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Wednesday, 28 November 2018

आंवला नहीं आंवड़ा!

यह आंवला नहीं है और जो मुझे स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया और मैंने सही-सही याद रखा है, तो यह आंवड़ा है। सुविधा के लिए इसे आंवले का छोटा भाई मान लीजिए, जो अपने बड़े भाई से कई मायनों में अलहदा है।
मुरब्बे के अलावा आंवले से बना कुछ और मुझे पसंद नहीं, फिर कच्चे आंवले को नमक-मिर्च पाउडर के साथ खाने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। आंवले में भरपूर खटास ही नहीं एक कसैलापन भी होता है, जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त है।
बात आंवडों की करते हैं। मैसूर के टूरिस्ट प्लेसेज़ पर डिस्पोजेबल ग्लास में नमक और मिर्च पाउडर में सने छोटे-छोटे आंवड़ों को ऊपर तक भरकर बेचा जा रहा था। हालांकि सौरभ ने इसे खरीदा आंवला समझ कर ही था, लेकिन जब खाकर इसका स्वाद कुछ अलग लगा तो उन्होंने मुझे और हमारे साथ घूमने निकले दो और साथियों प्रमोद और अजित को भी इन्हें चखने के लिए दिया। यह हम सभी को इतना मज़ेदार लगा कि हमने इसे जमकर खाया और दिलचस्प यह था कि उस दस या बीस रूपये में खरीदे गए ग्लास में छोटे-छोटे इतने आंवड़े थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
आंवले का कसैलापन इसमें बिल्कुल भी नहीं था और आंवले की तुलना में यह मुलायम भी था। हल्का मीठापन लिए और ढेर सारा खट्टापन लिए यह आवड़ा खाने में इतना मज़ेदार था कि अभी जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूं, तब भी इसे सोच-सोचकर मेरे मुंह में पानी आ रहा है।
आंवड़े की तस्वीर तब तो नहीं उतार पाई थी, लेकिन संयोग से कुछ देर बाद इस आंवड़े का एक पेड़ ही कहीं दिख गया और नीचे कुछ आंवड़े भी गिरे हुए थे। आंवड़े और उसके पेड़ की तस्वीर यहां साझा कर रही हूं। ताकि आप इसे पहचान लें और जब कभी मैसूर जाने का मौका मिले तो इसे ज़रूर चखें।

Wednesday, 9 August 2017

चेन्नई में चहलकदमी

पिछले दिनों चेन्नई जाने का संयोग बना । चेन्नई यात्रा से जुड़ी ये दोनों टिप्पणियाँ चैन्नई की दो झलकियाँ भर हैं । इन्हें यात्रा संस्मरण नहीं कहा जा सकता है ।
चेन्नई – 1
[05.08.2017]
चेन्नई के मरीना बीच पर बनी एक कलाकृति

तमिलनाडु के लोगों के सड़कों पर उतरने के प्रभाव के बारे में तो सुन रखा था। लेकिन इसके प्रभावी होने के कारणों को आज अपनी आंखों से देखने का मौका मिला।
मरीना बीच तक जाने वाली एक सड़क का मरीना बीच से लेकर अगले कम से कम ढाई-तीन किलोमीटर का हिस्सा पोस्टर और बैनर लेकर खड़े पुरुषों और महिलाओं से इस कदर अटा पड़ा था, कि उसके एक छोर से अगर आप देंखे तो वह समुद्र के समक्ष दूसरा समुद्र लग रहा था। यह प्रदर्शन किस उद्देश्य के लिए हो रहा था, लिपिगत अपरिचय की वजह से मुझे यह तो नहीं पता चल सका, लेकिन किसी धरना प्रदर्शन या रैली में मैंने आजतक इतनी भारी भीड़ नहीं देखी थी! इन प्रदर्शनकारियों के बीच से गुज़र कर मरीना बीच तक जाने की हमारी कोशिश इस तरह असफल हुई कि किसी तरह रास्ता बनाकर लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर जाने के बाद फिर से यत्न करके इतनी ही दूरी तय कर वापस लौट आना पड़ा। क्योंकि आगे भीड़ इतनी सघन होती जा रही थी, कि वापस लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
मैंने जितना समझा, चेन्नई एक ऐसा महानगर है, जो एक साथ महानगर और दक्षिण भारतीय गांव दोनों ही संस्कृतियों के गुण रखता है। इस नगर में विकास और बदहाली भी एकसाथ दिखती है। जगह-जगह कूड़े की गंध से आप परेशान हो सकते हैं और वहीं आपको दूसरी तरफ साफ-सुथरा समुद्र तट भी दिखेगा।
भाषागत समस्याएं तो हैं लेकिन आप यहां आकर महसूस करेंगे कि जो हमारी हिन्दी है, वह हमारे देश में कहीं भी पूरी तरह अजनबी नहीं है। हिन्दी बोलने वाला आदमी बिना किसी खास परेशानी के यहां के दुकानदारों, ड्राइवरों वगैरह से संवाद स्थापित कर सकता है। आपको आश्चर्य हो सकता है कि इस शहर के मुख्य हिस्से में आपको बहुत सारे ऐसे होटल और रेस्टोरेंट मिलेंगे जहां के मालिक और सहायक बंगाल, उड़ीसा या असम के हैं। यहां तक कि कई तमिल होटल मालिकों ने भी अपने सहायक इन्हीं राज्यों के रखें हैं। ये लोग धड़ल्ले से अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ हिन्दी बोलते हैं, और निश्चित रूप से हिन्दी बोलने की उनकी यह विशेषता ही, तमिल होटल मालिकों को अपने फायदे की लगती होगी!

चेन्नई – 2
[09.08.2017]
चेन्नई स्टेशन के बाहरी हिस्से की तस्वीर

ये चेन्नई स्टेशन के बाहरी हिस्से की तस्वीर है। बाहरी हिस्सा तो खूबसूरत है ही, लेकिन जब आप इसके अंदर जाएंगे तो, उसकी खूबसूरती से भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएँगे। ये खूबसूरती इसकी सजावट में नहीं बल्कि इसकी बनावट और व्यवस्था में मौजूद है। इसके ग्राउंड फ्लोर पर चलते हुए ही आप इसके सभी प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच सकते हैं, जो कई दृष्टिकोण से सुविधाजनक और जरूरी है।
जिसे सभी प्लेटफॉर्म्स के यात्रियों का कॉमन स्पेस कह सकते हैं, वह एक ही छत के नीचे एक बड़े दायरे में फैला हुआ परिसर है, जहाँ खाने-पीने के बहुत सारे छोटे-छोटे स्टाल हैं, जो बेहद किफायती हैं। यहां साफ सुथरा वेटिंग रूम तो है ही, साथ ही यात्रियों के बैठने के लिए कई जगहों पर सुव्यवस्थित कतारों में सैकड़ों कुर्सियां लगी हुई हैं। इस तरह की व्यवस्था प्रायः हवाई अड्डों पर रहती है। चाहें तो इन कुर्सियों पर बैठ कर आराम से इंतजार करें। वैसे मुझे अपने लिए यह परिसर चहल-कदमी करते हुए समय बिताने के अधिक मुफीद लगा!

Tuesday, 2 May 2017

बजवाड़े के किले तक पहुँच कर भी..

पिछले दिनों पंजाब के होशियारपुर कस्बे में जाना हुआ । सोचा कि आये ही हैं तो कोई घूमने लायक जगहें यहाँ हों, तो देख ली जाएँ । गूगल सर्च किया तो पता चला यहाँ एक किला है- बजवाड़ा किला। इसे देखने भरी दोपहरी भारी गर्मी में भी हम लोग बड़े उत्साह के साथ चल दिए! हम लोग टैक्सी से थे । पूछ-पूछ कर किसी तरह उस जगह तक पहुंचे, तो पता चला कि वहां तक गाड़ी नहीं जा सकती, लिहाज़ा हम लोग गाड़ी से उतर कर पैदल चल पड़े । हमारी सोच के एकदम विपरीत, किले का रास्ता बेहद संकरी सी गलियों से होकर जा रहा था । जैसे तैसे किले के पास पहुंचे । दरअसल उसे पास नहीं कहा जा सकता, बस ऐसी जगह पहुंच गए कि वहां से किला स्पष्ट दिख रहा था ।
इस ऐतिहासिक किले और उसके खंडित हिस्सों की देखकर रखरखाव का अभाव तो साफ दिखा ही, उस तक पहुँचने का कोई ठीक रास्ता तक नही था! किले से लगभग सौ मीटर के दायरे तक गेंहूँ के खेत थे । कह सकते हैं कि यह खेतों के बीच में खड़ा था । ये खेत लोहे के बाड़ों से घिरे हुए थे ।आसपास रिहायशी मकान तो थे लेकिन दूर-दूर तक कोई आदमी नज़र नहीं आ रहा था । कोई निर्देशिका, कोई सूचना पट्ट तक वहाँ उपलब्ध नहीं था । हमने किले के भीतर जाने का इरादा त्याग दिया । किसी ऐतिहसिक इमारत के इतना पास जाकर भी उसे पास से न देख सकने का मलाल मुझे हमेशा रहेगा । 

#Bajwara Fort,Hoshiarpur

Thursday, 13 April 2017

यहीं चली थी गोलियाँ

जलियांवाला बाग प्रवेश द्वार 
बैसाखी का दिन पंजाब के लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण दिन होता है । 13 अप्रैल 1919 को भी वैसाखी का दिन था। वर्षों से अमृतसर में इस दिन एक बड़ा मेला लगा करता था । इस मेले में शरीक होने पंजाब के दूरदराज के इलाकों तक से लोग आते थे ।
उस दिन हरमन्दिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) से थोड़ी ही दूरी पर (जलियाँवाला बाग में) एक शांतिपूर्ण सरकार विरोधी सभा आयोजित थी । नेताओं के भाषण होने थे । मेला देखने और शहर घूमने आए कई बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ तो इसलिए भी उस सभा में शामिल हो गये थे कि जाते-जाते वे इन नेताओं को देख लें, और उनका भाषण सुन लें ।
अचानक से उस सभा पर बिना चेतावनी दिये गोलियाँ चलवाई जाने लगी । निहत्थे लोगों पर कायर जनरल डायर के आदेश से तकरीबन 1650 राउंड गोलियाँ चलाई गयीं। सैकड़ों निर्दोष औरतें, बच्चे, बुजुर्ग और युवा मारे गये ।

शहीदी कुआं
जलियाँवाला बाग औपनिवेशिक भारत की जघन्यतम घटनाओं में से एक का उस दिन साक्षी बना था । देशभर में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश फैल गया था और तीव्रतम प्रतिक्रियाएं हुई थीं । ऐसा माना जाता है कि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर इस घटना का निर्णायक प्रभाव पड़ा । ये एक ऐसी घटना थी जिसकी दुनिया भर में निंदा हुई ।
दीवार पर बने गोलियों के निशान

#JaliyanwalaBagh #13April1919 #GeneralDyer #GoliyonkeNishaan #ShahidiKuan