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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Monday, 28 September 2020

'इतनी शक्ति हमें देना दाता' के रचयिता को श्रद्धांजलि

 

"इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न"

पूरा बचपन स्कूलों में हम ये प्रार्थना गाते हुए ही बड़े हुए। और मेरे खयाल से हर किसी को यह प्रार्थना सुंदर लगती होगी। आज भी शायद कुछ स्कूलों में दिन की शुरुआत इसी प्रार्थना से होती है। गीतकार अभिलाष ने फिल्म 'अंकुश' के लिए जब यह गीतनुमा प्रार्थना लिखी होगी, तब उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी लिखी यह प्रार्थना देशभर के शैक्षणिक संस्थानों का हिस्सा बन जाएगी। जब कभी विद्यालयों में लंबी-लंबी कतारों में करबद्ध होकर आँखें मूँदे खड़े विशाल युवा जनसमूह को वे अपनी लिखी पंक्तियाँ दोहराते; सुनते-देखते होंगे तो निश्चय ही उनका ह्रदय गर्व से प्रफुल्लित हो उठता होगा!

एक लंबे अरसे से कैंसर से लड़ते हुए आज गीतकार अभिलाष का निधन हो गया। उन्हें उनकी प्रार्थना की पंक्तियों के साथ श्रद्धांजलि। वे हमेशा इस प्रार्थना के जरिए, याद किए जाते रहेंगे। नमनय़

"जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे"!

Tuesday, 4 August 2020

अलविदा अल्काज़ी साहब! आप याद किए जाते रहेंगे

इब्राहिम अल्काज़ी भारतीय रंगमंच की दुनिया के शीर्षस्थों में शुमार थे। रंगमंच की दुनिया और उसकी शख्सियतों की मैं बेहद मामूली जानकार हूँ। लेकिन अल्काज़ी साहब का नाम इतने शीर्षस्थ अभिनेताओं को इतने आदर के साथ लेते देखा कि मान लेना पड़ा कि वे निश्चित तौर पर बहुत खास व्यक्ति हैं। नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, गोविंद नामदेव, हिमानी शिवपुरी, डॉली आहलूवालिया और भी कई दिग्गज अभिनेता-निर्देशक अपने कौशल के विकास में उनकी बड़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं। इन सबकी बातों से जो एक कॉमन बात उभर कर आती है, वह यह है कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों में अल्काज़ी साहब कठोर अनुशासन के हिमायती होने के बावजूद अपने एक-एक छात्र की प्रगति, बॉडी लैंग्वेज, व्यवहार आदि पर ध्यान रखते थे, और अपने ऑब्जर्वेशन के आधार पर ही उनसे अकेले में बुलाकर बात करते और उनकी समस्या के समाधान का प्रयास करते थे। उनकी सही प्रतिभा को पहचान पाने में मदद करते थे।

एक-एक छात्र पर ध्यान देना, उनकी कमियाँ-कमज़ोरियाँ देख पाना और उन्हें ठीक करने का प्रयास करना, हर एक छात्र की असली प्रतिभा को पहचान जाना; ये एक बहुत बड़ी बात होती है। अल्काज़ी साहब के बारे में जब जब सुना हमेशा मन में आया कि काश मैं भी किसी ऐसे गुरू, किसी शिक्षक से मिल पाती। यह एक सौभाग्य है, जो सबको नहीं मिलता। लेकिन हाँ, मन में यह ज़रूर आता है कि कमोबेश ऐसी शिक्षक ज़रूर बन सकूँ।

श्रद्धांजलि अल्काज़ी साहब! आप याद किये जाते रहेंगे।

Friday, 31 July 2020

सद्गति

आज हिन्दी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का 140वाँ जन्मदिन है। मुझे सुबह से बार-बार 'सद्गति' का ध्यान आ रहा है। इस कहानी को हिंदी की चुनिंदा प्रभावी और उम्दा कहानियों में शामिल किया जाता है।

'सद्गति' पर भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध निर्देशक सत्यजीत रे ने 45 मिनट की एक छोटी सी फिल्म बनाई है। जो शुरू से लेकर आखिर तक आपको बांधे रखती है और मात्र 45 मिनटों में उन सारी यंत्रणाओं, उन सारे अत्याचारों का अनुभव आपको करवा देती है; जो हमारे समाज में दलित कही जाने वाली जातियों पर होते रहे हैं। हिन्दी साहित्य पर बने सिनेमा में मैं 'सद्गति' को सबसे बेहतर रूपांतरणों में गिनती हूँ। मेरे खयाल से सभी को यह फिल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। मुझे इस बात का भी पूरा भरोसा है कि जब यह फिल्म बनी थी; उस समय यदि प्रेमचंद जीवित होते तो वे भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। दुर्भाग्य से अपने जीवनकाल में सिनेमा की दुनिया से जुड़े उनके अनुभव कड़वे रहे थे। इतने अधिक की उन्होंने विस्तार से लिखे अपने एक लेख में साहित्य को दूध कहते हुए तत्कालीन सिनेमा को ताड़ी की संज्ञा दे डाली थी!


Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Sunday, 5 January 2020

पंकज कपूर की 'हैप्पी'


लम्बे अरसे से पंकज कपूर अभिनीत फिल्म हैप्पीका इंतज़ार कर रही थी; बहुत साल पहले इस फिल्म का सिर्फ पोस्टर भर देखा था। फिर सालों तक सर्च करती रही; लेकिन न तो उस फिल्म की चर्चा कहीं सुनी, न ही ट्रेलर वगैरह देखने को कहीं मिला। लेकिन अभी कुछ दिन पहले ज़ी5 पर ये फिल्म अचानक से दिखाई दी। पता चला कि कई तरह की दिक्कतों से जूझते हुए इस फिल्म को परदे पर रिलीज़ करना संभव नहीं हो सका तो अंतत: 25 दिसम्बर को यह फिल्म ज़ी5 पर रिलीज़ की गयी। साल 2019 ने बेहतर हिंदी फिल्मों के ख़याल से लगभग निराश ही किया; ऐसे में साल के अंत तक पहुँचते-पहुँचते हैप्पीदेखना संतोषप्रद रहा।
पंकज कपूर अपनी हर फिल्म में कुछ अलग, कुछ नया करने के लिए जाने-जाते हैं। इस फिल्म में भी उनका अभिनय बेहतरीन है। उल्लेखनीय यह है कि इसकी कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। निर्देशक भावना तलवार ने काबिले तारीफ काम किया है। इससे पहले धर्मफिल्म से भी वो अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। फिल्म हैप्पीपूरी की पूरी ब्लैक एंड व्हाइट इफैक्ट के साथ बनायी गयी है। फिल्म के मुख्य किरदार हैप्पी पर और फिल्म पर चार्ली चैपलिन और उनकी फिल्मों का प्रभाव भी महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म का मुख्य किरदार एक बहुत ही सकारात्मक संवाद को फिल्म में कई बार दोहराता है। उसे यहाँ लिख देने का लोभ मुझसे छूट नहीं रहा है- दोस्तों ये जो ज़िन्दगी नाम की डिश है न, इसमें सबसे ज़रुरी मसाला होता है स्माइल का। इस्माइल प्लीज़ :)  

Saturday, 29 June 2019

निर्देशक अनुभव सिन्हा का सचमुच कमाल का काम है- ‘आर्टिकल-15’

2019 में पहली बार सिनेमा हॉल तक गयी और खुशी है कि कुछ सार्थक देख कर लौटी। लगभग 2 घंटे की फिल्म बिना किसी भाषण, बिना किसी जबरदस्ती ठूंसे विमर्श के वह सब बता देती है, जिसकी उससे अपेक्षा हो। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है- समाज, राजनीति, व्यवस्था सबका सच, सबकी परतें खुलती चली जाती हैं। अभिनय, संवाद, सिनेमेटोग्राफी सब में फिल्म को उम्दा कहा जा सकता है।
सुना है कि कुछ जगह ब्राह्मणों ने इस फिल्म का विरोध किया है। मुझे तो इसका कोई औचित्य नहीं लगता। विरोध करने वालों को यह फिल्म देखनी चाहिए, मुझे उम्मीद है कि इससे उन्हें खुद को बेहतर बना पाने में कुछ न कुछ मदद ज़रूर मिलेगी।
एक और बात जिसका उल्लेख होना चाहिए, वह यह कि इस फिल्म के एकदम शुरू में गीत -'कहब त लग जाई धक से' भी शामिल है, जिसे दिल्ली के जन आंदोलनों में अक्सर गाया और सुना जाता है!

Monday, 10 June 2019

गिरीश कर्नाड के निधन पर


गिरीश कर्नाड बीमार थे, इसकी मुझे बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी, इसलिए आज सुबह जब उनके जाने की खबर सुनी तो मैं स्तब्ध रह गयी! गिरीश कर्नाड रंगकर्म के क्षेत्र से जुड़ी एक ऐसी हस्ती थे जिनके नाम से भारत में पढ़ने-लिखने से सम्बन्ध रखने वाला शायद ही कोई अपरिचित हो। कन्नड़ भाषी गिरीश की दक्षिण भारत ही नहीं शेष भारत में भी जितनी ख्याति थी, वह किसी बड़ी प्रतिभा के बल पर ही संभव होता है। गिरीश ने नाटक लिखे, नाटकों में अभिनय किया, नाटकों का निर्देशन किया। उन्होंने कई हिन्दी और कन्नड़ फिल्मों में अभिनय किया, कुछ फिल्मों के लिए लिखा और कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया।
गिरीश कर्नाड की बड़ी खासियत ये थी कि वे कन्नड़ भाषा साहित्य के मर्मज्ञ भी थे। कन्नड़ फिल्मों से कन्नड़ साहित्य का रिश्ता कायम करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यू.आर.अनंतमूर्ति के बहुचर्चित उपन्यास संस्कार’ (1970) पर इसी नाम से बनी कन्नड़ फिल्म में मुख्य भूमिका निभाकर उन्होंने सिनेमा में अपने अभिनय की शुरुआत की थी। बाद में हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने भी इस सौम्य व्यक्तित्व वाले सहज अभिनेता को कई बेहतरीन फिल्मों में देखा; जिनमें निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और स्वामी’ (1977) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। उनके एक चर्चित कन्नड़ नाटक अग्निमुत्तू माले’, जो महाभारत की कथा से प्रेरित होकर बिल्कुल एक नयी दृष्टि से एक नयी तरह की कथा की सृष्टि है, को आधार बनाकर हिन्दी में अग्निवर्षा’ (2002) नाम से एक फिल्म भी बनाई गयी थी।
गिरीश कर्नाड उन संस्कृतिकर्मियों में शामिल थे जो देश में सांप्रदायिक सौहार्द और वैज्ञानिक चेतना (Scientific temper) के प्रति समर्पित थे और इसके लिए काफी मुखर भी थे। वे कट्टरपंथी हिन्दुत्व के मुखर आलोचक थे और इसलिए पिछले कुछ सालों में उन्हें बहुत परेशान भी किया गया। गिरीश कर्नाड का निधन सचमुच एक बड़ा 'शून्य' पैदा करेगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 2 March 2019

दर्शनीय है भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय

मुंबई में हाल ही में फिल्म प्रभाग (Film Division of India) परिसर में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum of the Indian Cinema) का उद्घाटन हुआ है। पिछले दिनों एक सेमिनार और रिसर्च से जुड़े काम के सिलसिले में मेरा मुंबई जाना हुआ। किसी अनजान शहर में अकेले उतरने, वहाँ के ऑटो, टैक्सी, लोकल ट्रेन में अकेले सफ़र करने के अनुभव कुल मिलाकर बेहद अच्छे रहे। 
जिस दिन वहां पहुँची उसी दिन सबसे पहले इस म्यूज़ियम को ही देखने गयी। दो भवनों में समाया यह बेहद विशाल संग्रहालय सिनेमा की पूरी यात्रा को बेहद सुन्दर तरीके से दिखाता है। इस म्यूज़ियम में आप सिनेमा के शुरूआती दौर से लेकर अब तक के इतिहास को, सिनेमा बनने की प्रक्रिया को, इसके लिए उपयोग किये जाने वाले तकनीकी उपकरणों मसलन विभिन्न प्रकार के कैमरों, साउंड रिकॉर्डर्स, रीलों व शूटिंग के समय काम आने वाले अन्य विभिन्न उपकरणों, संपादन की तकनीकों वगैरह को बेहद नजदीक से देख और महसूस कर सकते हैं। इस संग्रहालय में घूमते हुए भारतीय सिनेमा की पूरी परंपरा को आप जैसे साकार देखते हैं। कई-कई जगहों पर तो आपको खुद इस रोमांच का हिस्सा बनने का भी मौका मिलता है। मसलन आप गाँधीजी के साथ बैठ कर फिल्म देखने जैसा अनुभव कर सकते हैं, तरह-तरह के बैकग्राउंड सेलेक्ट कर अपनी ऐसी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं कि देखकर लगेगा ही नहीं कि आप सचमुच उस लोकेशन पर नहीं हैं।
इस संग्रहालय के हर एक कोने में भारतीय सिनेमा के किसी न किसी तत्व की मौजूदगी है। यहाँ के वॉशरूम तक को सिनेमा का प्रभाव ली हुई कलात्मकता से संवारा गया है। सोने पे सुहागा यह है कि यहाँ के सभी स्टाफ बेहद विनम्र और सहयोगी स्वाभाव के हैं। अभी इस म्यूज़ियम के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, इसलिए यहाँ इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई दिए। लेकिन मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही यह मुम्बई के बेहद लोकप्रिय स्थानों में से एक होगा। कभी मुंबई जाइए और समय मिले तो म्यूज़ियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा ज़रूर जाइए। यह संग्रहालय अनूठा तो है ही, इसकी टिकट भी बेहद सस्ती है।

Friday, 1 March 2019

फिल्म निर्माताओं में देशभक्ति, युद्ध और आतंकी हमले भुनाने की होड़

फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइककी कमाई थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बात से सिनेमा का व्यापार करने वाले बाकी लोग प्रेरणा न लें, यह भला कैसे हो सकता है! अभी पुलवामा में हुई हमले की दर्दनाक घटना को कुछ दिन भी नहीं बीतें हैं, भारतीय वायुसेना के एयर स्ट्राइक के दावे के बाद सीमा पर बनी तनाव की स्थिति ख़त्म भी नहीं हुई है, कई विमानों के क्रैश होने और सेना के जवानों सहित कई लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं, ठीक उसी समय यह खबर आ रही है कि पुलवामा की घटना, बालाकोट एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तानी हिरासत में लिए जाने की घटना पर फिल्में बनाने के लिए प्रोडक्शन हाउसों के बीच टाइटल रजिस्टर करवाने की होड़ मची हुई है! 

मतलब हिंदी सिनेमा के निर्माताओं के लालची दिमाग इस दुखद समय को भी भुनाने के लिए पूरी तरह तत्पर और प्रयत्नशील हैं। इस तरह की घटनाएँ उनके लिए मसाला भर हैं। इसमें और अधिक नमक-मिर्च लगाकर परोसने में तो उन्हें महारत हासिल है ही। इन मुनाफाखोरों के लिए यह सिर्फ अकूत पैसा कमाने का मौका है। देशभक्ति का टॉनिक मिलाकर ये लोग सेना के प्रति देश की जनता की भावनाओं को भुनाएंगे और सोने पे सुहागा यह होगा कि ये बैठे-बिठाये मि. प्राइम मिनिस्टर को फिल्म का हीरो भी बना देंगे! यानी हर तरह से फील गुड एंडिंग!
इतना सब कहने का एक मतलब यह भी है कि देशप्रेम के जज़्बे से प्रेरित होकर जब आप ऐसी फ़िल्में देखने का प्लान बनाते हैं, तो आप सिर्फ आर्थिक ठगी का शिकार ही नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि भावनाओं से खेलने वाले लोगों के द्वारा बेवकूफ भी बन रहे होते हैं। इस तरह का खेल समझ लेने बाद कोई पूछे ‘how’s the josh’? तो क्या कहेंगे भला!!

Sunday, 18 November 2018

निराश करती है विनोद कापड़ी की फिल्म 'पीहू'!

आने वाले हफ्ते के बाकी दिनों की व्यस्तता पहले से निर्धारित थीइसलिए कल शाम पीहू’ और मोहल्ला अस्सी’ दोनों ही फ़िल्में बैक टू बैक देखनी पड़ी। ज़िन्दगी में पहली बार बड़े पर्दे पर एक ही दिन में दो फ़िल्में देखीं। दरअसल दोनों ही फिल्मों का लम्बे समय से इंतज़ार था और मुझे लग रहा था कि इनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
जो पहली फिल्म देखी वो विनोद कापड़ी निर्देशित पीहू’ थी। इससे पहले विनोद कापड़ी मिस टनकपुर हाज़िर हों’ बनाकर तारीफें बटोर चुके हैं। इसलिए पीहू’ से अपेक्षाएं स्वाभाविक थी लेकिन इस फिल्म ने निराश किया। मुझे नहीं पता कि कुछ लोग किन भावनाओं में बहकर इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैंमुझे तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ भावनाओं को भुनाने वाली लगी। सुनने में यह भी आया है कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इस फिल्म को पुरस्कार और तारीफें भी मिली हैं, यह भी मेरे लिए आश्चर्य की बात ही है! फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि इस पूरी घटना को महज़ एक सम्वेदनशील रिपोर्ट के रूप में भी छापा या दिखाया जाता तो वह इस फिल्म से कम प्रभावी नहीं होता। यह फिल्म जो सन्देश देना चाहती हैवो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैलेकिन इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए आपको इस फिल्म को अनावश्यक रूप से लगभग दो घंटे तक झेलना पड़े तो यह बेमानी लगता है।
एक ही लोकेशन और सिचुएशन पर पूरी फिल्म को शूट करना कम खर्चीला ज़रूर होता हैलेकिन वह सचमुच बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता हैउसमें बहुत सावधानी की जरुरत होती है। विनोद कापड़ी और उनकी टीम इस मसले पर काफी लचर साबित हुई है। इस फिल्म में एक से बढ़कर एक असंगत दृश्यों की भरमार है। कई बार तो ऐसा लगा कि जब जिस चीज़ को दिखाना होता है वो चीज़ उस दृश्य में हाज़िर हो जाती है। मसलन बीच घर में बच्ची को फिनायल की बोतल मिल जाती हैइसी तरह बच्ची के हाथ से दूध की बोतल गिर जाने पर उसे वहीं पर पोछा भी मिल जाता है! मुझे लगता है कि निर्देशक ने सोचा होगा कि इन पहलुओं पर कोई बारीकी से ध्यान नहीं देगा जबकिसच यह है कि फिल्म के दौरान यह सारी चीज़ें बहुत डिस्टर्ब करती हैं और यह कोई बारीक नहीं बल्कि साफ़ दिखने वाला अंतर है। एक दृश्य में बच्ची अपनी मृत माँ के ज़ख़्मी चेहरे पर बहुत सारी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाती है और अगले कुछ दृश्यों में वह क्रीम कभी चेहरे पर दिखाई देती हैऔर कभी गायब हो जाती है। ये कुछ संकेत भर हैंइस फिल्म में ऐसी गलतियों की भरमार है। गौर से देखेगें तो इस फिल्म के कई दृश्य और घटनाएँ आपको अतार्किक लगेंगी। एक दृश्य को लेकर हालांकि मैं कोई एक्सपर्ट कमेंट नहीं कर सकती लेकिन मेरे लिए यह ताज्जुब और जिज्ञासा का विषय ज़रूर है कि क्या नींद की चार गोलियां खाकर भी दो साल की बच्ची को महज़ तीन-चार घंटे की नार्मल नींद ही आएगीऔर उसके बाद उठकर वह पूरी तरह एक्टिव हो सकती हैइस फिल्म में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि यह मेडिकली प्रूव्ड होमुझे इसकी जानकारी नहीं है। मेरे खयाल से फिल्म की पटकथा बहुत दुरूस्त नहीं है। इस पर बहुत मेहनत करने की जरूरत थी जिसे शायद बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। शायद बहुत सारा ध्यान एक छोटी बच्ची को फिल्माने की चुनौतियों से निपटने पर ही लगा दिया गया।
एक छोटी बच्ची से प्रभावी अभिनय करवाना सचमुच बहुत कठिन काम है। इस फिल्म की बड़ी खासियत भी यही बताई जा रही थी वो कि एक बहुत छोटी बच्ची से निर्देशक ने चुनौती भरा अभिनय करवाया है। इसमें कोई शक नहीं कि पीहू विश्वकर्मा सचमुच बहुत प्यारी बच्ची हैऔर हर बच्चे की तरह उसकी सहज हरकतें लोगों को पसंद आती हैं और इसे उतारने के लिए निर्देशक और पूरी टीम ने बहुत मेहनत भी की होगीलेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसके बावजूद निर्देशक ने फिल्मांकन का कोई बहुत महीन काम नहीं किया है। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों ने छोटे-छोटे बच्चों से बहुत असाधारण काम करवाए हैं। एक उदाहरण के लिए 1966 में प्रदर्शित हुई चेतन आनंद की एक बहुत ही साधारण फिल्म आखिरी ख़त’ का जिक्र किया जा सकता है जिसमें महज़ सवा साल के बच्चे से बहुत बेहतरीन अभिनय करवाया गया है। वास्तव में बहुत साधारण स्तर के निर्देशकों ने भी चाइल्ड आर्टिस्ट्स से बहुत बेहतर काम करवाए हैं।
पीहू’ के प्रमोशन में इस तरह की भावनात्मक अपील की जा रही है कि जो अपने परिवार से प्यार करते हैं वो यह फिल्म देखने ज़रूर जाएँ। लेकिन फिल्म देखने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि आर्थिक लाभ के लिए यह एक किस्म का भावनात्मक दोहन भर है। इस फिल्म को वो लोग ज़रूर देखने जाएँ जो फ़िल्में देखकर अपनी राय बनाने में यकीन करते हों और हर बार की तरह कहूँगी कि हो सकता है उनकी राय मुझसे अलग हो। जहाँ तक परिवार से प्यार करने का प्रश्न है और यदि आप वो करते हैंतो आपके लिए कोई समस्या ही नहीं है। हम सबको अपने-अपने जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए। शकमतभेदमामूली झगड़ों की वज़ह से इसे तबाह नहीं कर लेना चाहिए। हमें इन सारी चीजों से निपटना आना चाहिए। यहाँ तक कि संबंधों के बीच जब यह लगने लगे कि जीवनयापन दूभर हो रहा हैतब जीने के नए और उत्साहजनक तरीके और रास्ते तैयार कर लेने चाहिए। यह जीवन जीने के लिए मिला हैइसके साथ कुछ उत्तरदायित्व बंधे हुए हैंहमें उन सबका सम्मान करना चाहिए।
दूसरी देखी गयी फिल्म मोहल्ला अस्सी’ ने निराश नहीं किया। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म बहुत सारे प्रक्रियागत झंझटों और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझते हुए प्रदर्शित हुई है। इसपर विस्तार से दूसरे पोस्ट में लिखूँगी। बहरहाल इतना जरूर कहूँगी कि यह फिल्म देखने लायक है। साहित्य पर फिल्म बना पाने की हिम्मत कम फिल्मकार करते हैं। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ हिम्मत करते हैं बल्कि इसे एक अच्छी फिल्म में तब्दील करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। उनकी पहली फिल्म पिंजर’ भी इसका उदाहरण है। हम अपने पैसे खर्च कर इस तरह कि फिल्में देखेंगे तभी फिल्माकारों में इस तरह की फिल्में बनाने की हिम्मत बची रहेगी।

Thursday, 25 October 2018

होप और हम

कई फिल्मों के बारे में हम प्रमोशन के ज़रिये नहीं बल्कि उनके ट्रेलर रिलीज़ होने पर जानते हैं। इसके बाद वो फिल्म कब रिलीज़ होती है, किन सिनेमाघरों में लगती है, बहुत बार तो पता ही नहीं चलता! ऐसी कुछ फ़िल्में बाद में किसी दिन यूट्यूब पर दिख जाती हैं और इनमें से कई फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें देखने के बाद लगता है कि ऐसी फिल्मों को सिनेमाघरों में अच्छे-खासे दर्शक मिलने चाहिए थे।
पिछले दिनों एक ऐसी ही फिल्म आई थी ‘होप और हम’। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सोनाली कुलकर्णी, आमिर बशीर, नवीन कस्तूरिया और बाल कलाकार कबीर शेख जैसे लोकप्रिय कलाकारों ने काम किया है। इनके अलावा भी जो कलाकार हैं सबने अपने हिस्से का अभिनय बेहद संजीदगी के साथ किया है। लेकिन इस फिल्म की जो सबसे बड़ी खासियत है, वह है इसकी सकारात्मकता। सुदीप बंदोपाध्याय ने एक अच्छे कथानक को बहुत सादगी से फिल्माया है।
मुझे यह फिल्म बहुत विशिष्ट लगी हो ऐसा नहीं है, लेकिन यह मुझे खूबसूरत ज़रूर लगी। ऐसी फ़िल्में बहुत कम न सही तो बहुत ज़्यादा भी नहीं बनती। यह फिल्म निराशा और पलायन दोनों ही स्थितियों से दूरी बनाये रखने का सन्देश देती है। इस फिल्म में हर आयुवर्ग के लोगों के लिए कुछ न कुछ प्रेरणादायक है। फिल्म का टाइटल ट्रैक है- ‘होप और हम साथ रहें हर दम’। वाकई ज़िन्दगी में आशाओं का साथ बना रहना चाहिए, इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

Friday, 12 October 2018

तुम्बाड से लौटकर


कई कारणों से 'तुम्बाड' देखने जाना चाहिए। लालच बुरी बला है, इसे नये कथ्य और रूपकों के साथ देखने के लिए। फिल्म की ज़बरदस्त सिनेमेटोग्राफी के लिए। क्रिएटिव डायरेक्टर के बतौर आनंद गांधी की क्रिएटिविटी और निर्देशक के बतौर पहली फिल्म कर रहे राही अनिल बारवे के कौशल को देखने के लिए। और सबसे खास 'शिप ऑफ थीसियस' में बेहद सहज स्वाभाविक अभिनय के माध्यम से दर्शकों का दिल जीतने वाले सोहम शाह की अभिनय क्षमता के विस्तृत रेंज को देखने के लिए। 
तीन चैप्टरों में बंटी इस फिल्म का पहला चैप्टर हो सकता है आपको उतना नहीं बांध पाए, लेकिन दूसरे चैप्टर से आप अंत तक पूरी तरह इस फिल्म से बंध जाएंगे। और हां नन्हें एक्टर समद के लिए भी जाना चाहिए जिसकी अभिनय क्षमता का कमाल 'गट्टू' और 'हरामखोर' जैसी फिल्में देखने वाले दर्शक देख चुके हैं। मेरा अनुभव रहा कि यह फिल्म लालच के प्रति आगाह करती है, लेकिन खाली हाथ लौटने नहीं देती।

Sunday, 23 September 2018

कल्पना लाजमी का असमय निधन

चर्चित फिल्म निर्देशक कल्पना लाज़मी नहीं रहीं। वे लम्बे समय से लीवर और किडनी की समस्या से जूझ रही थीं। 64 वर्ष की कल्पना ने आज सुबह मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
कल्पना में कमाल की रचनात्मक प्रतिभा थी और सिनेमा को लेकर उनका नज़रिया उन्हें खास बनाता है, यही कारण है कि उन्होंने 'रूदाली', 'दरमियां', दमन' सहित स्त्री केन्द्रित कई उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण फिल्में बनायी। कल्पना उन स्त्री निर्देशकों में शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म निर्देशन की दुनिया में तब कदम रखा जब इस क्षेत्र में अमूमन पुरूषों का ही बोलबाला था, और अपने काम से यह साबित किया कि उनकी निर्देशकीय क्षमता बेमिसाल है। कल्पना का असमय निधन बहुत दुखद है। हिन्दी सिनेमा को चाहनेवाले उन्हें उनके काम से हमेशा याद करेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 8 September 2018

वक्त काटने की चीज़ नहीं है सिनेमा

हम कल रिलीज़ हुई फिल्म गली गुलियाँदेखने गये थे। इस फर्स्ट डे फर्स्ट शो में हम दो लोगों के अलावा छः और लोग थे, यानी लगभग डेढ़ सौ लोगों की क्षमता वाले हॉल में लगभग 140 सीटें खाली थीं। इस तरह का अनुभव पहली बार नहीं हुआ है। हैदराबाद के सिनेमा घरों में इससे पहले भी हमने कुछ ऐसी फिल्में देखी हैं, जिन्हें देखने के लिए इससे भी कम लोग पहुँचे थे, और इससे भी अधिक सीटें खाली थीं। लेकिन कल पहली बार मुझे मल्टिप्लैक्स कर्मचारियों के एक अजीब किस्म के अनुरोध का सामना करना पड़ा। हुआ यह कि जब फिल्म 25-30 मिनट बीत चुकी थी, और हम उससे पूरी तरह जुड़ चुके थे, तब कुछ कर्मचारी हमारे पास आए और उनमें से एक ने कहा : ‘Ma’am because very few people watching this movie, so can you shuffle to any other movie?' यह सुनकर मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, क्यूंकि मैंने कभी इस तरह के किसी प्रस्ताव की कल्पना तक नहीं की थी। खैर मैंने उससे दृढ़तापूर्वक कहा : No! thank you. We have paid and come for this movie. शुक्र था कि उसने मुझ ही से पूछ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और हॉल में बैठे बाकी लोगों से यही सवाल पूछने की उसकी हिम्मत नही हुई या उसने ज़हमत नहीं उठाई। जो लोग फिल्में पसंद करके व प्लान करके देखने जाते हैं, वे इस तरह के प्रस्ताव भर को अपनी तौहीन समझ बैठें तो कुछ ग़लत नहीं होगा।
मुझे लगता है कि आज भी इस सोच से बहुत सारे फिल्मकार, सिनेमा हॉल वाले और ख़ुद कई दर्शकभी इत्तेफाक रखते हैं कि फिल्में समय काटने का माध्यम भर हैं, यानी आँखों के आगे किसी कहानी पर फिल्माए गये ठीक-ठाक सीन चलते रहें और कानों तक समझ में आने वाले डायलॉग पहुँचते रहें तो वक्त कट ही जाएगा! जबकि हक़ीकत यह है कि सिनेमा का असली दर्शक वक्त काटने नहीं, वक्त निकालकर सिनेमा देखने पहुँचता है।
अब फिल्म पर आती हूँ गली गुलियाँका ट्रेलर पिछले हफ्ते ही देखा था। ट्रेलर देखकर फिल्म देखने की इच्छा हुई, दूसरा कारण यह रहा कि फिल्म में मनोज वाजपेयी, रणवीर शौरी और नीरज कबी जैसे अक्सर पसंद किये जाने वाले अभिनेता हैं। फिल्म बाल उत्पीड़न और बाल मनोविज्ञान की कोमल से लेकर विस्फ़ोटक जटिलताओं तक को उभार पाने में सफल हुई है, लेकिन इसमें कुछ कमजोर कड़ियाँ भी हैं, और यह मुझे किसी साधारण फिल्म से बेहतर श्रेणी की फिल्म नहीं लगी। फिल्म का अभिनय पक्ष भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इस फिल्म में मनोज वाजपेयी के अभिनय की नाहक ही अधिक तारीफ हो रही है, वे इससे बहुत बेहतर काम कर सकते थे। अभिनय की तारीफ करनी हो तो अपेक्षाकृत कम चर्चित शहाना गोस्वामी के अभिनय की तारीफ होनी चाहिए। मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक नीरज कबी ने नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई सेक्रेड गेम्समें अपने अभिनय से मुझे निराश किया था, लेकिन गली गुलियाँमें उन्होंने निराश नहीं किया है। इसके अलावा रणवीर शौरी के हिस्से जितनी भूमिका आयी है, उन्होंने भी उसे अच्छे से निभाया है।

Tuesday, 10 July 2018

**** हिन्दी सिनेमा में हाशिये की यौनिकता ****

हाशिये की लैंगिक पहचान या हाशिये की यौनिकता को फिल्मों का विषय बनाने वाली फिल्में अभी खुद सिनेमा के हाशिये पर हैं। इसके बावजूद ये फ़िल्में समाज की मानसिकता में हो रहे बदलावों को दिखाने और बदलावों के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी भाषा से इतर विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी इस तरह की उल्लेखनीय फिल्में बनाई जा रही हैं।
बया (अप्रैल-जून-2018) 
संपादक- गौरीनाथ
हिंदी सिनेमा में हाशिये का समाज : 1(विशेषांक) 
अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन- II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।

Wednesday, 9 May 2018

ओमेरटा देखने के बाद

हंसल मेहता की पिछली फिल्म 'सिमरन' को जो लोग उनकी फिल्म समझ कर देखने गए थे, उन लोगों को बहुत निराशा हाथ लगी थी। लेकिन 'ओमेरटा' देखने वालों को बेशक इस बात का सुकून होगा कि वे हंसल मेहता की फिल्म ही देख रहे हैं।
इस फिल्म के साथ हिन्दी सिनेमा के दर्शकों को दो तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, एक तो यह कि इस फिल्म के अधिकांश हिस्से में संवाद की भाषा अंग्रेजी है और दूसरी यह कि यह फिल्म वास्तविक जीवन के जिस किरदार पर केन्द्रित है उससे खुद को जोड़ पाने में तमाम भारतीय दर्शकों को समस्या हो सकती है। लेकिन यदि आप गंभीर सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं तो यह दोनों ही समस्याएं आपके लिए बाधा नहीं बनेंगी।
युवा पीढ़ी के लिए यह एक देखने लायक फिल्म है, जो उनके सोच विचार और व्यवहार के स्तर पर सकारात्मक असर डालेगी। इस फिल्म में विषय चयन से लेकर प्रस्तुति तक में बहुत मेहनत दिखाई देती है और इन दोनों ही स्तरों पर दर्शक वर्ग की रुचि के खयाल से फिल्मकार ने एक हद तक खतरा उठाया है।
चिंता का विषय यह है कि इस फिल्म को पर्याप्त संख्या में दर्शक नहीं मिल रहे हैं। हंसल मेहता ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि सिनेमाघर के मालिकों ने इस फिल्म को जो समय दिया है वह दर्शकों के लिए सुविधाजनक समय नहीं है, इस वजह से भी इस फिल्म को कम दर्शक मिल रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह फिल्म अपनी लागत नहीं निकाल पाई तो स्थिति उनके लिए बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाएगी!
मेरे खयाल से अच्छी फिल्मों के कद्रदानों को 'ओमेरटा' देखने के लिए सिनेमाघरों तक जाना चाहिए ताकि हंसल मेहता इस तरह की फिल्में बनाने का साहस करते रह सकें और अच्छी फिल्में बनाने वाले अन्य फिल्मकारों की भी हिम्मत बढ़े।

Monday, 30 April 2018

दादासाहेब फाल्के के फ़साने में राजा रवि वर्मा का ज़िक्र

भारतीय चित्रकला के बड़े प्रवर्त्तक राजा रवि वर्मा के जीवन पर बनी केतन मेहता की फिल्म 'रंगरसिया' में दो प्रसंग ऐसे हैं जो आधुनिकता और तकनीकी उन्नति के प्रति रवि वर्मा के सम्मान, अभिरूचि और उदारता को दिखाते हैं। रवि वर्मा ने जब कैमरे से खींची हुई तस्वीरों को पहली बार देखा तो चित्रकला की तुलना में श्रम और समय की भारी बचत और अधिक सटीक छायांकन को देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।
दूसरा प्रसंग यह है कि मुंबई (तब के बंबई) में जब 1896 में पहली बार ल्युमिरे बंधुओं ने फिल्म का प्रदर्शन किया था तो उन्होंने बंबई के तमाम गणमान्य नागरिकों को यह प्रर्दशन देखने के लिए आमंत्रित किया। राजा रवि वर्मा भी इस प्रर्दशन को देखने के लिए आमंत्रित किए गए थे। उन्होंने जब पर्दे पर चलती हुई तस्वीरों को देखा तो वे बहुत अधिक आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने बहुत प्रसन्नतापूर्वक कहा कि अब तक तो चित्र सिर्फ उतारे जाते थे, लेकिन इस अविष्कार में तो चित्र हम सब की तरह चल-फिर रहे हैं! वाह! लाजवाब।
उसी प्रर्दशन में उन्होंने देखा कि एक नवयुवक ल्युमिरे बंधुओं को फिल्म प्रर्दशन में बड़े उत्साह के साथ हर तरह से सहयोग कर रहा था। बाद में इस युवक ने रवि वर्मा के सहायक चित्रकार के रूप में भी काम किया। जब रवि वर्मा की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी तो उन्होंने अपना प्रेस बेच दिया था। इससे उन्हें जो राशि मिली उसका एक अच्छा-खासा हिस्सा अपने उस सहयोगी युवक को भी दिया था, जिसमें उन्होंने फिल्म कला के प्रति अभिरुचि और ललक देखी थी, ताकि वह अपनी इस अभिरुचि और ललक को दिशा दे सके‌। उस युवक की यात्रा आगे भी सरल नहीं रही लेकिन उस युवक में फिल्म कला के प्रति इतना अगाध समर्पण था कि उसने तमाम आर्थिक व अन्य चुनौतियों को पार करते हुए भारतीय फिल्म कला को स्थापित करने वाले व्यक्ति के रूप में ख्याति पाई। उस युवक का नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से भी जाना जाता है। आज दादासाहेब फाल्के का 148वां जन्मदिन है।
मुझे आज याद दादसाहेब को करना था लेकिन इस पोस्ट का एक बड़ा हिस्सा रवि वर्मा पर केन्द्रित हो गया, इसका कारण यह है कि रवि वर्मा की फाल्के को आर्थिक सहायता देकर फिल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की जो घटना है वह इसलिए भी हमेशा याद की जानी चाहिए, कि यह एक पारंपरिक कला विधा से जुड़ी बड़ी हस्ती का एक आधुनिक कला विधा को स्थापित करने में दिया गया योगदान भी है। ऐसा विरले ही होता है! इसलिए जब कभी भारतीय फिल्मों की चर्चा हो, उसके जनक दादासाहेब फाल्के के संघर्षों और योगदान की चर्चा हो तो उस चर्चा में राजा रवि वर्मा का ज़िक्र अनिवार्य रूप से होना चाहिए।

Saturday, 31 March 2018

एक संवेदनशील अभिनेत्री के जीवन की त्रासदी


मीना कुमारी एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील इंसान भी थीं। यह कहना उचित होगा कि उनका संवेदनशील व्यक्तित्व ही उनकी अदायगी में ताउम्र झलकता रहा। इस खूबसूरत अभिनेत्री के द्वारा शिद्दत से निभाए गये किरदारों में से अधिकांश के हिस्से त्रासदी हुआ करती थी और इसी ने उन्हें 'ट्रेजडी क्वीन' के बतौर स्थापित कर दिया था।
परदे की इस 'ट्रेजडी क्वीन' का अपना जीवन भी त्रासदियों से भरा हुआ था, यह तब उन्हें परदे पर देखने वाले कम ही प्रशंसकों को मालूम रहा होगा। बचपन से ही त्रासदियों से उनका जो नाता जुड़ा वह ताउम्र पीछा करता रहा। अठारह वर्ष की उम्र में अपने से लगभग दुगुने उम्र के लेखक-निर्देशक कमाल अमरोही से उन्होंने शादी की थी। मीना के ख्वाब तब बिखरने लगे जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को बात-बात पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वे मीना कुमारी को लगातार निगरानी में रहने वाली एक गुलाम की तरह अपनी जिन्दगी में रखना चाहते थे। उनके द्वारा कई शर्तें मीना कुमारी पर लाद दी गयी थीं। मीना इन सबको सहते हुए भी सम्बंध को बचाए रखने की लगातार कोशिश करती रहीं, लेकिन जब स्थितियाँ बर्दाश्त से बिल्कुल बाहर हो गयीं तो उन्होंने पति का घर छोड़ दिया। लेकिन यातना और प्रताड़ना का यह दौर यहीं खत्म नहीं हुआ। प्रेम की उनकी तलाश में मिले धोखे ने उन्हें शराब की बुरी लत लगा दी। उसी दौर में उनके मायके के कुछ रिश्तेदारों ने उनका भरपूर दोहन किया और धूर्ततापूर्वक उनकी कमायी सारी दौलत हड़पने में लगे रहे। अपने ही घर में वे भिखारियों की तरह जीने को मजबूर कर दी गयीं थीं। उन्हें ढंग से खाना तक नहीं दिया जाता था। शराब की लत ने उन्हें लीवर सिरोसिस की गंभीर बीमारी दी और वही उनकी मौत का कारण भी बनी।
मीना कुमारी अपने एकांत क्षणों में लिखा करती थीं। उनकी तमाम शेरो-शायरी में उनकी भोगी हुई गहरी वेदना को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। जैसे उनकी लिखी इन दो उम्दा ग़ज़लों को देखिए : चाँद तनहा है आसमां तनहा / दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहाया फिर टुकड़े-टुकड़े दिन बीता और धज्जी-धज्जी रात मिली / जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली!