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Friday, 31 July 2020

सद्गति

आज हिन्दी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का 140वाँ जन्मदिन है। मुझे सुबह से बार-बार 'सद्गति' का ध्यान आ रहा है। इस कहानी को हिंदी की चुनिंदा प्रभावी और उम्दा कहानियों में शामिल किया जाता है।

'सद्गति' पर भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध निर्देशक सत्यजीत रे ने 45 मिनट की एक छोटी सी फिल्म बनाई है। जो शुरू से लेकर आखिर तक आपको बांधे रखती है और मात्र 45 मिनटों में उन सारी यंत्रणाओं, उन सारे अत्याचारों का अनुभव आपको करवा देती है; जो हमारे समाज में दलित कही जाने वाली जातियों पर होते रहे हैं। हिन्दी साहित्य पर बने सिनेमा में मैं 'सद्गति' को सबसे बेहतर रूपांतरणों में गिनती हूँ। मेरे खयाल से सभी को यह फिल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। मुझे इस बात का भी पूरा भरोसा है कि जब यह फिल्म बनी थी; उस समय यदि प्रेमचंद जीवित होते तो वे भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। दुर्भाग्य से अपने जीवनकाल में सिनेमा की दुनिया से जुड़े उनके अनुभव कड़वे रहे थे। इतने अधिक की उन्होंने विस्तार से लिखे अपने एक लेख में साहित्य को दूध कहते हुए तत्कालीन सिनेमा को ताड़ी की संज्ञा दे डाली थी!


Monday, 19 March 2018

****हिंदी सिनेमा को सई परांजपे का योगदान****

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सई परांजपे की फिल्मों की रेंज बहुत व्यापक है । उन्होंने कृषकों, मजदूरों, बेरोज़गार युवकों, अकेली स्त्रियों, शारिरिक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों आदि की समस्यायों को अपने सिनेमा में पूरी शिद्धत से उतारा है । सई की बहुत बड़ी खासियत यह है कि उनकी फिल्मों की जान इनके कथातत्व मात्र नहीं हैं, बल्कि बहुत सतर्कता से किया गया दृश्य संयोजन, कैमरे से उतारे गये सरल प्रतीक और इसके पीछे की बेहतर सोच है। सई एक ऐसी फिल्मकार हैं, जिन्होंने पुरूष वर्चस्व के इस क्षेत्र में न सिर्फ अपना एक मुकाम बनाया बल्कि वो हिन्दी सिनेमा को सार्थक दिशा देने वाले और इसकी ऐतिहासिक परंपरा को वास्तव में समृद्ध करने वाले अग्रणी निर्देशकों में से एक हैं ।
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['आजकल' (मार्च-2018 अंक) में प्रकाशित]

Tuesday, 10 October 2017

उमराव जान रेखा

मैं करीब सात-आठ साल की रही होउंगी जब पहली बार टीवी पर ‘उमराव जान’ देखी थी। तब समझ में तो क्या ही आया होगा, लेकिन तब की देखी उस फिल्म की धुंधली स्मृतियाँ आज भी दिमाग में कहीं दर्ज हैं। करुणा की जिस पराकाष्ठा को इस फिल्म में उभारा गया है, उसने उस छोटी सी उम्र में भी मुझे प्रभावित बेहद किया होगा, और शायद इसीलिए आजतक मैंने जितनी भी बार उमराव जान देखी है, हर बार ऐसा लगता है, जैसे कभी अधूरी छूट गयी फिल्म को पूरा देखने बैठी हूँ!
एक तमिल भाषी लड़की जिसने हिंदी भी बेहद प्रयासों के बाद बोलनी सीखी, उसने इस फिल्म में उर्दू बोली है, और न सिर्फ बोली है, बल्कि उसके लखनवी लहज़े और भंगिमाओं को हुबहू उतार पाने में पूरी तरह सफल रही हैं। हिंदी सिनेमा के पास गर्व करने के लिए जो चुनिन्दा फ़िल्में हैं, उनमें ‘उमराव जान’ का नाम भी लिया जाता है। इस फिल्म के निर्देशक मुज्ज़फर अली ने हालांकि कई और फ़िल्में बनाई, लेकिन ‘उमराव जान’ जैसी फिल्म वे दुबारा कभी नहीं बना सके। ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपनी सारी निर्देशन कला इसी फिल्म में झोंक दी हो।
यह फिल्म मुझे इसलिए भी बेहद पसंद है, क्योंकि ये साहित्यिक कृति पर बनी है। उमराव जान’ किसी लेखक की कल्पना का पात्र* है, ये लगता ही नहीं है । हमेशा यही महसूस होता है कि किसी ज़माने में एक उमराव जान रही होगी, उसी की कहानी लेखक ने लिखी है।  हिंदी सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ही ऐसी हैं जो साहित्यिक कृति को बखूबी सिनेमा में उतार सकी हैं। ‘उमराव जान’ इसमें भी एक कदम आगे हैं, क्योंकि ये फिल्म मिर्ज़ा हदी रुसवा के ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास से भी कहीं अधिक प्रभावी है।
इस फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोग उसी शिद्दत से सुनते हैं। ख़य्याम ने इस फिल्म के लिए संगीत दिया था। वे रेखा से इस कदर प्रभावित हैं, कि कहते हैं ‘अगर किसी को उमराव जान को देखना हो तो, वो रेखा को देख ले, क्यूंकि यही उमराव जान हैं’। शहरयार के लिखे गीत और ख़य्याम के संगीत ने इस फिल्म को सम्पूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस फिल्म में अमीर खुसरो के लिखे ‘काहे को ब्याहे बिदेस’ गीत का भी बहुत सार्थक उपयोग किया गया है।
रेखा बेहद ईमानदारी के साथ अपने साक्षात्कारों में ये कहती हैं कि, मैं अपनी निजी ज़िन्दगी में जिस समय जैसे हालातों से गुज़र रही होती हूँ, उसका रिफ्लेक्शन उस समय मेरे निभाए जा रहे किरदारों पर भी पड़ता है। वे बताती हैं कि जिस समय वो ‘उमराव जान’ कर रही थीं, उस समय शायद वे अपने निजी जीवन में कुछ ऐसे ही मिलते-जुलते अनुभवों से गुजर रही थीं, जिनसे उमराव गुजरती हैं। ‘उमराव जान’ में जान फूँक देने वाली रेखा ने कई अन्य फिल्मों में भी किरदारों की विविधता को उम्दा अदायगी से जीवंत बना कर हिन्दी सिनेमा को समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।


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[*कई लोग इस बात से मतांतर रखते हैं कि उमराव जान एक काल्पनिक पात्र है। इसकी वास्तविकता को लेकर उनके अपने तर्क भी होते हैं। इस लिहाज से उमराव जान की काल्पनिकता या वास्तविकता बहस का विषय हो सकती है, लेकिन अवध के इतिहास, संस्कृति और समाज के जानकार विद्वानों ने प्रायः अपनी किताबों और लेखों में उमराव जान को एक काल्पनिक पात्र ही माना है।]

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Thursday, 20 July 2017

मिर्ज़ा ग़ालिब नसीरुद्दीन शाह

किसी भी फिल्म में नसीरुद्दीन शाह की उपस्थिति मात्र भी सुकून देने वाली होती है। उनकी अदाकारी में एक ख़ास किस्म का आकर्षण मौजूद रहता है । एक ऐसा आकर्षण जिससे आप बंधे रह जाना चाहते हैं । पार, मंडी, स्पर्श, बाज़ार, कथा और मानसून वेडिंग जैसी फिल्मों में निभाए नसीरुद्दीन के किरदार उनके निभाए कई बेहतरीन किरदारों की बानगी भर हैं ।
उनके निभाये एक किरदार मिर्ज़ा ग़ालिब का विशेष उल्लेख ज़रूर होना चाहिए । ग़ालिब जब भी याद आते हैं, तो मुझे उनके चेहरे के बतौर नसीर साहब का चेहरा ही याद आता है । इस किरदार को उन्होंने निभाया ही इतनी शिद्दत से है कि ऐसा होना स्वाभाविक है । गुलज़ार ने दूरदर्शन के लिए बनाए गये 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के निर्माण के दिनों को याद करते हुए एक इंटरव्यू में कहा था कि, उस धारावाहिक के दौरान नसीर मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार को निभाते हुए, इस क़दर ग़ालिब हो जाया करते थे कि अपना शॉट देने के बहुत बाद तक भी वे कहीं खोए हुए बैठे रहते थे । उन्हें झकझोर कर उस किरदार से बाहर निकालना पड़ता था !

Thursday, 19 May 2016

रस्किन के साथ 'ढाबे की चाय'


रस्किन बांड बच्चों के प्रिय लेखक यूँ ही नहीं रहे हैं । बच्चों के लिए जितनी रोचक, रोमांचक और उनके मनमाफिक दुनिया रच देने वाली कहानियाँ उन्होंने लिखी हैं, शायद ही किसी दूसरे भारतीय लेखक ने लिखी हों । अंग्रेजी में लिखने वाले इस लेखक की कहानियों, उपन्यासों के लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं, खासकर हिंदी में । रस्किन बांड से मेरा परिचय पहले-पहल दूरदर्शन पर आने वाले धारावाहिक एक था रस्टीके माध्यम से हुआ था । यह रस्किन के बचपन के दिनों के अनुभव और उनकी अनूठी किस्सागोई का बेजोड़ मिश्रण था । इसे देखना हमेशा रोमांच से भर देने वाला होता था । उनके उपन्यास द ब्लू अम्ब्रेलापर इसी नाम से बनी फिल्म देखकर रस्किन के लेखन से और अधिक प्यार हो गया । उनके कथानकों को पहाड़ों के शांत, सुन्दर और अद्भुत सौन्दर्य के बीच जनमते पलते बढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है । हम एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाते हैं, जहाँ हम हमेशा होना चाहते हैं ।
आज रस्किन बांड के जन्मदिन पर रस्टी के कारनामेका एक अंश ढाबे की चायशेयर कर रही हूँ । हालांकि स्कूल से भागने का मेरा कोई अपना अनुभव नहीं रहा, पर इसकी कल्पना मात्र भी रोमांचक है !






साभार : रस्टी के कारनामे – लेखक : रस्किन बांड, अनुवादक : द्रोणवीर कोहली
नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया, प्रथम सं.-1995, द्वितीय आवृत्ति-1999

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Friday, 10 October 2014

माय मालगुडी डेज़

आर.के. नारायण की पहचान मालगुडी डेज़ से इसतरह अभिन्न है कि आज उनके जन्मदिन के मौके पर गूगल ने जो डूडल बनाया है उसमें उकेरे गये व्यक्तित्व का चेहरा भी मालगुडी डेज़ किताब से ढँका हुआ है । अक्टूबर 10, 1906 को चेन्नई में जन्मे आर. के नारायण (रसिपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी) को मैं भी मालगुडी डेज़ से ही जानती हूँ, लेकिन मालगुडी डेज़ किताब से नहीं । बचपन में दूरदर्शन पर हर रविवार मुझे जिस धारावाहिक का बेसब्री से इंतजार रहा करता था वह मालगुडी डेज़ ही था । इसमें हर हफ्ते एक नयी कहानी दिखाई जाती थी । दक्षिण भारत की संस्कृति, खानपान, पहनावा, गाँव, कस्बे, शहर को जानने का पहला मौका इसी धारावाहिक के माध्यम से मिला । मालगुडी आर.के नारायण द्वारा कल्पित दक्षिण भारतीय शहर है, जिसे उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से वास्तविक बना दिया है । इस धारावाहिक की शुरूआत उस दिन की कहानी को आधार बनाकर प्रस्तुत जीवंत रेखाचित्रों से हुआ करती थी । आर.के नारायण के छोटे भाई ख्यात कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण के द्वारा उकेरी कृतियों का भी एक अपना सम्मोहन है । 
आज भी कभी-कभी यूट्यूब पर इसके कुछ एपिसोड्स देखती रहती हूँ । इन्टरनेट ने अब बहुत कुछ आसान कर दिया है । आज आर. के. लक्ष्मण के जन्मदिन पर मुझे फिर से मालगुडी डेज़ की याद आ गयी । इसके विभिन्न पात्रों की छवियाँ मेरे मन में जैसे हमेशा के लिए सुरक्षित हो गयी हैं । यदि आपने कभी मालगुडी डेज़ न देखा हो या नहीं पढ़ा हो तो आप उसे यूट्यूब पर देख सकते हैं । यहाँ इसके सभी एपिसोड उपलब्ध हैं । यकीन मानिये ये बेहद मजेदार हैं और इन्हें देखना आपको एक अलग दुनिया से जुड़ने का अनुभव देगा । कुछ साहित्यिक कृतियाँ जब दृश्य माध्यम के रूप में हमारे समक्ष आयीं तो उन्होंने और भी अधिक सफलता प्राप्त की, मालगुडी डेज़ भी उन्हीं में से एक है । 
दूरदर्शन का बेहद शुक्रिया जिसने भारत के इतने महान गल्पकार से मेरा परिचय बचपन में ही करवा दिया अन्यथा अभी तक भी उन्हें मैं पढ़ पाती, इसमें मुझे संशय है ।




 #R K Narayan, Malgudi Days, DD National, Doordarshan, R K Laxman,