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Saturday, 1 June 2019

नहीं रही भारत की इकलौती वन-मानुष बिन्नी

चिड़ियाघर (Zoo) जाने से मैं बचती रहती हूँ क्योंकि वहाँ जाने पर मेरा मन अक्सर उदास हो जाता है और कई बार बहुत व्यथित और विचलित भी। सितम्बर 2016 में मैं पुरी-भुवनेश्वर की यात्रा पर गयी थी। एक डेली ट्रिप बस में जब हम घूमने निकले तो उसका अंतिम पड़ाव ‘नन्दन कानन’ था। जहाँ मेरा एक-आध घंटा बीता। ‘नन्दन कानन’ की ख्याति से बचपन से परिचित रही हूँ। मेरी जानकारी में यह एशिया का सबसे विशाल (Largest) ज़ूलॉजिकल पार्क है।
इस चिड़ियाघर ने भी उतना ही निराश किया जितना किसी अन्य चिड़ियाघर में जाकर मैं निराश हुई थी। मैंने सोचा था कि क्योंकि यह बहुत विशाल चिड़ियाघर माना जाता है तो यहाँ पशु-पक्षियों के घूमने फिरने के लिए ज़्यादा जगह होगी और अपेक्षाकृत वे अधिक आज़ाद होंगे। लेकिन वास्तव में यहाँ भी लगभग सभी पशु-पक्षी एक बदतर कैदी जीवन ही जी रहे थे। ये सब देखकर मुझे बस यही लगता है कि चिड़ियाघर जैसी चीज़ होनी ही नहीं चाहिए! किसी पशु-पक्षी के बारे में जानने-समझने और उनसे परिचित होने की अब बहुत सारी मानव-निर्मित तकनीकें विकसित हो चुकी हैं।
‘नन्दन कानन’ में तब मेरा ध्यान जिस एक पशु ने सबसे अधिक खींचा था, वह वन-मानुष था। वह एक बड़े से बेंचनुमा पत्थर पर बैठा हुआ था। अपने दायरे में वह अकेला था और जैसे कोई मनुष्य गहरी चिंता या सोच में डूबा हुआ चेहरे पर हाथ रखकर बैठा होता है, वह वन-मानुष ठीक उसी तरह बैठा हुआ था। उसका वजन भी सामान्य से अधिक लग रहा था। बाड़े के बाहर आते-जाते, शोर मचाते और उसकी तस्वीरें लेते लोगों से उसे तिनका भी फर्क नहीं पड़ रहा था। यहाँ तक कि उसके इर्द-गिर्द धमाचौकड़ी कर रहे बन्दर भी उसे विचलित नहीं कर पा रहे थे। कुल मिलकर यह वैसा ही था जैसे कोई बेहद हताश व्यक्ति कहीं अकेले इस तरह बैठ गया हो कि पूरी दुनिया उसके लिए बेमानी हो गयी हो! उस वन-मानुष की इस दशा और इस मुद्रा की याद मुझे अक्सर कई बार आती रही है।
कल रात अचानक से एक खबर पर नज़र पड़ी कि ‘नन्दन-कानन’ के उस वन-मानुष की मौत हो गयी है। कल ही मुझे कुछ नयी बातें पता चली वह यह कि वह वन-मानुष मादा थी और भारत की इकलौती वन-मानुष थी। उसका नाम ‘बिन्नी’ था और वह 41 साल की थी। पिछले लगभग एक साल से वह काफी बीमार थी और उसका इलाज भी चल रहा था। वन-मानुष की औसत आयु 45 वर्ष मानी जाती है, इस लिहाज़ से उसकी उम्र कम नहीं थी लेकिन सच तो यह है कि नितांत अकेलेपन और कैद ने बहुत पहले ही उससे उसकी सहजता और उत्साह छीन लिया था। हमें यह ज़रूर सोचना चाहिए कि हम ‘मानुष’, भारत के इस अंतिम वन-मानुष के कितने बड़े गुनाहगार हैं!

Friday, 3 May 2019

'फोनी' के सामने डटा ओडिशा

ओडिशा के पुरी तट से टकराने के बाद चक्रवाती तूफ़ान फोनी (fani) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। तटीय इलाकों में मूसलाधार बारिश हो रही है और 200 कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज हवाएँ चल रही हैं। ख़बरों के मुताबिक ओडिशा में बीस साल बाद इतना बड़ा तूफ़ान आया है। हमारे परिवार के कई सदस्य भी कल दोपहर तक पुरी में थे। वापसी की उनकी ट्रेन कल रात की थी, जो रद्द कर दी गयी। लेकिन कल दोपहर को चलायी गयी एक स्पेशल ट्रेन से उन्हें वापसी की टिकट मिल सकी, तो हम लोगों की जान में जान आई। पर्यटक तो फिर भी अपने-अपने घरों को वापस लौट गए होंगे, लेकिन असल चिंता उन लोगों की है, जिनका घर ही पुरी या अन्य तटीय इलाकों में है।
बहुत खूबसूरत और प्राकृतिक सम्पदा के धनी ओडिशा के साथ इस तरह की त्रासदी बार-बार न होती तो वह भारत के संपन्न राज्यों में गिना जाता। लेकिन जिस जीवटता से ओडिशा के लोग इस तरह की आपदाओं का सामना करते हैं, इसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। चूँकि मौसम विभाग ने समय रहते अलर्ट जारी कर दिया था और समय रहते लाखों लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दिया गया है, इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नुकसान कम से कम होगा। लेकिन इसके बावजूद पेड़ों, बिजली वगैरह के खंभों और कच्चे घरों-दुकानों के उखड़ने-टूटने से होने वाले नुकसान को तो नहीं ही रोका जा सकेगा। जो लोग अब भी खतरे वाले इलाकों में रहने के लिए विवश हैं, उन्हें हिम्मत, धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। इस कठिन वक्त में पूरा देश ओडिशा के साथ खड़ा है। हम प्रार्थना कर रहे हैं कि यह तूफ़ान आपकी मजबूती से टकराकर बेहद कमज़ोर हो जाए और जान-माल की कोई हानि न हो!

Friday, 4 January 2019

कैद में शतुरमुर्ग


शुतुरमुर्ग मुझे बेहद प्यारा जीव लगता है। पहली बार जब मैंने शुतुरमुर्ग को देखा था, तो उसका चेहरा देखकर लगा था कि वो इंसानों की तरह हंस रहा है!
पिछले हफ्ते त्रिशूर के एक चिड़ियाघर में इस शुतुरमुर्ग को देखा। जो लोहे की सींखचों को अपनी नाज़ुक चोंच से बार-बार और लगातार जैसे तोड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था। कैद में जकड़ा ये दौड़ने-भागने वाला जीव बेहद दयनीय लग रहा था।
चिड़ियाघर देखना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता। वहां जाकर मासूम जानवरों को कैद में देखकर मन बहुत दुखी हो जाता है। इसलिए मैं अक्सर वहां जाने से बचती हूं। कूदने-उछलने, उड़ने वाले पशु-पक्षी चिड़ियाघर में बेहद उदास दिखाई देते हैं। लोगों का लोहे की जालियों के पार से उन्हें घूरना, छेड़ना, शोर मचाना उन बेजुबानों को कैसा लगता होगा, सोचकर ही मन पसीज जाता है।