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Sunday, 24 May 2020

जड़ी-बूटी युक्त गरम पानी पीने वाले प्रदेश से हम कुछ तो सीखें


भारत के जिन राज्यों में कोरोना संक्रमण के शुरूआती मामले देखे गये थे, उनमें केरल भी शामिल था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस तरह की खबर बार-बार ध्यान खींच रही है कि भारत में कोरोना से कारगर तरीके से निपटने में केरल सबसे अग्रणी रहा है। कोरोना पीड़ितों की रिकवरी दर और नये संक्रमणों की रोकथाम को लेकर केरल की खूब तारीफ हो रही है। इसके लिए केरल सरकार और स्थानीय प्रशासन के प्रबंधन और सक्रियता की तो तारीफ हो रही है- मलयाली जीवनशैली की कुछ अन्य विशेषताओं ने भी लोगों का ध्यान खूब खींचा है। इन्हीं में एक है वहाँ की स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग नजरिये के साथ विकसित हुई खान-पान की संस्कृति। उनकी खान पान की स्वस्थ आदतों को; मजबूत इम्यून सिस्टम का कारण मानकर; केरल वालों की खूब तारीफ हो रही है। हो भी क्यों न!
अपनी केरल यात्रा की यादें अब भी ताज़ा है। 2018 अंत में जब केरल गयी थी तब दिसम्बर में उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की तुलना में वहाँ ठीक विपरीत मौसम था। चिलचिलाती धूप और पसीने से तर-ब-तर कर देने वाला मौसम! कभी-कभी राहत पहुँचाती बारिश की फुहारें! लेकिन इस गरम मौसम में भी एक मलयाली मानुष को आप त्रिशुर स्टेशन पर आइआरसीटीसी कैंटीन में गरम पानी के बदले ठंडा पानी परोसने पर टोकते हुए और नाराजगी जाहिर करते हुए सुनेंगे तो आपको कैसा लगेगा? मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा क्योंकि यह मेरी वापसी के समय का प्रसंग था; और तब तक मैं स्थानीय खान पान की आदतों से न सिर्फ परिचित हो गयी थी बल्कि पिछले तीन दिनों से उसी खान पान का लुत्फ भी उठा रही थी। इसलिए समझ पा रही थी कि कुछ-कुछ लाल रंग लिए गरम पानी यहाँ के स्वास्थ्य सजग लोगों के जीवन का सहज हिस्सा है।
केरल बेहतरीन गुणवत्ता के मसालों का प्रचूर मात्रा में उत्पादन करने वाला राज्य है। इसके बावजूद कम से कम मेरा अपना अनुभव यही रहा कि यहाँ भोजन बनाने में तेल-मसालों का बहुत कम उपयोग किया जाता है। इस बात का अनुभव आपको वहाँ के हर छोटे-बड़े रेस्टोरेंट में होगा। सब्जियां तो प्रायः लगभग उबली हुई होती थीं। मैं जहाँ ठहरी हुई थी वहाँ हर बार भोजन के साथ मीठे के नाम पर सिर्फ केला ही परोसा गया। सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के साथ- पका केला, उबला हुआ केला या फिर भुना हुआ या फिर केले से ही बना कुछ और। ऐसा माना जाता है कि केला मीठा खाने की इच्छा की पूर्ति तो करता है और साथ ही भोजन को पचाने में भी बहुत मदद करता है। चावल के नाम पर वहाँ अधिकतर लोग मोटा चावल खाना ही पसंद करते हैं। चावलों में मोटे चावल स्वास्थ्य के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाते हैं।
[यह तस्वीर मैंने एक दिन त्रिशुर में खाने से पहले थी]

अब फिर से गरम पानी का ज़िक्र। केरल के खान-पान में मुझे सबसे ज्यादा जिस चीज़ ने आकर्षित किया था; वह यहाँ परोसे जाने वाला पानी ही था। मुझे बाताया गया कि वहाँ लोग साल के बारहों महीने खाने के साथ गरम पानी ही पीना पसंद करते हैं। पारंपरिक तौर पर भी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मत से भी ठंडे पानी की जगह गरम पानी का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत-बहुत अधिक लाभकारी माना जाता है। लेकिन यहाँ सिर्फ सादा गरम पानी कहाँ; औषधीय गुणों वाले खास किस्म की जड़ी-बूटियों के साथ उबाला हुआ पानी इस्तेमाल किया जाता है और यही कारण है कि उस पानी का रंग लालिमा लिए होता है। खाने के साथ, खाने से पहले और खाने के बाद जड़ी-बूटी युक्त हल्के लाल रंग का पानी पीना। जब पहली बार मुझे वह पानी पीने को मिला तो मुझे लगा कि पानी गंदा तो नहीं, शायद ग्लास अच्छे से साफ नहीं किया गया हो। मैंने वो पानी सिंक में फेंककर दूसरे ग्लास में जग से फिर से पानी उड़ेला। फिर से पानी का वही रंग और गरमाहट तो थी ही। लेकिन तभी देखा कि सामने वाले टेबल पर उसी रंग का पानी ग्लास में उड़ेल कर मजे से पिया जा रहा है। डरते-डरते मैंने भी पानी को हल्का सा टेस्ट किया और वह पानी मुझे अच्छा ही लगा। सादा गरम पानी मुझसे पिया नहीं जाता रहता तो उन जड़ी बूटियों का ही कमाल कहेंगे कि वह पानी मुझे ठीक लगा, बल्कि धीरे-धीरे बहुत स्वादिष्ट लगने लगा था। मैं खाने के मेज पर उस पानी के परोसे जाने का इंतजार किया करती थी। खाना कम खाया जाता था और वह पानी कई ग्लास पी जाती थी। हर बार पानी पीते हुए यही सोचती थी कि कुछ दिन य़हाँ रह जाऊं तो मैं ये गरम पानी पी-पी कर ही स्वस्थ और एकदम पतली हो जाउंगी।
जहाँ मिठाई के नाम पर ज्यादातर किस्म-किस्म के उबाले या भुने, पके या कच्चे केले से बने व्यंजन खाये जाते हों, और गर्मी में भी गरम और जड़ी-बूटी युक्त पानी पिया जाता हो, वहाँ की खान पान की संस्कृति तो अनुकरणीय होगी ही।
हम लोगों की आदतें तो ये हैं कि कोरोना काल में बाज़ार बंद हुए तो हम सब खुद ही वो सारी चीज़ें घरों में ही बनाने लग गये। बेहिसाब तली-भुनी, मसालेदार और मीठी चीज़ें- मानो पकौड़े-समौसे-मिठाईयों की दुकान और ढ़ाबे हमने अपने-अपने किचन में ही खोल लिये थे। इसकी कीमत भी कोई और नहीं हम ही चुकाएँगे। खान-पान के मामले में हम केरल से थोड़ा-कुछ तो सीखें!

Friday, 20 March 2020

थाॅट प्रवोकिंग फिल्म है 'थप्पड़'


अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म 'आर्टिकल 15' मुझे बेहद पसंद आई थी और एक सकारात्मक फिल्म लगी थी। बाद के दिनों में जब 'थप्पड़' का ट्रेलर रिलीज़ हुआ ; तब से फिल्म देखने की जिज्ञासा थी।

फिल्म रिलीज़ हुई पर देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कुछ खास नहीं मिल रही थी। किसी ने कहा कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा के दिखाया है, तो कोई कह रहा था फालतू ड्रामा है। आज 'थप्पड़' पर फिल्म बनी है; अब कल को उंगली पर फिल्म बनेगी कि तुमने मुझपर उंगली कैसे उठाई! मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी; क्योंकि फिल्म देखी नहीं थी।

फाइनली फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देखने के बाद लगा कि इसे सही मायनों में काबिले तारीफ और ज़रूरी फिल्म कहा जा सकता है। लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे फिल्म में जिस-जिस तरह के लूप होल्स की आशंका थी, शुक्र है फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं था। अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जो वह दिखाना चाहते थे, उन्हें उसमें सौ प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। जब आप 'थप्पड़' देखकर उठेंगे तो बहुत सारी चीज़ों पर, बातों पर सोचने के लिए मजबूर होंगे। सही मायनों में 'थाॅट प्रवोकिंग' फिल्म है। जहाँ बात थप्पड़ की होकर भी थप्पड़ की नहीं है। बात जो गलत हुआ उसको 'शिट हैपेन्स' कहकर टालने, गलती को अस्वीकारने, ग्लानि बोध न होने और माफी न मांगने की है और फिल्म में इसे दिखाने में निर्देशक कहीं चूके नहीं हैं।
फिल्म का अभिनय पक्ष भी उम्दा है। पहली बार स्क्रीन पर दिखे पवैल गुलाटी ने मंझा हुआ अभिनय किया है। 'आँखों देखी' के बाऊजी की बेटी बनी माया सराओ को इसमें वकील की भूमिका में पहचानना मुश्किल है; उनका अभिनय भी बेहतर है। बाकी पूरी स्टार कास्ट ने भी काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अनुभव सिन्हा की खासियत है कि उनकी फिल्में बेहद स्पष्ट होती हैं। जो वो कहना चाहते हैं उसमें कहीं भी आपको अस्पष्टता देखने को नहीं मिलती। उनकी पिछली फिल्मों 'मुल्क'और 'आर्टिकल 15' से भी इसे समझा जा सकता है। ये स्पष्टता ही आम से आम दर्शक को भी फिल्म से जोड़ने में सहायता करती है।
'थप्पड़' हमारे समाज को दिखाती है। समाज की उन बारीक चीज़ों को कवर करती चलती है; जिनके बारे में हमारा पितृसत्तात्मक समाज सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। फिल्म आपको बहुत कुछ देकर जाती है।

Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।

Tuesday, 18 June 2019

जादूगर चंचल लाहिरी का आखिरी स्टंट


कोलकाता के मशहूर जादूगर चंचल लाहिरी की ख़बरें कल से पढ़ रही थी कि; जंजीरों और रस्सियों से बँध कर, सात तालों में कैद होकर उन्होंने खुद को हुगली नदी में उतारवाया था। अपना जादुई करतब दिखाते हुए उन्हें जंजीरों-तालों से खुद को आज़ाद करके; नदी से सकुशल बाहर आना था। लेकिन अफ़सोस कि चंचल बाहर नहीं आ सके। उनकी मृत्यु की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन जब तक शव नहीं मिल जाता, तब तक निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता था। खबर पढ़ कर मन बेहद विचलित हुआ। कल से उसी तरफ ध्यान लगा हुआ था। अभी पता चला कि उनका शव मिल गया है। यानी करतब दिखाने के उनके जुनून ने आखिर उन्हें लील लिया।
दुखद ये है कि यह कोई पहला ऐसा वाकया नहीं है। हमारे यहाँ बहुत से जादूगर और जोकर जादू और करतब दिखाते हुए मौत के मुँह में समा गये। बहुत सारी फिल्मों में भी ऐसे त्रासदपूर्ण दृश्य फिल्माए गये हैं। मेरे ख़याल से ऐसे जानलेवा करतब नहीं दिखाने चाहिए। जान से कीमती तो कुछ नहीं होता। लोग अधिक से अधिक तालियाँ बजायेंगे और कुछ पैसे देकर अपने घर चले जायेंगे। आपका हासिल क्या है? ज़ोखिम उठाकर करतब दिखाना, बच गये तो किस्मत, न बचे तो दुर्भाग्य!!
चंचल लाहिरी के बारे में सोच रही हूँ, कि पानी के अन्दर अपनी ज़िन्दगी बचाने के लिए उस वक्त उन्होंने न जाने कितने प्रयास किये होंगे! इस तरह के जानलेवा करतबों के प्रदर्शन पर न सिर्फ प्रशासन द्वारा पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए बल्कि दर्शकों को भी कुछ नया, कुछ थ्रिलिंग देखने के लोभ से बचना चाहिए। आपके थ्रिल के लिए किसी की जान चली जाए, इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता!!

Sunday, 26 May 2019

बेहद अफ़सोसनाक है पायल ताडवी की 'आत्महत्या'


मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की 23 साल की छात्रा पायल की आत्महत्या की घटना बेहद-बेहद दुखद है। यह और भी अधिक अफसोसनाक है कि पायल को आत्महत्या के लिए उकसाने का इल्ज़ाम जिन तीन लोगों पर है, वो तीनों कथित तौर पर जातीय अहंकार से ग्रस्त 'लड़कियाँ' ही हैं! खबरों के मुताबिक पायल ताडवी ने इन्हीं तीन लड़कियों के जातिसूचक और आरक्षण के प्रति अपमानजनक तानों और प्रताड़ना से परेशान होकर यह कदम उठाया। प्रशासन से पायल ने समय रहते शिकायत भी की थी, लेकिन उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया।
आवश्यकता है कि इस घटना की निष्पक्ष तरीके से जाँच हो और दोषियों को कोई रियायत न बरती जाए। यदि तीनों लड़कियों पर लगा आरोप सही है तो कहा जा सकता है कि वास्तव में एक संभावना से भरी भावी डॉक्टर को उन लड़कियों ने मौत के मुँह में धकेल दिया, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ज़रूर मिला था, लेकिन वो कहीं से डॉक्टर बनने लायक नहीं थीं। जातिवादी कॉलेज प्रशासन पर भी सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए!

Saturday, 11 May 2019

अलवर गैंग रेप और न्याय का संघर्ष

अलवर में गैंगरेप की शिकार हुई महिला ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक साथ उदास भी करती हैं और प्रेरित भी। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीती और जिस स्थिति से वह गुज़र रही हैं, उसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। उन्होंने एक और बात यह कही कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह किसी और के साथ न हो, इसलिए दोषियों को बेहद कड़ी सजा दी जाए। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया। वह गहरे दुःख में बोल रही हैं, बावजूद इसके वह अपनी मजबूती को बटोरने का प्रयास भी कर रही हैं।
महिला के पति की हिम्मत भी प्रेरित करती है, जो अपनी पत्नी के साथ न सिर्फ डट कर खड़े हैं, बल्कि अपराधियों को दंड दिलाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं। पति के साथ भी मारपीट हुई थी और उन्हें बंधक बनाकर उनके सामने ही उनकी पत्नी का बारी-बारी से बलात्कार किया गया, उसका विडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल भी कर दिया गया। पति का कहना है कि घरवाले माने या न माने लेकिन वे न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना के बाद भी अलवर जिले में ही रेप की कुछ और जघन्य घटनाएँ सामने आयीं। अपराधियों का हौसला आखिर इतना बुलंद कैसे है? कानून का डर किसी अपराधी में रह ही नहीं गया है। अपराधियों को बिना देरी सख्त से सख्त सजा दी जाए और इस तरह का एक भी अपराधी कानून की गिरफ्त से न छूटे तभी इस तरह के अपराध रुकेंगे। होता यह है कि ऐसे कई अपराधी बार-बार अपराध भी करते हैं और छुट्टे घूमते भी रहते हैं!

Monday, 22 April 2019

ईस्टर के मौके पर श्रीलंका में आत्मघाती बम हमले

ईस्टर के दिन‌ श्रीलंका में आतंकवादियों ने चर्च और होटलों को निशाना बनाते हुए सिलसिलेवार आत्मघाती बम हमले किए। 300 के लगभग निहत्थे-निर्दोष लोग मारे गए और सैंकड़ों अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इनमें सभी उम्र के लोग शामिल थे। इनमें से अधिकांश लोग प्रार्थना के लिए आए थे, या सद्भावना से उत्सव मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे। शुरूआती जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि इन हमलों को एक इस्लामिक आतंकी संगठन ने अंजाम दिया है।
कितना बर्बर और कितना कायरना कृत्य है ये! इसका हासिल क्या होगा? निर्दोष-निहत्थे नागरिकों को मारकर ऐसे संगठन अपने होने का सिर्फ और सिर्फ अहसास कराते रह सकते हैं, इसके अलावा इनका कोई न्यायसंगत लक्ष्य नहीं है, और यदि कोई पागलपन भरा लक्ष्य है भी तो वो कभी हासिल नहीं होने वाला। यदि इस तरह के काम किसी 'जन्नत' की चाह में और 'उनहत्तर कुंवारी रूहों' को भोगने की लालसा में किए जा रहे हों तो उस जन्नत का तो किसी को नहीं पता लेकिन उन जहन्नुमों में आग लगे, जहां ऐसी लालसाएँ जगा-जगा कर इस तरह के 'जिहादी' तैयार किए जाते हैं!!

Thursday, 21 February 2019

मेरी लघुकथा 'समोसा' :)

कहानी, कविता जैसी साहित्यिक विधाओं की मैं एक तरह से मन्त्रमुग्ध पाठक रही हूँ। मुझे लगता रहा है कि यह सब लिखना कम से कम मेरे वश की बात नहीं है! मैं कुछ टिप्पणियां या लेख लिखकर अपनी बात कह पाऊं यही बहुत लगता है। हां किस्सागोई का आकर्षण और लघुकथाओं का आकार इस फॉर्म में अपनी बात कहने के लिए कभी-कभी प्रेरित ज़रूर करता रहा है, लेकिन मुझे पता है कि लघुकथा वास्तव में एक बहुत ही कॉम्पैक्ट विधा है, और यह बहुत अधिक रचनात्मक कुशलता की मांग करती है, जिसका मुझमें नितांत अभाव है।
एक शाम मेरी आँखों के सामने एक घटना घटी। मैने एक मासूम बच्चे को अपने ही माता-पिता के भाषाई हीनताबोध का शिकार बनते हुए देखा था। मैंने उस बच्चे को सहमते हुए देखा और देखते-देखते ही उसकी सहजता जिस तरह गायब हो गयी, उसने मुझे खासा विचलित किया था। उस दिन इस घटना को मैंने यूँ ही नोट करके रख लिया था। बाद में इसे ही थोड़ी सी काट-जोड़ के साथ मैंने एक लघुकथा की शक्ल देनी चाही। हालांकि मुझे पूरा संदेह रहा कि यह लघुकथा बन भी सकी है या नहीं!
पिछले दिनों रचनाकार.आर्ग' ने एक लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया था। मैंने इस रचना को उस प्रतियोगिता में भेज दिया। आज ईमेल से सूचना मिली कि प्रथम, द्वितीय या तृतीय तो नहीं लेकिन विशेष पुरस्कार के लिए जिन चार लघुकथाओं को चुना गया, उसमें मेरी लघुकथा- समोसाभी है। मुझे तो इसी बात की ख़ुशी है कि मैंने जो लिखा उसे कम से कम लघुकथा के रूप में पहचाना गया! संयोग ही है कि इस लघुकथा के पीछे भाषाई हीनता बोध की एक घटना है, और आज मातृभाषा दिवस भी है।


Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Sunday, 18 November 2018

निराश करती है विनोद कापड़ी की फिल्म 'पीहू'!

आने वाले हफ्ते के बाकी दिनों की व्यस्तता पहले से निर्धारित थीइसलिए कल शाम पीहू’ और मोहल्ला अस्सी’ दोनों ही फ़िल्में बैक टू बैक देखनी पड़ी। ज़िन्दगी में पहली बार बड़े पर्दे पर एक ही दिन में दो फ़िल्में देखीं। दरअसल दोनों ही फिल्मों का लम्बे समय से इंतज़ार था और मुझे लग रहा था कि इनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
जो पहली फिल्म देखी वो विनोद कापड़ी निर्देशित पीहू’ थी। इससे पहले विनोद कापड़ी मिस टनकपुर हाज़िर हों’ बनाकर तारीफें बटोर चुके हैं। इसलिए पीहू’ से अपेक्षाएं स्वाभाविक थी लेकिन इस फिल्म ने निराश किया। मुझे नहीं पता कि कुछ लोग किन भावनाओं में बहकर इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैंमुझे तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ भावनाओं को भुनाने वाली लगी। सुनने में यह भी आया है कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इस फिल्म को पुरस्कार और तारीफें भी मिली हैं, यह भी मेरे लिए आश्चर्य की बात ही है! फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि इस पूरी घटना को महज़ एक सम्वेदनशील रिपोर्ट के रूप में भी छापा या दिखाया जाता तो वह इस फिल्म से कम प्रभावी नहीं होता। यह फिल्म जो सन्देश देना चाहती हैवो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैलेकिन इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए आपको इस फिल्म को अनावश्यक रूप से लगभग दो घंटे तक झेलना पड़े तो यह बेमानी लगता है।
एक ही लोकेशन और सिचुएशन पर पूरी फिल्म को शूट करना कम खर्चीला ज़रूर होता हैलेकिन वह सचमुच बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता हैउसमें बहुत सावधानी की जरुरत होती है। विनोद कापड़ी और उनकी टीम इस मसले पर काफी लचर साबित हुई है। इस फिल्म में एक से बढ़कर एक असंगत दृश्यों की भरमार है। कई बार तो ऐसा लगा कि जब जिस चीज़ को दिखाना होता है वो चीज़ उस दृश्य में हाज़िर हो जाती है। मसलन बीच घर में बच्ची को फिनायल की बोतल मिल जाती हैइसी तरह बच्ची के हाथ से दूध की बोतल गिर जाने पर उसे वहीं पर पोछा भी मिल जाता है! मुझे लगता है कि निर्देशक ने सोचा होगा कि इन पहलुओं पर कोई बारीकी से ध्यान नहीं देगा जबकिसच यह है कि फिल्म के दौरान यह सारी चीज़ें बहुत डिस्टर्ब करती हैं और यह कोई बारीक नहीं बल्कि साफ़ दिखने वाला अंतर है। एक दृश्य में बच्ची अपनी मृत माँ के ज़ख़्मी चेहरे पर बहुत सारी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाती है और अगले कुछ दृश्यों में वह क्रीम कभी चेहरे पर दिखाई देती हैऔर कभी गायब हो जाती है। ये कुछ संकेत भर हैंइस फिल्म में ऐसी गलतियों की भरमार है। गौर से देखेगें तो इस फिल्म के कई दृश्य और घटनाएँ आपको अतार्किक लगेंगी। एक दृश्य को लेकर हालांकि मैं कोई एक्सपर्ट कमेंट नहीं कर सकती लेकिन मेरे लिए यह ताज्जुब और जिज्ञासा का विषय ज़रूर है कि क्या नींद की चार गोलियां खाकर भी दो साल की बच्ची को महज़ तीन-चार घंटे की नार्मल नींद ही आएगीऔर उसके बाद उठकर वह पूरी तरह एक्टिव हो सकती हैइस फिल्म में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि यह मेडिकली प्रूव्ड होमुझे इसकी जानकारी नहीं है। मेरे खयाल से फिल्म की पटकथा बहुत दुरूस्त नहीं है। इस पर बहुत मेहनत करने की जरूरत थी जिसे शायद बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। शायद बहुत सारा ध्यान एक छोटी बच्ची को फिल्माने की चुनौतियों से निपटने पर ही लगा दिया गया।
एक छोटी बच्ची से प्रभावी अभिनय करवाना सचमुच बहुत कठिन काम है। इस फिल्म की बड़ी खासियत भी यही बताई जा रही थी वो कि एक बहुत छोटी बच्ची से निर्देशक ने चुनौती भरा अभिनय करवाया है। इसमें कोई शक नहीं कि पीहू विश्वकर्मा सचमुच बहुत प्यारी बच्ची हैऔर हर बच्चे की तरह उसकी सहज हरकतें लोगों को पसंद आती हैं और इसे उतारने के लिए निर्देशक और पूरी टीम ने बहुत मेहनत भी की होगीलेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसके बावजूद निर्देशक ने फिल्मांकन का कोई बहुत महीन काम नहीं किया है। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों ने छोटे-छोटे बच्चों से बहुत असाधारण काम करवाए हैं। एक उदाहरण के लिए 1966 में प्रदर्शित हुई चेतन आनंद की एक बहुत ही साधारण फिल्म आखिरी ख़त’ का जिक्र किया जा सकता है जिसमें महज़ सवा साल के बच्चे से बहुत बेहतरीन अभिनय करवाया गया है। वास्तव में बहुत साधारण स्तर के निर्देशकों ने भी चाइल्ड आर्टिस्ट्स से बहुत बेहतर काम करवाए हैं।
पीहू’ के प्रमोशन में इस तरह की भावनात्मक अपील की जा रही है कि जो अपने परिवार से प्यार करते हैं वो यह फिल्म देखने ज़रूर जाएँ। लेकिन फिल्म देखने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि आर्थिक लाभ के लिए यह एक किस्म का भावनात्मक दोहन भर है। इस फिल्म को वो लोग ज़रूर देखने जाएँ जो फ़िल्में देखकर अपनी राय बनाने में यकीन करते हों और हर बार की तरह कहूँगी कि हो सकता है उनकी राय मुझसे अलग हो। जहाँ तक परिवार से प्यार करने का प्रश्न है और यदि आप वो करते हैंतो आपके लिए कोई समस्या ही नहीं है। हम सबको अपने-अपने जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए। शकमतभेदमामूली झगड़ों की वज़ह से इसे तबाह नहीं कर लेना चाहिए। हमें इन सारी चीजों से निपटना आना चाहिए। यहाँ तक कि संबंधों के बीच जब यह लगने लगे कि जीवनयापन दूभर हो रहा हैतब जीने के नए और उत्साहजनक तरीके और रास्ते तैयार कर लेने चाहिए। यह जीवन जीने के लिए मिला हैइसके साथ कुछ उत्तरदायित्व बंधे हुए हैंहमें उन सबका सम्मान करना चाहिए।
दूसरी देखी गयी फिल्म मोहल्ला अस्सी’ ने निराश नहीं किया। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म बहुत सारे प्रक्रियागत झंझटों और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझते हुए प्रदर्शित हुई है। इसपर विस्तार से दूसरे पोस्ट में लिखूँगी। बहरहाल इतना जरूर कहूँगी कि यह फिल्म देखने लायक है। साहित्य पर फिल्म बना पाने की हिम्मत कम फिल्मकार करते हैं। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ हिम्मत करते हैं बल्कि इसे एक अच्छी फिल्म में तब्दील करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। उनकी पहली फिल्म पिंजर’ भी इसका उदाहरण है। हम अपने पैसे खर्च कर इस तरह कि फिल्में देखेंगे तभी फिल्माकारों में इस तरह की फिल्में बनाने की हिम्मत बची रहेगी।

Sunday, 14 October 2018

प्रश्नपत्र तैयार करने वालों की बीमार मानसिकता!

हाल ही में सम्पन्न दिल्ली नगर निगम की प्राइमरी टीचर भर्ती परीक्षा के लिए तैयार प्रश्नपत्र में जाति सम्बंधित आपत्तिजनक प्रश्न पूछा गया है। पिछले दिनों इसी तरह का एक प्रश्न हरियाणा में आयोजित किसी परीक्षा में भी पूछा गया था। इन प्रश्नों को सूक्ष्मता से देखने पर इनमें जातिवाद ही नहीं लिंग, रंग और नस्ल से जुड़े दुराग्रह एकसाथ नज़र आते हैं। ऐसे प्रश्न तैयार करने वाले कौन लोग हैं? किस सोच के तहत ऐसे प्रश्न तैयार किये जाते हैं? इससे चयन समितियों की खतरनाक मानसिकता और पूर्वाग्रह के साथ-साथ दुस्साहस का भी पता चलता है! संविधान का क्या खूब मखौल उड़ाया जा रहा है। जिम्मेदार लोगों पर कड़ी अनुशासनात्मक कारवाई होनी चाहिए। इस तरह की बीमार मानसिकता का उन्मूलन बहुत आवश्यक है।

Thursday, 27 September 2018

मेरठ की साम्प्रदायिक पुलिस

हमारे देश का संविधान बताता है कि भारत एक धर्म/पंथ निरपेक्ष देश है, इसलिए संवैधानिक दायित्व से बंधी हुई किसी भी संस्था या व्यक्ति का पदों पर रहते हुए धर्म निरपेक्ष होना अनिवार्य है। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक लड़की के साथ पुलिस वैन में मारपीट करते हुए और भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए पुलिस वाले कह रहे हैं : एक हिन्दू होकर मुसलमान से प्यार करती है? हिन्दू कम पड़ गये हैं क्या?’!
ख़बरों के मुताबिक यह मेरठ का वीडियो है और एक हिन्दू युवती के एक मुसलमान युवक के साथ होने की खबर सुनकर कुछ कट्टरवादी हिन्दू संगठन के सदस्यों ने जमा होकर उन्हें घेर लिया था। कहने को तो पुलिस उन दोनों को यहाँ से अलग-अलग वैन में बचाकर ले जा रही थी, लेकिन वास्तव में पुलिस की वर्दी पहने ये लोग खुद सांप्रदायिक गुंडों जैसी सोच रखने वाले थे और इस सच का सामना करना उस लड़की के लिए कितना भयावह रहा होगा, इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है।
इस तरह के क्रूर या अभद्र तरीके तो छोड़िये, पुलिस को किसी को प्यार या अपनेपन से भी यह समझाने का हक़ नहीं है, कि किसे किस धर्म के लोगों से प्यार या दोस्ती करनी चाहिए और किससे नहीं। यह तय करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी तरह की बाधा को ख़त्म करना सरकारी तंत्र और न्याय तंत्र का काम है। जब ऐसी संस्थाएं ही लोगों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने लगें, तो क्या किया जाना चाहिए? इसे साधारण अपराध की बजाय असाधारण अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिये और दोषी व्यक्ति या व्यक्तियों को न सिर्फ पदों से हटा देना चाहिए, बल्कि बेहद सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।

Wednesday, 26 September 2018

हर तरह की कट्टरता खतरनाक है!

मुंबई के एक गणपति पूजा पंडाल में AIMIM पार्टी के विधायक वारिस पठान ने एक कार्यक्रम में सम्मिलित होकर लोगों को पूजा की शुभकामनाएं दीं और अपने वक्तव्य का समापन गणपति बप्पा मोरेया कहकर किया। एक मुसलमान विधायक को हिन्दुओं के धार्मिक आयोजन में आमंत्रित करना और उस विधायक का उत्सव में सहर्ष शामिल होकर उनके धर्म के प्रति सम्मान प्रकट करनाधार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता का अच्छा उदाहरण कहा जा सकता थालेकिन इसके बाद जो कुछ घटा वह निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
कथित तौर पर वारिस पठान‌ को सोशल मीडिया और अन्यत्र इस बात के लिए ट्रोल किया गया कि वे न केवल मूर्तिपूजा के आयोजन में सम्मिलित हुए बल्किउन्होंने एक हिन्दू देवता के सम्मान में नारा भी लगाया! इसके बाद वारिस पठान पर इतना दबाव बना कि उन्होंने एक वीडियो जारी कर अपने इस आचरण पर शर्मिंदगी जताई और कहा कि 'अल्लाह ताला से उन्होंने माफी मांगी है और वे उन्हें माफ कर देंगे। गलती इंसानों से ही होतीलेकिन आईंदा वे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे।'
कल्पना करिए कि वारिस पठान को उनके मुसलमान होने के कारण गणेश पूजा के पंडाल में जाने या संबोधित करने से रोक दिया जातातो हम इसे बेहद शर्मनाक और असहिष्णुता भरा कृत्य बताकर इसकी तीखी आलोचना करते।
मेरे खयाल से वारिस पठान का गणेश उत्सव में शामिल होने के अपने आचरण को गुनाह कहना और उसके लिए अफ़सोस जतानाउससे कम तीखी आलोचना का विषय नहीं है। उन्होंने वीडियो जारी करके किसी धर्म विशेष के सम्मान को बढ़ाया या घटाया नहीं हैबल्कि धार्मिक सौहार्द के प्रति जघन्यता दिखाई है। ऐसा कहा जा रहा है कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें माफी मांगने के लिए बाध्य किया। पार्टी मुखिया असदुद्दीन ओवैसी को शर्म आनी चाहिए कि एक ओर तो वे संघ और भाजपा की साम्प्रदायिकता की तीखी आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ अपनी पार्टी के विधायक को बेहद घटिया स्तर के असहिष्णु साम्प्रदायिक आचरण के लिए प्रेरित करते हैं। सिर्फ संघी कट्टरता ही नहींहर तरह की कट्टरता ख़तरनाक हैऔर इसका तीखा विरोध होना चाहिए।

Thursday, 20 September 2018

कितने सैराट !

जातीय, वर्गीय या किसी अन्य तरह की 'प्रतिष्ठा' के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्या करवाने वाले परिजनों की प्रतिष्ठा कभी बढ़ी हो, ऐसा शायद इतिहास में कभी नहीं हुआ है। कुकर्मी हत्यारों के रूप में उनकी बदनामी चारों तरफ जरूर फैल जाती है। पता नहीं क्यों फिर भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता और न जाने किस प्रतिष्ठा या अहंकार के लिए यह सब किया जाता है!
पिछले दिनों तेलंगाना में घटी एक बेहद क्रूर घटना में कथित तौर पर एक करोड़ रुपये की सुपारी देकर एक पिता ने अपने दामाद की हत्या करवा दी। लड़की का पिता तथाकथित ऊंची जाति का है, जबकि उनकी बेटी ने जिससे प्रेम विवाह किया था, वह तथाकथित निचली जाति का था।
यह सोचने की बात है कि करोड़ों रुपए खर्च करके एक पिता ने क्या हासिल किया? एक निर्दोष लड़के की हत्या, अपनी बेटी की हंसती-खेलती ज़िन्दगी की तबाही और अपने लिए जेल की सलाखें! तो जिस 'प्रतिष्ठा' के लिए यह सब किया गया वो कहां है? बहरहाल तो इस हत्यारे पिता और अन्य परिजनों पर हर कोई थूक ही रहा है और खुद उनकी पीड़ित बेटी उनके खिलाफ न्याय के लिए डट कर खड़ी है!
इस घटना के बारे में सुनते ही मुझे 'सैराट' फिल्म का ध्यान आया था। 2016 में रिलीज़ हुई नागराज मंजुले की मराठी फिल्म 'सैराट' ने लगभग इसी तरह की घटना को अपना विषय बनाया था, और इस फिल्म ने दर्शकों की संवेदना को झकझोर कर रख दिया था। असल ज़िन्दगी में सैराट के यूं घटने और लगातार घटते रहने से अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा!!

Thursday, 6 September 2018

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाली आईपीसी की धारा 377 को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला है। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी इस बेतुकी धारा को निरस्त करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में आये ऐसे ही फैसले को खुद सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में रद्द कर दिया था। देर से ही सही लेकिन अपनी उस गलती को सुधार कर सुप्रीम कोर्ट ने एक दुरुस्त काम किया है।
इस मामले को सिर्फ समलैंगिकों के अधिकारों से जुड़े मामले के रूप में देखना एक संकुचित नज़रिया होगा, वास्तव में यह मानवाधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा मसला है। मुझे खुशी है कि हमारा देश थोड़ा और प्रगतिशील, थोड़ा और बेहतर हुआ है। सिर्फ LGBTQ+ समुदाय ही नहीं पूरे देश को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Wednesday, 8 August 2018

लफंगे उपद्रवियों की कांवड़ यात्रा!

दिल्ली कावड़ियों को सर आँखों पर बिठाती रही है। कांवड़ यात्रा शुरू होने से महीनों पहले उनके आराम के लिए जगह-जगह पंडाल बनने शुरू हो जाते हैं। सावन के महीने में दिल्ली की लगभग हर गली हर नुक्कड़ पर कांवड़ यात्रियों के लिए विश्राम शिविर, भंडारे वगैरह के आयोजन होते रहते हैं।
इतना मान-सम्मान इन कावंड यात्रियों को इन दिनों मिलता है, जिनके इनमें से अधिकांश पूरे जीवन हक़दार नहीं हो सकते! इसलिए ऐसे अवसरों का लाभ लुच्चे-लफंगे, वेल्ले लोग खूब उठाते हैं। टोलियाँ बना-बना कर ये भी कांवड़ियों का चोला ओढ़कर निकल पड़ते हैं या कांवड़ियों की टोलियों में शामिल हो जाते हैं। इस तरह होता यह है कि कुछ सज्जन श्रद्धालुओं की तुलना में उन्मादी और उत्पाती लोगों का एक बड़ा काफिला कांवड़ियों के लिवास में चल रहा होता है। इनमें से कई समूह न सिर्फ तमाम ट्रैफिक और सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देते हैं, बल्कि छेड़खानी और मारपीट तोड़-फोड़ का जैसे लाइसेंस लिये घूमते हैं! लोगों की असुविधा का ध्यान रखे बगैर लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स लगाकर विभिन्न पड़ावों पर और रास्ते भर भी इनका नाचना-गाना चलता रहता है। इनकी हरकतों से ट्रैफिक में भारी दिक्कत आती है और सामान्य लोग बेबस और सहमे हुए नजर आते हैं।
धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इनकी गुंडागर्दी को क्यों चलने दिया जाना चाहिए? हर साल ऐसी घटनाएँ क्यों दोहराने की इजाजत दी जाती है? इस तरह की अप्रिय और बेहद असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए ज़रूरी गाइडलाइन्स क्यों नहीं बनाई जाती या पालन की जाती? इस तरह की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए दुरुस्त सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किये जाते? उपद्रवी कांवड़ियों की पहचान कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुँचाया जाता?
धर्म की आड़ लेकर की जाने वाली ऐसी उदंडता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए!

Tuesday, 10 July 2018

**** हिन्दी सिनेमा में हाशिये की यौनिकता ****

हाशिये की लैंगिक पहचान या हाशिये की यौनिकता को फिल्मों का विषय बनाने वाली फिल्में अभी खुद सिनेमा के हाशिये पर हैं। इसके बावजूद ये फ़िल्में समाज की मानसिकता में हो रहे बदलावों को दिखाने और बदलावों के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी भाषा से इतर विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी इस तरह की उल्लेखनीय फिल्में बनाई जा रही हैं।
बया (अप्रैल-जून-2018) 
संपादक- गौरीनाथ
हिंदी सिनेमा में हाशिये का समाज : 1(विशेषांक) 
अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन- II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

Friday, 8 June 2018

प्रेमी जोड़ों के प्रति घृणा का एक रूप यह भी!

हैदराबाद का लुम्बिनी पार्क मेरी पसंदीदा जगहों में से एक है।‌ हुसैन सागर के बीचों-बीच खड़ी बुद्ध की बेहद विशाल प्रतिमा मन को मोह लेती है।
पिछले दिनों लुम्बिनी पार्क जाना हुआ था। इस बार वहां ऐंट्री गेट के पास एक बड़ा सा पोस्टर टंगा दिखा। दूर से मुझे लगा कि इसपर पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार की अपील करने वाला कोई संदेश लगा होगा। लेकिन नजदीक जा कर जो देखा और पढ़ा वह मन को दुखाने वाला था। कुंठाएँ कितने-कितने रूपों में अभिव्यक्त होती हैं! वास्तव में यह प्रेम के प्रति बेहद घृणा प्रदर्शित करने वाला और प्रेमी जोड़ों के प्रति बेहद अपमानजनक पोस्टर है। मनुष्य ही नहीं पशुओं का प्रेम भी इस घृणा की जद में है!
सार्वजनिक और एकांत जगहों का भेद प्रेमी जोड़ों को भी अच्छी तरह से मालूम होता है। यह उन्हें सिखाने की ज़रूरत नहीं होती! उनसे उनका एकांत तक छीन लेने को आमादा लोग, सार्वजनिक जगहों पर भी उनका साथ होना, साथ बैठना, हाथ पकड़ कर चलना और बातें करना तक बर्दाश्त नहीं कर पाते!
ऐसे लोग इस तरह के हज़ारों पोस्टर लगा दें तब भी उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। जोड़े कुंठित दुनिया की परवाह नहीं किया करते। यह पोस्टर बुद्ध को समर्पित एक खूबसूरत जगह को बदनुमा बनाने का काम ज़रूर कर रहा है। दरअसल इस तरह की सोच पूरी दुनिया को बदनुमा बना देने के अभियान का ही तो हिस्सा है!!

Sunday, 27 May 2018

गीता कपूर के निधन पर

'पाकीज़ा' और 'रजिया सुल्तान' सहित सौ से अधिक हिन्दी फिल्मों में काम करने वाली गीता कपूर के बारे में पिछले साल एक खबर आई थी कि बीमारी की हालत में उन्हें बिना बताए उनके बच्चे मुंबई के एक अस्पताल में छोड़कर चले गए थे। वहां से उन्हें फिर एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, जहां उन्होंने बताया था कि उनका बेटा उन्हें भूखा रखता था और तकलीफें दिया करता था।
खबरों के मुताबिक गीता कपूर के दो बच्चे हैं। उनका बेटा प्रोफेशनल कोरियोग्राफर है और बेटी एयरहोस्टेस है। बहुत बुरे अनुभवों के बावजूद भी गीता हमेशा अपने बच्चों को याद किया करती थीं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके बच्चे उन्हें वापिस लेने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह ज़रूर हो गया कि दुख और बीमारी झेलते हुए गीता 56-57 की उम्र में ही 75-80 वर्ष की वृद्धा जैसी लगने लगी थीं। आज गीता कपूर का निधन हो गया। दुखद यह है कि बीमारियों से अधिक उन्हें भावनात्मक ज़रूरतों के अभाव ने असमय इस दुनिया को छोड़ने के लिए बाध्य किया!
नम श्रद्धांजलि।