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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Sunday, 24 May 2020

जड़ी-बूटी युक्त गरम पानी पीने वाले प्रदेश से हम कुछ तो सीखें


भारत के जिन राज्यों में कोरोना संक्रमण के शुरूआती मामले देखे गये थे, उनमें केरल भी शामिल था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस तरह की खबर बार-बार ध्यान खींच रही है कि भारत में कोरोना से कारगर तरीके से निपटने में केरल सबसे अग्रणी रहा है। कोरोना पीड़ितों की रिकवरी दर और नये संक्रमणों की रोकथाम को लेकर केरल की खूब तारीफ हो रही है। इसके लिए केरल सरकार और स्थानीय प्रशासन के प्रबंधन और सक्रियता की तो तारीफ हो रही है- मलयाली जीवनशैली की कुछ अन्य विशेषताओं ने भी लोगों का ध्यान खूब खींचा है। इन्हीं में एक है वहाँ की स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग नजरिये के साथ विकसित हुई खान-पान की संस्कृति। उनकी खान पान की स्वस्थ आदतों को; मजबूत इम्यून सिस्टम का कारण मानकर; केरल वालों की खूब तारीफ हो रही है। हो भी क्यों न!
अपनी केरल यात्रा की यादें अब भी ताज़ा है। 2018 अंत में जब केरल गयी थी तब दिसम्बर में उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की तुलना में वहाँ ठीक विपरीत मौसम था। चिलचिलाती धूप और पसीने से तर-ब-तर कर देने वाला मौसम! कभी-कभी राहत पहुँचाती बारिश की फुहारें! लेकिन इस गरम मौसम में भी एक मलयाली मानुष को आप त्रिशुर स्टेशन पर आइआरसीटीसी कैंटीन में गरम पानी के बदले ठंडा पानी परोसने पर टोकते हुए और नाराजगी जाहिर करते हुए सुनेंगे तो आपको कैसा लगेगा? मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा क्योंकि यह मेरी वापसी के समय का प्रसंग था; और तब तक मैं स्थानीय खान पान की आदतों से न सिर्फ परिचित हो गयी थी बल्कि पिछले तीन दिनों से उसी खान पान का लुत्फ भी उठा रही थी। इसलिए समझ पा रही थी कि कुछ-कुछ लाल रंग लिए गरम पानी यहाँ के स्वास्थ्य सजग लोगों के जीवन का सहज हिस्सा है।
केरल बेहतरीन गुणवत्ता के मसालों का प्रचूर मात्रा में उत्पादन करने वाला राज्य है। इसके बावजूद कम से कम मेरा अपना अनुभव यही रहा कि यहाँ भोजन बनाने में तेल-मसालों का बहुत कम उपयोग किया जाता है। इस बात का अनुभव आपको वहाँ के हर छोटे-बड़े रेस्टोरेंट में होगा। सब्जियां तो प्रायः लगभग उबली हुई होती थीं। मैं जहाँ ठहरी हुई थी वहाँ हर बार भोजन के साथ मीठे के नाम पर सिर्फ केला ही परोसा गया। सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के साथ- पका केला, उबला हुआ केला या फिर भुना हुआ या फिर केले से ही बना कुछ और। ऐसा माना जाता है कि केला मीठा खाने की इच्छा की पूर्ति तो करता है और साथ ही भोजन को पचाने में भी बहुत मदद करता है। चावल के नाम पर वहाँ अधिकतर लोग मोटा चावल खाना ही पसंद करते हैं। चावलों में मोटे चावल स्वास्थ्य के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाते हैं।
[यह तस्वीर मैंने एक दिन त्रिशुर में खाने से पहले थी]

अब फिर से गरम पानी का ज़िक्र। केरल के खान-पान में मुझे सबसे ज्यादा जिस चीज़ ने आकर्षित किया था; वह यहाँ परोसे जाने वाला पानी ही था। मुझे बाताया गया कि वहाँ लोग साल के बारहों महीने खाने के साथ गरम पानी ही पीना पसंद करते हैं। पारंपरिक तौर पर भी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मत से भी ठंडे पानी की जगह गरम पानी का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत-बहुत अधिक लाभकारी माना जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ सादा गरम पानी कहाँ; औषधीय गुणों वाले खास किस्म की जड़ी-बूटियों के साथ उबाला हुआ पानी इस्तेमाल किया जाता है और यही कारण है कि उस पानी का रंग लालिमा लिए होता है। खाने के साथ, खाने से पहले और खाने के बाद जड़ी-बूटी युक्त हल्के लाल रंग का पानी पीना। जब पहली बार मुझे वह पानी पीने को मिला तो मुझे लगा कि पानी गंदा तो नहीं, शायद ग्लास अच्छे से साफ नहीं किया गया हो। मैंने वो पानी सिंक में फेंककर दूसरे ग्लास में जग से फिर से पानी उड़ेला। फिर से पानी का वही रंग और गरमाहट तो थी ही। लेकिन तभी देखा कि सामने वाले टेबल पर उसी रंग का पानी ग्लास में उड़ेल कर मजे से पिया जा रहा है। डरते-डरते मैंने भी पानी को हल्का सा टेस्ट किया और वह पानी मुझे अच्छा ही लगा। सादा गरम पानी मुझसे पिया नहीं जाता रहता तो उन जड़ी बूटियों का ही कमाल कहेंगे कि वह पानी मुझे ठीक लगा, बल्कि धीरे-धीरे बहुत स्वादिष्ट लगने लगा था। मैं खाने के मेज पर उस पानी के परोसे जाने का इंतजार किया करती थी। खाना कम खाया जाता था और वह पानी कई ग्लास पी जाती थी। हर बार पानी पीते हुए यही सोचती थी कि कुछ दिन य़हाँ रह जाऊं तो मैं ये गरम पानी पी-पी कर ही स्वस्थ और एकदम पतली हो जाउंगी।
जहाँ मिठाई के नाम पर ज्यादातर किस्म-किस्म के उबाले या भुने, पके या कच्चे केले से बने व्यंजन खाये जाते हों, और गर्मी में भी गरम और जड़ी-बूटी युक्त पानी पिया जाता हो, वहाँ की खान पान की संस्कृति तो अनुकरणीय होगी ही।
हम लोगों की आदतें तो ये हैं कि कोरोना काल में बाज़ार बंद हुए तो हम सब खुद ही वो सारी चीज़ें घरों में ही बनाने लग गये। बेहिसाब तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीज़ें- मानो पकौड़े-समौसे-मिठाईयों की दुकान और ढ़ाबे हमने अपने-अपने किचन में ही खोल लिये थे। इसकी कीमत भी कोई और नहीं हम ही चुकाएँगे। खान-पान के मामले में हम केरल से थोड़ा-कुछ तो सीखें!

Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Monday, 18 November 2019

डॉ. फ़िरोज़ की नियुक्ति का विरोध और जगन्नाथ-लवंगी प्रसंग


बीएचयू में संस्कृत के सहायक प्राध्यापक के रूप में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों में से कुछ छात्रों के विचार एक न्यूज़ चैनल की वीडियो फुटेज के माध्यम से जानने को मिले। अधिकांश छात्रों ने बताया कि वे काशी की परंपरा और गरिमा को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोई विधर्मी और अनार्य उन्हें धर्म पढ़ाए-सिखाए ये उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने पक्ष को अधिक मजबूती से पेश करने के लिए एक छात्र ने पंडितराज जगन्नाथ से जुड़े प्रसंग का ज़िक्र करते हुए कहा कि आचार्य जगन्नाथ भले ही बहुत प्रतिष्ठित विद्वान और धर्मज्ञ रहे हों, लेकिन काशी के समाज ने उनका भी इसलिए बहिष्कार कर दिया था; क्योंकि उन्होंने एक यवन (मुसलमान) कन्या से शादी की थी। अफसोस है कि उस छात्र ने इस प्रसंग का अधूरा ज़िक्र किया!
लोगों के बीच यह प्रसंग जिस रूप में सुरक्षित है, वास्तव में वह आत्मा की गांठे खोल देने वाला है। कहते हैं कि पंडितराज जगन्नाथ का लवंगी नाम की जिस लड़की से प्रेम हुआ था, वह शाहजहाँ के परिवार में पली-बढ़ी एक अनाथ कन्या थी। उसके माता-पिता मुसलमान थे।
लवंगी से विवाह के बाद आचार्य जगन्नाथ काशी लौटे। काशी के विद्वानों ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया, उनका बहिष्कार कर दिया और स्थिति यह हो गई कि एक बेहद योग्य और विद्वान व्यक्ति का जीवन-यापन तक दूभर हो गया। ऐसी स्थिति में बहुत क्षुब्ध होकर पंडितराज ने कहा कि काशी के पंडित उनका बहिष्कार करने वाले कोई नहीं होते; काशी के द्वारा उन्हें और उनके विवाह को स्वीकारने-अस्वीकारने का निर्णय सिर्फ माँ गंगा कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि काशी का समाज गंगा तट पर आकर खुद अपनी आँखों से देख सकता है कि माँ गंगा उन्हें ठुकराती हैं या स्वीकारती हैं।
तय तिथि को नियत घाट पर काशी निवासियों की पूरी भीड़ जमा हो गई। लवंगी के साथ पंडितराज जगन्नाथ भी घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठ गए। इसके बाद पंडितराज ने गंगा की स्तुति में श्लोक लिखने शुरू किए। कहा जाता है कि उनके एक-एक श्लोक रचने और पढ़ने के साथ गंगा का जल स्तर भी एक-एक सीढ़ी ऊपर आता जाता। इस तरह उन्होंने कुल 52 श्लोकों की रचना की और गंगा का जल उस अंतिम बावनवी सीढ़ी तक पहुँच गया जहाँ पंडितराज और लवंगी बैठे हुए थे। अपने आह्वान पर गंगा के उन तक पहुँचने पर पंडितराज भाव विह्वल हो गए और उनका गला रूंध गया। रूंधे गले से उन्होंने प्रार्थना की कि माँ गंगे उन्हें और लवंगी को स्वीकार कर अपनी शरण में लें। तब पूरी भीड़ के बीच से गंगा ने दोनों को इस तरह से समेटा जैसे कोई माँ अपने बच्चों को गोद में उठा रही हो। इसके बाद कुछ क्षणों में ही गंगा का जलस्तर सामन्य हो गया।
यह प्रसंग धर्म सम्प्रदाय के कृत्रिम कट्टर विभाजन को नकार कर मनुष्य की गरिमा को स्थापित करता है। कहा जा सकता है कि मनुष्यता को स्थापित करने के लिए जगन्नाथ और लवंगी ने अपना बलिदान दिया था!
लेकिन कहते हैं कि काशी के कट्टर विद्वान समाज पर इस बलिदान का भी कोई विशेष असर नहीं पड़ा था। डॉ.फिरोज की नियुक्ति का विरोध करते हुए एक छात्र द्वारा पंडितराज जगन्नाथ के प्रसंग का अधूरा जिक्र; इसी बात को साबित करता है कि वह कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी कायम है!!

Saturday, 2 March 2019

दर्शनीय है भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय

मुंबई में हाल ही में फिल्म प्रभाग (Film Division of India) परिसर में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum of the Indian Cinema) का उद्घाटन हुआ है। पिछले दिनों एक सेमिनार और रिसर्च से जुड़े काम के सिलसिले में मेरा मुंबई जाना हुआ। किसी अनजान शहर में अकेले उतरने, वहाँ के ऑटो, टैक्सी, लोकल ट्रेन में अकेले सफ़र करने के अनुभव कुल मिलाकर बेहद अच्छे रहे। 
जिस दिन वहां पहुँची उसी दिन सबसे पहले इस म्यूज़ियम को ही देखने गयी। दो भवनों में समाया यह बेहद विशाल संग्रहालय सिनेमा की पूरी यात्रा को बेहद सुन्दर तरीके से दिखाता है। इस म्यूज़ियम में आप सिनेमा के शुरूआती दौर से लेकर अब तक के इतिहास को, सिनेमा बनने की प्रक्रिया को, इसके लिए उपयोग किये जाने वाले तकनीकी उपकरणों मसलन विभिन्न प्रकार के कैमरों, साउंड रिकॉर्डर्स, रीलों व शूटिंग के समय काम आने वाले अन्य विभिन्न उपकरणों, संपादन की तकनीकों वगैरह को बेहद नजदीक से देख और महसूस कर सकते हैं। इस संग्रहालय में घूमते हुए भारतीय सिनेमा की पूरी परंपरा को आप जैसे साकार देखते हैं। कई-कई जगहों पर तो आपको खुद इस रोमांच का हिस्सा बनने का भी मौका मिलता है। मसलन आप गाँधीजी के साथ बैठ कर फिल्म देखने जैसा अनुभव कर सकते हैं, तरह-तरह के बैकग्राउंड सेलेक्ट कर अपनी ऐसी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं कि देखकर लगेगा ही नहीं कि आप सचमुच उस लोकेशन पर नहीं हैं।
इस संग्रहालय के हर एक कोने में भारतीय सिनेमा के किसी न किसी तत्व की मौजूदगी है। यहाँ के वॉशरूम तक को सिनेमा का प्रभाव ली हुई कलात्मकता से संवारा गया है। सोने पे सुहागा यह है कि यहाँ के सभी स्टाफ बेहद विनम्र और सहयोगी स्वाभाव के हैं। अभी इस म्यूज़ियम के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, इसलिए यहाँ इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई दिए। लेकिन मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही यह मुम्बई के बेहद लोकप्रिय स्थानों में से एक होगा। कभी मुंबई जाइए और समय मिले तो म्यूज़ियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा ज़रूर जाइए। यह संग्रहालय अनूठा तो है ही, इसकी टिकट भी बेहद सस्ती है।

Thursday, 21 February 2019

मेरी लघुकथा 'समोसा' :)

कहानी, कविता जैसी साहित्यिक विधाओं की मैं एक तरह से मन्त्रमुग्ध पाठक रही हूँ। मुझे लगता रहा है कि यह सब लिखना कम से कम मेरे वश की बात नहीं है! मैं कुछ टिप्पणियां या लेख लिखकर अपनी बात कह पाऊं यही बहुत लगता है। हां किस्सागोई का आकर्षण और लघुकथाओं का आकार इस फॉर्म में अपनी बात कहने के लिए कभी-कभी प्रेरित ज़रूर करता रहा है, लेकिन मुझे पता है कि लघुकथा वास्तव में एक बहुत ही कॉम्पैक्ट विधा है, और यह बहुत अधिक रचनात्मक कुशलता की मांग करती है, जिसका मुझमें नितांत अभाव है।
एक शाम मेरी आँखों के सामने एक घटना घटी। मैने एक मासूम बच्चे को अपने ही माता-पिता के भाषाई हीनताबोध का शिकार बनते हुए देखा था। मैंने उस बच्चे को सहमते हुए देखा और देखते-देखते ही उसकी सहजता जिस तरह गायब हो गयी, उसने मुझे खासा विचलित किया था। उस दिन इस घटना को मैंने यूँ ही नोट करके रख लिया था। बाद में इसे ही थोड़ी सी काट-जोड़ के साथ मैंने एक लघुकथा की शक्ल देनी चाही। हालांकि मुझे पूरा संदेह रहा कि यह लघुकथा बन भी सकी है या नहीं!
पिछले दिनों रचनाकार.आर्ग' ने एक लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया था। मैंने इस रचना को उस प्रतियोगिता में भेज दिया। आज ईमेल से सूचना मिली कि प्रथम, द्वितीय या तृतीय तो नहीं लेकिन विशेष पुरस्कार के लिए जिन चार लघुकथाओं को चुना गया, उसमें मेरी लघुकथा- समोसाभी है। मुझे तो इसी बात की ख़ुशी है कि मैंने जो लिखा उसे कम से कम लघुकथा के रूप में पहचाना गया! संयोग ही है कि इस लघुकथा के पीछे भाषाई हीनता बोध की एक घटना है, और आज मातृभाषा दिवस भी है।


Friday, 4 January 2019

कैद में शतुरमुर्ग


शुतुरमुर्ग मुझे बेहद प्यारा जीव लगता है। पहली बार जब मैंने शुतुरमुर्ग को देखा था, तो उसका चेहरा देखकर लगा था कि वो इंसानों की तरह हंस रहा है!
पिछले हफ्ते त्रिशूर के एक चिड़ियाघर में इस शुतुरमुर्ग को देखा। जो लोहे की सींखचों को अपनी नाज़ुक चोंच से बार-बार और लगातार जैसे तोड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था। कैद में जकड़ा ये दौड़ने-भागने वाला जीव बेहद दयनीय लग रहा था।
चिड़ियाघर देखना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता। वहां जाकर मासूम जानवरों को कैद में देखकर मन बहुत दुखी हो जाता है। इसलिए मैं अक्सर वहां जाने से बचती हूं। कूदने-उछलने, उड़ने वाले पशु-पक्षी चिड़ियाघर में बेहद उदास दिखाई देते हैं। लोगों का लोहे की जालियों के पार से उन्हें घूरना, छेड़ना, शोर मचाना उन बेजुबानों को कैसा लगता होगा, सोचकर ही मन पसीज जाता है।

Saturday, 22 December 2018

"ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, यह तो सिर्फ किताब है"

ग्रैजुएशन के दिनों में जब मैं लाइब्रेरी में किसी किताब को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते परेशान हो जाती थी और अपनी यह परेशानी लाइब्रेरियन को जाकर बताती थी तो वे किताब ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मेरे साथ किताबों के रैक तक आते थे और किताब ढूंढ़ते हुए अक्सर हर बार कहा करते थे कि 'अरे ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, ये तो सिर्फ किताब है।' और कुछ देर बाद वह किताब मिल ही जाती थी।
इस मामले में मैं खुद को बहुत हद तक खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अक्सर लाइब्रेरियों में वो सामग्रियां भी बड़ी सहजता से मिल जाती हैं, जो साधारणतया लोगों की नज़रों से चूक जाती हैं और कई बार तो लाइब्रेरी के केटलॉग में भी शामिल नहीं होतीं! लेकिन अब भी कभी-कभी कुछ सामग्रियां ढूंढ़ते हुए बहुत परेशान हो जाती हूं और कई बार तो निराश भी! लेकिन जब-जब ऐसी स्थिति होती है तो मुझे लाइब्रेरियन सर की कहीं हुई वहीं बात याद आ जाती है कि 'ढूंढ़ने से तो...' और इसे इत्तेफाक ही कहूंगी कि इसके बाद जब मैं फिर से ढूंढ़ने के काम में जुटती हूं, तो अक्सर मुझे इच्छित सामग्री मिल ही जाती है!

Tuesday, 2 October 2018

कैंपस गाँधीजी, दो अक्टूबर से जुड़े संयोग!

आज से ठीक एक साल पहले इसी दिन कैंपस में टहलते हुए सामने से अचानक मुझे धोती पहने, हाथ में लाठी पकड़े, नंगे पाँव चल रहे एक बाबा दिखे थे। उनके पास से गुजरते ही मुझे कुछ ध्यान आया। मुड़ कर देखा तो बाबा की छवि मुझे गांधी जी जैसी लगी थी। मैंने झट से अपने मोबाइल कैमरे से पीछे से उनकी एक तस्वीर उतार ली। 2 अक्टूबर के दिन ऐसा घटित होना मुझे खूबसूरत संयोग लगा था। मैंने इसे हमारे कैंपस में गांधी जीशीर्षक के साथ पोस्ट किया था।
इसके बाद कभी-कभार वे बाबा टहलते-टहलते दिख जाया करते थे। लेकिन पिछले बहुत दिनों से उन्हें नहीं देखा था। कल शाम टहलते हुए वे मुझे सामने से आते हुए दिखे। मुझे लगा सामने से उनकी तस्वीर उतारूँ, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उन्हें यह पता चले। इस कोशिश में फोटो बहुत ब्लर आई!
लेकिन आज देर रात कहिये या एकदम सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मैं फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी कि हमारे इन गाँधी बाबाकी तस्वीर मुझे फेसबुक पर दिख गयी! वे हमारे कैंपस की एक दुकान के बाहर बैठ कर आराम कर रहे थे। कैंपस में चुनावी मौसम है, और उसी सिलसिले में किसी की खींची गयी तस्वीर में बाबा उतर आए!

[यहाँ तीनों तस्वीरें लगा रही हूँ। एक सबसे पहली जो पिछले 2 अक्टूबर को खींची थी। दूसरी तस्वीर कल शाम की है, और तीसरी तस्वीर जो सुबह के साढ़े तीन बजे अचानक से मुझे फेसबुक पर दिखाई दी।]

Saturday, 8 September 2018

वक्त काटने की चीज़ नहीं है सिनेमा

हम कल रिलीज़ हुई फिल्म गली गुलियाँदेखने गये थे। इस फर्स्ट डे फर्स्ट शो में हम दो लोगों के अलावा छः और लोग थे, यानी लगभग डेढ़ सौ लोगों की क्षमता वाले हॉल में लगभग 140 सीटें खाली थीं। इस तरह का अनुभव पहली बार नहीं हुआ है। हैदराबाद के सिनेमा घरों में इससे पहले भी हमने कुछ ऐसी फिल्में देखी हैं, जिन्हें देखने के लिए इससे भी कम लोग पहुँचे थे, और इससे भी अधिक सीटें खाली थीं। लेकिन कल पहली बार मुझे मल्टिप्लैक्स कर्मचारियों के एक अजीब किस्म के अनुरोध का सामना करना पड़ा। हुआ यह कि जब फिल्म 25-30 मिनट बीत चुकी थी, और हम उससे पूरी तरह जुड़ चुके थे, तब कुछ कर्मचारी हमारे पास आए और उनमें से एक ने कहा : ‘Ma’am because very few people watching this movie, so can you shuffle to any other movie?' यह सुनकर मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, क्यूंकि मैंने कभी इस तरह के किसी प्रस्ताव की कल्पना तक नहीं की थी। खैर मैंने उससे दृढ़तापूर्वक कहा : No! thank you. We have paid and come for this movie. शुक्र था कि उसने मुझ ही से पूछ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और हॉल में बैठे बाकी लोगों से यही सवाल पूछने की उसकी हिम्मत नही हुई या उसने ज़हमत नहीं उठाई। जो लोग फिल्में पसंद करके व प्लान करके देखने जाते हैं, वे इस तरह के प्रस्ताव भर को अपनी तौहीन समझ बैठें तो कुछ ग़लत नहीं होगा।
मुझे लगता है कि आज भी इस सोच से बहुत सारे फिल्मकार, सिनेमा हॉल वाले और ख़ुद कई दर्शकभी इत्तेफाक रखते हैं कि फिल्में समय काटने का माध्यम भर हैं, यानी आँखों के आगे किसी कहानी पर फिल्माए गये ठीक-ठाक सीन चलते रहें और कानों तक समझ में आने वाले डायलॉग पहुँचते रहें तो वक्त कट ही जाएगा! जबकि हक़ीकत यह है कि सिनेमा का असली दर्शक वक्त काटने नहीं, वक्त निकालकर सिनेमा देखने पहुँचता है।
अब फिल्म पर आती हूँ गली गुलियाँका ट्रेलर पिछले हफ्ते ही देखा था। ट्रेलर देखकर फिल्म देखने की इच्छा हुई, दूसरा कारण यह रहा कि फिल्म में मनोज वाजपेयी, रणवीर शौरी और नीरज कबी जैसे अक्सर पसंद किये जाने वाले अभिनेता हैं। फिल्म बाल उत्पीड़न और बाल मनोविज्ञान की कोमल से लेकर विस्फ़ोटक जटिलताओं तक को उभार पाने में सफल हुई है, लेकिन इसमें कुछ कमजोर कड़ियाँ भी हैं, और यह मुझे किसी साधारण फिल्म से बेहतर श्रेणी की फिल्म नहीं लगी। फिल्म का अभिनय पक्ष भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इस फिल्म में मनोज वाजपेयी के अभिनय की नाहक ही अधिक तारीफ हो रही है, वे इससे बहुत बेहतर काम कर सकते थे। अभिनय की तारीफ करनी हो तो अपेक्षाकृत कम चर्चित शहाना गोस्वामी के अभिनय की तारीफ होनी चाहिए। मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक नीरज कबी ने नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई सेक्रेड गेम्समें अपने अभिनय से मुझे निराश किया था, लेकिन गली गुलियाँमें उन्होंने निराश नहीं किया है। इसके अलावा रणवीर शौरी के हिस्से जितनी भूमिका आयी है, उन्होंने भी उसे अच्छे से निभाया है।

Wednesday, 8 August 2018

लफंगे उपद्रवियों की कांवड़ यात्रा!

दिल्ली कावड़ियों को सर आँखों पर बिठाती रही है। कांवड़ यात्रा शुरू होने से महीनों पहले उनके आराम के लिए जगह-जगह पंडाल बनने शुरू हो जाते हैं। सावन के महीने में दिल्ली की लगभग हर गली हर नुक्कड़ पर कांवड़ यात्रियों के लिए विश्राम शिविर, भंडारे वगैरह के आयोजन होते रहते हैं।
इतना मान-सम्मान इन कावंड यात्रियों को इन दिनों मिलता है, जिनके इनमें से अधिकांश पूरे जीवन हक़दार नहीं हो सकते! इसलिए ऐसे अवसरों का लाभ लुच्चे-लफंगे, वेल्ले लोग खूब उठाते हैं। टोलियाँ बना-बना कर ये भी कांवड़ियों का चोला ओढ़कर निकल पड़ते हैं या कांवड़ियों की टोलियों में शामिल हो जाते हैं। इस तरह होता यह है कि कुछ सज्जन श्रद्धालुओं की तुलना में उन्मादी और उत्पाती लोगों का एक बड़ा काफिला कांवड़ियों के लिवास में चल रहा होता है। इनमें से कई समूह न सिर्फ तमाम ट्रैफिक और सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देते हैं, बल्कि छेड़खानी और मारपीट तोड़-फोड़ का जैसे लाइसेंस लिये घूमते हैं! लोगों की असुविधा का ध्यान रखे बगैर लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स लगाकर विभिन्न पड़ावों पर और रास्ते भर भी इनका नाचना-गाना चलता रहता है। इनकी हरकतों से ट्रैफिक में भारी दिक्कत आती है और सामान्य लोग बेबस और सहमे हुए नजर आते हैं।
धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इनकी गुंडागर्दी को क्यों चलने दिया जाना चाहिए? हर साल ऐसी घटनाएँ क्यों दोहराने की इजाजत दी जाती है? इस तरह की अप्रिय और बेहद असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए ज़रूरी गाइडलाइन्स क्यों नहीं बनाई जाती या पालन की जाती? इस तरह की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए दुरुस्त सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किये जाते? उपद्रवी कांवड़ियों की पहचान कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुँचाया जाता?
धर्म की आड़ लेकर की जाने वाली ऐसी उदंडता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए!

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Saturday, 28 April 2018

माँ के लिए भेजी थी साड़ी पहुँचा कपड़े का टुकड़ा!


बीते 23 अप्रैल को हैदराबाद से मैंने अपनी माँ के लिए एक साड़ी भारतीय डाक की रजिस्टर्ड पार्सल सर्विस के माध्यम से दिल्ली भेजी थी। ट्रैक करने पर पता चला कि पार्सल परसों शाम को डिलीवरी पोस्ट ऑफिस (नांगलोई) पहुँच चुका था। चूँकि हमारे इलाके का डाकिया सही समय से जरूरी से जरूरी पत्र भी नहीं पहुंचाने के लिए जाना जाता है, इसलिए मैंने अपने भाई को कल पोस्ट ऑफिस जाकर पार्सल ले आने के लिए कहा था। पोस्ट ऑफिस में उसे किसी कर्मचारी ने कहा कि तुम लोगों के यहाँ इसलिए देर से पोस्टल आइटम्स पहुँचती हैं, क्यूंकि तुम लोग पोस्टमैन की सेवा-पानी (शायद टिप या घूस!) नहीं करते और साथ ही यह कहा कि तुम्हारा पार्सल पोस्ट ऑफिस में नहीं है और पोस्टमैन डिलीवरी के लिए ही गया हुआ है।
बायीं तरफ भेजी हुई साड़ी है और दायीं तरफ साड़ी कीजगह पंहुचा कपडे का टुकड़ा 
आज सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के करीब डाकिये ने पार्सल मेरे घर पर पहुँचाया। वह इतनी हड़बड़ी में था कि उसने किसी से रिसीविंग तक नहीं ली! पार्सल खोलते ही मेरी माँ ने मुझे फ़ोन करके पूछा कि तूने ये क्या भेजा है? उसमें मरून रंग की साड़ी और ब्लाउज की बजाय फिरोज़ी रंग के एक-आध मीटर के कपड़े का एक टुकड़ा था। ये सुनते ही मैं सन्न रह गयी! साड़ी और सिलवाकर भेजे गये ब्लाउज की कुल लागत दो-हज़ार के लगभग थी और पैसों से भी अधिक उसके साथ जुड़ी मेरी भावना थी।
इंडियन पोस्ट के माध्यम से भेजे गये पार्सल कभी-कभार गायब हो जाते हैं, यह तो सुना था। लेकिन किसी एक सामान को बदलकर दूसरे सामान को रख देने का आरोप कुछ कुरियर कंपनियों पर ज़रूर लगता रहा है, लेकिन भारतीय डाक विभाग के रजिस्टर्ड पोस्ट को लेकर ऐसा मैंने आजतक नहीं सुना था। लेकिन आज तो उसे खुद भोग भी लिया! किसी ने बड़ी तफसील से पैकेट खोलकर साड़ी निकाली और उसमें कपड़े का एक टुकड़ा डाल कर टेप लगा दिया।
एक शिकायती टिप्पणी के साथ मैंने डाक विभाग को इसकी सूचना दे दी है और शिकायत के अन्य सभी विकल्पों पर भी विचार कर रही हूँ। बहरहाल डाक विभाग में शिकायत के लिए निर्धारित जितने भी फ़ोन नंबर हैं, उनपर या तो कॉल नहीं लग रहा या कॉल उठाया नहीं जा रहा! स्थानीय पोस्ट ऑफिस से यह भी पता चला है कि ऐसे मामलों में डाक विभाग मामूली पूछ-ताछ के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करता और इस तरह की धोखा-धड़ी के शिकार उपभोक्ताओं को किसी तरह का कोई मुआवजा भी तब तक नहीं मिलता जब तक कि पार्सल भेजते हुए उन्होंने उसका इंश्योरेन्स नहीं करवाया हो! और इंश्योर्ड पार्सल का खर्च रजिस्टर्ड पार्सल से बहुत अधिक होता है।
आज घर पर एक फंक्शन है और मैंने इस भावना के साथ वो साड़ी भेजी थी कि माँ आज उसे पहन पाएंगी। डाक विभाग की इस धोखा-धड़ी का जब से पता चला है, तब से मन बहुत उदास है!

Monday, 23 April 2018

ताकि किताबों की संस्कृति बची रहे

पाठ्यक्रम की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में थी, तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के लिए मिल जाती थी।
लेकिन वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्र नाम का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा, शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो, मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक, मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये, तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की किताब वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना, उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!

Saturday, 14 April 2018

ओस्मानिया यूनिवर्सिटी और इफ्लू से लौटकर

कल एक परीक्षा के सिलसिले में सिकंदराबाद के पास के एक इलाके में जाना हुआ। विभाग के कई अन्य साथी भी वहां परीक्षा देने आये हुए थे। वापसी में हम छ: लोग एक साथ थे। लोकल ट्रेन लेने के लिए हम लोग बस से निकले और बस से उतरकर स्टेशन तक की दूरी हमने पैदल ही तय करने की सोची। इसका बहुत अच्छा परिणाम यह मिला कि चलते-चलते हम उस इलाके में दाखिल हुए जहाँ ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के किसी डिपार्टमेंट का रास्ता दिखाने वाला साइन बोर्ड लगा हुआ था, यानी कि हम ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के इलाके में थे। पिछले चार-पांच साल से हैदराबाद में होने के बावजूद यहाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय ओस्मानिया में जाने का मौका अब तक नहीं मिल पाया था। जबकि मेरी यह इच्छा हमेशा से रही है कि हैदराबाद के जितने भी प्रमुख विश्वविद्यालय हैं उन्हें कम से कम एक बार ज़रूर देख लूँ। कल का दिन इस लिहाज़ से बहुत सफल साबित हुआ। हमने तत्काल तय किया कि इस संयोग का फायदा उठाते हुए ओस्मानिया यूनिवर्सिटी घूम लिया जाये।
      टहलते हुए हमने कुछ डिपार्टमेंट और कुछ हॉस्टल्स देखे, लेकिन हमारे लिए जो महत्त्व का था वो आर्ट्स कॉलेज को देखना था जहाँ हम पूछ-पूछ कर पहुंच गये। यह आर्ट्स कॉलेज एक बहुत ही भव्य इमारत में है, इस भवन का निर्माण 1934 में शुरु हुआ था और 1939 में इसका उद्घाटन हुआ। इसका मॉडल तैयार करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों की एक टीम ने कई यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका, जापानमिस्र और तुर्की जैसे देशों का दौरा किया था और अंत में एक बहुत ही कलात्मक संरचना वाले भवन का निर्माण किया गयाजिसमें विभिन्न देशों की स्थापत्य कला का मिश्रण दिखाई देता है। मानविकी (Humanities) के सभी विभाग इसी भवन में स्थित हैंजिनमें हिंदी विभाग भी शामिल है।
हालांकि इतनी भव्य इमारत के बावजूद जो चहल-पहल इसके इर्द-गिर्द दिखनी चाहिए थी वह गायब थी और लड़कियाँ तो इक्का-दुक्का ही कहीं-कहीं दिख रही थीं। ओस्मानिया एक क्लोज़ कैंपस नहीं है और इस वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय की तरह यहाँ भी बाहर की गाड़ियाँ और लोग बेधड़क आ-जा रहे थे। जितनी देर हम ओस्मानिया घूमते रहे हमें यही लगा कि अच्छे-खासे क्षेत्रफल और अच्छे भौगौलिक परिवेश में होने के बावजूद शिक्षण संस्थानों का जैसा माहौल होना चाहिए उसका वहां अभाव है। यह भी हो सकता है कि यह सिर्फ उस दिन विशेष का अनुभव हो और जैसा मुझे महसूस हुआज़रूरी नहीं कि वही वास्तविकता हो।

ओस्मानिया में घूमते हुए ही हमें पता चला कि हैदराबाद का एक अन्य प्रमुख विश्वविद्यालय इफ्लू’ (English and Foreign Languages University) पास में ही ठीक सड़क के दूसरी तरफ स्थित है। यह एक और संयोग था तो हम सबने तय किया कि लगे हाथ वहाँ भी घूम लिया जाये। हैदराबाद विश्वविद्यालय से एम.ए करने वाला एक छात्र उस्मान जो अब वहाँ पीएचडी कर रहा है, उसने इफ्लू में हमारीअगवानी की और अपनी यूनिवर्सिटी में हमें घुमाया। इफ्लू बहुत बड़ा कैंपस नहीं है लेकिन वह जितने दायरे में फैला हुआ वह अपने आप में सम्पूर्ण और सुव्यवस्थित है। यहाँ आकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पता चली, वह यह कि इस विश्वविद्यालय में लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा बहुत अधिक है (एक छात्र के मुताबिक लगभग चौगुनी) और इसीलिए यहाँ लड़कों के लिए एक हॉस्टल है वहीं लड़कियों के लिए तीन या चार हॉस्टल हैं। यह वाकई बड़े आश्चर्य और ख़ुशी की बात है। 
इस यूनिवर्सिटी की जो सबसे बड़ी खासियत है वह यहाँ का माहौल है, खासतौर पर लड़के-लड़कियों के साथ होने, घूमने, पसंद के कपड़े पहनने और सुरक्षा वगैरह को लेकर ये कैंपस बहुत ही अच्छा माना जाता है और यहाँ छात्रों के व्यक्तिगत जीवन की निगरानी करने या दखल देने जैसी बातें नहीं सुनने को मिलती। हालाँकि यह बात कुछ रूढ़िवादी शिक्षकों को चुभती भी है, लेकिन वे सिवाय चिढ़ने के कुछ कर नहीं सकते! ऐसी ही एक शिक्षिका से कल वहाँ रूबरू होने का मौका भी मिला। मेरे इतना भर कहने पर कि इफ्लू मुझे बहुत अच्छा कैंपस लगा, उन्होंने कहा कि हाँ कुछ ज्यादा ही अच्छा है! अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा! शाम के बाद तो यह विश्वविद्यालय इंग्लैंड बन जाता हैउन्होंने आगे कहा इतनी अधिक पश्चात्यता उचित नहीं’!
ओस्मानिया और इफ्लू एकदम पड़ोसी विश्वविद्यालय हैं जो बिलकुल आमने-सामने हैं, इसके बावजूद दोनों जगह के माहौल में जो बहुत बड़ा अंतर है उससे यह पता चलता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के माहौल को मजबूत इरादों के साथ मनचाहे तरीके से ढाला जा सकता है। इफ्लू में छात्रों को जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता है उसका सकारात्मक परिणाम इस तरह भी दिखता है कि यहाँ अराजकता की बजाय छात्रों में एक तरह का अनुशासन है। लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं के बराबर है और उनके बीच असामनता या संदेह की बजाय दोस्ताना रिश्ता है। मेरे खयाल से हर विश्वविद्यालय को माहौल के स्तर पर इफ्लू जैसा ही होना चाहिए। इस तरह के माहौल में ही समुचित विकास और कुंठा रहित अच्छी सोच का निर्माण संभव है।