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Friday, 26 October 2018

सैनिटरी नैपकिन से मैन्सट्रुअल कप की ओर

मैन्सट्रुअल कप के बारे में मैंने पहली बार लगभग तीन-चार साल पहले सुना था। तब इसके बारे में जानने की जिज्ञासा तो हुई, लेकिन बहुत ध्यान नहीं दिया। आसपास किसी को इसे यूज़ करते कभी देखा, सुना नहीं था। यहाँ तक कि इसका कभी कोई विज्ञापन तक नहीं देखा था। हम जैसों, जिनकी माएँ मासिक धर्म के दिनों में कपड़े का इस्तेमाल किया करती थीं, के लिए सैनिटरी नैपकिन के ‘उन दिनों’ भी मुक्त और निश्चिंत रहने वाले विज्ञापन ही क्रांतिकारी हुआ करते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि सैनिटरी नैपकिन ने मासिक धर्म के दिनों को अपेक्षाकृत बहुत सुविधाजनक और स्वस्थकर बनाया, लेकिन इसके बावज़ूद सैनिटरी नैपकिन को उतना भी सुविधाजनक नहीं समझा जाना चाहिए, जितना विज्ञापनों में दिखाया जाता है!
असुविधाओं को झेलते हुए सैनिटरी नैपकिन से बेहतर की तालाश का खयाल आना स्वाभाविक है। इसी क्रम में मैन्स्ट्रुअल कप के बारे में जानने की इच्छा बढ़ी और पिछले लगभग दो वर्षों से मैंने इस बारे में जानकारी हासिल करना शुरू किया। यूट्यूब पर उपलब्ध इससे सम्बंधित ढेरों वीडियोज़ देखे, इंटरनेट पर उपलब्ध तकरीबन सौ से अधिक आर्टिकल्स पढ़े। यानी एक छोटे-मोटे रिसर्च जैसा अनुभव रहा। इस दौरान मैन्सट्रुअल  कप में न सिर्फ मेरी दिलचस्पी लगातार बढ़ती गयी, बल्कि इसको लेकर मेरी धारणा भी काफी अच्छी होती गयी। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि जिन औरतों ने इसका इस्तेमाल किया था, उनमें से अधिकांश के अनुभव इसे लेकर बेहतरीन थे और उनकी प्रतिक्रियायें बेहद सकारात्मक थीं। उन महिलाओं ने सैनिटरी नैपकिन की तुलना में इसे बहुत बेहतर बताया था।
इन सब बातों को जानने समझने के बाद मैन्सट्रुअल  कप खरीदने की मेरी इच्छा तो हो रही थी, लेकिन एक हिचक बरकरार थी। मेरे आसपास और मेरी जानकारी में अब तक कोई भी ऐसी दोस्त या परिचित नहीं थीं, जो मैन्सट्रुअल कप यूज़ करती हों, और जिनसे उनके अनुभव के बारे में सीधी बात की जा सके। इस दौरान की एक दिलचस्प बात साझा करना चाहूँगी। मैंने कई महीने पहले अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर मैन्सट्रुअल  कप की फोटो लगाई थी। मेरा मकसद यह जानना था कि मेरी कितनी फ्रेंड्स या रिलेटिव्स इसके बारे में कम से कम जानती हैं। मुझे यह जानकर आश्चर्य नहीं हुआ कि मेरी अधिकतर फ्रेंड्स ने मुझसे पूछा कि ये क्या है? मतलब कोई ऐसी तो नहीं ही मिली जो इसे यूज़ करती हों, लेकिन ज्यादातर इसके बारे में जानती भी नहीं थी!
बहरहाल मुझे ऐसा लगा कि अपने मित्रों परिचतों के अनुभव की बाट जोहना उचित नहीं है। जितनी जानकारी मेरे पास थी, वह इसको सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त थी। दो-तीन महीने पहले मैंने एक ऑनलाइन साइट से इस कप को खरीदा। पिछले महीने पहली बार मैंने मैन्सट्रुअल  कप का इस्तेमाल किया, इसे यूज़ करते हुए थोड़ी घबराहट और थोड़ा डर जरूर था, लेकिन इस दौरान मेरे पढ़े हुए आर्टिकल्स, देखे गये वीडियोज़ और औरतों के साझा किये हुए अनुभव काम आए। अब जब कि मैंने मैन्स्ट्रुअल कप का खुद इस्तेमाल कर लिया है, मेरे अनुभव भी प्रामणिक हैं, और इन्हें दूसरों से साझा करना मैं अपना दायित्व समझती हूँ। मेरे अनुभव, मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक बेहतर रहे। सैनिटरी पैड की तुलना में मैन्स्ट्रुअल कप न सिर्फ बहुत अधिक सुविधाजनक है, बल्कि अधिक हाइजेनिक भी है। जहाँ तक मुझे याद है पीरियड्स के दौरान इतने अधिक सुकून से मैं कभी नहीं रही। पैड यूज़ करते हुए आप पीरियड्स के दौरान पूरी तरह मुक्त नहीं रहते, चाहे कितना भी बढ़िया पैड आप यूज़ करें, लेकिन मैन्सट्रुअल  कप यूज़ करके मैं पहली बार पीरियड्स के दिनों में भी खुद को आम दिनों की तरह सहज महसूस कर पा रही थी। किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई। मैं मैन्सट्रुअल  कप के साथ बाहर गयी। दिन के लगभग बारह-तेरह घंटे मैंने घर से बाहर गुज़ारे, इस दौरान पैदल, लोकल ट्रेन, बस, ऑटो में सफ़र किया, सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, घंटों कुर्सी पर बैठकर लोगों को सुना और खुद मंच पर खड़ी होकर श्रोताओं से मुखातिब भी हुई। यह सब करते हुए मैं एकदम बेफिक्र रही, न दिनभर पैड बदलने की कोई टेंशन रही, न दाग लग जाने का कोई डर!
जब हम मैन्सट्रुअल  कप इस्तेमाल करते हैं तो यूज़्ड पैड फैंकने के झंझट से हमें निजात मिलती है। पानी से अच्छी तरह धोते ही यह फिर से इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। इस दौरान हाइजीन का खासा ख़याल ज़रूर रखना होता है। मसलन आपके हाथ अच्छी तरह से साफ हों। आपने जिस पानी का इस्तेमाल किया हो वह भी साफ-स्वच्छ हो। आजकल जो कूड़े के निपटान की समस्याएँ आ रही हैं, और कहा जाता है कि भारी मात्रा में डंप किये जाने वाले सैनिटरी नैपकिन पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो रहे हैं, ऐसी स्थिति में यह रियूज़ेबल सिलिकॉन कप स्त्रियों और पर्यावरण दोनों के लिए एक वरदान की तरह है। इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि इसकी कीमत बार-बार खरीदे जाने वाले सैनिटरी नैपकिन की तुलना में बहुत कम है। एक मैन्सट्रुअल  कप की कीमत औसतन 300 से 500 तक है, जिसका इस्तेमाल आप कम से कम पांच से छ: साल तक कर सकते हैं और अच्छे गुणवत्ता के मैन्सुट्रुअल कप का आठ से दस वर्षों तक भी इस्तेमाल इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे बहुत आसानी से अपने साथ कैरी भी किया जा सकता है।
मेरे खयाल से अब सैनिटरी नैपकिन की असुविधाओं से भी आज़ाद होने का दौर आ चुका है। यह बात सही है कि एक बड़ी आबादी तक आज भी सैनिटरी नैपकिन तक की पहुँच भी नहीं है, लेकिन उन तक भी सिर्फ सैनिटरी नैपकिन ही नहीं, बल्कि मैन्सट्रुअल कप के इस्तेमाल व फायदों से जुड़ी जानकारी और उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। मेरे खयाल से औरतों को मैन्सट्रुअल  कप का इस्तेमाल कर यह ज़रूर जानना चाहिए कि उनके लिए यह सुविधाजनक है या नहीं। सबके अपने अनुभव हो सकते हैं। मेरा जो अनुभव रहा उसके आधार पर मैं इसे दूसरों को जरूर रिकमेंड करना चाहूँगी। अब वक्त आ चुका है कि हम सैनिटरी नैपकिन से मैन्स्ट्रुअल कप की ओर शिफ्ट करें।

Saturday, 18 August 2018

केरल में बाढ़ की त्रासदी

केरल को लोग उसकी समृद्ध प्राकृतिक विरासत के लिए भी जानते हैं। नदियां, समुद्र, हरी-भरी धरती और पहाड़ों की अद्भुत खूबसूरती केरल को एक अलग पहचान देती है। केरल के विषय में किसी की यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि प्रकृति ने मानों एक बड़े कैनवास पर हरे रंग की सुंदर चित्रकारी की हो!
वही केरल इस समय बाढ़ की भारी विभीषिका से जूझ रहा है। कई लोग मारे गए हैं, बहुत सारे लोग विस्थापित हो रहे हैं। लोग भुखमरी और बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। कुल मिलाकर केरल की एक बड़ी आबादी भयंकर संकट का सामना कर रही है और जान-माल का बहुत नुकसान हो रहा है। केरल के लोग सामान्य: इस तरह की बाढ़ के आदी नहीं रहे हैं, इसलिए यह एक नए तरह का खतरा है! आशंका होती है कि वहां के सहज पारितंत्र के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ की जा रही है और व्यावसायिक दोहन या लाभ के इस तरह की गलतियां की जा रही हैं जो नहीं की जानी चाहिए थीं! इसके अलावा जो स्थिति है उससे यह भी पता चलता है कि किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी कम तैयारियां की गई थीं!
जो भी हो इस समय एकजुट होकर केरल को इस आपदा से उबरने में मदद करना हम सबकी प्राथमिकता में होना चाहिए। इसके बाद केरल को उसी स्वाभाविक केरल की स्थिति में लाने की ज़रूरत होगी जहां प्रकृति केरलवासियों की सबसे सच्ची सहचरी होती है, संहार करने वाली नहीं!! 

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।

Wednesday, 23 May 2018

ब्यास नदी त्रासदी

पंजाब की पांच प्रमुख नदियों में 'ब्यास' वह एकमात्र नदी है जिसे मैंने देखा है और एक से अधिक बार देखा है। यह अपने वात्सल्य के लिए जानी जाती है और इसकी खूबसूरती मन मोहने वाली है। पिछले दो-तीन दिन से लगातार एक खबर आ रही है कि बटाला के पास एक शुगर मिल में शीरे का टैंकर फट गया। शीरे का उपयोग शुगर रिफाइन करने में किया जाता है। कथित तौर पर इस लाखों लीटर केमिकल को ब्यास नदी में बहा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस केमिकल की वजह से ब्यास नदी में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो गई लिहाजा कई जलीय जीव खासतौर पर लाखों मछलियां मरकर नदी के ऊपर तैरने लगीं। यही नहीं एक बड़े दायरे में ब्यास नदी का पानी गाढ़ा काला और बेहद दुर्गंधयुक्त हो चुका है। किनारे पर बसने वाले गांवों के सैकड़ों पालतू पशुओं की भी इस पानी को पीकर मौत हो गयी है और कई गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं।
कृषि के लिए इस नदी पर निर्भर एक बड़ी आबादी भी इससे बहुत अधिक प्रभावित हुई है। ब्यास चूंकि पंजाब से बहते हुए राजस्थान तक जाती है इसलिए बहुत बड़ी संख्या में जनजीवन इससे प्रभावित हुआ है।‌ इसके अतिरिक्त ब्यास नदी का धार्मिक महत्व भी है, उस दृष्टि से इस नदी में स्नान करने आने वाले लोग और पर्यटन के लिए आने वाले लोगों को भी भारी तकलीफ उठानी पड़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिनों तक यदि भारी मात्रा में लगातार इस नदी में जल नहीं छोड़ा गया, तब तक यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। विशेषज्ञों का हालांकि यह भी साफ़ मानना है कि इस त्रासदी के बाद नदी के पारितंत्र को पूर्व की स्थिति में आने के लिए कुछ वर्षों तक का समय लग जायेगा! यह मन को बहुत दुःख देने वाली स्थिति है।
हमारे देश में वैसे तो बिरले लोगों को ही पर्यावरण की परवाह होती है और उसमें भी विभिन्न औद्योगिक इकाइयां तो तमाम गाइडलाइंस के बावजूद पर्यावरण विशेष तौर पर जल स्रोतों को प्रदूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं। लेकिन बटाला के पास शुगर मिल प्रबंधन ने अपनी बेहद गैरज़िम्मेदाराना हरकत से एक ही बार में आसपास के पूरे पारितंत्र को जिस तरह से भारी संकट में डाल दिया है, वह बहुत अधिक चिंता का विषय है और प्रबंधन द्वारा अपने इस कृत्य को आसानी से अंजाम देने से यह संदेह गहराता है कि इस तरह की और भी घटनाएं हो सकती हैं। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि इस घटना के लिए जिम्मेदार प्रबंधन पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए और इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए कि प्रबंधन और प्रशासन की मिलीभगत की वजह से असली दोषियों की बजाय मजदूरों को प्रताड़ित न होना पड़े। फिलहाल इस बात की ज़रूरत है कि ब्यास नदी के उपचार के लिए युद्धस्तर पर उपाय किए जाएं और आगे से इस तरह की घटनाएं न हों इसके लिए तमाम सतर्कता उपाय अपनाए जाएं।

Tuesday, 10 April 2018

होम्योपैथी की ज़रूरत

दवाइयां खाना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता। फिर भी ज़रूरत पड़ने पर दवाइयां लेनी पड़ती हैं और तब मैं एकसाथ बीमारी और दवाई दोनों का दुष्प्रभाव झेलती हूं। ख़ासतौर पर किसी भी तरह के एंटीबायोटिक मुझे सूट नहीं करते और इनके साइड-इफेक्ट्स से मुझे अक्सर जूझना पड़ता है।
लेकिन दवाइयों का एक ऐसा प्रकार भी है, जिन्हें मैं तब भी खा सकती हूं जब मैं बीमार न रहूं। मैं हौम्योपैथिक दवाइयों की बात कर रही हूं। ये दवाइयां मूल रूप में तो लिक्विड फॉर्म में होती हैं लेकिन इन्हें अक्सर मीठी गोलियों में डालकर दिया जाता है और यही वह बात है जो हौम्योपैथिक दवाइयों को बच्चों की भी प्रिय बना देती हैं।
रंग-बिरंगी छोटी-छोटी बोतलों में मीठी-मीठी सफेद गोलियां देखकर ही मन खुश हो जाता है। इसके अलावा मेरे अनुभव का निचोड़ यह है कि हौम्योपैथिक दवाइयां यदि कुशल चिकित्सक के द्वारा दी जाएं तो यह बहुत असरदार होती हैं और जिन बीमारियों के लिए ऐलोपैथिक चिकित्सा सीधे-सीधे उपलब्ध नहीं है उन बीमारियों में हौम्योपैथिक दवाइयां न केवल असर करती हैं बल्कि उन्हें जड़ से हटा पाने में भी कामयाब होती हैं।
हौम्योपैथिक चिकित्सा निदान के लिए प्रर्याप्त धैर्य की मांग करती है और तेजी से भागते इस समय में धैर्य को बनाए रख पाना बहुत कठिन हो गया है, इसलिए हौम्योपैथिक चिकित्सा की लोकप्रियता में लगातार गिरावट हुई है और अब तो हौम्योपैथिक चिकित्सकों का भारी अभाव भी दिखने लगा है। इस दिशा में गंभीरतापूर्वक ध्यान दिए जाने और पहल किए जाने की ज़रूरत है। यह सस्ती और संभावनाओं से भरी चिकित्सा पद्धति है।
आज विश्व हौम्योपैथी दिवस है। मेरी यही कामना है कि हौम्योपैथी के क्षेत्र में नवीन अनुसंधान हों और इसके द्वारा होने वाले इलाज पर लोगों का यकीन बने।

Wednesday, 14 March 2018

स्टीफन हॉकिंग के निधन पर

पाठ्यक्रम के एक विषय के रूप में विज्ञान भले ही अक्सर सर से ऊपर गया हो और अक्सर एक्ज़ाम में इसने रूलाया हो, लेकिन बावजूद इसके इस विषय के प्रति एक आकर्षण रहा है। न्यूटन का गिरते हुए सेब को देखकर 'लॉ ऑफ ग्रेविटी' का सिद्धांत प्रतिपादित करना हो, या डार्विन के 'बायलॉजिकल इवॉल्यूशन' का सिद्धांत हो या आइंस्टीन का 'थियरी ऑफ रिलेटिविटी! इस तरह के सिद्धातों ने दुनिया के विकास में लोगों की सोच को सही दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है।
स्टीफन हॉकिंग एक ऐसे ही भौतिकविद रहे हैं, जिन्होंने ब्रहाण्ड को समझने में हमारी खासी मदद की है और इसकी उलझी हुई गुत्थी के कई सिरों को सुलझाने का ताउम्र प्रयास करते रहे हैं।
हॉकिंग दुनियाभर के लिए इसलिए भी प्रेरणास्रोत रहे हैं कि अपनी बहुत अधिक शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वो सब कर दिखाया जो शारीरिक रूप से सक्षम वैज्ञानिकों के लिए भी आदर्श है। 21 साल की उम्र में उन्हें मोटर न्यूरॉन बीमारी ने जकड़ लिया। इसके बाद धीरे-धीरे उनके शरीर के अधिकांश हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया था। इस भयंकर चुनौती के बावजूद वे विज्ञान की उन्नति और मनुष्य की बेहतरी के लिए काम करते रहे। उनका व्यक्तित्व हर किसी के लिए आकर्षण और आश्चर्य का विषय रहा है।
वे कहा करते थे कि मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है। मुझे अभी बहुत काम करना है। इसी जिजीविषा के सहारे वे मोटर न्यूराॅन जैसी जानलेवा बीमारी को दशकों तक मात देते रहे। स्टीफन हाॅकिग की किताब 'द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' मैंने नहीं पढ़ी है, लेकिन कहा जाता है कि इसमें बिगबैंग थियरी और ब्लैक होल के सिद्धांत को इतनी सरलता से समझाया है कि यह दुनिया में सर्वाधिक बिकने वाली लोकप्रिय किताबों में शुमार है।
76 साल की उम्र में आज उन्होंने इस दुनिया को अलविदा भले ही कह दिया हो, लेकिन अपने योगदान के माध्यम से वे हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Wednesday, 7 February 2018

पीरियड्स के दौरान छुट्टी खैरात नहीं अधिकार है


तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपने प्रोडक्शन हाउस की फिल्म ‘पैडमैन’ के प्रमोशन में जोरशोर से जुटी ट्विंकल खन्ना से जब यह सवाल पूछा गया कि मासिक धर्म के दौरान औरतों को छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं तो उनका जवाब था कि छुट्टी के लिए मासिक धर्म का एक बहाने की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अपने इस नज़रिए को रेडिकल फेमिनिस्ट नज़रिया साबित करने के लिए उन्होंने यह तर्क दिया कि मासिक धर्म के दौरान छुट्टी लेने से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमज़ोर समझने की धारणा को बल मिलेगा। ट्विंकल ने आगे यह कहा कि जिन महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अधिक दर्द होता है तो उन्हें उसी तरह से छुट्टी लेनी चाहिए जैसे कि पेट दर्द या अन्य किसी बीमारी के समय ली जाती है।
ट्विंकल के इस नज़रिए से यह बात साफ़ हो जाती है कि मासिक धर्म और इससे जुड़ी समस्यायों को लेकर वे कितनी कम संवेदनशीलता के साथ विचार कर पाती हैं और यह भी कि ‘पैडमैन’ जैसी फिल्म का प्रमोशन सिर्फ़ और सिर्फ व्यावसायिक मामला है। जबकि इसे प्रचारित इस तरह किया जा रहा है कि यह फिल्म लोगों को मासिक धर्म और उससे जुड़ी समस्यायों के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनायेगी। मासिक धर्म के शुरूआती एक से दो दिन तक अमूमन महिलाओं को दर्द का सामना करना पड़ता है और जिन महिलाओं को इन दिनों दर्द की समस्या नहीं होती है, उनके लिए भी सामान्य दिनों की तरह सहज रह पाना कठिन होता है।
ट्विंकल को यह सुविधा है कि उन्हें सामान्य कामकाजी महिलाओं की तरह कई घंटों तक ऑफिस में काम नहीं करना पड़ता और घर से ऑफिस तक पहुँचने और लौटने के लिए लोकल ट्रेनों और बसों में धक्के नहीं खाने पड़ते, शायद इसीलिए वे आम कामकाजी महिलाओं की चुनौतियों को समझने में असमर्थ हैं। ट्विंकल की भाषा सेनेटरी नैपकिन के उसी विज्ञापन की तरह है, जिसमें यह प्रचारित किया जाता है कि सेनेटरी नैपकिन का उपयोग कर सामान्य दिनों की तरह सहज और उन्मुक्त रहा जा सकता है। यह बात सही है कि सेनेटरी नैपकिन ने मासिक धर्म के दौरान महिलाओं की असुविधाओं को कम किया है, लेकिन यह महिलाओं को आम दिनों की तरह सहज बना देता है यह धारणा पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक है। पीरियड्स के दौरान एक ही दिन में कई-कई बार सेनेटरी नैपकिन बदलने पड़ते हैं और ये अभी इतने भी स्किन फ्रेंडली और परफेक्ट नहीं हो सके हैं कि अधिक चलने-फिरने और उठने-बैठने के बावजूद यह कष्टप्रद और असहज करने वाले न हों।
मासिक धर्म के दिनों की असुविधाओं को जबतक वास्तविक समस्या के रूप में नहीं स्वीकार किया जायेगा, तब तक इस दौरान मांगी गयी छुट्टी खैरात लग सकती है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि इस तरह की छुट्टी दया और सहानुभूति का विषय नहीं बल्कि कामकाजी महिलाओं का हक़ है। जहाँ तक इस छुट्टी के कारण औरतों को पुरुषों से कमज़ोर मान लिए जाने की बात है, तो यह तर्क इसलिए भी बेबुनियाद है कि इस स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया और समस्याओं से स्त्रियों को गुज़रना पड़ता है न कि पुरुषों को! ठीक उसी तरह जैसे कि गर्भावस्था से स्त्रियों को गुजरना पड़ता है न कि पुरुषों को। दुनियाभर में गर्भावस्था के दौरान और बाद में मातृत्वावकाश के लिए अधिक से अधिक दिनों की मांग इसी आधार पर की जा रही है कि यह उनका हक़ है। ट्विंकल के तर्क के हिसाब से मातृत्वावकाश की मांग भी औरतों को पुरुषों की तुलना में कमज़ोर साबित करने वाली मानी जाएगी।
पुरुषों से अलग कुछ जैविक प्रक्रियायों के कारण औरतों के लिए जो चुनौतियां बढ़ जाती हैं, उन चुनौतियों की स्वीकृति और उनसे जूझने के लिए अतिरिक्त सुविधा की मांग औरतों को कमतर साबित करने वाली होगी, यह सोच ही अपने आप में हीनताबोध से संचालित है। औरतों का मसिक धर्म और औरतों का गर्भधारण वास्तव में प्रकृति के द्वारा मानव समुदाय की निरंतरता के लिए औरतों को दिया गया अतिरिक्त उत्तरदायित्व है। इसलिए इस दौरान कुछ अतिरिक्त सुविधाओं की मांग पूरी तरह जायज़ और ज़रूरी है। सच यह है कि महिलाओं ने अपनी इस स्थिति का फायदा उठाने के बजाय सिर्फ न्यूनतम और बेहद ज़रूरी सुविधाएँ ही चाही हैं और इसके लिए भी उन्हें लगातार जूझना पड़ रहा है ।

7 फरवरी 2018 को YKA (यूथ की आवाज़) पर भी प्रकाशित 

Monday, 4 December 2017

हमेशा याद किये जायेंगे शशि कपूर

18 मार्च 1938 को कोलकाता में जन्में शशि कपूर फिल्मों के अलावा थिएटर से भी गहरा जुड़ाव रखते थे। उनकी पत्नी जेनिफ़र भी एक थिएटर आर्टिस्ट थीं और दोनों के बीच मुलाकात भी कलकत्ता में तब हुई थी, जब जेनिफ़र अपने पिता के थिएटर ग्रुप और शशि अपने पिता के थिएटर ग्रुप में सक्रिय थे।
प्रतिष्ठित पृथ्वी थिएटर को भी फिर से खड़ा करने में पृथ्वीराज कपूर के इस सबसे छोटे बेटे शशि और बहु जेनिफ़र ने ही अपना योगदान दिया। इसके अलावा सिनेमा में शशि कपूर की अपनी एक पहचान और लोकप्रियता रही है। बाल कलाकार के रूप में हालांकि उन्होंने अपनी पहली फिल्म 1948 में ही की थी। लेकिन एक वयस्क अभिनेता के बतौर वे साठ के दशक से नब्बे के दशक तक हिंदी और अंग्रेजी सिनेमा में लगातार सक्रिय रहे। 'दीवार' जैसी लोकप्रिय फिल्म में अपनी छाप छोड़ने वाले शशि कपूर ने कई संजीदा फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। नब्बे का दशक जिसे उनके अभिनय का अंतिम पड़ाव कह सकते हैं, में भी उन्होंने कुछ ऐसी फ़िल्में की हैं, जिनमें उनके अभिनय की तारीफ की जाती है, जैसे 'इन कस्टडी' (1993) और 'जिन्नाह' (1998)।

शशि ने लम्बी बीमारी के बाद आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसा माना जाता है कि 1984 में पत्नी जेनिफ़र के देहांत के बाद वे भावनात्मक स्तर पर बहुत टूट गए थे और अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहने लगे थे। एक दौर में अपनी फिटनेस के लिए जाने जाने वाले शशि का वजन भी बाद के दिनों में बहुत बढ़ गया था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि कई सालों से वे दोपहर का खाना नहीं खाते थे, लेकिन पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने बिना सोचे-विचारे कभी भी कुछ भी खाया। वे कहते थे कि जेनिफ़र नहीं रही तो किसके लिए फिट दिखना!
भारतीय सिनेमा और थिएटर की दुनिया में शशि कपूर हमेशा याद किये जाते रहेंगे। अलविदा और हार्दिक श्रद्धांजलि।

5 दिसम्बर को 'यूथ की आवाज़ (YKA)' पर भी प्रकाशित 
#ShashiKapoor #InCustody #Jinnah #Deewar #Jeniffer #PrithviTheatre 

Thursday, 23 November 2017

अबोध पर अपराध थोपने के ख़तरे

कल से आ रही ख़बरों के मुताबिक दिल्ली के एक स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले चार साल के एक बच्चे पर, लगभग अपनी ही उम्र की एक सहपाठी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। बच्ची के अभिभावकों ने पुलिस में सहपाठी बच्चे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी है। रेप के वास्तविक पीड़ितों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी एफआईआर तक दर्ज करने में आनाकानी करने के लिए बदनाम पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए, इस आरोप को दर्ज़ भी कर लिया है। अब उस बच्चे पर द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसस’ (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की सम्भावना तलाशी जा रही है। अधिक विचलित करने वाली बात ये है कि मीडिया भी इस घटना की रिपोर्टिंग एक क्राइम रिपोर्ट की तरह कर रही है। चार साल के एक बच्चे को रेपिस्ट की तरह प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है। उदाहरण के लिए आजतकने इस घटना को एक बच्चे के द्वारा किये गए यौन शोषण की एक चौंका देने वाली घटना कहा है, और जनसत्ताने अपनी खबर में इसे बलात्कार की संज्ञा दी है!
अब तक जो तथ्य उभर कर सामने आये हैं, वो ये हैं कि बच्चे ने स्कूल के वाशरूम में अपनी सहपाठी के वेजाइना में ऊँगली और पेंसिल से चोट पहुँचाने की कोशिश की और बच्ची को इससे चोट पहुंची भी है। बच्ची ने घर जाकर अपनी माँ को पेट के निचले हिस्से में दर्द की बात बतायी और बाद में वह घटना भी बतायी जो उसके साथ घटी। जो कुछ हुआ वह बहुत दुखद है, लेकिन इसे यौन शोषण या बलात्कार की एक घटना की तरह प्रस्तुत करना इससे भी बहुत अधिक दुखद है। इस घटना को बच्चे के यौन दुर्व्यवहार के रूप में देखने की कोई तुक ही नहीं है। इस घटना को उस बच्चे के अपने परिवेश से ग्रहण किये गए नकारात्मक प्रभाव और उसमें विकसित हो रही हिंसक मनोग्रंथि के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। चार साल के बच्चे में कांशियस सेक्सुअल सेंस डेवलप नहीं होता, और जब तक ये सेंस डेवलप नहीं है, तब तक के किसी बच्चे की किसी एक्टिविटी को, चाहे वो सेक्सुअल ऑर्गन से ही क्यों न जुड़ी हो, यौन उत्पीड़न या यौन शोषण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। उस बच्चे को काउंसलिंग की ज़रूरत है, और सिर्फ़ उसी बच्चे को नहीं आजकल के माहौल में अधिकतर बच्चों को लगातार ऐसी काउंसलिंग की ज़रुरत है। अगर उस बच्चे को एक अपराधी की तरह प्रस्तुत किया गया तो उसमें सुधार की सम्भावना बहुत क्षीण हो जाएगी। उस बच्चे का विकास अपराधबोध के साथ होगा और उसकी विकास प्रक्रिया इस बात से भी प्रभावित होगी कि उसके साथ होने वाले बर्ताव के पीछे लोगों के बीच बनी उसकी अपराधिक छवि कहीं न कहीं काम कर रही होगी, और यह सब तब होगा जबकि अपराध करने, नहीं करने सम्बन्धी निर्णय लेने की मानसिक क्षमता उसमें है ही नहीं।
इसके अलावा उस बच्ची के भीतर यौन उत्पीड़ित होने की भावना को भर देना, जबकि उसका यौन उत्पीड़न हुआ ही नहीं है, उस बच्ची के लिए भी सकारात्मक नहीं होगा। अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ उसका सहज हो पाना कठिन होगा। हम एक फ़ॉर्मूले के तहत बच्चों को ये तो बता देते हैं कि गुड टच और बैड टच क्या है, लेकिन इस बैड टच करने वाले की उम्र और परिपक्वता भी इस मसले पर मायने रखती है, यह स्वयं अभिभावकों के लिए अच्छी तरह समझना बहुत आवश्यक है। इसतरह के टच, बैड टच होते हुए भी उसी श्रेणी में नहीं रखे जा सकते जिस श्रेणी में किसी परिपक्व व्यक्ति के बैड टच को रखा जाता है। कम उम्र के बच्चों को यह समझाना होगा कि उनकी उम्र का कोई बच्चा भी उनके प्राइवेट पार्ट को टच करे तो यह गलत है और उन्हें उसके लिए मना करना चाहिए और अपने अभिभावकों को भी इसके बारे में बताना चाहिए। लेकिन इसके बाद ये अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है कि इस घटना पर उनकी प्रतिक्रिया प्रकट-अप्रकट रूप से भी ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उनके बच्चे का यौन शोषण हुआ है। इस मसले पर अभिभावकों के बीच बातचीत होनी चाहिए और बिना कोई अपराधबोध स्थापित किये इस तरह के व्यवहार करने वाले बच्चों में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए।
जिस उम्र में बच्चों में ठीक से बोध विकसित न हो उस समय तक बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की होती है, और इसे स्वीकार करना चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस तरह की घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया बहुत संजीदगी के साथ व्यक्त होनी चाहिए। इस तरह का अपराधबोध अगर चार-पांच साल के बच्चों के बीच प्रचारित कर दिया जाए, तो इससे बच्चों के बीच न सिर्फ लैंगिक भेदभाव बढ़ेगा, बल्कि बच्चों की आपसी दुनिया और दायरे में भी एक किस्म की अजनबियत, भय और अविश्वास का माहौल तैयार हो जाएगा, जिस माहौल का शिकार आज लगभग हमारा पूरा समाज है। बच्चों की आपसी दुनिया भी जब बहुत असहज हो जाएगी, तब हमारी दुनिया और कितनी अधिक कृत्रिम, कितनी अधिक बदरंग हो जाएगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।

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[24.11.2017 को 'यूथ की आवाज (YKA)'  में और 26.11.2017 को 'स्त्रीकाल' में प्रकाशित]

Sunday, 23 July 2017

ऐंडोमिट्रीयोसिस की विचलित करने वाली कलात्मक अभिव्यक्ति

आंकड़ों के आधार पर कहें तो हर दस में से एक महिला ऐंडोमिट्रीयोसिस (Endometriosis) की शिकार है । पेट के निचले हिस्से में अक्सर और असहनीय दर्द, पीरियड्स के दौरान असहनीय दर्द, अनियमित पीरियड्स, पीरियड्स में अधिक खून आना, सेक्स के दौरान या इसके बाद दर्द का अनुभव करना ये सब ऐंडोमिट्रीयोसिस के लक्षण हैं ।
महिलाएं अक्सर इन सब को नज़रअंदाज़ करती हैं और इसपर बात करने से कतराती हैं । लेकिन ऐली कैमर एक ऐसी ही महिला नहीं हैं । 17 साल की उम्र में पहली बार उन्हें ये आभास हुआ कि वो ऐंडोमिट्रीयोसिस की शिकार हैं । जिस दर्द और पीड़ा को उन्होंने भोगा, उसे अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से दुनिया भर के सामने लेकर आई हैं । जब से इन पेंटिंग्स को देखा है मन बहुत विचलित है ।

हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां पीरियड्स तक पर खुलकर बात नहीं की जाती वहां इस बीमारी को लेकर कितनी महिलाएं जागरुक होंगी??
इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है जीवन भर ये दर्द आपके साथ रहता है। इसी के साथ आपको जीना पड़ता है । कुछ सर्जरीज़, दवाईयों और खान-पान की आदतों, खाने में प्रोटीन और विटामिन का भरपूर ध्यान रखकर ही आप इस बीमारी से लड़ने की ताकत हासिल कर सकती हैं। इसलिए खुद पर ध्यान दीजिए । अपने दर्द को नज़रअंदाज़ मत कीजिए । जागरूक बनिए, खुलकर बिना किसी हिचक के अपनी दिक्कतों को शेयर कीजिए और सबसे बड़ी बात है खुद से प्यार करिए ।
ऐली को सलाम जिन्होंने अपने दर्द, अपनी पीड़ा और अपने भोगे दुख को ऐसी जीवंत अभिव्यक्ति दी है ।

[एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से मैं इस लिंक तक पहुंची । आप भी इस लिंक को विज़िट कर सकते हैं https://metrouk2.files.wordpress.com/2017/07/dscf3087.jpg?quality=80&strip=all&strip=all ]



#Endometriosis #BeAware #DontBeHesitate #LoveYourBody #LoveYourLife #Ellie Kammer

Monday, 17 July 2017

नेक इरादे से बनायी गयी एक फिल्म

कुछ देखने लायक फ़िल्में कब आती हैं,और आकर चली जाती हैं, भनक तक नहीं लग पाती! फिर कभी यूँ ही भूले- भटके इन्टरनेट पर आपको वो फिल्म दिख जाए, और देखने के बाद लगे कि यह तो एक ज़रूरी फ़िल्म है । ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है ।
17 फरवरी 2017 को रिलीज़ हुई इरादाएक ऐसी ही फ़िल्म है । कैमिकल फैक्टरियों से निकलने वाले खतरनाक कचरों को रिवर्स बोरिंग के माध्यम से ज़मीन में ही दबा देने के दुष्परिणामों को इस फिल्म के केन्द्र में रख कर दिखाया गया है । इससे आस-पास के इलाके में भूमिगत जल, फसलों के इसके प्रभाव में आने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी फैलती चली जाती है । फ़ायदे के लिए सत्ता और व्यापारियों की गठजोड़ से इस तरह के काम धड़ल्ले से होते हैं, यह भी इस फ़िल्म में दिखाया गया है ।

इस फ़िल्म में बाकी क्या है, वह पोस्ट पढ़कर नहीं, इसे देखकर जानना चाहिए । इसमें नसीरुद्दीन शाह, दिव्या दत्ता, अरशद वारसी, सागरिका घटगे सहित कई मंझे हुए कलाकार हैं । निर्देशक अपर्णा सिंह ने अच्छे इरादे से एक अच्छी फ़िल्म बनाई है । 


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