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Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।

Saturday, 11 May 2019

अलवर गैंग रेप और न्याय का संघर्ष

अलवर में गैंगरेप की शिकार हुई महिला ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक साथ उदास भी करती हैं और प्रेरित भी। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीती और जिस स्थिति से वह गुज़र रही हैं, उसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। उन्होंने एक और बात यह कही कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह किसी और के साथ न हो, इसलिए दोषियों को बेहद कड़ी सजा दी जाए। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया। वह गहरे दुःख में बोल रही हैं, बावजूद इसके वह अपनी मजबूती को बटोरने का प्रयास भी कर रही हैं।
महिला के पति की हिम्मत भी प्रेरित करती है, जो अपनी पत्नी के साथ न सिर्फ डट कर खड़े हैं, बल्कि अपराधियों को दंड दिलाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं। पति के साथ भी मारपीट हुई थी और उन्हें बंधक बनाकर उनके सामने ही उनकी पत्नी का बारी-बारी से बलात्कार किया गया, उसका विडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल भी कर दिया गया। पति का कहना है कि घरवाले माने या न माने लेकिन वे न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना के बाद भी अलवर जिले में ही रेप की कुछ और जघन्य घटनाएँ सामने आयीं। अपराधियों का हौसला आखिर इतना बुलंद कैसे है? कानून का डर किसी अपराधी में रह ही नहीं गया है। अपराधियों को बिना देरी सख्त से सख्त सजा दी जाए और इस तरह का एक भी अपराधी कानून की गिरफ्त से न छूटे तभी इस तरह के अपराध रुकेंगे। होता यह है कि ऐसे कई अपराधी बार-बार अपराध भी करते हैं और छुट्टे घूमते भी रहते हैं!

Wednesday, 24 October 2018

'तुम्बाड' का रोमांच


जिन सिनेमा प्रेमियों ने तुम्बाडसिनेमाघरों में जाकर नहीं देखी है, हो सकता है उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहे। मेरे खयाल से टीवी या लैपटॉप स्क्रीन पर इस फिल्म के पूरे रोमांच को महसूस नहीं किया जा सकता। वैसे अभी भी कई सिनेमाघरों में तुम्बाडलगी हुई है, इच्छा हो तो इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। इस फिल्म को देख कर लौटने वाले कुछ लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनने के बाद मैं यह सलाह ज़रूर दूंगी कि इस फिल्म को जब देखने जाएँ तो यह सोचकर बिल्कुल भी न जाएँ कि यह एक हॉरर मूवी है, यह पूर्वाग्रह आपका मज़ा खराब कर सकता है।
इस फिल्म में सबकुछ बहुत वास्तविक दिखाने के लिए छ: सालों तक जबरदस्त टीमवर्क किया गया है। लोकेशन का चयन, सेट की पूरी परिकल्पना, मेकअप, डिजाइन वगैरह के लिए अथक मेहनत की गयी है। फिल्म में प्रभावी बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए डेनिश म्यूजिशियन जेस्पर किड जेकॉब्सन (Jesper Kyd Jakobson) से संपर्क किया गया, जिन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ लॉस एंजल्स (यूएसए) स्थित अपने स्टूडियो में इस फिल्म के लिए म्यूजिक तैयार किया। इस फिल्म में एक ही गीत है, और वो बेहद प्रभावी है। इस गीत के कुछ-कुछ अंश पूरी फिल्म में कई बार बजते हैं। राजशेखर के लिखे हुए इस गीत का म्यूजिक अजय-अतुल की जोड़ी ने कंपोज़ किया है और इसी जोड़ी में से एक अतुल गोगावाले ने इसे बेहद खूबसूरती से गाया है।
बहरहाल इस फिल्म से जुड़ी एक ऐसी जानकारी यहाँ साझा कर रही हूँ, जो मेरे लिए तो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। अभी एक-दो दिन पहले यह जानकारी मुझे फ़िल्मी फीवरनामक एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित हुए चाइल्ड एक्टर मोहम्मद समद के एक इंटरव्यू से मिली। इस फिल्म में विनायक (सोहम शाह) के नन्हें बेटे का किरदार निभा रहे मोहम्मद समद ने ही विनायक की बूढ़ी दादी का भी किरदार निभाया है। विनायक की दादी का किरदार एक बूढ़ी अभिशप्त महिला का है, जिसका पूरा शरीर शक्ल-ओ-सूरत बेहद जुगुप्सा पैदा करने वाला और बेहद डरावना है। एक 9-10 साल के बच्चे का एक ही फिल्म में दोहरा किरदार निभाना, जिसमें से एक सामान्य बच्चे का और दूसरा बेहद असामान्य बुढ़िया का वाकई बहुत चकित करने वाला है। बाकी इन किरदारों की क्या खासियत है और कितना अलग-अलग रेंज है, यह फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है।
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Friday, 12 October 2018

तुम्बाड से लौटकर


कई कारणों से 'तुम्बाड' देखने जाना चाहिए। लालच बुरी बला है, इसे नये कथ्य और रूपकों के साथ देखने के लिए। फिल्म की ज़बरदस्त सिनेमेटोग्राफी के लिए। क्रिएटिव डायरेक्टर के बतौर आनंद गांधी की क्रिएटिविटी और निर्देशक के बतौर पहली फिल्म कर रहे राही अनिल बारवे के कौशल को देखने के लिए। और सबसे खास 'शिप ऑफ थीसियस' में बेहद सहज स्वाभाविक अभिनय के माध्यम से दर्शकों का दिल जीतने वाले सोहम शाह की अभिनय क्षमता के विस्तृत रेंज को देखने के लिए। 
तीन चैप्टरों में बंटी इस फिल्म का पहला चैप्टर हो सकता है आपको उतना नहीं बांध पाए, लेकिन दूसरे चैप्टर से आप अंत तक पूरी तरह इस फिल्म से बंध जाएंगे। और हां नन्हें एक्टर समद के लिए भी जाना चाहिए जिसकी अभिनय क्षमता का कमाल 'गट्टू' और 'हरामखोर' जैसी फिल्में देखने वाले दर्शक देख चुके हैं। मेरा अनुभव रहा कि यह फिल्म लालच के प्रति आगाह करती है, लेकिन खाली हाथ लौटने नहीं देती।

Thursday, 27 September 2018

मेरठ की साम्प्रदायिक पुलिस

हमारे देश का संविधान बताता है कि भारत एक धर्म/पंथ निरपेक्ष देश है, इसलिए संवैधानिक दायित्व से बंधी हुई किसी भी संस्था या व्यक्ति का पदों पर रहते हुए धर्म निरपेक्ष होना अनिवार्य है। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक लड़की के साथ पुलिस वैन में मारपीट करते हुए और भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए पुलिस वाले कह रहे हैं : एक हिन्दू होकर मुसलमान से प्यार करती है? हिन्दू कम पड़ गये हैं क्या?’!
ख़बरों के मुताबिक यह मेरठ का वीडियो है और एक हिन्दू युवती के एक मुसलमान युवक के साथ होने की खबर सुनकर कुछ कट्टरवादी हिन्दू संगठन के सदस्यों ने जमा होकर उन्हें घेर लिया था। कहने को तो पुलिस उन दोनों को यहाँ से अलग-अलग वैन में बचाकर ले जा रही थी, लेकिन वास्तव में पुलिस की वर्दी पहने ये लोग खुद सांप्रदायिक गुंडों जैसी सोच रखने वाले थे और इस सच का सामना करना उस लड़की के लिए कितना भयावह रहा होगा, इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है।
इस तरह के क्रूर या अभद्र तरीके तो छोड़िये, पुलिस को किसी को प्यार या अपनेपन से भी यह समझाने का हक़ नहीं है, कि किसे किस धर्म के लोगों से प्यार या दोस्ती करनी चाहिए और किससे नहीं। यह तय करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी तरह की बाधा को ख़त्म करना सरकारी तंत्र और न्याय तंत्र का काम है। जब ऐसी संस्थाएं ही लोगों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने लगें, तो क्या किया जाना चाहिए? इसे साधारण अपराध की बजाय असाधारण अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिये और दोषी व्यक्ति या व्यक्तियों को न सिर्फ पदों से हटा देना चाहिए, बल्कि बेहद सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।

Wednesday, 26 September 2018

हर तरह की कट्टरता खतरनाक है!

मुंबई के एक गणपति पूजा पंडाल में AIMIM पार्टी के विधायक वारिस पठान ने एक कार्यक्रम में सम्मिलित होकर लोगों को पूजा की शुभकामनाएं दीं और अपने वक्तव्य का समापन गणपति बप्पा मोरेया कहकर किया। एक मुसलमान विधायक को हिन्दुओं के धार्मिक आयोजन में आमंत्रित करना और उस विधायक का उत्सव में सहर्ष शामिल होकर उनके धर्म के प्रति सम्मान प्रकट करनाधार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता का अच्छा उदाहरण कहा जा सकता थालेकिन इसके बाद जो कुछ घटा वह निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
कथित तौर पर वारिस पठान‌ को सोशल मीडिया और अन्यत्र इस बात के लिए ट्रोल किया गया कि वे न केवल मूर्तिपूजा के आयोजन में सम्मिलित हुए बल्किउन्होंने एक हिन्दू देवता के सम्मान में नारा भी लगाया! इसके बाद वारिस पठान पर इतना दबाव बना कि उन्होंने एक वीडियो जारी कर अपने इस आचरण पर शर्मिंदगी जताई और कहा कि 'अल्लाह ताला से उन्होंने माफी मांगी है और वे उन्हें माफ कर देंगे। गलती इंसानों से ही होतीलेकिन आईंदा वे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे।'
कल्पना करिए कि वारिस पठान को उनके मुसलमान होने के कारण गणेश पूजा के पंडाल में जाने या संबोधित करने से रोक दिया जातातो हम इसे बेहद शर्मनाक और असहिष्णुता भरा कृत्य बताकर इसकी तीखी आलोचना करते।
मेरे खयाल से वारिस पठान का गणेश उत्सव में शामिल होने के अपने आचरण को गुनाह कहना और उसके लिए अफ़सोस जतानाउससे कम तीखी आलोचना का विषय नहीं है। उन्होंने वीडियो जारी करके किसी धर्म विशेष के सम्मान को बढ़ाया या घटाया नहीं हैबल्कि धार्मिक सौहार्द के प्रति जघन्यता दिखाई है। ऐसा कहा जा रहा है कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें माफी मांगने के लिए बाध्य किया। पार्टी मुखिया असदुद्दीन ओवैसी को शर्म आनी चाहिए कि एक ओर तो वे संघ और भाजपा की साम्प्रदायिकता की तीखी आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ अपनी पार्टी के विधायक को बेहद घटिया स्तर के असहिष्णु साम्प्रदायिक आचरण के लिए प्रेरित करते हैं। सिर्फ संघी कट्टरता ही नहींहर तरह की कट्टरता ख़तरनाक हैऔर इसका तीखा विरोध होना चाहिए।

Thursday, 6 September 2018

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाली आईपीसी की धारा 377 को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला है। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी इस बेतुकी धारा को निरस्त करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में आये ऐसे ही फैसले को खुद सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में रद्द कर दिया था। देर से ही सही लेकिन अपनी उस गलती को सुधार कर सुप्रीम कोर्ट ने एक दुरुस्त काम किया है।
इस मामले को सिर्फ समलैंगिकों के अधिकारों से जुड़े मामले के रूप में देखना एक संकुचित नज़रिया होगा, वास्तव में यह मानवाधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा मसला है। मुझे खुशी है कि हमारा देश थोड़ा और प्रगतिशील, थोड़ा और बेहतर हुआ है। सिर्फ LGBTQ+ समुदाय ही नहीं पूरे देश को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Monday, 20 August 2018

यह तंगदिली क्यों?

एक राजनेता के बतौर नवजोत सिंह सिद्धू मुझे कहीं से प्रभावित करने वाले नहीं लगते लेकिन इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित किये जाने पर सिद्धू का पाकिस्तान जाने का फैसला मेरे ख़याल से एक अच्छा फैसला था। वहां के सेना प्रमुख से उनका गले मिलना किसी भी दृष्टि से नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। समारोह के दौरान उन्हें किसकी बगल में जगह दी गयी या उन्होंने अपनी बगल में बैठे किस व्यक्ति से बात की, इसे आलोचना का विषय बनाना बेवकूफी है। जब से सिद्धू लौटकर आये हैं इन बातों को लेकर उनका भारी विरोध हो रहा है, उन्हें देशद्रोही सिर्फ कहा ही नहीं जा रहा बल्कि उनपर देशद्रोह का मुकद्दमा भी कायम किया गया है, यही नहीं उनका सिर काटकर लाने वाले के लिए इनाम भी रखे जा रहे हैं!
यदि भारत और पाकिस्तान दो दुश्मन देश हैं और यही सबसे बड़ी सच्चाई है, तो शपथग्रहण समारोह में सिद्धू को आमंत्रित करने के फ़ैसले और सेना प्रमुख द्वारा उन्हें गले लगाने का पाकिस्तान में भी तीखा विरोध होना चाहिए था, लेकिन मेरी जानकारी में वहाँ ऐसा नहीं हो रहा है। यदि विरोध हो भी रहा होगा, तो विरोध करने वाले गिने-चुने लोग ही होंगे! विकट से विकट परिस्थिति में भी दोस्ती, शान्ति और सौहार्द की पहल करना हमेशा स्वागत योग्य ही होता है। कायदे से यदि वहाँ सिद्धू मिलनसार दिखने की बजाय अकड़ दिखाते तो यह निंदनीय होता। हमें सोचना चाहिए कि क्या तंगदिली के कीर्तिमान स्थापित करने में हमारी दिलचस्पी बहुत बढ़ गयी है?

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Monday, 16 April 2018

सीरिया के आम नागरिकों के पक्ष में

सीरिया के भीतर पहले रासायनिक हमला हुआ जो कथित तौर पर वहां की सरकार ने ही करवाया है, इसमें कई लोगों की जान गई और कई लोग इससे बुरी तरह प्रभावित हुए। उसके बाद इस हमले के खिलाफ अमेरिका ने सीरिया पर बम बरसाए, फिर कई आम नागरिकों की मौत हुई और कई गंभीर रूप से घायल हुए।
कहने के लिए ये दोनों ही हमले सीरिया की बेहतरी के लिए हो रहे हैं। लेकिन साफ-साफ दिख रहा है कि इन दोनों ही पक्षों का सीरिया की बेहतरी से कोई सरोकार नहीं है! ये अपना-अपना हित साध रहे हैं और इन्हें खुली छूट मिली तो ये सीरिया को मलबे का ढेर बना देंगे!
पूरी दुनिया का यह कर्तव्य है कि वह सीरिया के हित के नाम पर किए जा रहे हिंसक और बर्बर हमलों का विरोध करे। वहां शांति स्थापित करने के लिए तमाम प्रयास करे और सीरिया को बिलखते-मरते-डर के साए में जी रहे बच्चों और वयस्कों का देश होने से तत्काल रोके।

Saturday, 3 March 2018

शादी के बारे में तेजस्वी की पिछड़ी सोच पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व नहीं करती!

हाल ही में बीबीसी के एक इंटरव्यू में बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालूप्रसाद यादव और राबड़ी देवी के छोटे पुत्र, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव से जब यह पूछा गया कि ‘क्या वे अंतर्जातीय विवाह करेंगे?’ तो उन्होंने बहुत ही गंभीरता से जवाब देते हुए कहा : इंटर कास्ट मैरिज करना या नहीं करना या किस लड़की से हम शादी करेंगे, ये मेरा फैसला है ही नहीं न! हम बिहारी लोग हैंये हमारे माता-पिता का अधिकार है’!
तेजस्वी को इससे कोई रोक नहीं सकता कि वे अपना विवाह अपने माता पिता की ही मर्ज़ी से करें, लेकिन उनके बयान में जिस तरह से बिहार के सभी युवाओं को जेनरलाइज़ करने की कोशिश की गयी है, वह बेहद अफसोसनाक है। तेजस्वी को यह ध्यान रखना चाहिए था, कि उन्हें किसी ने पूरे बिहार की सांस्कृतिक ठेकेदारी नहीं दे रखी है। उनके इस विचार से जहाँ विवाह को लेकर रूढ़िवादी मानसिकता प्रोत्साहित होगी, वहीं बिहार की एक अनावश्यक पिछड़ी तस्वीर लोगों के सामने पेश होगी। इस बयान से इतना ज़रूर तय हो जाता है, कि तेजस्वी कहीं से भी आधुनिक सोच रखने वाले बिहार के युवाओं का प्रतिनिधित्व करने के काबिल नहीं हैं।
विवाह के नाम पर माता-पिता (या अन्य परिजनों) की पसंद को अपनी संतानों पर थोपे जाने की परिपाटी बिहार में ही नहीं कमोबेश पूरे देश मे रही है। लेकिन इसके दुष्परिणामों ने और समय के साथ हुई वैचारिक प्रगति ने इस तरह की परिपाटी को बहुत हतोत्साहित किया है। समय के साथ यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि पारंपरिक तरीके से तय होने वाली शादियों में भी उन लोगों के पसंद-नापसंद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिन्हें साथ मिलकर जीवन जीना है। एक दौर ऐसा भी था जब बिना तस्वीरें देखे दो परिवारों के बीच रिश्ता तय हो जाया करता था, लेकिन अब पारंपरिक विवाहों में भी अक्सर ऐसा होने लगा है कि लड़का-लड़की विवाह से पहले न सिर्फ मिलते हैं, बल्कि संचार की नयी तकनीकों के माध्यम से संवाद कर एक दूसरे को जानने-समझने की कोशिश भी करते हैं। यह बदलाव पूरे देश के साथ बिहार में भी हो रहा है। इसके बावज़ूद इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि अब भी बहुत सारी शादियाँ रूढ़िवादी तरीके से होती हैं। यह दुखद है और इस बात की ज़रूरत है कि इस तरह की परिपाटी के खिलाफ व्यापक जागरूकता लायी जाए। लेकिन जब किसी राज्य के उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद को संभाल चुके एक युवा नेता इस तरह का जेनरलाइज़्ड बयान दें कि विवाह के बारे में फैसला लेने का अधिकार युवाओं के बजाय उनके माता पिता को है तो इसका सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक प्रभाव ही पड़ सकता है।    
तेजस्वी के इस बयान से बिहार के उन लाखों युवाओं की तौहीन हुई है, जिन्होंने अपने विवेक से अपने जीवनसाथी का चयन किया है, या करना चाहते हैं। इस बयान में बिहार के उन लोगों के संघर्षों के प्रति तो बड़ी ही हिकारत और संवेदनहीनता प्रकट हुई है, जिन लोगों ने परिवार और समाज के भारी विरोध के बावज़ूद सामाजिक बंधनों और कुरीतियों को धत्ता बताते हुए प्रेम विवाह किया है।
बिहार के लड़के ही नहीं बिहार की लड़कियाँ भी अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनने को लेकर पर्याप्त मुखरता दिखा रही हैं। शिक्षा तक लगातार बढ़ रही पहुँच और आत्मनिर्भरता बढ़ने के साथ-साथ जीवन साथी के चयन के अधिकार को लेकर आत्मविश्वास में भी लगातार वृद्धि हो रही है, और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले वर्षों में इस मसले पर पूरी बदली हुई तस्वीर दिखाई देने लगेगी।
यह एक कड़वा सच है कि अपनी पसंद से शादी करने वाले लोगों को कई बार अपने परिजनों और समाज का भारी असहयोग और विरोध झेलना पड़ता है, लेकिन हमेशा ऐसा ही हो, यह ज़रूरी नही है। यह मैं अपने अनुभव से भी जानती हूँ। मेरे पति भी बिहार के हैं, और उन्होंने यह खुद तय किया था कि उन्हें किससे शादी करनी है। हमारे अन्तर्जातीय और अन्तर्प्रांतीय प्रेम को लेकर शुरूआत में परिजनों को थोड़ी बहुत असहजता जरूर हुईं, लेकिन बाद में सभी ने न सिर्फ हमारे फैसले को स्वीकारा बल्कि विवाह समारोह को लेकर हमारी आडंबरविहीन और किफायती एप्रोच को भी सभी ने सहर्ष स्वीकारा और सराहा। मैं अपने छोटे से व्यक्तिगत परिचय और सीमित जानकारी के बावज़ूद बिहार के ऐसे कई युवक-युवतियों से परिचित हूँ, जिन्होंने प्रेम विवाह किया है या प्रेम विवाह करने को लेकर बेहद स्पष्ट हैं।
तेजस्वी ज़रूरी है कि आप बिहार की बदलती हुई तस्वीर के साथ ताल-मेल बैठाना सीखें। अपने ही समाज में हो रहे उस बदलाव को महसूस करें जो दशकों से बिहार की सत्ता में बैठे लोगों के मंसूबे पर पानी फेर रहा है। इसके अलावा एक सलाह यह भी है कि अपने समाज के पिछड़ेपन को भी ईमानदारी से महसूस करें और उसके निवारण का अगुवा बनने की कोशिश करें न कि पिछड़ेपन का ब्रांड एम्बेसडर बनने की, नहीं तो इसका परिणाम यह होगा कि आप अप्रासंगिक होते चले जाएँगे।

Wednesday, 7 February 2018

पीरियड्स के दौरान छुट्टी खैरात नहीं अधिकार है


तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपने प्रोडक्शन हाउस की फिल्म ‘पैडमैन’ के प्रमोशन में जोरशोर से जुटी ट्विंकल खन्ना से जब यह सवाल पूछा गया कि मासिक धर्म के दौरान औरतों को छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं तो उनका जवाब था कि छुट्टी के लिए मासिक धर्म का एक बहाने की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अपने इस नज़रिए को रेडिकल फेमिनिस्ट नज़रिया साबित करने के लिए उन्होंने यह तर्क दिया कि मासिक धर्म के दौरान छुट्टी लेने से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमज़ोर समझने की धारणा को बल मिलेगा। ट्विंकल ने आगे यह कहा कि जिन महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अधिक दर्द होता है तो उन्हें उसी तरह से छुट्टी लेनी चाहिए जैसे कि पेट दर्द या अन्य किसी बीमारी के समय ली जाती है।
ट्विंकल के इस नज़रिए से यह बात साफ़ हो जाती है कि मासिक धर्म और इससे जुड़ी समस्यायों को लेकर वे कितनी कम संवेदनशीलता के साथ विचार कर पाती हैं और यह भी कि ‘पैडमैन’ जैसी फिल्म का प्रमोशन सिर्फ़ और सिर्फ व्यावसायिक मामला है। जबकि इसे प्रचारित इस तरह किया जा रहा है कि यह फिल्म लोगों को मासिक धर्म और उससे जुड़ी समस्यायों के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनायेगी। मासिक धर्म के शुरूआती एक से दो दिन तक अमूमन महिलाओं को दर्द का सामना करना पड़ता है और जिन महिलाओं को इन दिनों दर्द की समस्या नहीं होती है, उनके लिए भी सामान्य दिनों की तरह सहज रह पाना कठिन होता है।
ट्विंकल को यह सुविधा है कि उन्हें सामान्य कामकाजी महिलाओं की तरह कई घंटों तक ऑफिस में काम नहीं करना पड़ता और घर से ऑफिस तक पहुँचने और लौटने के लिए लोकल ट्रेनों और बसों में धक्के नहीं खाने पड़ते, शायद इसीलिए वे आम कामकाजी महिलाओं की चुनौतियों को समझने में असमर्थ हैं। ट्विंकल की भाषा सेनेटरी नैपकिन के उसी विज्ञापन की तरह है, जिसमें यह प्रचारित किया जाता है कि सेनेटरी नैपकिन का उपयोग कर सामान्य दिनों की तरह सहज और उन्मुक्त रहा जा सकता है। यह बात सही है कि सेनेटरी नैपकिन ने मासिक धर्म के दौरान महिलाओं की असुविधाओं को कम किया है, लेकिन यह महिलाओं को आम दिनों की तरह सहज बना देता है यह धारणा पूरी तरह बेबुनियाद और भ्रामक है। पीरियड्स के दौरान एक ही दिन में कई-कई बार सेनेटरी नैपकिन बदलने पड़ते हैं और ये अभी इतने भी स्किन फ्रेंडली और परफेक्ट नहीं हो सके हैं कि अधिक चलने-फिरने और उठने-बैठने के बावजूद यह कष्टप्रद और असहज करने वाले न हों।
मासिक धर्म के दिनों की असुविधाओं को जबतक वास्तविक समस्या के रूप में नहीं स्वीकार किया जायेगा, तब तक इस दौरान मांगी गयी छुट्टी खैरात लग सकती है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि इस तरह की छुट्टी दया और सहानुभूति का विषय नहीं बल्कि कामकाजी महिलाओं का हक़ है। जहाँ तक इस छुट्टी के कारण औरतों को पुरुषों से कमज़ोर मान लिए जाने की बात है, तो यह तर्क इसलिए भी बेबुनियाद है कि इस स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया और समस्याओं से स्त्रियों को गुज़रना पड़ता है न कि पुरुषों को! ठीक उसी तरह जैसे कि गर्भावस्था से स्त्रियों को गुजरना पड़ता है न कि पुरुषों को। दुनियाभर में गर्भावस्था के दौरान और बाद में मातृत्वावकाश के लिए अधिक से अधिक दिनों की मांग इसी आधार पर की जा रही है कि यह उनका हक़ है। ट्विंकल के तर्क के हिसाब से मातृत्वावकाश की मांग भी औरतों को पुरुषों की तुलना में कमज़ोर साबित करने वाली मानी जाएगी।
पुरुषों से अलग कुछ जैविक प्रक्रियायों के कारण औरतों के लिए जो चुनौतियां बढ़ जाती हैं, उन चुनौतियों की स्वीकृति और उनसे जूझने के लिए अतिरिक्त सुविधा की मांग औरतों को कमतर साबित करने वाली होगी, यह सोच ही अपने आप में हीनताबोध से संचालित है। औरतों का मसिक धर्म और औरतों का गर्भधारण वास्तव में प्रकृति के द्वारा मानव समुदाय की निरंतरता के लिए औरतों को दिया गया अतिरिक्त उत्तरदायित्व है। इसलिए इस दौरान कुछ अतिरिक्त सुविधाओं की मांग पूरी तरह जायज़ और ज़रूरी है। सच यह है कि महिलाओं ने अपनी इस स्थिति का फायदा उठाने के बजाय सिर्फ न्यूनतम और बेहद ज़रूरी सुविधाएँ ही चाही हैं और इसके लिए भी उन्हें लगातार जूझना पड़ रहा है ।

7 फरवरी 2018 को YKA (यूथ की आवाज़) पर भी प्रकाशित 

Saturday, 3 February 2018

अंकित सक्सेना की मौत और तमाशबीन लोग

दिल्ली के रघुबीर नगर इलाके में अंकित नाम के एक 23 वर्षीय युवक की गुरुवार शाम को सरेआम गला रेत कर हत्या कर दी गई। मामला प्रेम संबंध का था और दोनों अलग-अलग सम्प्रदायों से ताल्लुक रखते थे। लड़की के माता-पिता, छोटे भाई और मामा ने मिलकर लड़के को दबोचा और देखते ही देखते लड़की के बाप ने चाकू से लड़के का गला रेत दिया!
इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि संकुचित साम्प्रदायिकता के तीव्रता से फैल रहे ज़हर की इस ऑनर किलिंग में बड़ी भूमिका रही होगी। लेकिन इस घटना से चिंता का एक और पहलू फिर से सामने आया है। सड़क के बीचों-बीच यह घटना हुई। लड़के की मां मदद की गुहार लगाती रही और पास से गुज़रने वाले कुछ लोग नज़रअंदाज़ करके अपने रास्ते बढ़ते चले और कुछ लोग वहीं खड़े होकर फोटो खींचने लगे, वीडियो बनाने लगे।
सोशल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही हाल के वर्षों में हमारे देश में ऐसे लोगों की भारी संख्या सामने आयी है, जो दुर्घटनाओं की स्थिति में मदद करने की बजाय, पुलिस एम्बुलेंस को फोन करने की बजाय, घटना का वीडियो बनाने या फोटो खींचने में व्यस्त हो जाते हैं, ताकि सोशल मीडिया पर ऐसे विडियो को वायरल कर लाइक और शेयर बटोर सकें!
संवेदनशीलता तो इतनी भी नहीं रही कि सामने एक आदमी मर रहा है, मदद की गुहार लगाई जा रही है तो कोई मदद को आगे आये! अगर अंकित को सही समय पर हॉस्पिटल पहुंचा दिया जाता, तो हो सकता है उसकी जान बच जाती!

Monday, 15 January 2018

मीडिया की मनगढ़ंत रिपोर्टिंग का एक उदाहरण

आजकल न्यूज़ चैनल्स और वेबसाइट्स किस तरह गलत सूचनाएं परोसते हैं, उसका एक उदाहरण आजतक की इस रिपोर्टिंग में देख सकते हैं। आजतक की वेबसाइट पर लगाई गई यह रिपोर्ट जिस एंकर अर्पिता तिवारी की कथित आत्महत्या की घटना से जुड़ी हुई है, उसका टी.वी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी से कोई संबंध नहीं है। अर्पिता की बहन का नाम भी श्वेता तिवारी ज़रूर है, जो इस घटना में न्याय के लिए मुखर संघर्ष कर रही हैं।
लेकिन सिर्फ इस नाम के आधार पर पूरी रिपोर्टिंग इस तरह कर दी गई है कि यह बिग बॉस विनर और एक्ट्रेस श्वेता तिवारी की बहन की आत्महत्या का मामला हो। यानि कि पूरी मानसिकता मसाला इकट्ठा करने की थी और इस चक्कर में तथ्यों की पुष्टि करने की भी ज़रूरत नहीं समझी गई! 
मैं सिर्फ इस तरफ संकेत करना चाहती हूं कि इस तरह की गलत रिपोर्टिंग कई संवेदनशील मसलों पर भी की जाती है और अधिकतर लोग उसी को सच मान बैठते हैं। आजतक जैसे न्यूज़ चैनलों का तो यह धंधा ही है। इसलिए आंख मूंदकर विश्वास करने की बजाय हमें सावधानी बरतने की ज़रूरत है।

Wednesday, 20 December 2017

कथित हिन्दी पट्टी के लोग और मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा

        कथित हिन्दी पट्टी के लोगों और सिनेमा के बीच के रिश्ते को लेकर पिछले कुछ वर्षों का मेरा कुछ ऑब्जर्वेशन रहा है, जो यहाँ साझा कर रही हूँ। यहाँ के लोगों के मन में हिंदी सिनेमा के लिए कितनी 'अधिक श्रद्धा' और हिंदी सिनेमा से जुड़े अपने इलाके के किसी व्यक्ति के प्रति कितना 'अपार स्नेह' है, इसका पता आपको तब लगेगा जब इस पट्टी के किसी इलाके का कोई भी, किसी सिनेमा प्रोजेक्ट का छोटे से छोटा हिस्सा भी हो। मसलन पटकथा, संवाद, गीत-संगीत या कैमरा उनके जिम्मे हो। अभिनय के अतिरिक्त सिनेमा की अन्य जिम्मेदारियों को महत्व देने वाला यह रुझान अपेक्षाकृत बहुत नया है। अभिनय की तो बात आज भी जुदा है, जब यह उनके जिम्मे हो तो ये लोग बावले हुए जाते हैं। नये रुझान के बतौर कुछ हद तक यही बावलापन अब निर्देशन को लेकर भी दिखता है। मेरे खयाल से इस स्नेह और बावलेपन की शर्त सिर्फ इतनी है कि फिल्म मुख्यधारा के अनुकूल होनी या लगनी चाहिए। उदाहरण के लिए पिछले कुछ वर्षों में रिलीज़ हुई फ़िल्मों ‘गैंग्स ऑफ वास्सेपुर’, ‘तनु वेड्स मनु’, ‘डॉली की डोली’ और ‘अनारकली ऑफ आरा’ के नाम लिये जा सकते हैं, जिनमें इस पट्टी के लोगों की किसी न किसी रूप में उल्लेखनीय भागीदारी रही है। मुख्यधारा से हटकर बनायी गयी बेहतरीन फिल्मों पर यह बात शायद ही लागू होती है!
मेरा ऑब्जर्वेशन सोशल मीडिया की प्रतिक्रियायों यानी पढ़े-लिखे लोगों की प्रतिक्रियायों पर आधारित है। कम से कम यहाँ ऐसी फिल्मों को हिट कराने की भावुक अपील करते हुए इन लोगों के अपडेट्स चारों तरफ दिखाई पड़ने लगते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि इस तरह के भावुक अपडेट्स करने वाले अधिकांश लोग सिनेमा से जुड़े इन लोगों के साथ अपना करीबी रिश्ता होने का भी दावा करते हैं।मसलन मेरे बड़े भाई, मेरे अग्रज, मेरे सीनियर, मेरे दोस्त, वर्षों एक ही मोहल्ले में रहने वाले, मेरे सहपाठी, मेरे हमख़याल, एक ही चाय की गुमटी पर बहस करने वाले वगैरह-वगैरह। कुछ और नहीं तो इनके बीच इनकी ‘हिन्दी’ वाली पहचान का एक रिश्ता तो जुड़ता ही है। संभव है कि यह इन लोगों की सांस्कृतिक विशेषता हो, लेकिन दुखद रूप से कई बार प्रशंसा का यह खेल चाटुकारिता के निचले स्तर तक पहुँच जाता है। मैं जितना समझ पायी हूँ, वह यह है कि इस तरह की अपीलों में उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों के वे लोग बराबर शरीक होते हैं, जिनके पठन-पाठन, विमर्श, बहस और मनोरंजन की दुनिया हिंदी में खुलती है और जिनकी ख़ुद की दृष्टि में उनकी मातृभाषी अस्मिता अपेक्षाकृत कमज़ोर है या यूँ कहिये कि नगण्य है! यह बुरा नहीं है कि आप किसी फिल्म की जानकारी साझा करें, उसके प्रति अपनी रूचि प्रदर्शित करें, लेकिन यह तो नहीं होना चाहिए कि किसी फ़िल्म के प्रदर्शन से पहले ही उसकी महिमा मंडन का तूफान ला खड़ा करें, वह भी व्यक्तिगत कारणों से!!
मेरी चिंता का विषय यह है कि इस तरह की भावुक एकता ने हिन्दी सिनेमा के बड़े दर्शक वर्ग विशेषकर हिंदी पढ़ने-लिखने वाले दर्शक वर्ग की अभिरुचियों को विकृत होने देने में अच्छी-खासी भूमिका निभाई है। आश्चर्य होता है कि सिनेमा के इन प्रेमियों के लिए भोजपुरी सिनेमा फूहड़ हो सकता है, लेकिन उसके उत्थान की चिंता उनके मन में नहीं के बराबर होती है। इसी तरह पड़ोसी भाषा बांगला की समृद्ध सिनेमाई परम्परा के रहते भी मैथिलों को सामान्यत: यह रश्क नहीं होता कि वह अपने ही पड़ोसी के आगे हाथों की ऊँगलियों पर गिनने लायक फ़िल्में लेकर खड़े हैं और उनमें भी उल्लेखनीय फ़िल्मों का सख्त अभाव है। अवधी, ब्रज, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, कुमाउँनी, गढ़वाली, राजस्थानी आदि भाषाओं में भी सिनेमा निर्माण की गंभीर पहलकदमी की कोई आहट नहीं सुनाई देती। कोई भी सिनेमा दर्शकों के दम पर चलता है, लेकिन मेरी जानकारी में लोक-लुभावन अपवादों को छोड़कर, क्षेत्रीय सिनेमाओं के लिए ठीक से सिनेमा हॉल तक उपलब्ध नहीं होते!
यूँ तो हिंदी सिनेमा के स्टारडम से पूरा देश प्रभावित है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि पिछड़ी चेतना और पिछड़ी आर्थिक स्थिति की पट्टी, यानी कथित हिंदी पट्टी, इसके चकाचौंध से सर्वाधिक चुंधियाई हुई है। यही कारण है कि दशकों तक शत्रुघ्न सिन्हा बिहारी बाबू बनकर बिहार के लोगों की सिनेमाई आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते रहे। इसी तरह अमिताभ बच्चन उत्तर प्रदेश की कला और संस्कृति के लिए कितना योगदान दे सके नहीं पता लेकिन उत्तर प्रदेश के लोगों ने उन्हें हमेशा सर-आँखों पर बिठाए रखा और उनपर नाज़ करते रहे। जबकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि पंजाब, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रदेश, जहाँ से आये लोगों ने हिंदी सिनेमा को सर्वाधिक योगदान दिया, वहाँ आज भी उम्दा क्षेत्रीय सिनेमा का समानान्तर विस्तार है, और क्षेत्रीय कलाकारों के प्रति बहुत सम्मान और प्यार भी है।
हो सकता है कि पिछड़ेपन के शिकार कथित हिन्दी प्रदेशों के लोग हिंदी सिनेमा में अपने प्रतिनिधित्व के माध्यम से अपने ढुलमुल आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचे से निकास की कोई फैंटसी रचते हों! अपनी ही कला और संस्कृति को अपने ही हीनताबोध के कारण नष्टप्राय कर देने के बाद हिंदी सिनेमा के बड़े पटल पर अपने प्रतिनिधित्व के माध्यम से मानो वे अपना महत्व, अपना कौशल साबित करना चाहते  हों, लेकिन फैंटसी तो आखिर फैंटसी ही है! यदि यहाँ के लोग अपने क्षेत्र की वास्तविक समस्यायों की पहचान कर उनके खिलाफ इसी भाईचारे और एकता के साथ मोर्चा खोल लें, तो इन प्रदेशों की तकदीर बदल सकती है।
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[20 दिसम्बर 2017 को सम्पादित शीर्षक के साथ 'यूथ की आवाज़' (YKA) पर भी प्रकाशित]
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Thursday, 23 November 2017

अबोध पर अपराध थोपने के ख़तरे

कल से आ रही ख़बरों के मुताबिक दिल्ली के एक स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले चार साल के एक बच्चे पर, लगभग अपनी ही उम्र की एक सहपाठी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। बच्ची के अभिभावकों ने पुलिस में सहपाठी बच्चे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी है। रेप के वास्तविक पीड़ितों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी एफआईआर तक दर्ज करने में आनाकानी करने के लिए बदनाम पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए, इस आरोप को दर्ज़ भी कर लिया है। अब उस बच्चे पर द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसस’ (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की सम्भावना तलाशी जा रही है। अधिक विचलित करने वाली बात ये है कि मीडिया भी इस घटना की रिपोर्टिंग एक क्राइम रिपोर्ट की तरह कर रही है। चार साल के एक बच्चे को रेपिस्ट की तरह प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है। उदाहरण के लिए आजतकने इस घटना को एक बच्चे के द्वारा किये गए यौन शोषण की एक चौंका देने वाली घटना कहा है, और जनसत्ताने अपनी खबर में इसे बलात्कार की संज्ञा दी है!
अब तक जो तथ्य उभर कर सामने आये हैं, वो ये हैं कि बच्चे ने स्कूल के वाशरूम में अपनी सहपाठी के वेजाइना में ऊँगली और पेंसिल से चोट पहुँचाने की कोशिश की और बच्ची को इससे चोट पहुंची भी है। बच्ची ने घर जाकर अपनी माँ को पेट के निचले हिस्से में दर्द की बात बतायी और बाद में वह घटना भी बतायी जो उसके साथ घटी। जो कुछ हुआ वह बहुत दुखद है, लेकिन इसे यौन शोषण या बलात्कार की एक घटना की तरह प्रस्तुत करना इससे भी बहुत अधिक दुखद है। इस घटना को बच्चे के यौन दुर्व्यवहार के रूप में देखने की कोई तुक ही नहीं है। इस घटना को उस बच्चे के अपने परिवेश से ग्रहण किये गए नकारात्मक प्रभाव और उसमें विकसित हो रही हिंसक मनोग्रंथि के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। चार साल के बच्चे में कांशियस सेक्सुअल सेंस डेवलप नहीं होता, और जब तक ये सेंस डेवलप नहीं है, तब तक के किसी बच्चे की किसी एक्टिविटी को, चाहे वो सेक्सुअल ऑर्गन से ही क्यों न जुड़ी हो, यौन उत्पीड़न या यौन शोषण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। उस बच्चे को काउंसलिंग की ज़रूरत है, और सिर्फ़ उसी बच्चे को नहीं आजकल के माहौल में अधिकतर बच्चों को लगातार ऐसी काउंसलिंग की ज़रुरत है। अगर उस बच्चे को एक अपराधी की तरह प्रस्तुत किया गया तो उसमें सुधार की सम्भावना बहुत क्षीण हो जाएगी। उस बच्चे का विकास अपराधबोध के साथ होगा और उसकी विकास प्रक्रिया इस बात से भी प्रभावित होगी कि उसके साथ होने वाले बर्ताव के पीछे लोगों के बीच बनी उसकी अपराधिक छवि कहीं न कहीं काम कर रही होगी, और यह सब तब होगा जबकि अपराध करने, नहीं करने सम्बन्धी निर्णय लेने की मानसिक क्षमता उसमें है ही नहीं।
इसके अलावा उस बच्ची के भीतर यौन उत्पीड़ित होने की भावना को भर देना, जबकि उसका यौन उत्पीड़न हुआ ही नहीं है, उस बच्ची के लिए भी सकारात्मक नहीं होगा। अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ उसका सहज हो पाना कठिन होगा। हम एक फ़ॉर्मूले के तहत बच्चों को ये तो बता देते हैं कि गुड टच और बैड टच क्या है, लेकिन इस बैड टच करने वाले की उम्र और परिपक्वता भी इस मसले पर मायने रखती है, यह स्वयं अभिभावकों के लिए अच्छी तरह समझना बहुत आवश्यक है। इसतरह के टच, बैड टच होते हुए भी उसी श्रेणी में नहीं रखे जा सकते जिस श्रेणी में किसी परिपक्व व्यक्ति के बैड टच को रखा जाता है। कम उम्र के बच्चों को यह समझाना होगा कि उनकी उम्र का कोई बच्चा भी उनके प्राइवेट पार्ट को टच करे तो यह गलत है और उन्हें उसके लिए मना करना चाहिए और अपने अभिभावकों को भी इसके बारे में बताना चाहिए। लेकिन इसके बाद ये अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है कि इस घटना पर उनकी प्रतिक्रिया प्रकट-अप्रकट रूप से भी ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उनके बच्चे का यौन शोषण हुआ है। इस मसले पर अभिभावकों के बीच बातचीत होनी चाहिए और बिना कोई अपराधबोध स्थापित किये इस तरह के व्यवहार करने वाले बच्चों में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए।
जिस उम्र में बच्चों में ठीक से बोध विकसित न हो उस समय तक बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की होती है, और इसे स्वीकार करना चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस तरह की घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया बहुत संजीदगी के साथ व्यक्त होनी चाहिए। इस तरह का अपराधबोध अगर चार-पांच साल के बच्चों के बीच प्रचारित कर दिया जाए, तो इससे बच्चों के बीच न सिर्फ लैंगिक भेदभाव बढ़ेगा, बल्कि बच्चों की आपसी दुनिया और दायरे में भी एक किस्म की अजनबियत, भय और अविश्वास का माहौल तैयार हो जाएगा, जिस माहौल का शिकार आज लगभग हमारा पूरा समाज है। बच्चों की आपसी दुनिया भी जब बहुत असहज हो जाएगी, तब हमारी दुनिया और कितनी अधिक कृत्रिम, कितनी अधिक बदरंग हो जाएगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।

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[24.11.2017 को 'यूथ की आवाज (YKA)'  में और 26.11.2017 को 'स्त्रीकाल' में प्रकाशित]

Thursday, 7 September 2017

वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं!

हाल ही में 'मीट एंड लाइवस्टॉक ऑस्ट्रेलिया' के एक विज्ञापन में हिन्दुओं के देवता गणेश को मेमने का मांस खाते हुए दिखाया गया है । जबकि मिथक कथाओं और लोक आस्था के अनुसार गणेश शाकाहारी हैं, और वे मनुष्य और पशुओं के समन्वय के प्रतीक भी है । उनका धड़ मनुष्य का है तो सिर हाथी का है । हाथी भी शाकाहारी पशु होते हैं । टू लैंबद मीट वी कैन ईट ऑलकी स्थापना के साथ ख़त्म होने वाला यह विज्ञापन इन सभी कोमल और संवेदना से भरी मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ाकर रख देता है । यह शाकाहार और पशुओं के प्रति संवेदनशीलता के विचार पर भी आघात है ।
सवाल सिर्फ आस्था का नहीं है, सवाल उस मानसिकता का है, जिस वजह से देवी देवताओं के चित्र कभी चप्पलों, तो कभी टॉयलेट सीट पर उकेरे जाते हैं, तो कभी उन्हें मांस खाते हुए दिखाया जाता है, या कुछ और जो अपमानजनक हो! वह भी सिर्फ विवाद पैदा कर बेजा लाभ उठाने के लिए ! इस तरह की मानसिकता की आलोचना कर इसे हतोत्साहित करने की आवश्यकता है ।
देवी देवताओं को सिर्फ धर्म और आस्था से ही जोड़कर नहीं देखना चाहिए । ये हमारी सांस्कृतिक अस्मिता के भी अभिन्न अंग होते हैं। मिथक कथाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं । इन पर तर्क-वितर्क और आलोचना इन्हें समृद्ध ही करते हैं, लेकिन इनकी अतार्किक और विकृत व्याख्या या प्रस्तुति मन पर ही नहीं पूरी, सांस्कृतिक अस्मिता पर चोट पहुँचाने वाली होती हैं ।
फिर भी हमारा बड़प्पन इसी में है कि हम ऐसी किसी भी परिस्थिति में उग्र न हों, संयम रखें और सहिष्णुता का परिचय देते हुए इस अंदाज़ में सोचे कि 'वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं ।' इस तरह के उदार आचरण को आत्मसात कर लेना भी वास्तव में एक बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि होती है ।

सम्बंधित विज्ञापन का यूट्यूब लिंक : https://www.youtube.com/watch?v=f8kuoFGgj8s

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