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Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Friday, 20 March 2020

थाॅट प्रवोकिंग फिल्म है 'थप्पड़'


अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म 'आर्टिकल 15' मुझे बेहद पसंद आई थी और एक सकारात्मक फिल्म लगी थी। बाद के दिनों में जब 'थप्पड़' का ट्रेलर रिलीज़ हुआ ; तब से फिल्म देखने की जिज्ञासा थी।

फिल्म रिलीज़ हुई पर देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कुछ खास नहीं मिल रही थी। किसी ने कहा कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा के दिखाया है, तो कोई कह रहा था फालतू ड्रामा है। आज 'थप्पड़' पर फिल्म बनी है; अब कल को उंगली पर फिल्म बनेगी कि तुमने मुझपर उंगली कैसे उठाई! मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी; क्योंकि फिल्म देखी नहीं थी।

फाइनली फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देखने के बाद लगा कि इसे सही मायनों में काबिले तारीफ और ज़रूरी फिल्म कहा जा सकता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे फिल्म में जिस-जिस तरह के लूप होल्स की आशंका थी, शुक्र है फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था। अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जो वह दिखाना चाहते थे, उन्हें उसमें सौ प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। जब आप 'थप्पड़' देखकर उठेंगे तो बहुत सारी चीज़ों पर, बातों पर सोचने के लिए मजबूर होंगे। सही मायनों में 'थाॅट प्रवोकिंग' फिल्म है। जहाँ बात थप्पड़ की होकर भी थप्पड़ की नहीं है। बात जो गलत हुआ उसको 'शिट हैपेन्स' कहकर टालने, गलती को अस्वीकारने, ग्लानि बोध न होने और माफी न मांगने की है और फिल्म में इसे दिखाने में निर्देशक कहीं चूके नहीं हैं।
फिल्म का अभिनय पक्ष भी उम्दा है। पहली बार स्क्रीन पर दिखे पवैल गुलाटी ने मंझा हुआ अभिनय किया है। 'आँखों देखी' के बाऊजी की बेटी बनी माया सराओ को इसमें वकील की भूमिका में पहचानना मुश्किल है; उनका अभिनय भी बेहतर है। बाकी पूरी स्टार कास्ट ने भी काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अनुभव सिन्हा की खासियत है कि उनकी फिल्में बेहद स्पष्ट होती हैं। जो वो कहना चाहते हैं उसमें कहीं भी आपको अस्पष्टता देखने को नहीं मिलती। उनकी पिछली फिल्मों 'मुल्क'और 'आर्टिकल 15' से भी इसे समझा जा सकता है। ये स्पष्टता ही आम से आम दर्शक को भी फिल्म से जोड़ने में सहायता करती है।
'थप्पड़' हमारे समाज को दिखाती है। समाज की उन बारीक चीज़ों को कवर करती चलती है; जिनके बारे में हमारा पितृसत्तात्मक समाज सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। फिल्म आपको बहुत कुछ देकर जाती है।

Friday, 22 November 2019

शौकत आज़मी का निधन



यदि आप शौकत आज़मी को कैफी आज़मी की पत्नी या शबाना आज़मी की माँ के बतौर ही जानते हैं; तो दरअसल आप एक बेहद मजबूत और बेहद प्रतिभाशाली शख्सियत से लगभग अपरिचित ही हैं। वे कमाल की अदाकारा, महिलाओं की बराबरी को व्यवहार में साबित करने वाली और जन नाट्य मंच के शुरुआती स्तंभों में से एक थीं। कह सकते हैं कि शबाना आज़मी ने अभिनय अपनी माँ की कोख से ही सीखना शुरू कर दिया था। शौकत की अभिनय क्षमता देखनी हो तो आप 'उमराव जान', 'गर्म हवा' और 'बाज़ार' जैसी फिल्मों में उन्हें देखिए।
शौकत आज़मी का आज देर रात निधन हो गया। वे 93वें वर्ष की थीं। लम्बे समय से कहीं उनका ज़िक्र होना भी लगभग बंद हो चुका था। अब उनकी मृत्यु के बाद शायद उनके योगदान की फिर से समीक्षा हो। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि!

Thursday, 15 August 2019

नहीं रहीं विद्या सिन्हा

70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो ग़लत नहीं होगा।
जिसने भी रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे लिए’, पति पत्नी और वोजैसी फ़िल्में देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या सिन्हा किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मका हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों, टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

Saturday, 29 June 2019

निर्देशक अनुभव सिन्हा का सचमुच कमाल का काम है- ‘आर्टिकल-15’

2019 में पहली बार सिनेमा हॉल तक गयी और खुशी है कि कुछ सार्थक देख कर लौटी। लगभग 2 घंटे की फिल्म बिना किसी भाषण, बिना किसी जबरदस्ती ठूंसे विमर्श के वह सब बता देती है, जिसकी उससे अपेक्षा हो। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है- समाज, राजनीति, व्यवस्था सबका सच, सबकी परतें खुलती चली जाती हैं। अभिनय, संवाद, सिनेमेटोग्राफी सब में फिल्म को उम्दा कहा जा सकता है।
सुना है कि कुछ जगह ब्राह्मणों ने इस फिल्म का विरोध किया है। मुझे तो इसका कोई औचित्य नहीं लगता। विरोध करने वालों को यह फिल्म देखनी चाहिए, मुझे उम्मीद है कि इससे उन्हें खुद को बेहतर बना पाने में कुछ न कुछ मदद ज़रूर मिलेगी।
एक और बात जिसका उल्लेख होना चाहिए, वह यह कि इस फिल्म के एकदम शुरू में गीत -'कहब त लग जाई धक से' भी शामिल है, जिसे दिल्ली के जन आंदोलनों में अक्सर गाया और सुना जाता है!

Saturday, 2 March 2019

दर्शनीय है भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय

मुंबई में हाल ही में फिल्म प्रभाग (Film Division of India) परिसर में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum of the Indian Cinema) का उद्घाटन हुआ है। पिछले दिनों एक सेमिनार और रिसर्च से जुड़े काम के सिलसिले में मेरा मुंबई जाना हुआ। किसी अनजान शहर में अकेले उतरने, वहाँ के ऑटो, टैक्सी, लोकल ट्रेन में अकेले सफ़र करने के अनुभव कुल मिलाकर बेहद अच्छे रहे। 
जिस दिन वहां पहुँची उसी दिन सबसे पहले इस म्यूज़ियम को ही देखने गयी। दो भवनों में समाया यह बेहद विशाल संग्रहालय सिनेमा की पूरी यात्रा को बेहद सुन्दर तरीके से दिखाता है। इस म्यूज़ियम में आप सिनेमा के शुरूआती दौर से लेकर अब तक के इतिहास को, सिनेमा बनने की प्रक्रिया को, इसके लिए उपयोग किये जाने वाले तकनीकी उपकरणों मसलन विभिन्न प्रकार के कैमरों, साउंड रिकॉर्डर्स, रीलों व शूटिंग के समय काम आने वाले अन्य विभिन्न उपकरणों, संपादन की तकनीकों वगैरह को बेहद नजदीक से देख और महसूस कर सकते हैं। इस संग्रहालय में घूमते हुए भारतीय सिनेमा की पूरी परंपरा को आप जैसे साकार देखते हैं। कई-कई जगहों पर तो आपको खुद इस रोमांच का हिस्सा बनने का भी मौका मिलता है। मसलन आप गाँधीजी के साथ बैठ कर फिल्म देखने जैसा अनुभव कर सकते हैं, तरह-तरह के बैकग्राउंड सेलेक्ट कर अपनी ऐसी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं कि देखकर लगेगा ही नहीं कि आप सचमुच उस लोकेशन पर नहीं हैं।
इस संग्रहालय के हर एक कोने में भारतीय सिनेमा के किसी न किसी तत्व की मौजूदगी है। यहाँ के वॉशरूम तक को सिनेमा का प्रभाव ली हुई कलात्मकता से संवारा गया है। सोने पे सुहागा यह है कि यहाँ के सभी स्टाफ बेहद विनम्र और सहयोगी स्वाभाव के हैं। अभी इस म्यूज़ियम के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, इसलिए यहाँ इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई दिए। लेकिन मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही यह मुम्बई के बेहद लोकप्रिय स्थानों में से एक होगा। कभी मुंबई जाइए और समय मिले तो म्यूज़ियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा ज़रूर जाइए। यह संग्रहालय अनूठा तो है ही, इसकी टिकट भी बेहद सस्ती है।

Friday, 1 March 2019

फिल्म निर्माताओं में देशभक्ति, युद्ध और आतंकी हमले भुनाने की होड़

फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइककी कमाई थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बात से सिनेमा का व्यापार करने वाले बाकी लोग प्रेरणा न लें, यह भला कैसे हो सकता है! अभी पुलवामा में हुई हमले की दर्दनाक घटना को कुछ दिन भी नहीं बीतें हैं, भारतीय वायुसेना के एयर स्ट्राइक के दावे के बाद सीमा पर बनी तनाव की स्थिति ख़त्म भी नहीं हुई है, कई विमानों के क्रैश होने और सेना के जवानों सहित कई लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं, ठीक उसी समय यह खबर आ रही है कि पुलवामा की घटना, बालाकोट एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तानी हिरासत में लिए जाने की घटना पर फिल्में बनाने के लिए प्रोडक्शन हाउसों के बीच टाइटल रजिस्टर करवाने की होड़ मची हुई है! 

मतलब हिंदी सिनेमा के निर्माताओं के लालची दिमाग इस दुखद समय को भी भुनाने के लिए पूरी तरह तत्पर और प्रयत्नशील हैं। इस तरह की घटनाएँ उनके लिए मसाला भर हैं। इसमें और अधिक नमक-मिर्च लगाकर परोसने में तो उन्हें महारत हासिल है ही। इन मुनाफाखोरों के लिए यह सिर्फ अकूत पैसा कमाने का मौका है। देशभक्ति का टॉनिक मिलाकर ये लोग सेना के प्रति देश की जनता की भावनाओं को भुनाएंगे और सोने पे सुहागा यह होगा कि ये बैठे-बिठाये मि. प्राइम मिनिस्टर को फिल्म का हीरो भी बना देंगे! यानी हर तरह से फील गुड एंडिंग!
इतना सब कहने का एक मतलब यह भी है कि देशप्रेम के जज़्बे से प्रेरित होकर जब आप ऐसी फ़िल्में देखने का प्लान बनाते हैं, तो आप सिर्फ आर्थिक ठगी का शिकार ही नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि भावनाओं से खेलने वाले लोगों के द्वारा बेवकूफ भी बन रहे होते हैं। इस तरह का खेल समझ लेने बाद कोई पूछे ‘how’s the josh’? तो क्या कहेंगे भला!!

Tuesday, 20 November 2018

कई कसौटियों पर खरी उतरती है 'मोहल्ला अस्सी'


'पीहू' की कमाई की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' का पिछड़ना इस बात का संकेत नहीं है कि 'मोहल्ला अस्सी' पसंद नहीं की जा रही। दरअसल इसका उल्टा है, सारा खेल प्रमोशंस का है। 'पीहू' के प्रमोशंस और प्रमोशनल स्टंट्स की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' के प्रमोशंस आपको दिखेंगे ही नहीं होंगे! आखिर कब तक प्रमोशंस फिल्म को चलाएंगे! कम से कम फिल्म रिलीज़ के शुरुआती तीन दिनों तक तो हम प्रमोशंस के धोखे से लूटे ही जा सकते हैं!
'मोहल्ला अस्सी' के फिल्मांकन का सूक्ष्म से सूक्ष्म अन्वेषण भी आपको निराश नहीं करेगा। धर्मनाथ पांडे की ग़रीबी आपको उनके साफ-सुथरे कुर्ते में नहीं बल्कि उसके टूटे हुए बटनों में दिखेगी! इसी तरह उनकी पत्नी सावित्री को उनकी दोहराई जाने वाली मामूली किस्म की साड़ियों में देखेंगे। पप्पू की दुकान पर कुल्हड़ में मिलने वाली चाय दौर बदलने पर कांच के गिलास में मिलने लगती है! यही नहीं फिल्म के बैकग्राउंड में बजने वाले श्लोक, अध्यापकीय व्याख्या के लिए लिए गए श्लोक, रामचरितमानस की चौपाइयां और कई बार बहुत साधारण से लगने वाले संवाद भी गूढ़ और व्यापक अर्थों को व्यंजित करते हैं, अगर इन्हें समझा जा सके। बहरहाल कहने को ऐसी बहुत सी बातें हैं लेकिन इन्हें किसी और से सुनने की बजाय खुद देखकर ज़्यादा अच्छे से महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म के कैमरामैन विजय अरोड़ा के काम की तारीफ इस रूप में भी हो रही है कि उन्होंने बनारस या अस्सी को बहुत ही जीवंत रूप से उतारा है।
कुछ लोगों को इस फिल्म का कई-कई पहलुओं को छूना इसकी कमज़ोरी लग रही है, लेकिन वास्तव में यह इस फिल्म की खासियत है कि वो बहुत सारे पहलुओं को सफलतापूर्वक समेट पाती है और एक के बाद एक आने वाले दृश्य कहीं से असंगत नहीं लगते। हां ये ज़रूर है कि इन सभी पहलुओं को समझने के लिए आपके पास देश, समाज, इतिहास, राजनीति, धर्म आदि की बुनियादी जानकारी का होना ज़रूरी है।
साहित्य और सिनेमा की विद्यार्थी होने के नाते मेरी दिलचस्पी जिस बात में सबसे अधिक रही मैं अब उस पर आती हूं। मूल उपन्यास के लेखक काशीनाथ सिंह ने फिल्म देखने के बाद यह प्रतिक्रिया दी है कि फिल्मकार ने मूल कथानक के साथ बिना कोई तोड़-मरोड़ किए एक उम्दा फिल्म बनाई है जो उनके उपन्यास से भी अधिक जीवंत है।

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Sunday, 18 November 2018

निराश करती है विनोद कापड़ी की फिल्म 'पीहू'!

आने वाले हफ्ते के बाकी दिनों की व्यस्तता पहले से निर्धारित थीइसलिए कल शाम पीहू’ और मोहल्ला अस्सी’ दोनों ही फ़िल्में बैक टू बैक देखनी पड़ी। ज़िन्दगी में पहली बार बड़े पर्दे पर एक ही दिन में दो फ़िल्में देखीं। दरअसल दोनों ही फिल्मों का लम्बे समय से इंतज़ार था और मुझे लग रहा था कि इनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
जो पहली फिल्म देखी वो विनोद कापड़ी निर्देशित पीहू’ थी। इससे पहले विनोद कापड़ी मिस टनकपुर हाज़िर हों’ बनाकर तारीफें बटोर चुके हैं। इसलिए पीहू’ से अपेक्षाएं स्वाभाविक थी लेकिन इस फिल्म ने निराश किया। मुझे नहीं पता कि कुछ लोग किन भावनाओं में बहकर इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैंमुझे तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ भावनाओं को भुनाने वाली लगी। सुनने में यह भी आया है कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इस फिल्म को पुरस्कार और तारीफें भी मिली हैं, यह भी मेरे लिए आश्चर्य की बात ही है! फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि इस पूरी घटना को महज़ एक सम्वेदनशील रिपोर्ट के रूप में भी छापा या दिखाया जाता तो वह इस फिल्म से कम प्रभावी नहीं होता। यह फिल्म जो सन्देश देना चाहती हैवो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैलेकिन इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए आपको इस फिल्म को अनावश्यक रूप से लगभग दो घंटे तक झेलना पड़े तो यह बेमानी लगता है।
एक ही लोकेशन और सिचुएशन पर पूरी फिल्म को शूट करना कम खर्चीला ज़रूर होता हैलेकिन वह सचमुच बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता हैउसमें बहुत सावधानी की जरुरत होती है। विनोद कापड़ी और उनकी टीम इस मसले पर काफी लचर साबित हुई है। इस फिल्म में एक से बढ़कर एक असंगत दृश्यों की भरमार है। कई बार तो ऐसा लगा कि जब जिस चीज़ को दिखाना होता है वो चीज़ उस दृश्य में हाज़िर हो जाती है। मसलन बीच घर में बच्ची को फिनायल की बोतल मिल जाती हैइसी तरह बच्ची के हाथ से दूध की बोतल गिर जाने पर उसे वहीं पर पोछा भी मिल जाता है! मुझे लगता है कि निर्देशक ने सोचा होगा कि इन पहलुओं पर कोई बारीकी से ध्यान नहीं देगा जबकिसच यह है कि फिल्म के दौरान यह सारी चीज़ें बहुत डिस्टर्ब करती हैं और यह कोई बारीक नहीं बल्कि साफ़ दिखने वाला अंतर है। एक दृश्य में बच्ची अपनी मृत माँ के ज़ख़्मी चेहरे पर बहुत सारी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाती है और अगले कुछ दृश्यों में वह क्रीम कभी चेहरे पर दिखाई देती हैऔर कभी गायब हो जाती है। ये कुछ संकेत भर हैंइस फिल्म में ऐसी गलतियों की भरमार है। गौर से देखेगें तो इस फिल्म के कई दृश्य और घटनाएँ आपको अतार्किक लगेंगी। एक दृश्य को लेकर हालांकि मैं कोई एक्सपर्ट कमेंट नहीं कर सकती लेकिन मेरे लिए यह ताज्जुब और जिज्ञासा का विषय ज़रूर है कि क्या नींद की चार गोलियां खाकर भी दो साल की बच्ची को महज़ तीन-चार घंटे की नार्मल नींद ही आएगीऔर उसके बाद उठकर वह पूरी तरह एक्टिव हो सकती हैइस फिल्म में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि यह मेडिकली प्रूव्ड होमुझे इसकी जानकारी नहीं है। मेरे खयाल से फिल्म की पटकथा बहुत दुरूस्त नहीं है। इस पर बहुत मेहनत करने की जरूरत थी जिसे शायद बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। शायद बहुत सारा ध्यान एक छोटी बच्ची को फिल्माने की चुनौतियों से निपटने पर ही लगा दिया गया।
एक छोटी बच्ची से प्रभावी अभिनय करवाना सचमुच बहुत कठिन काम है। इस फिल्म की बड़ी खासियत भी यही बताई जा रही थी वो कि एक बहुत छोटी बच्ची से निर्देशक ने चुनौती भरा अभिनय करवाया है। इसमें कोई शक नहीं कि पीहू विश्वकर्मा सचमुच बहुत प्यारी बच्ची हैऔर हर बच्चे की तरह उसकी सहज हरकतें लोगों को पसंद आती हैं और इसे उतारने के लिए निर्देशक और पूरी टीम ने बहुत मेहनत भी की होगीलेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसके बावजूद निर्देशक ने फिल्मांकन का कोई बहुत महीन काम नहीं किया है। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों ने छोटे-छोटे बच्चों से बहुत असाधारण काम करवाए हैं। एक उदाहरण के लिए 1966 में प्रदर्शित हुई चेतन आनंद की एक बहुत ही साधारण फिल्म आखिरी ख़त’ का जिक्र किया जा सकता है जिसमें महज़ सवा साल के बच्चे से बहुत बेहतरीन अभिनय करवाया गया है। वास्तव में बहुत साधारण स्तर के निर्देशकों ने भी चाइल्ड आर्टिस्ट्स से बहुत बेहतर काम करवाए हैं।
पीहू’ के प्रमोशन में इस तरह की भावनात्मक अपील की जा रही है कि जो अपने परिवार से प्यार करते हैं वो यह फिल्म देखने ज़रूर जाएँ। लेकिन फिल्म देखने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि आर्थिक लाभ के लिए यह एक किस्म का भावनात्मक दोहन भर है। इस फिल्म को वो लोग ज़रूर देखने जाएँ जो फ़िल्में देखकर अपनी राय बनाने में यकीन करते हों और हर बार की तरह कहूँगी कि हो सकता है उनकी राय मुझसे अलग हो। जहाँ तक परिवार से प्यार करने का प्रश्न है और यदि आप वो करते हैंतो आपके लिए कोई समस्या ही नहीं है। हम सबको अपने-अपने जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए। शकमतभेदमामूली झगड़ों की वज़ह से इसे तबाह नहीं कर लेना चाहिए। हमें इन सारी चीजों से निपटना आना चाहिए। यहाँ तक कि संबंधों के बीच जब यह लगने लगे कि जीवनयापन दूभर हो रहा हैतब जीने के नए और उत्साहजनक तरीके और रास्ते तैयार कर लेने चाहिए। यह जीवन जीने के लिए मिला हैइसके साथ कुछ उत्तरदायित्व बंधे हुए हैंहमें उन सबका सम्मान करना चाहिए।
दूसरी देखी गयी फिल्म मोहल्ला अस्सी’ ने निराश नहीं किया। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म बहुत सारे प्रक्रियागत झंझटों और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझते हुए प्रदर्शित हुई है। इसपर विस्तार से दूसरे पोस्ट में लिखूँगी। बहरहाल इतना जरूर कहूँगी कि यह फिल्म देखने लायक है। साहित्य पर फिल्म बना पाने की हिम्मत कम फिल्मकार करते हैं। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ हिम्मत करते हैं बल्कि इसे एक अच्छी फिल्म में तब्दील करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। उनकी पहली फिल्म पिंजर’ भी इसका उदाहरण है। हम अपने पैसे खर्च कर इस तरह कि फिल्में देखेंगे तभी फिल्माकारों में इस तरह की फिल्में बनाने की हिम्मत बची रहेगी।

Thursday, 25 October 2018

होप और हम

कई फिल्मों के बारे में हम प्रमोशन के ज़रिये नहीं बल्कि उनके ट्रेलर रिलीज़ होने पर जानते हैं। इसके बाद वो फिल्म कब रिलीज़ होती है, किन सिनेमाघरों में लगती है, बहुत बार तो पता ही नहीं चलता! ऐसी कुछ फ़िल्में बाद में किसी दिन यूट्यूब पर दिख जाती हैं और इनमें से कई फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें देखने के बाद लगता है कि ऐसी फिल्मों को सिनेमाघरों में अच्छे-खासे दर्शक मिलने चाहिए थे।
पिछले दिनों एक ऐसी ही फिल्म आई थी ‘होप और हम’। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सोनाली कुलकर्णी, आमिर बशीर, नवीन कस्तूरिया और बाल कलाकार कबीर शेख जैसे लोकप्रिय कलाकारों ने काम किया है। इनके अलावा भी जो कलाकार हैं सबने अपने हिस्से का अभिनय बेहद संजीदगी के साथ किया है। लेकिन इस फिल्म की जो सबसे बड़ी खासियत है, वह है इसकी सकारात्मकता। सुदीप बंदोपाध्याय ने एक अच्छे कथानक को बहुत सादगी से फिल्माया है।
मुझे यह फिल्म बहुत विशिष्ट लगी हो ऐसा नहीं है, लेकिन यह मुझे खूबसूरत ज़रूर लगी। ऐसी फ़िल्में बहुत कम न सही तो बहुत ज़्यादा भी नहीं बनती। यह फिल्म निराशा और पलायन दोनों ही स्थितियों से दूरी बनाये रखने का सन्देश देती है। इस फिल्म में हर आयुवर्ग के लोगों के लिए कुछ न कुछ प्रेरणादायक है। फिल्म का टाइटल ट्रैक है- ‘होप और हम साथ रहें हर दम’। वाकई ज़िन्दगी में आशाओं का साथ बना रहना चाहिए, इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

Wednesday, 24 October 2018

'तुम्बाड' का रोमांच


जिन सिनेमा प्रेमियों ने तुम्बाडसिनेमाघरों में जाकर नहीं देखी है, हो सकता है उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहे। मेरे खयाल से टीवी या लैपटॉप स्क्रीन पर इस फिल्म के पूरे रोमांच को महसूस नहीं किया जा सकता। वैसे अभी भी कई सिनेमाघरों में तुम्बाडलगी हुई है, इच्छा हो तो इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। इस फिल्म को देख कर लौटने वाले कुछ लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनने के बाद मैं यह सलाह ज़रूर दूंगी कि इस फिल्म को जब देखने जाएँ तो यह सोचकर बिल्कुल भी न जाएँ कि यह एक हॉरर मूवी है, यह पूर्वाग्रह आपका मज़ा खराब कर सकता है।
इस फिल्म में सबकुछ बहुत वास्तविक दिखाने के लिए छ: सालों तक जबरदस्त टीमवर्क किया गया है। लोकेशन का चयन, सेट की पूरी परिकल्पना, मेकअप, डिजाइन वगैरह के लिए अथक मेहनत की गयी है। फिल्म में प्रभावी बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए डेनिश म्यूजिशियन जेस्पर किड जेकॉब्सन (Jesper Kyd Jakobson) से संपर्क किया गया, जिन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ लॉस एंजल्स (यूएसए) स्थित अपने स्टूडियो में इस फिल्म के लिए म्यूजिक तैयार किया। इस फिल्म में एक ही गीत है, और वो बेहद प्रभावी है। इस गीत के कुछ-कुछ अंश पूरी फिल्म में कई बार बजते हैं। राजशेखर के लिखे हुए इस गीत का म्यूजिक अजय-अतुल की जोड़ी ने कंपोज़ किया है और इसी जोड़ी में से एक अतुल गोगावाले ने इसे बेहद खूबसूरती से गाया है।
बहरहाल इस फिल्म से जुड़ी एक ऐसी जानकारी यहाँ साझा कर रही हूँ, जो मेरे लिए तो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। अभी एक-दो दिन पहले यह जानकारी मुझे फ़िल्मी फीवरनामक एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित हुए चाइल्ड एक्टर मोहम्मद समद के एक इंटरव्यू से मिली। इस फिल्म में विनायक (सोहम शाह) के नन्हें बेटे का किरदार निभा रहे मोहम्मद समद ने ही विनायक की बूढ़ी दादी का भी किरदार निभाया है। विनायक की दादी का किरदार एक बूढ़ी अभिशप्त महिला का है, जिसका पूरा शरीर शक्ल-ओ-सूरत बेहद जुगुप्सा पैदा करने वाला और बेहद डरावना है। एक 9-10 साल के बच्चे का एक ही फिल्म में दोहरा किरदार निभाना, जिसमें से एक सामान्य बच्चे का और दूसरा बेहद असामान्य बुढ़िया का वाकई बहुत चकित करने वाला है। बाकी इन किरदारों की क्या खासियत है और कितना अलग-अलग रेंज है, यह फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है।
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Friday, 12 October 2018

तुम्बाड से लौटकर


कई कारणों से 'तुम्बाड' देखने जाना चाहिए। लालच बुरी बला है, इसे नये कथ्य और रूपकों के साथ देखने के लिए। फिल्म की ज़बरदस्त सिनेमेटोग्राफी के लिए। क्रिएटिव डायरेक्टर के बतौर आनंद गांधी की क्रिएटिविटी और निर्देशक के बतौर पहली फिल्म कर रहे राही अनिल बारवे के कौशल को देखने के लिए। और सबसे खास 'शिप ऑफ थीसियस' में बेहद सहज स्वाभाविक अभिनय के माध्यम से दर्शकों का दिल जीतने वाले सोहम शाह की अभिनय क्षमता के विस्तृत रेंज को देखने के लिए। 
तीन चैप्टरों में बंटी इस फिल्म का पहला चैप्टर हो सकता है आपको उतना नहीं बांध पाए, लेकिन दूसरे चैप्टर से आप अंत तक पूरी तरह इस फिल्म से बंध जाएंगे। और हां नन्हें एक्टर समद के लिए भी जाना चाहिए जिसकी अभिनय क्षमता का कमाल 'गट्टू' और 'हरामखोर' जैसी फिल्में देखने वाले दर्शक देख चुके हैं। मेरा अनुभव रहा कि यह फिल्म लालच के प्रति आगाह करती है, लेकिन खाली हाथ लौटने नहीं देती।

Sunday, 23 September 2018

कल्पना लाजमी का असमय निधन

चर्चित फिल्म निर्देशक कल्पना लाज़मी नहीं रहीं। वे लम्बे समय से लीवर और किडनी की समस्या से जूझ रही थीं। 64 वर्ष की कल्पना ने आज सुबह मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
कल्पना में कमाल की रचनात्मक प्रतिभा थी और सिनेमा को लेकर उनका नज़रिया उन्हें खास बनाता है, यही कारण है कि उन्होंने 'रूदाली', 'दरमियां', दमन' सहित स्त्री केन्द्रित कई उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण फिल्में बनायी। कल्पना उन स्त्री निर्देशकों में शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म निर्देशन की दुनिया में तब कदम रखा जब इस क्षेत्र में अमूमन पुरूषों का ही बोलबाला था, और अपने काम से यह साबित किया कि उनकी निर्देशकीय क्षमता बेमिसाल है। कल्पना का असमय निधन बहुत दुखद है। हिन्दी सिनेमा को चाहनेवाले उन्हें उनके काम से हमेशा याद करेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 22 September 2018

ये वो मंटो तो नहीं!

हैदराबाद के किसी मल्टिप्लैक्स में यदि किसी हिन्दी फिल्म के (ख़ास तौर पर लीक से हट कर बनायी गयी फिल्म के) रिलीजिंग डे के दूसरे शो में अच्छी खासी भीड़ जुटी हो तो कोई शक नहीं रह जाता कि यह फिल्म ठीक-ठाक बिजनेस कर लेगी। कल रिलीज हुई फिल्म मंटोको लेकर मेरा यही अनुभव रहा। मेरे खयाल से इसमें मंटोके प्रमोशन के लिए की गयी मेहनत की बड़ी भूमिका है।
2012 से नंदिता इस विषय पर काम कर रही थीं। उनके मुताबिक काफी रिसर्च करके उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की। नंदिता को फिल्म जगत से जुड़े कुछ एक बौद्धिकों में शुमार किया जाता है। उन्होंने बेहद चुनिंदा फिल्मों में अभिनय किया है। बेहतरीन अभिनय के लिए उनकी खूब तारीफ भी होती रही है। निर्देशक के बतौर नंदिता को लोगों ने 2008 में तब जाना जब गुजरात दंगों पर आधारित उनकी फिल्म फ़िराकरिलीज़ हुई। यह बहुत ही संजीदगी के साथ बनायी गयी एक ज़रूरी और उम्दा फिल्म है। मंटोउनके द्वारा निर्देशित दूसरी फिल्म है।
यह फिल्म उर्दू के मशहूर अफसानानिग़ार सआदत हसन मंटो के जीवन और उनकी रचनाओं पर आधारित है। फिल्म के लिए इस तरह के विषय का चयन ही चुनौतीपूर्ण होता है। मेरे खयाल से नंदिता का दृष्टिकोण उन्हें इस तरह की चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह मंटो की जिंदगी, उनकी सोच और उनके रचनात्मक कार्यों के महत्व से नयी पीढ़ी को परिचित कराती है।
इन सब बातों के होते हुए भी मुझे यही लगा कि यह फिल्म मंटो पर किया गया कोई महीन काम नहीं है। यहाँ तक कि मंटो के मन की उथल-पुथल और रचनात्मक बेचैनियों को जिस शिद्धत से उकेरा जाना चाहिए था, उसका अभाव खटकता है। नवाज़ुद्दीन भले ही मंझे हुए अभिनेता हैं, लेकिन मंटो को अपने भीतर उतारने में वह उस तरह से कामयाब नहीं हो सके हैं, जैसी कामयाबी उन्होंने फैज़ल, स्कूल मास्टर श्याम, रमन राघव या गायतोंडे जैसे किरदारों को अपने भीतर उतार पाने में हासिल की है। इसे नवाज़ से अधिक नंदिता की निर्देशकीय कमज़ोरी कहा जा सकता है।
फिल्म में मंटो की कुछ कहानियों का फिल्मांकन यदि प्रभावित करने वाला है, तो कुछ कहानियों का फिल्मांकन बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि नंदिता दो घंटे में बहुत कुछ दिखा देने के लालच से खुद को नहीं बचा नहीं पायी हैं। कई जगहों पर जहाँ धैर्य और ठहराव की ज़रूरत महसूस होती है, फिल्म भागती नज़र आती है, वहीं कहीं-कहीं मामूली दृश्यों को अनावश्यक ही लम्बा कर दिया गया है।
बहुत सारे चर्चित अभिनेताओं की झलक इस फिल्म में आप देख सकते हैं, लेकिन इससे कोई प्रभाव उत्पन्न किया जा सका हो, ऐसा मुझे नहीं लगता है। रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी के किरदार को अच्छे से निभाया है। मंटो के ख़ास दोस्त श्याम चड्ढा का किरदार निभा रहे, ताहिर राज़ भसीन भी प्रभावित करते हैं। मुझे तो यह भी लगा कि बहुत से किरदारों के साथ ज़्यादती हुई। मसलन अशोक कुमार और फैज़ अहमद फैज़ का किरदार बेजान लगता है।
इन सब बातों के अलावा इस फिल्म में एक बात जो मुझे बेहद अखरी वो है भाषाको लेकर बरती गयी लापरवाही। मंटो लुधियाना के एक गाँव में पैदा हुए थे। वे कश्मीरी मूल के मुसलमान थे, लेकिन उनका परिवार पीढ़ियों पहले पंजाब में आकर बस गया था। लिहाज़ा पंजाबी उनकी मादरी जबान की तरह थी। मंटो अपने सम्बंधियों और पंजाबी दोस्तों से अक्सर पंजाबी में बात किया करते थे। उनकी कहानियों में पंजाबी शब्दों, वाक्यों की भरमार देखने को मिलती है, लेकिन इस फिल्म में पंजाबीपन सिरे से गायब कर दिया गया है, यहाँ तक कि लाहौर के बाज़ार में भी कोई पंजाबी नहीं बोलता! ठंडा गोश्तकहानी की बुनावट में चूँकि पंजाबी है इसलिए मात्र इसके फिल्मांकन में पंजाबी शामिल है। हालांकि इसे यह कह कर जस्टिफाई करने की कोशिश की जा सकती है कि एक हिन्दी फिल्म के लिए भाषा की यह छूट ली जा सकती है, लेकिन तब भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इससे फिल्म कमज़ोर हुई है। हिन्दी में ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जब किसी ऐतिहासिक पात्र को कहानी का आधार बनाया गया तो रहन-सहन और भाषाई स्तर पर वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश की गयी। नंदिता चाहती तो मंटो से उनकी पत्नी, उनकी बहन या उनके दोस्त श्याम चड्ढा से बातचीत करते हुए पंजाबी के कुछ छोटे-मोटे वाक्य बुलवाकर इस ओर कम से कम संकेत संकेत कर सकती थीं। खुद अपनी पहली फिल्म फ़िराकमें नंदिता ने अपने कुछ गुजराती पात्रों से गुजराती बुलवाई है।
खैर इन कमज़ोरियों के बावज़ूद इस फिल्म को देखने ज़रूर जाना चाहिए। एक तो यह ज़रूरी नहीं कि मुझे जो बातें खटकी वह सबको खटके, दूसरी बात यह कि इस तरह की फिल्मों का बनना ही बड़ी बात है। इस तरह की फिल्मों के पीछे समाज की बेहतरी का जो उद्देश्य निहित होता है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण और पवित्र होता है। ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की फिल्में बनाने का साहस किया जा सके। स्वाभाविक है कि कुछ फिल्में थोड़ी कमज़ोर बनेंगी तो कुछ बहुत उम्दा भी बनेंगी। सिनेमा की यह समानांतर संस्कृति जिंदाबाद रहनी चाहिए।

Saturday, 8 September 2018

वक्त काटने की चीज़ नहीं है सिनेमा

हम कल रिलीज़ हुई फिल्म गली गुलियाँदेखने गये थे। इस फर्स्ट डे फर्स्ट शो में हम दो लोगों के अलावा छः और लोग थे, यानी लगभग डेढ़ सौ लोगों की क्षमता वाले हॉल में लगभग 140 सीटें खाली थीं। इस तरह का अनुभव पहली बार नहीं हुआ है। हैदराबाद के सिनेमा घरों में इससे पहले भी हमने कुछ ऐसी फिल्में देखी हैं, जिन्हें देखने के लिए इससे भी कम लोग पहुँचे थे, और इससे भी अधिक सीटें खाली थीं। लेकिन कल पहली बार मुझे मल्टिप्लैक्स कर्मचारियों के एक अजीब किस्म के अनुरोध का सामना करना पड़ा। हुआ यह कि जब फिल्म 25-30 मिनट बीत चुकी थी, और हम उससे पूरी तरह जुड़ चुके थे, तब कुछ कर्मचारी हमारे पास आए और उनमें से एक ने कहा : ‘Ma’am because very few people watching this movie, so can you shuffle to any other movie?' यह सुनकर मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, क्यूंकि मैंने कभी इस तरह के किसी प्रस्ताव की कल्पना तक नहीं की थी। खैर मैंने उससे दृढ़तापूर्वक कहा : No! thank you. We have paid and come for this movie. शुक्र था कि उसने मुझ ही से पूछ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और हॉल में बैठे बाकी लोगों से यही सवाल पूछने की उसकी हिम्मत नही हुई या उसने ज़हमत नहीं उठाई। जो लोग फिल्में पसंद करके व प्लान करके देखने जाते हैं, वे इस तरह के प्रस्ताव भर को अपनी तौहीन समझ बैठें तो कुछ ग़लत नहीं होगा।
मुझे लगता है कि आज भी इस सोच से बहुत सारे फिल्मकार, सिनेमा हॉल वाले और ख़ुद कई दर्शकभी इत्तेफाक रखते हैं कि फिल्में समय काटने का माध्यम भर हैं, यानी आँखों के आगे किसी कहानी पर फिल्माए गये ठीक-ठाक सीन चलते रहें और कानों तक समझ में आने वाले डायलॉग पहुँचते रहें तो वक्त कट ही जाएगा! जबकि हक़ीकत यह है कि सिनेमा का असली दर्शक वक्त काटने नहीं, वक्त निकालकर सिनेमा देखने पहुँचता है।
अब फिल्म पर आती हूँ गली गुलियाँका ट्रेलर पिछले हफ्ते ही देखा था। ट्रेलर देखकर फिल्म देखने की इच्छा हुई, दूसरा कारण यह रहा कि फिल्म में मनोज वाजपेयी, रणवीर शौरी और नीरज कबी जैसे अक्सर पसंद किये जाने वाले अभिनेता हैं। फिल्म बाल उत्पीड़न और बाल मनोविज्ञान की कोमल से लेकर विस्फ़ोटक जटिलताओं तक को उभार पाने में सफल हुई है, लेकिन इसमें कुछ कमजोर कड़ियाँ भी हैं, और यह मुझे किसी साधारण फिल्म से बेहतर श्रेणी की फिल्म नहीं लगी। फिल्म का अभिनय पक्ष भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इस फिल्म में मनोज वाजपेयी के अभिनय की नाहक ही अधिक तारीफ हो रही है, वे इससे बहुत बेहतर काम कर सकते थे। अभिनय की तारीफ करनी हो तो अपेक्षाकृत कम चर्चित शहाना गोस्वामी के अभिनय की तारीफ होनी चाहिए। मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक नीरज कबी ने नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई सेक्रेड गेम्समें अपने अभिनय से मुझे निराश किया था, लेकिन गली गुलियाँमें उन्होंने निराश नहीं किया है। इसके अलावा रणवीर शौरी के हिस्से जितनी भूमिका आयी है, उन्होंने भी उसे अच्छे से निभाया है।

Thursday, 30 August 2018

शैलेन्द्र और गुलज़ार

शैलेन्द्र गीतकार तो थे लेकिन फिल्मों के लिए नहीं लिखना चाहते थे। राजकपूर का आग्रह और उनकी आर्थिक परेशानियाँ उन्हें फिल्मों में खींच लायीं। गुलज़ार कविताएँ लिखते थे, गीत लिखते थे लेकिन फिल्मों के लिए लिखने के बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। वे खुद कहते हैं कि एक तरह से ज़बरदस्ती शैलेन्द्र उन्हें इस काम में ले आये। जिस तरह राजकपूर ने शैलेन्द्र को अवसर देकर हिंदी सिनेमा को एक बेहद उम्दा गीतकार उपलब्ध करवाया, उसी तरह खुद शैलेन्द्र ने गुलज़ार के रूप में हिंदी सिनेमा से एक ऐसे प्रतिभावान रचनाकार को जोड़ा जो सिनेमा के कई कालखंडों के लोकप्रिय गीतकार हैं और हर पीढ़ी उन्हें अपने अनुकूल पाती है।
शैलेन्द्र की उपलब्धियों में से इसे भी एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना या अवसर उपलब्ध करवाने में मदद करना भी एक ज़रूरी रचनात्मक कर्तव्य होता है, शैलेन्द्र ने इसी का निर्वाह किया था। आज शैलेन्द्र का जन्मदिन है उन्हें नमन।

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Tuesday, 10 July 2018

**** हिन्दी सिनेमा में हाशिये की यौनिकता ****

हाशिये की लैंगिक पहचान या हाशिये की यौनिकता को फिल्मों का विषय बनाने वाली फिल्में अभी खुद सिनेमा के हाशिये पर हैं। इसके बावजूद ये फ़िल्में समाज की मानसिकता में हो रहे बदलावों को दिखाने और बदलावों के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी भाषा से इतर विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी इस तरह की उल्लेखनीय फिल्में बनाई जा रही हैं।
बया (अप्रैल-जून-2018) 
संपादक- गौरीनाथ
हिंदी सिनेमा में हाशिये का समाज : 1(विशेषांक) 
अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन- II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।