतरण इतना संतोषप्रद है कि इस फिल्म को देख लेने के बाद मूल साहित्यिक कृति को पढ़ने की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं होती! लेकिन मूल उपन्यास पढ़ लेने के बाद, इसके सिनेमाई रुपांतरण को नये सिरे से समझने का अधिक अवसर मिल सकता है। महाश्वेता देवी का लेखन इतना उम्दा और प्रभावशाली है, कि उनका यह उपन्यास अपने आप में एक सिनेमा है। इसलिए मुझे लगता है कि फिल्म के रूप में इसकी परिकल्पना करते हुए गोविन्द निहलानी को बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी।
महाश्वेता देवी के इस उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की केन्द्रीय संवेदना यह है कि समाज की विषमताओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान देने वाले एक पात्र की माँ उसके बलिदान के कारणों और महत्त्व को समझने की कोशिश करती है और जब वह इसे समझ लेती है, तब वह इन्हें मूल्य के बतौर आत्मसात करने की कोशिश भी करती है। यह इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि पुत्र के इस बलिदान को उसके अभिजात्य पिता और अन्य सम्बन्धियों सहित पूरा का पूरा बुर्जुवा समाज न सिर्फ ख़ारिज करता है, बल्कि उसके वजूद को भी मिटा देना चाहता है! इन प्रपंचों को समझ लेने के बाद माँ को अपने ही रक्त सम्बन्धियों और अपने ही अभिजात्य समाज से घृणा होने लगती है। उपन्यास के लगभग अंतिम हिस्से में घर में चल रही एक पार्टी में शराब में डूबे, झूमते-नाचते, बौद्धिकता और प्रतिबद्धता की दिखावटी बहसों में शामिल लोगों को देखकर उसे बहुत गहरी बेचैनी और वेदना होती है और उन क्षणों में वह सोचती है- “धरती की सब कविता, कविता के बिम्ब, लाल गुलाब के गुच्छे, हरी घास, नियॉन की रोशनी, माँ के चेहरे पर फैली हंसी, शिशु का क्रंदन....हमेशा अनंत काल तक इन सबका भोग करती रहेंगी ये लाशें! अपने सड़े गले-गँधाते अस्तित्व के लिए धरती के हर सौन्दर्य और माधुर्य को हथियाए रहेंगी, क्या इसीलिए व्रती मर गया? सिर्फ इसलिए?”
महाश्वेता देवी खुद एक एक्टिविस्ट लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। सिर्फ अपने लेखन से ही नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर प्रविरोध के मोर्चों पर डट जाना उनका स्वाभाव था। महाश्वेता देवी की वाम प्रतिबद्धता जगजाहिर रही है, लेकिन जब बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के रहते हुए सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जनविरोधी घटनाएँ हुईं तब वे सरकार की नीतियों के सबसे मुखर आलोचकों और सत्याग्रहियों में शामिल रहीं।
मेरे ख़याल से उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की प्रेरणा महाश्वेता देवी की वही पक्षधरता रही है, जो उनके उपन्यास के पात्र व्रती की है और इस उपन्यास के इतने प्रभावी होने का एक बड़ा कारण भी यही है कि महाश्वेता के खुद के विचारों और आचरण में कोई दोहरापन नहीं था। चूँकि महाश्वेता देवी इस उपन्यास की सर्जक हैं, इसलिए उन्हें 1084वें  की माँ की माँ भी कह सकते हैं। उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहे लगभग डेढ़ वर्ष हो गये हैं, यदि वे जीवित होतीं तो आज जीवन के 93वें वर्ष में प्रवेश करतीं। जनपक्षधरता के प्रति समर्पित इस सशक्त लेखिका को उनके जन्मदिन पर सलाम।

Saturday, 30 December 2017

नयी पीढ़ी तक दुष्यंत

दुष्यंत कुमार (01.09.1933 से 30.12.1975)

फिल्म मसानमें दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल की कुछ पंक्तियों के साथ प्रयोग करके जब वरुण ग्रोवर ने एक सुन्दर गीत बनाया, तब स्वाभाविक रूप से इस गीत के साथ जगह-जगह दुष्यंत कुमार का ज़िक्र भी हुआ। हो सकता है कि बिल्कुल नयी पीढ़ी के कई लोगों को इससे यह जानने का अवसर मिला हो कि ‘एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ / तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ’ जैसी खूबसूरत पंक्तियाँ दुष्यंत कुमार की कलम से निकली हैं। 
हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं है कि इस ज़िक्र के बिना भी देर-सवेर दुष्यंत के लिखे शेर हिन्दी बोलने, समझने और लिखने वाली नयी पीढ़ी तक पहुँच ही जाते। इस बात की तसल्ली करनी हो तो कहीं स्कूली बच्चों या कॉलेज के नव युवाओं के लिए रखे गये भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगितायों में कभी पहुँचिये। वहाँ तय किये गए विषय भले कुछ भी हों, इस बात की भरपूर संभावना है कि आप को वहाँ दुष्यंत के शेर सुनने को ज़रूर मिल जाएँगे। दुष्यंत की ग़जलों की यह ख़ासियत है कि यह सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों से हमेशा नये लगते हैं। दुर्भाग्य का ज़िक्र इसलिए कि जिन परिस्थितिथियों ने दुष्यंत को व्यथित किया वे सौगात के बतौर न जाने हम सब को कब तक मिलती रहेंगी।! पीर के पर्वत हो जाने का यह सिलसिला न जाने कब थमेगा!
दुष्यंत के शेर विकट परिस्थितियों से जूझने का जज़्बा देते हैं। वे पीर के पर्वत को पिघलाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं, बुनियाद के हिलाए जाने की ज़रूरत पर जोर देते हैं, वे आकाश के तारों के बजाय घर के अंधेरों पर ध्यान देने की बात करते हैं, वे अपने बाजुओं पर भरोसा करने की ज़रूरत पर इस तरह बल देते हैं कि कट चुके हाथों में तलवारें देखना खुद को भ्रम में रखने के अलावा कुछ भी नहीं है। दुष्यंत असंभव को इस तरह नकारते हैं कि तबीयत से उछाला गया पत्थर आसमां में भी सुराख कर सकता है, और भी बहुत कुछ!
दुष्यंत की गज़लों के संकलन साये में धूपसे जब आप गुज़रेंगे, तब आपको महसूस होगा कि इस पतली सी किताब में शायद ही ऐसा कुछ हो, जो छूट गया हो! इसलिए कहा जाता है कि देश की सभी भाषाओं को बरतने वाले लोग चाहते हैं कि उनका भी अपना एक दुष्यंत हो!
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1 जनवरी 2018 को 'यूथ की आवाज़' (YKA) पर भी प्रकाशित 

Tuesday, 19 December 2017

_____ कविता की बात सुनाती कविताएँ _____

वेणु गोपाल की कविताओं में विचार का पक्ष अधिक मुखर रहा है। मेरी समझ से इसका कारण उनकी स्पष्ट पक्षधरता है। नक्सल जैसी उग्रवामपंथी विचारधारा से सक्रिय तौर पर सम्बद्ध कवि की वैचारिक प्रखरता स्वाभाविक है। कविता को शोषण के विरूद्ध और साम्यवाद के पक्ष में इस्तेमाल करने की जो तकनीक प्रगतिशील कविता के दौर में विकसित हुई थी, नक्सल क्रांति के दौर में उसे पर्याप्त व्यावहारिक आधार मिला। हिन्दी साहित्य में वेणु गोपाल की पहली मुकम्मल पहचान इसी दौर के दायित्वबोध से आबद्ध, अभिव्यक्ति के भारी खतरे उठा सकने वाले कवि के बतौर हुई थी।
(मासिक पत्रिका ‘अक्षरपर्व’ के दिसम्बर'2017 अंक में प्रकाशित)

Tuesday, 10 October 2017

उमराव जान रेखा

मैं करीब सात-आठ साल की रही होउंगी जब पहली बार टीवी पर ‘उमराव जान’ देखी थी। तब समझ में तो क्या ही आया होगा, लेकिन तब की देखी उस फिल्म की धुंधली स्मृतियाँ आज भी दिमाग में कहीं दर्ज हैं। करुणा की जिस पराकाष्ठा को इस फिल्म में उभारा गया है, उसने उस छोटी सी उम्र में भी मुझे प्रभावित बेहद किया होगा, और शायद इसीलिए आजतक मैंने जितनी भी बार उमराव जान देखी है, हर बार ऐसा लगता है, जैसे कभी अधूरी छूट गयी फिल्म को पूरा देखने बैठी हूँ!
एक तमिल भाषी लड़की जिसने हिंदी भी बेहद प्रयासों के बाद बोलनी सीखी, उसने इस फिल्म में उर्दू बोली है, और न सिर्फ बोली है, बल्कि उसके लखनवी लहज़े और भंगिमाओं को हुबहू उतार पाने में पूरी तरह सफल रही हैं। हिंदी सिनेमा के पास गर्व करने के लिए जो चुनिन्दा फ़िल्में हैं, उनमें ‘उमराव जान’ का नाम भी लिया जाता है। इस फिल्म के निर्देशक मुज्ज़फर अली ने हालांकि कई और फ़िल्में बनाई, लेकिन ‘उमराव जान’ जैसी फिल्म वे दुबारा कभी नहीं बना सके। ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपनी सारी निर्देशन कला इसी फिल्म में झोंक दी हो।
यह फिल्म मुझे इसलिए भी बेहद पसंद है, क्योंकि ये साहित्यिक कृति पर बनी है। उमराव जान’ किसी लेखक की कल्पना का पात्र* है, ये लगता ही नहीं है । हमेशा यही महसूस होता है कि किसी ज़माने में एक उमराव जान रही होगी, उसी की कहानी लेखक ने लिखी है।  हिंदी सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ही ऐसी हैं जो साहित्यिक कृति को बखूबी सिनेमा में उतार सकी हैं। ‘उमराव जान’ इसमें भी एक कदम आगे हैं, क्योंकि ये फिल्म मिर्ज़ा हदी रुसवा के ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास से भी कहीं अधिक प्रभावी है।
इस फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोग उसी शिद्दत से सुनते हैं। ख़य्याम ने इस फिल्म के लिए संगीत दिया था। वे रेखा से इस कदर प्रभावित हैं, कि कहते हैं ‘अगर किसी को उमराव जान को देखना हो तो, वो रेखा को देख ले, क्यूंकि यही उमराव जान हैं’। शहरयार के लिखे गीत और ख़य्याम के संगीत ने इस फिल्म को सम्पूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस फिल्म में अमीर खुसरो के लिखे ‘काहे को ब्याहे बिदेस’ गीत का भी बहुत सार्थक उपयोग किया गया है।
रेखा बेहद ईमानदारी के साथ अपने साक्षात्कारों में ये कहती हैं कि, मैं अपनी निजी ज़िन्दगी में जिस समय जैसे हालातों से गुज़र रही होती हूँ, उसका रिफ्लेक्शन उस समय मेरे निभाए जा रहे किरदारों पर भी पड़ता है। वे बताती हैं कि जिस समय वो ‘उमराव जान’ कर रही थीं, उस समय शायद वे अपने निजी जीवन में कुछ ऐसे ही मिलते-जुलते अनुभवों से गुजर रही थीं, जिनसे उमराव गुजरती हैं। ‘उमराव जान’ में जान फूँक देने वाली रेखा ने कई अन्य फिल्मों में भी किरदारों की विविधता को उम्दा अदायगी से जीवंत बना कर हिन्दी सिनेमा को समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।


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[*कई लोग इस बात से मतांतर रखते हैं कि उमराव जान एक काल्पनिक पात्र है। इसकी वास्तविकता को लेकर उनके अपने तर्क भी होते हैं। इस लिहाज से उमराव जान की काल्पनिकता या वास्तविकता बहस का विषय हो सकती है, लेकिन अवध के इतिहास, संस्कृति और समाज के जानकार विद्वानों ने प्रायः अपनी किताबों और लेखों में उमराव जान को एक काल्पनिक पात्र ही माना है।]

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Saturday, 9 September 2017

वे गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहते थे!

एम.ए के दिनों में पाश (09 सितम्बर 1950 - 23 मार्च 1988) से परिचय हुआ था, उनकी कुछ कविताएँ हिन्दी में पढ़ी सुनी, लेकिन उन्हें जब गंभीरता से पढ़ना चाहा तब पता चला कि वे पंजाबी भाषा के कवि हैं। (यह मेरे लिए फक्र करने की बात थी!)
हिन्दी में उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा ही नहीं था, कि अनूदित कविताएँ पढ़ रही हूँ! बल्कि इसके विपरीत जब उन्हें पंजाबी में पढ़ने की कोशिश करती हूँ, तो वे कविताएँ मुझे अनूदित लगती हैं।
मुझे लगता है, एक सच्चे, जुझारू और ईमानदार व्यक्ति की रचनाएँ जिस भाषा में भी अनूदित कर दी जाएँ, वह उसी भाषा की लगने लगती हैं। यह संयोग था कि मैंने पाश को पहले हिन्दी में पढ़ा! निसंदेह इसमें एक बड़ी भूमिका चमनलाल सहित उन सभी अनुवादकों की भी है, जिन्होंने बड़े मनोयोग से पाश की कविताओं का अनुवाद कर उन्हें हिंदी पाठकों के समक्ष रखा।
पाश यदि जीवित होते तो आज अपने जीवन के 68वें साल में प्रवेश करते। वे बेशक एक लम्बा जीवन नहीं जी सके, लेकिन उन्होंने एक बड़ा जीवन जिया! इसलिए तो वे हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं। 

पाश की कविता अब विदा लेता हूँ’ (अनूदित) से कुछ अंश 
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"धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूँज जाना-
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया"
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"सब भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना।"

#PASH #BIRTHDAY #23MARCH #PUNJABI KAVI #CHAMANLAL