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Friday, 20 March 2020

थाॅट प्रवोकिंग फिल्म है 'थप्पड़'


अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म 'आर्टिकल 15' मुझे बेहद पसंद आई थी और एक सकारात्मक फिल्म लगी थी। बाद के दिनों में जब 'थप्पड़' का ट्रेलर रिलीज़ हुआ ; तब से फिल्म देखने की जिज्ञासा थी।

फिल्म रिलीज़ हुई पर देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कुछ खास नहीं मिल रही थी। किसी ने कहा कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा के दिखाया है, तो कोई कह रहा था फालतू ड्रामा है। आज 'थप्पड़' पर फिल्म बनी है; अब कल को उंगली पर फिल्म बनेगी कि तुमने मुझपर उंगली कैसे उठाई! मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी; क्योंकि फिल्म देखी नहीं थी।

फाइनली फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देखने के बाद लगा कि इसे सही मायनों में काबिले तारीफ और ज़रूरी फिल्म कहा जा सकता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे फिल्म में जिस-जिस तरह के लूप होल्स की आशंका थी, शुक्र है फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था। अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जो वह दिखाना चाहते थे, उन्हें उसमें सौ प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। जब आप 'थप्पड़' देखकर उठेंगे तो बहुत सारी चीज़ों पर, बातों पर सोचने के लिए मजबूर होंगे। सही मायनों में 'थाॅट प्रवोकिंग' फिल्म है। जहाँ बात थप्पड़ की होकर भी थप्पड़ की नहीं है। बात जो गलत हुआ उसको 'शिट हैपेन्स' कहकर टालने, गलती को अस्वीकारने, ग्लानि बोध न होने और माफी न मांगने की है और फिल्म में इसे दिखाने में निर्देशक कहीं चूके नहीं हैं।
फिल्म का अभिनय पक्ष भी उम्दा है। पहली बार स्क्रीन पर दिखे पवैल गुलाटी ने मंझा हुआ अभिनय किया है। 'आँखों देखी' के बाऊजी की बेटी बनी माया सराओ को इसमें वकील की भूमिका में पहचानना मुश्किल है; उनका अभिनय भी बेहतर है। बाकी पूरी स्टार कास्ट ने भी काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अनुभव सिन्हा की खासियत है कि उनकी फिल्में बेहद स्पष्ट होती हैं। जो वो कहना चाहते हैं उसमें कहीं भी आपको अस्पष्टता देखने को नहीं मिलती। उनकी पिछली फिल्मों 'मुल्क'और 'आर्टिकल 15' से भी इसे समझा जा सकता है। ये स्पष्टता ही आम से आम दर्शक को भी फिल्म से जोड़ने में सहायता करती है।
'थप्पड़' हमारे समाज को दिखाती है। समाज की उन बारीक चीज़ों को कवर करती चलती है; जिनके बारे में हमारा पितृसत्तात्मक समाज सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। फिल्म आपको बहुत कुछ देकर जाती है।

Friday, 22 November 2019

शौकत आज़मी का निधन



यदि आप शौकत आज़मी को कैफी आज़मी की पत्नी या शबाना आज़मी की माँ के बतौर ही जानते हैं; तो दरअसल आप एक बेहद मजबूत और बेहद प्रतिभाशाली शख्सियत से लगभग अपरिचित ही हैं। वे कमाल की अदाकारा, महिलाओं की बराबरी को व्यवहार में साबित करने वाली और जन नाट्य मंच के शुरुआती स्तंभों में से एक थीं। कह सकते हैं कि शबाना आज़मी ने अभिनय अपनी माँ की कोख से ही सीखना शुरू कर दिया था। शौकत की अभिनय क्षमता देखनी हो तो आप 'उमराव जान', 'गर्म हवा' और 'बाज़ार' जैसी फिल्मों में उन्हें देखिए।
शौकत आज़मी का आज देर रात निधन हो गया। वे 93वें वर्ष की थीं। लम्बे समय से कहीं उनका ज़िक्र होना भी लगभग बंद हो चुका था। अब उनकी मृत्यु के बाद शायद उनके योगदान की फिर से समीक्षा हो। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि!

Thursday, 15 August 2019

नहीं रहीं विद्या सिन्हा

70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो ग़लत नहीं होगा।
जिसने भी रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे लिए’, पति पत्नी और वोजैसी फ़िल्में देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या सिन्हा किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मका हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों, टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

Sunday, 26 May 2019

बेहद अफ़सोसनाक है पायल ताडवी की 'आत्महत्या'


मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की 23 साल की छात्रा पायल की आत्महत्या की घटना बेहद-बेहद दुखद है। यह और भी अधिक अफसोसनाक है कि पायल को आत्महत्या के लिए उकसाने का इल्ज़ाम जिन तीन लोगों पर है, वो तीनों कथित तौर पर जातीय अहंकार से ग्रस्त 'लड़कियाँ' ही हैं! खबरों के मुताबिक पायल ताडवी ने इन्हीं तीन लड़कियों के जातिसूचक और आरक्षण के प्रति अपमानजनक तानों और प्रताड़ना से परेशान होकर यह कदम उठाया। प्रशासन से पायल ने समय रहते शिकायत भी की थी, लेकिन उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया।
आवश्यकता है कि इस घटना की निष्पक्ष तरीके से जाँच हो और दोषियों को कोई रियायत न बरती जाए। यदि तीनों लड़कियों पर लगा आरोप सही है तो कहा जा सकता है कि वास्तव में एक संभावना से भरी भावी डॉक्टर को उन लड़कियों ने मौत के मुँह में धकेल दिया, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ज़रूर मिला था, लेकिन वो कहीं से डॉक्टर बनने लायक नहीं थीं। जातिवादी कॉलेज प्रशासन पर भी सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए!

Saturday, 11 May 2019

अलवर गैंग रेप और न्याय का संघर्ष

अलवर में गैंगरेप की शिकार हुई महिला ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक साथ उदास भी करती हैं और प्रेरित भी। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीती और जिस स्थिति से वह गुज़र रही हैं, उसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। उन्होंने एक और बात यह कही कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह किसी और के साथ न हो, इसलिए दोषियों को बेहद कड़ी सजा दी जाए। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया। वह गहरे दुःख में बोल रही हैं, बावजूद इसके वह अपनी मजबूती को बटोरने का प्रयास भी कर रही हैं।
महिला के पति की हिम्मत भी प्रेरित करती है, जो अपनी पत्नी के साथ न सिर्फ डट कर खड़े हैं, बल्कि अपराधियों को दंड दिलाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं। पति के साथ भी मारपीट हुई थी और उन्हें बंधक बनाकर उनके सामने ही उनकी पत्नी का बारी-बारी से बलात्कार किया गया, उसका विडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल भी कर दिया गया। पति का कहना है कि घरवाले माने या न माने लेकिन वे न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना के बाद भी अलवर जिले में ही रेप की कुछ और जघन्य घटनाएँ सामने आयीं। अपराधियों का हौसला आखिर इतना बुलंद कैसे है? कानून का डर किसी अपराधी में रह ही नहीं गया है। अपराधियों को बिना देरी सख्त से सख्त सजा दी जाए और इस तरह का एक भी अपराधी कानून की गिरफ्त से न छूटे तभी इस तरह के अपराध रुकेंगे। होता यह है कि ऐसे कई अपराधी बार-बार अपराध भी करते हैं और छुट्टे घूमते भी रहते हैं!

Tuesday, 26 March 2019

नहीं रहीं 'आपहुदरी' रमणिका गुप्ता


अभी आ रही खबरों से पता चला कि रमणिका गुप्ता नहीं रहीं। रमणिका जी ने जिस तरह का जीवन जीया वह बने बनाए खांचे का जीवन नहीं था। वे एक बेहद मजबूत एक्टिविस्ट और नेता थीं, जिन्होंने वंचितों और मज़दूरों के हक में आवाज़ उठाई और लगातार संघर्ष किया। झारखंड के कोयला खादान मजदूरों और आदिवासियों के हकों के लिए किये गए उनके काम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
रमणिका जी प्रखर लेखिका भी थीं और हिन्दी में 'युद्धरत आम आदमी' पत्रिका का लम्बे अरसे से संपादन करती आ रही थीं। रमणिका गुप्ता की मातृभाषा पंजाबी थी इसीलिए उन्होंने इस भाषा के शब्द 'आपहुदरी' को अपनी आत्मकथा का शीर्षक बनाया। आपहुदरी का अर्थ होता है 'अपने मन की करने वाली'। रमणिका जी ने इस शब्द के माध्यम से खुद को सही ही परिभाषित किया है। चूंकि वे स्वतंत्र प्रकृति की महिला थीं और निर्भीक थीं, इसलिए जैसा कि होता है, उनके ऊपर खूब कीचड़ भी उछाला गया लेकिन जिसने ठान लिया हो उसे इन सब चीज़ों से फर्क नहीं पड़ता! उन्हें अलविदा और श्रद्धांजलि।

Friday, 23 November 2018

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता बनाम अब्राह्मणवादी पितृसत्ता!


मुझे लगता है कि वर्चस्व और शोषण की बुनियाद पर खड़ी हर विचारधारा अनिवार्यतः पितृसत्तात्मक मूल्यों की भी पोषक होती है। इसलिए जब मैं ब्राह्मणवाद शब्द सुनती हूं तो उसमें मुझे निश्चित रूप से पितृसत्ता की भी भयानक गूंज सुनाई देती है। लेकिन पितृसत्ता की व्यापकता को अकेले ब्राह्मणवाद कवर नहीं कर सकता! इसलिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की की गई आलोचना महत्त्वपूर्ण होते हुए भी पितृसत्ता के एक सीमित संदर्भ की ही आलोचना है।‌ दुनियाभर की बात तो छोड़िए अगर सिर्फ भारत में ही पितृसत्ता की सारी ज़िम्मेदारी ब्राह्मणवाद पर होती तो ब्राह्मणवाद के मुखर आलोचक गैर ब्राह्मण नेताओं, लेखकों (जिनमें कई दलित लेखक भी शामिल हैं) की पत्नियां, प्रेमिकाएं, बेटियां आदि उन्हीं से प्रताड़ित नहीं होती!! इन बातों के दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध हैं।
मैं कई सुशिक्षित ब्राह्मण ही नहीं गैर ब्राह्मण लड़कों को भी जानती हूं , जो ब्राह्मणवाद की जड़ें खोद देने का दावा किये फिरते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी प्रेमिकाओं को अंत में सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वो उनकी जाति, धर्म या समुदाय से ताल्लुक नहीं रखती थीं! आज जब वही लोग 'Smash Brahmnical Patriarchy' का पोस्टर शेयर करते हुए मुझे दिख रहे हैं, तो मैं यही अर्थ लगा पा रही हूं कि उस पोस्टर में उनके सरोकार का शब्द सिर्फ 'ब्राह्मणवाद' या 'ब्राह्मण' भर है, अगर उनकी गौण अभिरूचि पितृसत्ता में है भी तो वे उसे ब्राह्मणवाद का विषय मान कर अपने भीतर की पितृसत्ता को सकारात्मक पितृसत्ता मानते हैं। हो सकता है ऐसे पुरुषों को अपनी वाली पितृसत्ता, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से निपटने के लिए निहायत ही ज़रूरी लगती होगी! आखिर लोहा ही तो लोहे को काटता है न!!
इस फोटो के ट्विटर पर शेयर होने के बाद कुछ लोगों ने प्रतिवाद किया। प्रतिक्रिया में कई लोगों ने  Smash Brahminical Patriarchy के पोस्टर के साथ सोशल मीडिया पर  अपना प्रोफाइल फोटो अपडेट किया। इस से सम्बंधित बीबीसी की एक खबर का लिंक : https://www.bbc.com/hindi/india-46281808

Friday, 26 October 2018

सैनिटरी नैपकिन से मैन्सट्रुअल कप की ओर

मैन्सट्रुअल कप के बारे में मैंने पहली बार लगभग तीन-चार साल पहले सुना था। तब इसके बारे में जानने की जिज्ञासा तो हुई, लेकिन बहुत ध्यान नहीं दिया। आसपास किसी को इसे यूज़ करते कभी देखा, सुना नहीं था। यहाँ तक कि इसका कभी कोई विज्ञापन तक नहीं देखा था। हम जैसों, जिनकी माएँ मासिक धर्म के दिनों में कपड़े का इस्तेमाल किया करती थीं, के लिए सैनिटरी नैपकिन के ‘उन दिनों’ भी मुक्त और निश्चिंत रहने वाले विज्ञापन ही क्रांतिकारी हुआ करते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि सैनिटरी नैपकिन ने मासिक धर्म के दिनों को अपेक्षाकृत बहुत सुविधाजनक और स्वस्थकर बनाया, लेकिन इसके बावज़ूद सैनिटरी नैपकिन को उतना भी सुविधाजनक नहीं समझा जाना चाहिए, जितना विज्ञापनों में दिखाया जाता है!
असुविधाओं को झेलते हुए सैनिटरी नैपकिन से बेहतर की तालाश का खयाल आना स्वाभाविक है। इसी क्रम में मैन्स्ट्रुअल कप के बारे में जानने की इच्छा बढ़ी और पिछले लगभग दो वर्षों से मैंने इस बारे में जानकारी हासिल करना शुरू किया। यूट्यूब पर उपलब्ध इससे सम्बंधित ढेरों वीडियोज़ देखे, इंटरनेट पर उपलब्ध तकरीबन सौ से अधिक आर्टिकल्स पढ़े। यानी एक छोटे-मोटे रिसर्च जैसा अनुभव रहा। इस दौरान मैन्सट्रुअल  कप में न सिर्फ मेरी दिलचस्पी लगातार बढ़ती गयी, बल्कि इसको लेकर मेरी धारणा भी काफी अच्छी होती गयी। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि जिन औरतों ने इसका इस्तेमाल किया था, उनमें से अधिकांश के अनुभव इसे लेकर बेहतरीन थे और उनकी प्रतिक्रियायें बेहद सकारात्मक थीं। उन महिलाओं ने सैनिटरी नैपकिन की तुलना में इसे बहुत बेहतर बताया था।
इन सब बातों को जानने समझने के बाद मैन्सट्रुअल  कप खरीदने की मेरी इच्छा तो हो रही थी, लेकिन एक हिचक बरकरार थी। मेरे आसपास और मेरी जानकारी में अब तक कोई भी ऐसी दोस्त या परिचित नहीं थीं, जो मैन्सट्रुअल कप यूज़ करती हों, और जिनसे उनके अनुभव के बारे में सीधी बात की जा सके। इस दौरान की एक दिलचस्प बात साझा करना चाहूँगी। मैंने कई महीने पहले अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर मैन्सट्रुअल  कप की फोटो लगाई थी। मेरा मकसद यह जानना था कि मेरी कितनी फ्रेंड्स या रिलेटिव्स इसके बारे में कम से कम जानती हैं। मुझे यह जानकर आश्चर्य नहीं हुआ कि मेरी अधिकतर फ्रेंड्स ने मुझसे पूछा कि ये क्या है? मतलब कोई ऐसी तो नहीं ही मिली जो इसे यूज़ करती हों, लेकिन ज्यादातर इसके बारे में जानती भी नहीं थी!
बहरहाल मुझे ऐसा लगा कि अपने मित्रों परिचतों के अनुभव की बाट जोहना उचित नहीं है। जितनी जानकारी मेरे पास थी, वह इसको सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त थी। दो-तीन महीने पहले मैंने एक ऑनलाइन साइट से इस कप को खरीदा। पिछले महीने पहली बार मैंने मैन्सट्रुअल  कप का इस्तेमाल किया, इसे यूज़ करते हुए थोड़ी घबराहट और थोड़ा डर जरूर था, लेकिन इस दौरान मेरे पढ़े हुए आर्टिकल्स, देखे गये वीडियोज़ और औरतों के साझा किये हुए अनुभव काम आए। अब जब कि मैंने मैन्स्ट्रुअल कप का खुद इस्तेमाल कर लिया है, मेरे अनुभव भी प्रामणिक हैं, और इन्हें दूसरों से साझा करना मैं अपना दायित्व समझती हूँ। मेरे अनुभव, मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक बेहतर रहे। सैनिटरी पैड की तुलना में मैन्स्ट्रुअल कप न सिर्फ बहुत अधिक सुविधाजनक है, बल्कि अधिक हाइजेनिक भी है। जहाँ तक मुझे याद है पीरियड्स के दौरान इतने अधिक सुकून से मैं कभी नहीं रही। पैड यूज़ करते हुए आप पीरियड्स के दौरान पूरी तरह मुक्त नहीं रहते, चाहे कितना भी बढ़िया पैड आप यूज़ करें, लेकिन मैन्सट्रुअल  कप यूज़ करके मैं पहली बार पीरियड्स के दिनों में भी खुद को आम दिनों की तरह सहज महसूस कर पा रही थी। किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई। मैं मैन्सट्रुअल  कप के साथ बाहर गयी। दिन के लगभग बारह-तेरह घंटे मैंने घर से बाहर गुज़ारे, इस दौरान पैदल, लोकल ट्रेन, बस, ऑटो में सफ़र किया, सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, घंटों कुर्सी पर बैठकर लोगों को सुना और खुद मंच पर खड़ी होकर श्रोताओं से मुखातिब भी हुई। यह सब करते हुए मैं एकदम बेफिक्र रही, न दिनभर पैड बदलने की कोई टेंशन रही, न दाग लग जाने का कोई डर!
जब हम मैन्सट्रुअल  कप इस्तेमाल करते हैं तो यूज़्ड पैड फैंकने के झंझट से हमें निजात मिलती है। पानी से अच्छी तरह धोते ही यह फिर से इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। इस दौरान हाइजीन का खासा ख़याल ज़रूर रखना होता है। मसलन आपके हाथ अच्छी तरह से साफ हों। आपने जिस पानी का इस्तेमाल किया हो वह भी साफ-स्वच्छ हो। आजकल जो कूड़े के निपटान की समस्याएँ आ रही हैं, और कहा जाता है कि भारी मात्रा में डंप किये जाने वाले सैनिटरी नैपकिन पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो रहे हैं, ऐसी स्थिति में यह रियूज़ेबल सिलिकॉन कप स्त्रियों और पर्यावरण दोनों के लिए एक वरदान की तरह है। इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि इसकी कीमत बार-बार खरीदे जाने वाले सैनिटरी नैपकिन की तुलना में बहुत कम है। एक मैन्सट्रुअल  कप की कीमत औसतन 300 से 500 तक है, जिसका इस्तेमाल आप कम से कम पांच से छ: साल तक कर सकते हैं और अच्छे गुणवत्ता के मैन्सुट्रुअल कप का आठ से दस वर्षों तक भी इस्तेमाल इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे बहुत आसानी से अपने साथ कैरी भी किया जा सकता है।
मेरे खयाल से अब सैनिटरी नैपकिन की असुविधाओं से भी आज़ाद होने का दौर आ चुका है। यह बात सही है कि एक बड़ी आबादी तक आज भी सैनिटरी नैपकिन तक की पहुँच भी नहीं है, लेकिन उन तक भी सिर्फ सैनिटरी नैपकिन ही नहीं, बल्कि मैन्सट्रुअल कप के इस्तेमाल व फायदों से जुड़ी जानकारी और उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। मेरे खयाल से औरतों को मैन्सट्रुअल  कप का इस्तेमाल कर यह ज़रूर जानना चाहिए कि उनके लिए यह सुविधाजनक है या नहीं। सबके अपने अनुभव हो सकते हैं। मेरा जो अनुभव रहा उसके आधार पर मैं इसे दूसरों को जरूर रिकमेंड करना चाहूँगी। अब वक्त आ चुका है कि हम सैनिटरी नैपकिन से मैन्स्ट्रुअल कप की ओर शिफ्ट करें।

Wednesday, 17 October 2018

सबरीमाला में स्त्रियों के प्रवेश के विरोध में स्त्रियाँ!

सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए कुछ महिलाओं ने संघर्ष किया और अंततः सुप्रीम कोर्ट का फैसला महिलाओं के हक में आया, जो मेरे खयाल से ज़रूरी और बहुत अधिक महत्व का फैसला है। इस फैसले की ज़द में वो हर जगह आनी चाहिए जहां इस तरह के भेदभावपूर्ण रवैये अपनाये जाते हैं।
खैर सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले में जीत हासिल करने के बाद अब नई चुनौती यह आ रही है कि महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए खुद बहुत सारी महिलाएं ही मोर्चे पर डट गई हैं! मैं इसी तरह की सोच और घटनाओं को 'स्वाभाविक विडंबना' कहा करती हूं। यानी कि ऐसा होना आश्चर्य का विषय नहीं है। सच यह है कि आज भी बहुत सारी महिलाएं, अपने विचारों और आचरण में महिलाओं को नहीं पुरूषों को ही रिप्रेजेंट करती हैं। महिलाएं पितृसत्तात्मक मानसिकता का सिर्फ शिकार ही नहीं होतीं, बल्कि राज़ी-खुशी उसकी ध्वज वाहक भी बन जाती हैं। इसलिए भी हमेशा से स्त्री अधिकारों का संघर्ष बहुत जटिल और मुश्किल रहा है। मेरी दिली इच्छा है कि मैं जिसे 'स्वाभाविक विडंबना' कहा करती हूं, वह अत्यंत अस्वाभाविक विडंबना में तब्दील हो जाए। लेकिन यह सब बहुत आसान भी कहां है!
प्राय: हम सभी (जिसमें मैं खुद भी शामिल हूं) जाने अनजाने पितृसत्ता के कई मूल्यों को ढोते और प्रोत्साहित करते हैं! इस बात को जानते हुए भी इस नुकसानदेह प्रवृत्ति से पूरी तरह मुक्त हो पाना व्यक्तिगत सीमाओं के कारण नामुमकिन सा लगता है, मेरे खयाल से सदियों से चलती आ रही पैट्रिर्याकल कंडिशनिंग इतनी ताकतवर तो है ही!! लेकिन इस कंडिशनिंग को लगातार कमज़ोर करते रहने की कोशिश तो करनी ही होगी। जो नामुमकिन सा लगा करता है, वास्तव में नामुमकिन है नहीं।

Tuesday, 16 October 2018

क्लब फैक्ट्री का स्त्री गरिमा से खिलवाड़


दुनिया भर में स्त्रियों से जुड़े मुद्दों पर भले ही आंदोलन हो रहे हों, बहसें चल रही हों, लेकिन बाज़ार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता! बाज़ार अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आता! पिछले साल अमेज़न पर एक ऐसा एशट्रे बेचा जा रहा था, जो स्त्रियों की गरिमा को बहुत अधिक ठेस पहुंचाने वाला और उनके प्रति यौन हिंसा की भावना को प्रोत्साहित करने वाला था। सोशल मीडिया पर उस एशट्रे का लगातार और बहुत अधिक विरोध होने के बाद ही अमेज़न ने उसे अपने डिस्प्ले लिस्ट से हटाया था। लेकिन क्या इस घटना और उसपर आयी प्रतिक्रियायों से बाज़ार ने कोई सबक लिया? नहीं!
क्लब फैक्ट्री नामक एक ऑनलाइन मार्केटिंग पोर्टल है, जिसकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। कल फेसबुक पर इसके स्पॉन्सर्ड विज्ञापन पर मेरी नज़र गयी, तो जैसे एक झटका सा लगा। यह एक टीशर्ट का डिस्प्ले था। इसके फ्रंट पर जो इमेज छपी हुई है, वह निहायत ही आपत्तिजनक है। इसमें एक लगभग नग्न स्त्री देह के साथ एक सेक्शुअल एक्ट का इस तरह इस्तेमाल किया गया है, जिससे स्त्रियों को यौन दासी समझने की मानसिकता खूब अधिक प्रोत्साहित होगी। इस टीशर्ट के डिसक्रिप्शन में भी इसे मिस न्युट्रल प्रिंट मेल टीशर्ट कहा गया है। यानी स्त्री देह के रूप में एक ऐसी वस्तु जिसका स्वामित्व हासिल किया जा सकता है और जिसके साथ जो मन चाहे वह किया जा सकता है!
इस टीशर्ट को देखने के बाद मैं क्लब फैक्ट्री की साइट पर गयी जहाँ मुझे कई और बेहद आपत्तिजनक टीशर्ट्स दिखीं। मसलन एक ऐसी टीशर्ट दिखी जिसपर एक स्त्री की नग्न छवि इस तरह उकेरी गयी है कि उसकी योनि एक प्याले का आभास देती है, जिसमें शराब उड़ेली जा रही है। मेरे ख़याल से इसमें निहित दुर्भावना को समझने के लिए अलग से व्याख्या की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। चिंता का विषय यह भी है कि ऐसी टीशर्ट्स न सिर्फ बेचीं जा रहीं बल्कि खूब खरीदी भी जा रही हैं, और जबरदस्त रेटिंग के साथ खूब पसंद भी की जा रही हैं।
बाज़ार का स्त्री की गरिमा के प्रति विरोधी रवैया ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। पूरी निर्लज्जता और ढिठाई के साथ नए-नए सामान और नए-नए तरीके इज़ाद किये जा रहे हैं। जिस समाज में खुले आम ऐसी चीज़ें बेचीं और खरीदी जा रही हों वहाँ एक जिंदा स्त्री के प्रति अच्छे रवैये या मानसिकता की उम्मीद किस तरह की जा सकती है! क्लब फैक्ट्री के इस कृत्य का पुरज़ोर विरोध होना चाहिए। कम से कम हम स्त्रियों को इस ऑनलाइन मार्केटिंग पोर्टल का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए और यह कम से कम तब तक के लिए जरूर होना चाहिए जब तक कि क्लब फैक्ट्री अपनी इस शर्मनाक हरकत की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए शर्मिंदा होकर माफ़ी न मांग लें। माफ़ी फेसबुक को भी मांगनी चाहिए जो अपने यूज़र्स को स्त्री के प्रति दुर्भावना से भरे ऐसे घटिया विज्ञापन परोसता है। 
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क्लब फैक्ट्री पर प्रदर्शित आपत्तिजनक उत्पादों के लिंक
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Monday, 8 October 2018

ग्लो ऑफ़ होप

ग्लो ऑफ़ होप
इस मशहूर और बेहद खूबसूरत पेंटिंग को कुछ समानताओं के कारण लोग अक्सर राजा रवि वर्मा की बनाई पेंटिंग समझ लेते हैं। गूगल पर राजा रवि वर्मा की कृतियों को सर्च करने परयह पेंटिंग भी एकदम शुरूआती परिणामों में दिखाई देती है!
लेकिन असल में इस वाटर कलर पेंटिंग को एक पेंटर पिता ने अपनी बेटी को देखकर तब बनाना शुरू किया थाजब एक दिवाली की रात हाथ में दीप लिए और हथेली के सहारे उसकी लौ को हवा से बचाने का यत्न करतीवह अपने पिता के सामने आकर खड़ी हो गयी थी। इस दृश्य ने पिता एस.एल. हलदणकर को इस कदर प्रभावित किया कि तीन दिनों तक लगातार जुटे रहकर उन्होंने इसे कैनवस पर उतार लिया। इन तीन दिनों तक कई बार घंटों इसी पोज़ में खड़े रहकर बेटी भी अपने पिता का सहयोग करती रही।
इस पेंटिंग में उतारी गयी लड़की का नाम गीता हलदणकर है। गीता का पिछले हफ्ते (2अक्टूबर को) 102 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इसके बाद ही मीडिया के ज़रिए मुझे पहली बार इस पेंटिंग के पीछे की कहानी जानने का मौका मिला। इससे पहले तक इस कालाकृति को मैं भी राजा रवि वर्मा की बनायी पेंटिंग ही समझती थी!

Sunday, 23 September 2018

कल्पना लाजमी का असमय निधन

चर्चित फिल्म निर्देशक कल्पना लाज़मी नहीं रहीं। वे लम्बे समय से लीवर और किडनी की समस्या से जूझ रही थीं। 64 वर्ष की कल्पना ने आज सुबह मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
कल्पना में कमाल की रचनात्मक प्रतिभा थी और सिनेमा को लेकर उनका नज़रिया उन्हें खास बनाता है, यही कारण है कि उन्होंने 'रूदाली', 'दरमियां', दमन' सहित स्त्री केन्द्रित कई उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण फिल्में बनायी। कल्पना उन स्त्री निर्देशकों में शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म निर्देशन की दुनिया में तब कदम रखा जब इस क्षेत्र में अमूमन पुरूषों का ही बोलबाला था, और अपने काम से यह साबित किया कि उनकी निर्देशकीय क्षमता बेमिसाल है। कल्पना का असमय निधन बहुत दुखद है। हिन्दी सिनेमा को चाहनेवाले उन्हें उनके काम से हमेशा याद करेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि।

Thursday, 20 September 2018

कितने सैराट !

जातीय, वर्गीय या किसी अन्य तरह की 'प्रतिष्ठा' के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्या करवाने वाले परिजनों की प्रतिष्ठा कभी बढ़ी हो, ऐसा शायद इतिहास में कभी नहीं हुआ है। कुकर्मी हत्यारों के रूप में उनकी बदनामी चारों तरफ जरूर फैल जाती है। पता नहीं क्यों फिर भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता और न जाने किस प्रतिष्ठा या अहंकार के लिए यह सब किया जाता है!
पिछले दिनों तेलंगाना में घटी एक बेहद क्रूर घटना में कथित तौर पर एक करोड़ रुपये की सुपारी देकर एक पिता ने अपने दामाद की हत्या करवा दी। लड़की का पिता तथाकथित ऊंची जाति का है, जबकि उनकी बेटी ने जिससे प्रेम विवाह किया था, वह तथाकथित निचली जाति का था।
यह सोचने की बात है कि करोड़ों रुपए खर्च करके एक पिता ने क्या हासिल किया? एक निर्दोष लड़के की हत्या, अपनी बेटी की हंसती-खेलती ज़िन्दगी की तबाही और अपने लिए जेल की सलाखें! तो जिस 'प्रतिष्ठा' के लिए यह सब किया गया वो कहां है? बहरहाल तो इस हत्यारे पिता और अन्य परिजनों पर हर कोई थूक ही रहा है और खुद उनकी पीड़ित बेटी उनके खिलाफ न्याय के लिए डट कर खड़ी है!
इस घटना के बारे में सुनते ही मुझे 'सैराट' फिल्म का ध्यान आया था। 2016 में रिलीज़ हुई नागराज मंजुले की मराठी फिल्म 'सैराट' ने लगभग इसी तरह की घटना को अपना विषय बनाया था, और इस फिल्म ने दर्शकों की संवेदना को झकझोर कर रख दिया था। असल ज़िन्दगी में सैराट के यूं घटने और लगातार घटते रहने से अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा!!

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।

Saturday, 31 March 2018

एक संवेदनशील अभिनेत्री के जीवन की त्रासदी


मीना कुमारी एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील इंसान भी थीं। यह कहना उचित होगा कि उनका संवेदनशील व्यक्तित्व ही उनकी अदायगी में ताउम्र झलकता रहा। इस खूबसूरत अभिनेत्री के द्वारा शिद्दत से निभाए गये किरदारों में से अधिकांश के हिस्से त्रासदी हुआ करती थी और इसी ने उन्हें 'ट्रेजडी क्वीन' के बतौर स्थापित कर दिया था।
परदे की इस 'ट्रेजडी क्वीन' का अपना जीवन भी त्रासदियों से भरा हुआ था, यह तब उन्हें परदे पर देखने वाले कम ही प्रशंसकों को मालूम रहा होगा। बचपन से ही त्रासदियों से उनका जो नाता जुड़ा वह ताउम्र पीछा करता रहा। अठारह वर्ष की उम्र में अपने से लगभग दुगुने उम्र के लेखक-निर्देशक कमाल अमरोही से उन्होंने शादी की थी। मीना के ख्वाब तब बिखरने लगे जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को बात-बात पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वे मीना कुमारी को लगातार निगरानी में रहने वाली एक गुलाम की तरह अपनी जिन्दगी में रखना चाहते थे। उनके द्वारा कई शर्तें मीना कुमारी पर लाद दी गयी थीं। मीना इन सबको सहते हुए भी सम्बंध को बचाए रखने की लगातार कोशिश करती रहीं, लेकिन जब स्थितियाँ बर्दाश्त से बिल्कुल बाहर हो गयीं तो उन्होंने पति का घर छोड़ दिया। लेकिन यातना और प्रताड़ना का यह दौर यहीं खत्म नहीं हुआ। प्रेम की उनकी तलाश में मिले धोखे ने उन्हें शराब की बुरी लत लगा दी। उसी दौर में उनके मायके के कुछ रिश्तेदारों ने उनका भरपूर दोहन किया और धूर्ततापूर्वक उनकी कमायी सारी दौलत हड़पने में लगे रहे। अपने ही घर में वे भिखारियों की तरह जीने को मजबूर कर दी गयीं थीं। उन्हें ढंग से खाना तक नहीं दिया जाता था। शराब की लत ने उन्हें लीवर सिरोसिस की गंभीर बीमारी दी और वही उनकी मौत का कारण भी बनी।
मीना कुमारी अपने एकांत क्षणों में लिखा करती थीं। उनकी तमाम शेरो-शायरी में उनकी भोगी हुई गहरी वेदना को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। जैसे उनकी लिखी इन दो उम्दा ग़ज़लों को देखिए : चाँद तनहा है आसमां तनहा / दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहाया फिर टुकड़े-टुकड़े दिन बीता और धज्जी-धज्जी रात मिली / जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली!

Tuesday, 20 March 2018

खतरे में हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर की सुरक्षा

बीते शुक्रवार की शाम हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक खौफनाक घटना घटी। परिसर के भीतर एक छात्रा के साथ चार अज्ञात लोगों ने मिलकर बलात्कार करने की कोशिश की। उस वक्त लड़की के साथ उसका एक दोस्त भी था और किसी तरह वे दोनों वहां से बचकर भाग पाने में कामयाब हो सके| मारपीट और हाथापाई से दोनों को गंभीर चोटें आयीं। इस घटना की एफआईआर नजदीकी थाने में दर्ज करायी गयी है, लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। ऐसा माना जा रहा है कि ये चारों ही लोग कैंपस के बाहर के लोग थे, जो कैंपस में अनिधिकृत तरीके से घुसे थे। उन लोगों ने कैंपस में दाखिल होने के लिए और फिर भागने के लिए संभवत: उन रास्तों का इस्तेमाल किया, जो सुरक्षा कर्मियों की निगरानी में नहीं हैं और पक्की चारदीवारी की बजाय प्राकृतिक अवरोधों (जैसे बड़े पत्थर और घने जंगल आदि) पर निर्भर हैं। 
इस घटना से यह साफ़ हो गया है कि कैंपस की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही लचर है और उसमें खतरनाक सेंधमारी की जा सकती है। साथ ही यह कि कैंपस के छात्र-छात्राएं भारी असुरक्षा खतरे का सामना कर रहे हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय का परिसर लगभग 2300 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें आने-जाने वाले लोगों की निगरानी के लिए सिर्फ निर्धारित प्रवेश द्वारों पर सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर निश्चिंत नहीं रहा जा सकता है। पहली ज़रूरत तो यह है कि उन हिस्सों को पक्की मजबूत और ऊँची दीवारों से घेरा जाये जिन हिस्सों को प्राकृतिक अवरोधों पर निर्भर रहते हुए घेराव में शामिल नहीं किया गया है। मौजूदा चारदीवारों को भी अधिक सुरक्षा उपायों से लैस किये जाने की ज़रुरत है। इसके अलावा उन जगहों पर जहाँ परिसर की सीमाएँ खत्म होती हैं और जहाँ से सुरक्षा में सेंधमारी की अधिक आशंका है, वहाँ-वहाँ निगरानी के लिए सुरक्षा पोस्ट स्थापित किये जाएँ और सीसीटीवी कैमरे लगाये जायें।
कैंपस असुरक्षा पर इसलिए लगातार बात करना और ध्यान खींचना ज़रूरी होता है, ताकि इसे अधिक से अधिक सुरक्षित रखने के लिए एक दबाव बनाया जा सके। हैदराबाद विश्वविद्यालय का परिसर अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसर माना जाता रहा है, लेकिन इस घटना से यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि कभी-कभी जो कैंपस सुरक्षित दिखता है उसका कुछ श्रेय उपद्रवियों और अपराधियों की थोड़ी-बहुत भलमनसाहत को भी जाता है। लेकिन जब इस तरह के तत्व अपने इरादों को अंजाम देने के लिए सक्रिय होते हैं तो सुरक्षित होने का सारा भ्रम तोड़ कर रख देते हैं, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था की लगातार समीक्षा किये जाने की ज़रूरत होती है।
कैंपस के भीतर इससे पहले भी कभी-कभी बाहरी तत्वों के द्वारा उपद्रव और छेड़खानी की घटनाएँ सामने आती रही हैं। दो-ढाई साल पहले मेरी एक दोस्त के साथ एक ऐसी ही घटना घटी थी, जब वो कैंपस के एक सुदूर हिस्से में दोपहर के समय बाइक से अपने दोस्त के साथ घूमने गयी हुई थी। कार में सवार चार-पाँच लोगों ने उनका न सिर्फ बहुत देर तक पीछा किया, बल्कि लगातार फब्तियाँ कसते रहे और हाथ से छूने की भी कोशिश कई बार की। समय रहते मेरी दोस्त और उसके साथी ने एक सुरक्षा पोस्ट पर जाकर इस बात की शिकायत कर दी और सुरक्षाकर्मियों के तुरंत सक्रिय हो जाने के कारण वे लोग पकड़ लिए गये थे। लेकिन हमेशा ऐसे परिणाम आयें ये ज़रूरी नहीं। ये कार सवार कैंपस के ही किसी गेट से दाखिल हुए थे और उनके बाहर निकलने का भी रास्ता किसी न किसी गेट से ही होता इसलिए भी उन्हें पकड़ने में आसानी हुई, लेकिन जो घटना बीते शुक्रवार को हुई है वहाँ सुरक्षाकर्मियों की पहुँच कठिन थी।
इसे केवल संयोग ही कहा जा सकता है कि शुक्रवार की शाम को वह छात्रा अपने साथी के साथ यौन हमले से बचकर भाग पाने में कामयाब हो सकी। इस घटना से तुरंत सबक लिए जाने की ज़रुरत है नहीं तो किसी भारी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता! यह भी ज़रूरी है कि आसपास के इलाकों में सघन पूछताछ की जाए। उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएँ और जो भी दोषी हैं, उन्हें चिन्हित कर उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाये। जो कुछ भी हुआ वह हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए चिंता ही नहीं शर्म का विषय भी है।

Monday, 19 March 2018

****हिंदी सिनेमा को सई परांजपे का योगदान****

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सई परांजपे की फिल्मों की रेंज बहुत व्यापक है । उन्होंने कृषकों, मजदूरों, बेरोज़गार युवकों, अकेली स्त्रियों, शारिरिक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों आदि की समस्यायों को अपने सिनेमा में पूरी शिद्धत से उतारा है । सई की बहुत बड़ी खासियत यह है कि उनकी फिल्मों की जान इनके कथातत्व मात्र नहीं हैं, बल्कि बहुत सतर्कता से किया गया दृश्य संयोजन, कैमरे से उतारे गये सरल प्रतीक और इसके पीछे की बेहतर सोच है। सई एक ऐसी फिल्मकार हैं, जिन्होंने पुरूष वर्चस्व के इस क्षेत्र में न सिर्फ अपना एक मुकाम बनाया बल्कि वो हिन्दी सिनेमा को सार्थक दिशा देने वाले और इसकी ऐतिहासिक परंपरा को वास्तव में समृद्ध करने वाले अग्रणी निर्देशकों में से एक हैं ।
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['आजकल' (मार्च-2018 अंक) में प्रकाशित]

Thursday, 8 March 2018

इतिहास से अनभिज्ञ हैं महिला दिवस पर चुटकियाँ लेने वाले लोग!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जिन लोगों ने किसी भी तरह की चुटकियाँ लेते हुए लिखा है, मुझे इस दिवस पर उनकी समझ को लेकर संदेह है। पहली बात अच्छे से समझ लीजिए कि यह दिवस बाज़ार केन्द्रित नहीं है और दूसरी बात कि यह दिवस सरकारों का दिया हुआ 'उपहार' भी नहीं है! 1975 में मिली संयुक्त राष्ट्र संघ की स्वीकृति भी इस दिवस का उद्गम स्थल नहीं है। इसके पीछे खुद महिलाओं का संघर्ष है और उनके दीर्घकालीन संघर्ष की एक लम्बी परंपरा है।
औरतों ने सड़कों पर संघर्ष करके अपने हक सुनिश्चित किए हैं। कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है‌ कि विभिन्न देशों में अपने अन्य अधिकारों के अलावा मताधिकार हासिल करने के लिए भी महिलाओं को लंबा संघर्ष करना पड़ा है। दुनिया के आधुनिक समझे जाने वाले कई देशों में भी महिलाओं को यह हक अपेक्षाकृत बहुत बाद में और बहुत संघर्षों के बाद मिला है।
इस दिवस पर सोशल मीडिया पर विशेषज्ञ व्यंग्य करने की बजाय अपनी उंगलियों को थोड़ा कष्ट देकर गूगल सर्च तक पहुंचे तो, अधिक दूर नहीं तो कम से कम सौ साल पीछे तो ज़रूर पहुंचेंगे जब 8 मार्च 1917 को रूस की मजदूर महिलाएं, रूस की तब की राजधानी पेट्रोग्राड (अब सेंट पीटर्सबर्ग) की सड़कों पर थीं और ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर इन विरोध प्रर्दशन करने वाली महिलाओं से भर गया हो। 'रोटी और शांति' के लिए विरोध प्रदर्शन और हड़ताल पर उतरी इन महिलाओं की इस पहलकदमी को ज़ारशाही के खिलाफ रूसी क्रांति की शुरुआत भी माना जाता है! वैसे अगर आप और पड़ताल करेंगे तो इस दिवस के बारे में कई-कई और परतें खुलती जाएंगी बशर्ते आपकी यह सब जानने में रूचि हो!
कुल मिलाकर मेरे यह सब लिखने का ध्येय यह है कि जो यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, यह हमें मिला कोई 'कोमल उपहार' नहीं है। यह दिन इस बात पर विचार करने के लिए नहीं है कि, पुरूषों से कम से कम आज के दिन महिलाओं को सहानुभूति मिलनी चाहिए या इस दिवस से प्रेरणा लेकर पुरुषों को महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए! जब आप यह सब लिखते हैं, तो आप महिलाओं के संघर्षों की लम्बी परम्परा की जलती हुई मशाल पर पानी डालने की नाकाम कोशिश कर रहे होते हैं। 
सहानुभूति, अच्छे व्यवहार की भीख जैसे शब्दों का इस दिवस से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। यह दिवस महिलाओं के संघर्षों के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है, इस संघर्ष को अनवरत बनाए रखने के लिए उर्जा हासिल करने का दिन है और साथ ही साथ यह याद दिलाने का दिन है कि महिलाएं बराबरी का अपना हक सुनिश्चित करवाने का माद्दा रखती हैं। कृपया कर इस दिवस को इसी रूप में समझें तो किसी और पर नहीं, आप खुद पर ही उपकार करेंगे।

Wednesday, 28 February 2018

होली के नाम पर होने वाली बुरी हरकतों का बुरा मानना ज़रूरी है !

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने होली की आड़ में अपने ऊपर वीर्य से भरा हुआ गुब्बारा फेंके जाने की जिस घटना को सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक किया है, वह बेहद भयावह है और उसे बहुत ही गंभीरता से लिये जाने की ज़रूरत है। इसकी जांच की जानी चाहिए और इसके ज़िम्मेदारों को आईडेंटिफाई करके उनपर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि नज़ीर बन सके! यह किसी अन्य यौन हमले से अलग नहीं है।
होली के नाम पर इस तरह की घिनौनी हरकत ही नहीं, अपरिचितों के ऊपर आपको पानी के गुब्बारे, पानी की बौछार, रंग-गुलाल कुछ भी फेंकने का हक नहीं है। इसी तरह होली की आड़ लेकर आपको अपने परिचितों के (या किसी के भी) उनकी अनिच्छा या विरोध के बावजूद शरीर टटोलने और अन्य शारीरिक दुर्व्यवहार करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता!
इस तरह की सारी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए अलग से कड़े गाइडलाइंस जारी किये जाने की ज़रूरत है और इसके साथ ही कड़ी निगरानी और‌ तत्वरित न्याय उपलब्ध कराने की ज़रूरत है। होली के नाम पर जिन बातों का ज़िक्र यहां हुआ है वह सब यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है और यह बात सबको अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए।
कुछ वर्ष पहले जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती थी, तब कथित तौर पर विश्वविद्यालय की एक शिक्षिका के ऊपर आर्टस फैकल्टी में कुछ लड़कों ने पानी से भरे गुब्बारे फैंके थे और शिक्षिका के विरोध किये जाने पर उनके साथ बदतमीज़ी की गई थी। इसके बाद शिक्षिका ने एक एफआईआर दर्ज करवायी थी। इस मामले में अबतक न्याय सुनिश्चित हो सका है या नहीं यह मुझे नहीं पता, लेकिन इतना ज़रूर पता चला कि जब उन लड़कों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े तो वे यह दलील देते हुए पाए गए कि उनका गुब्बारा फेंकना होली की सद्भावना से प्रेरित था!!
यदि होली की सद्भावना ऐसी होती है, तो इस सद्भावना को अपने पृष्ठ स्थान में डालिए और दफा हो जाईए। होली को सद्भावना का पर्व बनाए रखने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि जिन बातों को बुरा मानना चाहिए उनको प्रर्याप्त कड़ाई से बुरा माना जाए!