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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Thursday, 6 February 2020

लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन


एम.ए. के दिनों में पढ़ा था उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी'। तब इसने चमत्कृत किया था। जुदा कथ्य, सहज-सरल-प्रवाहमयी भाषा और बेहद प्रभावित करने वाला शिल्प। इसके लेखक थे- कृष्ण बलदेव वैद। उन्होंने विभिन्न गद्य विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है और हिन्दी साहित्य जगत में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही है। साथ ही वे हिन्दी के उन लेखकों की परंपरा से भी थे; जिनकी पढ़ाई-लिखाई और आजीविका की भाषा अंग्रेज़ी थी, लेकिन जिन्होंने लेखन के लिए हिन्दी को अपना माध्यम चुना। आज उनका निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Monday, 18 November 2019

डॉ. फ़िरोज़ की नियुक्ति का विरोध और जगन्नाथ-लवंगी प्रसंग


बीएचयू में संस्कृत के सहायक प्राध्यापक के रूप में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों में से कुछ छात्रों के विचार एक न्यूज़ चैनल की वीडियो फुटेज के माध्यम से जानने को मिले। अधिकांश छात्रों ने बताया कि वे काशी की परंपरा और गरिमा को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोई विधर्मी और अनार्य उन्हें धर्म पढ़ाए-सिखाए ये उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने पक्ष को अधिक मजबूती से पेश करने के लिए एक छात्र ने पंडितराज जगन्नाथ से जुड़े प्रसंग का ज़िक्र करते हुए कहा कि आचार्य जगन्नाथ भले ही बहुत प्रतिष्ठित विद्वान और धर्मज्ञ रहे हों, लेकिन काशी के समाज ने उनका भी इसलिए बहिष्कार कर दिया था; क्योंकि उन्होंने एक यवन (मुसलमान) कन्या से शादी की थी। अफसोस है कि उस छात्र ने इस प्रसंग का अधूरा ज़िक्र किया!
लोगों के बीच यह प्रसंग जिस रूप में सुरक्षित है, वास्तव में वह आत्मा की गांठे खोल देने वाला है। कहते हैं कि पंडितराज जगन्नाथ का लवंगी नाम की जिस लड़की से प्रेम हुआ था, वह शाहजहाँ के परिवार में पली-बढ़ी एक अनाथ कन्या थी। उसके माता-पिता मुसलमान थे।
लवंगी से विवाह के बाद आचार्य जगन्नाथ काशी लौटे। काशी के विद्वानों ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया, उनका बहिष्कार कर दिया और स्थिति यह हो गई कि एक बेहद योग्य और विद्वान व्यक्ति का जीवन-यापन तक दूभर हो गया। ऐसी स्थिति में बहुत क्षुब्ध होकर पंडितराज ने कहा कि काशी के पंडित उनका बहिष्कार करने वाले कोई नहीं होते; काशी के द्वारा उन्हें और उनके विवाह को स्वीकारने-अस्वीकारने का निर्णय सिर्फ माँ गंगा कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि काशी का समाज गंगा तट पर आकर खुद अपनी आँखों से देख सकता है कि माँ गंगा उन्हें ठुकराती हैं या स्वीकारती हैं।
तय तिथि को नियत घाट पर काशी निवासियों की पूरी भीड़ जमा हो गई। लवंगी के साथ पंडितराज जगन्नाथ भी घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठ गए। इसके बाद पंडितराज ने गंगा की स्तुति में श्लोक लिखने शुरू किए। कहा जाता है कि उनके एक-एक श्लोक रचने और पढ़ने के साथ गंगा का जल स्तर भी एक-एक सीढ़ी ऊपर आता जाता। इस तरह उन्होंने कुल 52 श्लोकों की रचना की और गंगा का जल उस अंतिम बावनवी सीढ़ी तक पहुँच गया जहाँ पंडितराज और लवंगी बैठे हुए थे। अपने आह्वान पर गंगा के उन तक पहुँचने पर पंडितराज भाव विह्वल हो गए और उनका गला रूंध गया। रूंधे गले से उन्होंने प्रार्थना की कि माँ गंगे उन्हें और लवंगी को स्वीकार कर अपनी शरण में लें। तब पूरी भीड़ के बीच से गंगा ने दोनों को इस तरह से समेटा जैसे कोई माँ अपने बच्चों को गोद में उठा रही हो। इसके बाद कुछ क्षणों में ही गंगा का जलस्तर सामन्य हो गया।
यह प्रसंग धर्म सम्प्रदाय के कृत्रिम कट्टर विभाजन को नकार कर मनुष्य की गरिमा को स्थापित करता है। कहा जा सकता है कि मनुष्यता को स्थापित करने के लिए जगन्नाथ और लवंगी ने अपना बलिदान दिया था!
लेकिन कहते हैं कि काशी के कट्टर विद्वान समाज पर इस बलिदान का भी कोई विशेष असर नहीं पड़ा था। डॉ.फिरोज की नियुक्ति का विरोध करते हुए एक छात्र द्वारा पंडितराज जगन्नाथ के प्रसंग का अधूरा जिक्र; इसी बात को साबित करता है कि वह कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी कायम है!!

Tuesday, 26 March 2019

नहीं रहीं 'आपहुदरी' रमणिका गुप्ता


अभी आ रही खबरों से पता चला कि रमणिका गुप्ता नहीं रहीं। रमणिका जी ने जिस तरह का जीवन जीया वह बने बनाए खांचे का जीवन नहीं था। वे एक बेहद मजबूत एक्टिविस्ट और नेता थीं, जिन्होंने वंचितों और मज़दूरों के हक में आवाज़ उठाई और लगातार संघर्ष किया। झारखंड के कोयला खादान मजदूरों और आदिवासियों के हकों के लिए किये गए उनके काम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
रमणिका जी प्रखर लेखिका भी थीं और हिन्दी में 'युद्धरत आम आदमी' पत्रिका का लम्बे अरसे से संपादन करती आ रही थीं। रमणिका गुप्ता की मातृभाषा पंजाबी थी इसीलिए उन्होंने इस भाषा के शब्द 'आपहुदरी' को अपनी आत्मकथा का शीर्षक बनाया। आपहुदरी का अर्थ होता है 'अपने मन की करने वाली'। रमणिका जी ने इस शब्द के माध्यम से खुद को सही ही परिभाषित किया है। चूंकि वे स्वतंत्र प्रकृति की महिला थीं और निर्भीक थीं, इसलिए जैसा कि होता है, उनके ऊपर खूब कीचड़ भी उछाला गया लेकिन जिसने ठान लिया हो उसे इन सब चीज़ों से फर्क नहीं पड़ता! उन्हें अलविदा और श्रद्धांजलि।

Wednesday, 20 February 2019

नामवर सिंह का निधन

हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह जितने दशकों तक सक्रिय और प्रभावी रहे वह आश्चर्यचकित करता है! एक प्राध्यापक के बतौर भी उनकी जो प्रतिष्ठा रही है वह भी किसी अन्य अध्यापक के लिए रश्क का विषय हो सकती है। हिन्दी में बिरले ही ऐसे प्रोफेसर होंगे जो इतनी तैयारी और विशेषज्ञता के साथ क्लासरूम में आते हों कि उनके बोलकर पढ़ाए गए लगभग हर शब्द को किताब की शक्ल में ढाला जा सके! 
इस विद्वता और प्रतिष्ठा के अलावा नामवर सिंह का एक पक्ष हिन्दी विभाग की अकादमिक राजनीति से भी जुड़ता है।‌‌‌‌‌ हमने जब से विश्वविद्यालयों में पढ़ना शुरू किया, इसे किंवदंतियों की तरह सुनते रहे कि एक लम्बे दौर तक नामवर सिंह देशभर के विश्वविद्यालयों में होने वाली नियुक्तियों को प्रभावित करते रहे थे, इसलिए उनसे उपकृत लोगों की लम्बी सूची है तो निश्चित रूप से तिरस्कृत लोगों की भी लम्बी सूची होगी! दुखद रूप से उपकार और तिरस्कार का यह सिलसिला नियुक्ति प्रक्रियाओं में आज भी बदस्तूर जारी है। नामवर सिंह को याद करते हुए लोगों को यह पहलू भी याद आना ही चाहिए।
एक लम्बी ज़िन्दगी उन्हें मिली और सबसे बड़ी बात कि अंतिम कुछ दिनों को छोड़कर वे लगभग इस पूरी अवधि में स्वस्थ और सक्रिय रहे। वे कुछ दिनों से बीमार थे। आज सुबह ही यह खबर पढ़ी की कल रात उनका निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि!

Friday, 25 January 2019

नहीं रहीं कृष्णा सोबती

मुझे लगता है कि पंजाबी समाज और उसके लोक व्यवहार को उतना मैंने अपने अनुभवों से नहीं जाना, जितना कृष्णा सोबती के उपन्यासों से जानने का मौका मिला।
कृष्णा जी एक भरपूर और सार्थक ज़िन्दगी जी कर आज विदा हुईं। जीवन के आखिरी दिनों तक उनके जैसी सक्रियताप्रतिरोधी मुखरता और ज़िंदादिली कम लोगों को मिलती है।कृष्णा सोबती एक श्रेष्ठ रचनाकार के बतौर ही नहीं एक शानदार व्यक्तित्व के तौर पर भी याद रखी जाएंगी। विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 22 December 2018

"ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, यह तो सिर्फ किताब है"

ग्रैजुएशन के दिनों में जब मैं लाइब्रेरी में किसी किताब को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते परेशान हो जाती थी और अपनी यह परेशानी लाइब्रेरियन को जाकर बताती थी तो वे किताब ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मेरे साथ किताबों के रैक तक आते थे और किताब ढूंढ़ते हुए अक्सर हर बार कहा करते थे कि 'अरे ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, ये तो सिर्फ किताब है।' और कुछ देर बाद वह किताब मिल ही जाती थी।
इस मामले में मैं खुद को बहुत हद तक खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अक्सर लाइब्रेरियों में वो सामग्रियां भी बड़ी सहजता से मिल जाती हैं, जो साधारणतया लोगों की नज़रों से चूक जाती हैं और कई बार तो लाइब्रेरी के केटलॉग में भी शामिल नहीं होतीं! लेकिन अब भी कभी-कभी कुछ सामग्रियां ढूंढ़ते हुए बहुत परेशान हो जाती हूं और कई बार तो निराश भी! लेकिन जब-जब ऐसी स्थिति होती है तो मुझे लाइब्रेरियन सर की कहीं हुई वहीं बात याद आ जाती है कि 'ढूंढ़ने से तो...' और इसे इत्तेफाक ही कहूंगी कि इसके बाद जब मैं फिर से ढूंढ़ने के काम में जुटती हूं, तो अक्सर मुझे इच्छित सामग्री मिल ही जाती है!

Tuesday, 20 November 2018

कई कसौटियों पर खरी उतरती है 'मोहल्ला अस्सी'


'पीहू' की कमाई की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' का पिछड़ना इस बात का संकेत नहीं है कि 'मोहल्ला अस्सी' पसंद नहीं की जा रही। दरअसल इसका उल्टा है, सारा खेल प्रमोशंस का है। 'पीहू' के प्रमोशंस और प्रमोशनल स्टंट्स की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' के प्रमोशंस आपको दिखेंगे ही नहीं होंगे! आखिर कब तक प्रमोशंस फिल्म को चलाएंगे! कम से कम फिल्म रिलीज़ के शुरुआती तीन दिनों तक तो हम प्रमोशंस के धोखे से लूटे ही जा सकते हैं!
'मोहल्ला अस्सी' के फिल्मांकन का सूक्ष्म से सूक्ष्म अन्वेषण भी आपको निराश नहीं करेगा। धर्मनाथ पांडे की ग़रीबी आपको उनके साफ-सुथरे कुर्ते में नहीं बल्कि उसके टूटे हुए बटनों में दिखेगी! इसी तरह उनकी पत्नी सावित्री को उनकी दोहराई जाने वाली मामूली किस्म की साड़ियों में देखेंगे। पप्पू की दुकान पर कुल्हड़ में मिलने वाली चाय दौर बदलने पर कांच के गिलास में मिलने लगती है! यही नहीं फिल्म के बैकग्राउंड में बजने वाले श्लोक, अध्यापकीय व्याख्या के लिए लिए गए श्लोक, रामचरितमानस की चौपाइयां और कई बार बहुत साधारण से लगने वाले संवाद भी गूढ़ और व्यापक अर्थों को व्यंजित करते हैं, अगर इन्हें समझा जा सके। बहरहाल कहने को ऐसी बहुत सी बातें हैं लेकिन इन्हें किसी और से सुनने की बजाय खुद देखकर ज़्यादा अच्छे से महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म के कैमरामैन विजय अरोड़ा के काम की तारीफ इस रूप में भी हो रही है कि उन्होंने बनारस या अस्सी को बहुत ही जीवंत रूप से उतारा है।
कुछ लोगों को इस फिल्म का कई-कई पहलुओं को छूना इसकी कमज़ोरी लग रही है, लेकिन वास्तव में यह इस फिल्म की खासियत है कि वो बहुत सारे पहलुओं को सफलतापूर्वक समेट पाती है और एक के बाद एक आने वाले दृश्य कहीं से असंगत नहीं लगते। हां ये ज़रूर है कि इन सभी पहलुओं को समझने के लिए आपके पास देश, समाज, इतिहास, राजनीति, धर्म आदि की बुनियादी जानकारी का होना ज़रूरी है।
साहित्य और सिनेमा की विद्यार्थी होने के नाते मेरी दिलचस्पी जिस बात में सबसे अधिक रही मैं अब उस पर आती हूं। मूल उपन्यास के लेखक काशीनाथ सिंह ने फिल्म देखने के बाद यह प्रतिक्रिया दी है कि फिल्मकार ने मूल कथानक के साथ बिना कोई तोड़-मरोड़ किए एक उम्दा फिल्म बनाई है जो उनके उपन्यास से भी अधिक जीवंत है।

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Monday, 23 April 2018

ताकि किताबों की संस्कृति बची रहे

पाठ्यक्रम की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में थी, तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के लिए मिल जाती थी।
लेकिन वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्र नाम का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा, शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो, मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक, मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये, तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की किताब वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना, उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!

Friday, 6 April 2018

हैदराबाद विश्वविद्यालय में तकनीकी शब्दावली के महत्त्व पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

हैदराबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के विकास में हिंदी की भूमिका एवं तकनीकी शब्दावली का महत्त्वविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज समापन हुआ। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इस तरह के विषय थोड़े बोझिल होते हैं लेकिन लगातार हुई चर्चा-परिचर्चा को सुनने और उसमें अपनी भागीदारी निभाने के बाद हमें लगा कि यह विषय महत्वपूर्ण है, और इस पर, खासतौर पर तकनीकी शब्दावली के विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त चर्चा-परिचर्चा की आवश्यकता है।
अकादमिक संगोष्ठियों में जिस तरह की लूटमार और ठगी मची रहती है, यदि आप उसके अपवाद की बात करना चाहें तो हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में होने वाले सेमिनारों का ज़िक्र कर सकते हैं। अब तक मैंने अपने विभाग में हुई जितनी संगोष्ठियों को देखा है, उनमें कभी रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं वसूला जाता और न मैंने कभी किसी को यह शिकायत करते सुना है कि उन्हें प्रपत्र प्रस्तुत करने का मौका नहीं दिया गया। सेमिनार के प्रमाणपत्र चूँकि अकादमिक महत्त्व के होते हैं इसलिए मुख्य सत्रों के समानांतर सत्र चलाकर भी शोधार्थियों को प्रमाणपत्र हासिल करने के अवसर दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त दो दिनों तक लगातार चाय-नाश्ता, और सादगी से बना खाना-पीना जो कुछ भी होता है, वह सभी वक्ताओं, श्रोताओं, कर्मचारियों, मजदूरों और यहाँ तक कि उस समय पहुँच गये किसी भी आगंतुक के लिए मुफ्त उपलब्ध रहता है।
लेकिन इस बार का सेमिनार और भी कई मायनों में ख़ास रहा। मेरी जानकारी में यहाँ पहली बार शोधार्थियों को समानांतर सत्र की बजाय मुख्य सत्र में अन्य विद्वानों के साथ प्रपत्र प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया और उन्हें भी बहुत महत्त्व के साथ सुना और सराहा गया। इस बार इस कार्यक्रम का पूरा खर्चा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोगने उठाया था और मेरे खयाल से इसका पूरा सदुपयोग हमारे विभाग ने किया। इस बार हम लोगों के लिए एक सरप्राइज भी था और वह यह कि शब्दावली आयोग ने समस्त शोधार्थियों और प्रतिभागियों के लिए एक किट भिजवायी थी जिसमें एक सुन्दर सा लैपटॉप बैग, कुछ किताबें और एक नोटबुक थी। बाकी जगहों के जो मेरे अनुभव हैं और जितनी मेरी जानकारी है कि बिना दो सौ-पाँच सौ-हजार वसूले तो एक मामूली सा फोल्डर भी कहीं नहीं दिया जाता। हिंदी विभाग ने शब्दावली आयोग के साथ तालमेल बिठाकर निस्संदेह एक अच्छा और उपयोगी आयोजन किया है। वे सभी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष रूप से भी इस संगोष्ठी को सफल बनाने में दिन-रात मेहनत की।

Wednesday, 14 March 2018

स्टीफन हॉकिंग के निधन पर

पाठ्यक्रम के एक विषय के रूप में विज्ञान भले ही अक्सर सर से ऊपर गया हो और अक्सर एक्ज़ाम में इसने रूलाया हो, लेकिन बावजूद इसके इस विषय के प्रति एक आकर्षण रहा है। न्यूटन का गिरते हुए सेब को देखकर 'लॉ ऑफ ग्रेविटी' का सिद्धांत प्रतिपादित करना हो, या डार्विन के 'बायलॉजिकल इवॉल्यूशन' का सिद्धांत हो या आइंस्टीन का 'थियरी ऑफ रिलेटिविटी! इस तरह के सिद्धातों ने दुनिया के विकास में लोगों की सोच को सही दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है।
स्टीफन हॉकिंग एक ऐसे ही भौतिकविद रहे हैं, जिन्होंने ब्रहाण्ड को समझने में हमारी खासी मदद की है और इसकी उलझी हुई गुत्थी के कई सिरों को सुलझाने का ताउम्र प्रयास करते रहे हैं।
हॉकिंग दुनियाभर के लिए इसलिए भी प्रेरणास्रोत रहे हैं कि अपनी बहुत अधिक शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वो सब कर दिखाया जो शारीरिक रूप से सक्षम वैज्ञानिकों के लिए भी आदर्श है। 21 साल की उम्र में उन्हें मोटर न्यूरॉन बीमारी ने जकड़ लिया। इसके बाद धीरे-धीरे उनके शरीर के अधिकांश हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया था। इस भयंकर चुनौती के बावजूद वे विज्ञान की उन्नति और मनुष्य की बेहतरी के लिए काम करते रहे। उनका व्यक्तित्व हर किसी के लिए आकर्षण और आश्चर्य का विषय रहा है।
वे कहा करते थे कि मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है। मुझे अभी बहुत काम करना है। इसी जिजीविषा के सहारे वे मोटर न्यूराॅन जैसी जानलेवा बीमारी को दशकों तक मात देते रहे। स्टीफन हाॅकिग की किताब 'द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' मैंने नहीं पढ़ी है, लेकिन कहा जाता है कि इसमें बिगबैंग थियरी और ब्लैक होल के सिद्धांत को इतनी सरलता से समझाया है कि यह दुनिया में सर्वाधिक बिकने वाली लोकप्रिय किताबों में शुमार है।
76 साल की उम्र में आज उन्होंने इस दुनिया को अलविदा भले ही कह दिया हो, लेकिन अपने योगदान के माध्यम से वे हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Sunday, 14 January 2018

‘1084वें की माँ’ की माँ

इस बात का ज़िक्र मैंने पहले भी एक लेख में किया है कि गोविन्द निहलानी निर्देशित हज़ार चौरासी की माँमैंने पहले देखी और महाश्वेता देवी के जिस मूल बांगला उपन्यास पर यह फिल्म आधारित है, उसका हिंदी अनुवाद ‘1084वें की माँ’ मैंने बाद में पढ़ा। यह फिल्म रूपांतरण इतना संतोषप्रद है कि इस फिल्म को देख लेने के बाद मूल साहित्यिक कृति को पढ़ने की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं होती! लेकिन मूल उपन्यास पढ़ लेने के बाद, इसके सिनेमाई रुपांतरण को नये सिरे से समझने का अधिक अवसर मिल सकता है। महाश्वेता देवी का लेखन इतना उम्दा और प्रभावशाली है, कि उनका यह उपन्यास अपने आप में एक सिनेमा है। इसलिए मुझे लगता है कि फिल्म के रूप में इसकी परिकल्पना करते हुए गोविन्द निहलानी को बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी।
महाश्वेता देवी के इस उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की केन्द्रीय संवेदना यह है कि समाज की विषमताओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान देने वाले एक पात्र की माँ उसके बलिदान के कारणों और महत्त्व को समझने की कोशिश करती है और जब वह इसे समझ लेती है, तब वह इन्हें मूल्य के बतौर आत्मसात करने की कोशिश भी करती है। यह इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि पुत्र के इस बलिदान को उसके अभिजात्य पिता और अन्य सम्बन्धियों सहित पूरा का पूरा बुर्जुवा समाज न सिर्फ ख़ारिज करता है, बल्कि उसके वजूद को भी मिटा देना चाहता है! इन प्रपंचों को समझ लेने के बाद माँ को अपने ही रक्त सम्बन्धियों और अपने ही अभिजात्य समाज से घृणा होने लगती है। उपन्यास के लगभग अंतिम हिस्से में घर में चल रही एक पार्टी में शराब में डूबे, झूमते-नाचते, बौद्धिकता और प्रतिबद्धता की दिखावटी बहसों में शामिल लोगों को देखकर उसे बहुत गहरी बेचैनी और वेदना होती है और उन क्षणों में वह सोचती है- “धरती की सब कविता, कविता के बिम्ब, लाल गुलाब के गुच्छे, हरी घास, नियॉन की रोशनी, माँ के चेहरे पर फैली हंसी, शिशु का क्रंदन....हमेशा अनंत काल तक इन सबका भोग करती रहेंगी ये लाशें! अपने सड़े गले-गँधाते अस्तित्व के लिए धरती के हर सौन्दर्य और माधुर्य को हथियाए रहेंगी, क्या इसीलिए व्रती मर गया? सिर्फ इसलिए?”
महाश्वेता देवी खुद एक एक्टिविस्ट लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। सिर्फ अपने लेखन से ही नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर प्रविरोध के मोर्चों पर डट जाना उनका स्वाभाव था। महाश्वेता देवी की वाम प्रतिबद्धता जगजाहिर रही है, लेकिन जब बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के रहते हुए सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जनविरोधी घटनाएँ हुईं तब वे सरकार की नीतियों के सबसे मुखर आलोचकों और सत्याग्रहियों में शामिल रहीं।
मेरे ख़याल से उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की प्रेरणा महाश्वेता देवी की वही पक्षधरता रही है, जो उनके उपन्यास के पात्र व्रती की है और इस उपन्यास के इतने प्रभावी होने का एक बड़ा कारण भी यही है कि महाश्वेता के खुद के विचारों और आचरण में कोई दोहरापन नहीं था। चूँकि महाश्वेता देवी इस उपन्यास की सर्जक हैं, इसलिए उन्हें 1084वें  की माँ की माँ भी कह सकते हैं। उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहे लगभग डेढ़ वर्ष हो गये हैं, यदि वे जीवित होतीं तो आज जीवन के 93वें वर्ष में प्रवेश करतीं। जनपक्षधरता के प्रति समर्पित इस सशक्त लेखिका को उनके जन्मदिन पर सलाम।

Saturday, 30 December 2017

नयी पीढ़ी तक दुष्यंत

दुष्यंत कुमार (01.09.1933 से 30.12.1975)

फिल्म मसानमें दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल की कुछ पंक्तियों के साथ प्रयोग करके जब वरुण ग्रोवर ने एक सुन्दर गीत बनाया, तब स्वाभाविक रूप से इस गीत के साथ जगह-जगह दुष्यंत कुमार का ज़िक्र भी हुआ। हो सकता है कि बिल्कुल नयी पीढ़ी के कई लोगों को इससे यह जानने का अवसर मिला हो कि ‘एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ / तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ’ जैसी खूबसूरत पंक्तियाँ दुष्यंत कुमार की कलम से निकली हैं। 
हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं है कि इस ज़िक्र के बिना भी देर-सवेर दुष्यंत के लिखे शेर हिन्दी बोलने, समझने और लिखने वाली नयी पीढ़ी तक पहुँच ही जाते। इस बात की तसल्ली करनी हो तो कहीं स्कूली बच्चों या कॉलेज के नव युवाओं के लिए रखे गये भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगितायों में कभी पहुँचिये। वहाँ तय किये गए विषय भले कुछ भी हों, इस बात की भरपूर संभावना है कि आप को वहाँ दुष्यंत के शेर सुनने को ज़रूर मिल जाएँगे। दुष्यंत की ग़जलों की यह ख़ासियत है कि यह सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों से हमेशा नये लगते हैं। दुर्भाग्य का ज़िक्र इसलिए कि जिन परिस्थितिथियों ने दुष्यंत को व्यथित किया वे सौगात के बतौर न जाने हम सब को कब तक मिलती रहेंगी।! पीर के पर्वत हो जाने का यह सिलसिला न जाने कब थमेगा!
दुष्यंत के शेर विकट परिस्थितियों से जूझने का जज़्बा देते हैं। वे पीर के पर्वत को पिघलाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं, बुनियाद के हिलाए जाने की ज़रूरत पर जोर देते हैं, वे आकाश के तारों के बजाय घर के अंधेरों पर ध्यान देने की बात करते हैं, वे अपने बाजुओं पर भरोसा करने की ज़रूरत पर इस तरह बल देते हैं कि कट चुके हाथों में तलवारें देखना खुद को भ्रम में रखने के अलावा कुछ भी नहीं है। दुष्यंत असंभव को इस तरह नकारते हैं कि तबीयत से उछाला गया पत्थर आसमां में भी सुराख कर सकता है, और भी बहुत कुछ!
दुष्यंत की गज़लों के संकलन साये में धूपसे जब आप गुज़रेंगे, तब आपको महसूस होगा कि इस पतली सी किताब में शायद ही ऐसा कुछ हो, जो छूट गया हो! इसलिए कहा जाता है कि देश की सभी भाषाओं को बरतने वाले लोग चाहते हैं कि उनका भी अपना एक दुष्यंत हो!
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1 जनवरी 2018 को 'यूथ की आवाज़' (YKA) पर भी प्रकाशित 

Saturday, 9 September 2017

वे गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहते थे!

एम.ए के दिनों में पाश (09 सितम्बर 1950 - 23 मार्च 1988) से परिचय हुआ था, उनकी कुछ कविताएँ हिन्दी में पढ़ी सुनी, लेकिन उन्हें जब गंभीरता से पढ़ना चाहा तब पता चला कि वे पंजाबी भाषा के कवि हैं। (यह मेरे लिए फक्र करने की बात थी!)
हिन्दी में उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा ही नहीं था, कि अनूदित कविताएँ पढ़ रही हूँ! बल्कि इसके विपरीत जब उन्हें पंजाबी में पढ़ने की कोशिश करती हूँ, तो वे कविताएँ मुझे अनूदित लगती हैं।
मुझे लगता है, एक सच्चे, जुझारू और ईमानदार व्यक्ति की रचनाएँ जिस भाषा में भी अनूदित कर दी जाएँ, वह उसी भाषा की लगने लगती हैं। यह संयोग था कि मैंने पाश को पहले हिन्दी में पढ़ा! निसंदेह इसमें एक बड़ी भूमिका चमनलाल सहित उन सभी अनुवादकों की भी है, जिन्होंने बड़े मनोयोग से पाश की कविताओं का अनुवाद कर उन्हें हिंदी पाठकों के समक्ष रखा।
पाश यदि जीवित होते तो आज अपने जीवन के 68वें साल में प्रवेश करते। वे बेशक एक लम्बा जीवन नहीं जी सके, लेकिन उन्होंने एक बड़ा जीवन जिया! इसलिए तो वे हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं। 

पाश की कविता अब विदा लेता हूँ’ (अनूदित) से कुछ अंश 
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"धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूँज जाना-
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया"
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"सब भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना।"

#PASH #BIRTHDAY #23MARCH #PUNJABI KAVI #CHAMANLAL

Friday, 28 July 2017

हज़ार चौरासी की माँ

‘हज़ार चौरासी की माँ’ मेरी अब तक देखी गयी साहित्य आधारित कुछ बेहतरीन फिल्मों में से एक है। यह फिल्म मैंने बहुत पहले देख ली थी, और उससे इतनी अधिक प्रभावित हुई, कि बाद में भी कई बार देखती रही हूँ। इसे बार-बार देखने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है, यह इसे देखने के बाद ही जाना जा सकता है। 
महाश्वेता देवी के लिखे मूल बांग्ला उपन्यास का हिन्दी अनुवाद बहुत बाद में, बल्कि हाल ही में पढ़ पायी हूँ। उपन्यास को इतनी देर से पढ़ने का एक कारण यह भी था कि फिल्म देख लेने के बाद, इतना संतोष मिला था कि इसकी बहुत ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी। अब उपन्यास पढ़ लेने के बाद, मुझे इसके सिनेमाई रुपांतरण को नये सिरे से समझने का अधिक अवसर मिला है।
मेरे खयाल से महाश्वेता देवी (जिन्हें मूल कथानक की लेखिका होने के कारण मैं 'हज़ार चौरासिवें की माँ' की माँ भी कहती हूँ) का लेखन इतना उम्दा और प्रभाशाली है, कि उनका यह उपन्यास अपने आप में एक सिनेमा भी है। इसलिए मुझे लगता है कि सिनेमा के रूप में इसकी परिकल्पना करते हुए गोविन्द निहलानी को बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी फिल्म को देखने और इसकी आधार साहित्यिक कृति को पढ़ने के बाद यह लगे कि फिल्म और मूल कृति एकाकार हो गये हों। उपन्यास के पात्रों की मन:स्थिति, उनके हाव-भाव, स्थिति विशेष में उनकी क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ सभी को फिल्म निर्देशक गोविन्द निहलानी ने बेहद सूक्ष्मता और गहराई के साथ समझा है, और बहुत ही कुशलता से उनका फिल्मांकन किया है।
अक्सर इस बात की शिकायत की जाती है कि किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाते हुए फिल्मकार उस कृति के साथ अनुचित और अनावश्यक छेड़-छाड़ करते हैं, और इससे मूल कृति की आत्मा ही गायब कर दी जाती है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कई बार फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्में बनाते हुए उनमें कुछ फेर-बदल किये और वे फेर-बदल मूल कृति को और बेहतर बनाकर प्रस्तुत करने वाले साबित हुए। मेरे खयाल से ऐसा तब संभव हुआ जब फिल्मकारों ने मूल कथा के साथ कुछ प्रयोग व्यावसायिक लाभ के दृष्टिकोण से नहीं किये बल्कि फिल्म को अधिक सम्प्रेषणीय  और अधिक प्रभावशाली बनाने के दृष्टिकोण से किये। 
निर्देशक गोविन्द निहलानी ने ‘हजार चौरासवें की माँ’ की मूल कथा के साथ इसी दृष्टिकोण से कुछ रचनात्मक प्रयोग किये हैं। उन्होंने इस फिल्म के अंत को उपन्यास के अंत से थोड़ा अधिक विस्तार दिया है, और यह विस्तार इसे और भी सार्थक बनाता है। यह विस्तार मूल कथा के जुझारू पात्रों के जुझारूपन को विस्तार देता है और नयी परिस्थिति में क्रूर व्यवस्था के खिलाफ उनके संघर्ष को नया आयाम भी प्रदान करता है। यानी यह फिल्म उपन्यास को स्वाभाविक और सकारात्मक विस्तार देती है। साहित्य और सिनेमा के खूबसूरत रिश्तों का यदि कोई उदाहरण देना हो तो निसंकोच 'हज़ार चौरासी की मां' का उल्लेख किया जा सकता है।

Tuesday, 23 May 2017

यादों में माधुरी जी

15 दिसम्बर 1958 को महाराष्ट्र के पुणे में जन्मी माधुरी उमराणीकर ने पुणे विश्विद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई के अतिरिक्त रूसी भाषा में एडवांस्ड डिप्लोमा किया था। मृत्युपर्यंत वे भारत के एक महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा संस्थान बीडीएल, हैदराबाद के रूसी अनुवाद प्रभाग में कार्यरत रहीं। मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी और रूसी भाषाओं पर उनका प्रायः समान अधिकार था। इन भाषाओं की शब्द-संपदा में उनकी विशेष अभिरूचि और विशेषज्ञता थी। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने रूसी भाषा से हिन्दी और मराठी में कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक अनुवाद किये थे। इनमें से कुछ ही उनके जीवनकाल में प्रकाशित हो सके थे।

हैदराबाद में मैथिलीभाषी प्रवासियों की ‘देसिल बयना’ नामक एक संस्था है। हैदराबाद आकर सौरभ इस संस्था से जुड़ गये थे। हमारी शादी के बाद मैं भी अक्सर उनके साथ इस संस्था के कार्यक्रमों में जाने लगी।  माधुरी जी से मेरी पहली भेंट इसी संस्था की एक मासिक गोष्ठी में हुई थी। हम संस्था के अध्यक्ष चन्द्रमोहन कर्ण जी के आवास पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले थे। अपनी व्यस्तताओं और कम अभिरूचि के कारण माधुरी जी संस्था के सामान्य कार्यक्रमों में प्रायः नहीं आती थी। उस दिन का कार्यक्रम इस अर्थ में विशेष था कि कार्यक्रम के बाद कर्ण जी ने सभी सदस्यों और उनके परिजनों के लिए एक छोटा सा भोज भी रखा था। उस दिन संस्था के लगभग सभी सदस्यों से मेरी पहली मुलाकात हो रही थी। सभी ने बहुत स्नेह और अपनेपन से स्वागत किया था। उसी दिन बिना किसी औपचारिक भूमिका के माधुरी जी ने जो कहा, वह मन को छू गया था, उन्होंने कहा- ‘कभी भी माँ की याद आये तो मेरे घर चली आना।’ इस पहली भेंट में ही हमारे बीच एक आत्मीयता स्थापित हो गयी थी।
मेरी ही तरह माधुरी जी की मातृभाषा भी मैथिली नहीं थी। उनकी मातृभाषा मराठी थी। उनके पति मोहन मुरारी झा संस्था के सक्रिय सदस्य हैं। इस तरह माधुरी जी का भी संस्था से जुड़ाव हो ही गया था। उनके आवास पर सम्पन्न हुई एक मासिक गोष्ठी में उनके आत्मीय आतिथ्य की सौरभ आज भी चर्चा करते हैं। उनकी हाज़िर जवाबी, हास्यबोध और स्पष्टवादिता की तारीफ भी उन्हें जानने वाले लगभग सभी लोग करते हैं।
उनके साथ कुछ-कुछ अंतराल पर मेरी कुल तीन मुलाकातें ही हैं। दो मुलाकातें देसिल बयना के कार्यक्रमों में हुईं। तीसरी मुलाकात संस्था की एक सदस्य शारदा झा के एक हिन्दी कविता संकलन के लोकार्पण के अवसर पर हुई थी। यह संकलन क्रियेटिव कैंपस नामक जिस प्रकाशन संस्था से प्रकाशित हुआ था, उसकी स्थापना कुछ दिनों पहले ही माधुरी जी के पति मोहन जी ने की थी। उस दिन उनके पैर में चोट की वजह से सूजन थी फिर भी वह प्रसन्नचित्त थीं। उस दिन बहुत लम्बा समय हमने साथ में बिताया। माधुरी जी डायबिटिक थीं और उन्हें ब्लडप्रेशर से जुड़ी शिकायते भी थीं, इसलिए अपने साथ में दवाईयां लेकर चला करती थीं। उन्होंने मुझसे पूछा- यहाँ कुछ खाने को मिलेगा आसपास? खोजने पर सामने ही छोटी सी कैंटीन दिखाई दे रही थी। मैंने कहा कि यहाँ पूछ लेते हैं, कुछ मिल जाये शायद। उन्होंने वड़ा खाया और अपनी दवाईयाँ ली। मैंने चाय पी। इसी दौरान उन्होंने मुझे कहा कि- ‘संस्था के लोग मुझे बार-बार कहते हैं कि मैं मैथिली में भी कुछ लिखने की कोशिश करूँ। मैं मैथिली समझ तो लेती हूँ लेकिन इस भाषा में लिख पाना संभव नहीं लगता। मैंने उनसे कहा कि आप जिस भाषा में सहज हैं, और जिसमें बेहतर लिख सकती हैं, उसी भाषा में लिखिए।
मुझे याद है कि उस कार्यक्रम में शरीक एक महिला ने जब उनसे मजाक करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद तो आप आराम करेंगी। बेटे की शादी करवा कर फुर्सत से बहु से सेवा करवाएंगी! तब उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया था कि- “मेरे पास इतना समय कहाँ है! रिटायरमेंट के बाद बहुत सारे काम हैं जो मुझे करने हैं,अभी से उन कामों की लिस्ट बनाती जा रही हूँ।” लगभग दो वर्षो के बाद वे अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होने वाली थीं।
वह मुलाकात उनसे मेरी अंतिम मुलाकात थी। कुछ दिनों बाद यह सूचना मिली कि वे गंभीर रूप से बीमार हैं, और एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। हम समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक इतनी गंभीर हालत कैसे हो गयी! पिछली मुलाकात में ही वे इतनी उर्जा से भरी हुई दिखी थीं। पता चला कि अपनी नियमित जाँच के लिए वे खुद ही अपने बेटे के साथ अस्पताल गयी थीं। वहाँ जरूरी समझ कर डाक्टरों ने उन्हें भर्ती होने की सलाह दी। लगभग एक सप्ताह बाद उन्हें स्वस्थ मानकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। लेकिन एक-दो दिन बाद ही उनकी तबियत फिर से बिगड़ गयी। इस कारण से उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। हम उनसे मिलने अस्पताल गये। वे आई.सी.यू में थीं, इसलिए उन्हें देख भी नहीं पाए। उस दिन सिर्फ मोहन जी से मिलकर और हाल-चाल पूछ कर हम लौट आए। इसके बाद हम लगातार मोहन जी से हाल-चाल पूछते रहते थे। कभी उनकी हालत में सुधार की खबर आती तो कभी गिरावट की। मस्तिष्क में रक्त के थक्के जमने और शरीर के विभिन्न अंगों के क्रमशः काम नहीं कर पाने की सूचना डाक्टरों ने दी थी। एक सुविधा और साधन सम्पन्न अस्पताल के विशेषज्ञ डाक्टरों की पूरी टीम बेहतरी के लिए काम कर रही थी। माधुरी जी की जिजीविषा पर भी हमें भरोसा था। लेकिन लगभग दो महीने तक संघर्ष करते रहने के बाद 12 अक्टूबर 2016 को माधुरी जी इस दुनिया से विदा हो गयीं।
यह स्तब्ध करने वाला था। उनसे हुई आखिरी मुलाकात बार-बार याद आ रही थी। कहने को उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था। एकदम नया-नया परिचय था जो एक जुड़ाव में बदल गया था। पारदर्शी रेप्रीजेटर में रखे उनके  पार्थिव शरीर के पास मैं दो-तीन घंटे तक बैठी रही। यह शायद रिक्तता की सत्यता और उसे स्वीकार न कर पाने की बीच की स्थिति थी, या यह शायद सच स्वीकारने की प्रक्रिया का हिस्सा था!!
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माधुरी जी के गुजर जाने के बाद मोहन जी से हमें उनके अप्रकाशित साहित्यिक अनुवाद कार्यों का पता चला। हम सभी की यह इच्छा थी कि उनके ये अनुवाद लोगों के बीच जाएँ। यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि रूसी भाषा के कथा साहित्य के उनके द्वारा किये गये लगभग दर्जन भर हिन्दी अनुवादों में से लेफ़ तल्सतोय की सात अनूदित कहानियों का संकलन इसी महीने (मई’2017) में प्रकाशित हो चुका है। इस संकलन की सातों कहानियों से इसके प्रकाशन के पूर्व ही गुजरने का मुझे अवसर मिला था। हालांकि अपने अनुवादों को दूसरी बार देख सकने का भी अवसर उन्हें ठीक से नहीं मिल सका फिर भी आश्चर्यजनक तौर पर इन अनुवादों में त्रुटियाँ नहीं के बराबर थीं। मोहन जी ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि अनुवाद से पहले किसी मूल रूसी कहानी को वे तब तक कई बार पढ़ती थीं, जब तक वह उन्हें आत्मसात न हो जाए। शायद यही कारण है कि उनके अनुवाद बहुत ही स्तरीय हैं। इन अनुवादों को पढ़ते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि हम अनूदित साहित्य पढ़ रहे हैं। लेफ़ तल्सतोय की जो सात अनूदित कहानियाँ इसमें संकलित हैं वे हैं : (1.) इंसान को कितनी जमीन चाहिए (2.) इंसान किस वज़ह से जिन्दा रहता है (3.) दो बुढ़ऊ (4.) तीन साधु (5.) ईश्वर देखते हैं किन्तु प्रतीक्षा करते हैं (6.) चिंगारी जो घर करो जला दे (7.) कॉकेशस का कैदी।

संभव है इनमें से कुछ कहानियाँ आपने पहले पढ़ी हों लेकिन माधुरी जी के अनुवाद की सजीवता इन्हें पहले के अनुवादों से अलग करती है। ये अनुवाद हमें मूल रूसी कहानियों के निकट ले जाते हैं। मुझे आशा है कि माधुरी जी अपने इस अनुवाद कार्य के माध्यम से हमेशा हिन्दी के पाठकों के बीच रहेंगी। प्रकाशित संकलन में यह सूचना है कि उनके कुछ महत्वपूर्ण मराठी साहित्यिक अनुवाद अभी तक अप्रकाशित हैं। मुझे विश्वास है कि ये अनुवाद भी अपने प्रकाशन के बाद मराठी अनुवाद साहित्य को पर्याप्त समृद्ध करेंगे। 

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Friday, 28 April 2017

******वर्चस्ववादी संस्कृति के विरूद्ध फ़ैज़******

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दुनिया भर के दुख-दर्द को महसूस करने और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से उसका विश्लेषण करने की प्रक्रिया किसी को भी वर्चस्ववादी संस्कृति का प्रबल विरोधी बना देने के लिए पर्याप्त होती   है। वर्चस्व किसी वर्ग का होकिसी समुदाय का होकिसी लिंग का होकिसी देश का अथवा किसी अराजक राजनितिक शक्ति का हो या किसी अन्य तरह का हो हर तरह के वर्चस्व के खिलाफफ़ैज़ अपनी संवेदना और अपने वैज्ञानिक साम्यवादी दृष्टिकोण के कारण प्रतिरोध की समानांतर संस्कृति रच पाने में कामयाब हो पाते हैं।
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