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Thursday, 3 December 2020

अलविदा; मसालों के शहंशाह

 

मेरी पीढ़ी के लोग जब से पैदा हुए थे, महाशय धर्मपाल गुलाटी जी को MDH मसालों के विज्ञापन में देखते आ रहे थे। महाशय जी की खास बात यह थी कि मैंने बचपन से लेकर आज तक उनको वैसा का वैसा ही देखा है।

पिछले कई सालों से उनके देहांत की अफवाहें बीच-बीच में उड़ती रही हैं; लेकिन हर बार हर अफवाह को वे झूठा साबित कर देते थे; लेकिन इस बार ऐसा ही नहीं हुआ। कोरोना से तो वे जंग जीत गए; लेकिन उसके बाद दिल का दौरा पड़ने से आज सुबह उनका देहांत हो गया।

महाशय धर्मपाल का जीवन प्रेरणादायक रहा है। उनका जीवन वास्तव में शून्य से शिखर तक की यात्रा का एक बड़ा उदाहरण है। भारत विभाजन के बाद लुटे-पिटे लगभग खाली हाथ सीमा पार कर भारत पहुँचे लोगों में से वे भी एक थे। शुरूआती दिनों में तांगा चलाया। बाद के दिनों में सड़क किनारे एक खोखा लगाकर मसाले बेचे और फिर ऐसा दौर भी आया जब उन्हें मसालों का शहंशाह कहा जाने लगा। उनके ब्रांड का नाम एमडीएच यानी 'महाशयां दी हट्टी' मसाले के उनके शुरूआती कारोबार से ही निकला नाम है। उनके बारे में एक विशेष बात यह भी है कि जीवन के लगभग अंतिम समय तक वे अपने ऑफिस पहुँचते रहे और कामकाज देखते रहे। शानदार और सक्रिय लम्बी पारी खेलकर विदा हुए मसालों के शहंशाह को हार्दिक श्रद्धांजलि।

Sunday, 5 April 2020

'शिकारा' देखने के बाद

कश्मीर का दर्द दशकों पुराना है। एक खुशहाल वादी में जो कई दशकों तक पर्यटन और हिन्दी फिल्मों की शूटिंग का पसंदीदा लोकेशन रहा- उस पर न जाने किस की नज़र लग गयी। धीरे धीरे वहाँ की फिज़ा में घृणा और असंतोष का जहर फैलता चला गया। इसके साथ ही पुलिस और फौज का हस्तक्षेप भी बढ़ता चला गया। हमारे पड़ोस के एक पाकदेश ने भी धरती की जन्नत को जहन्नुम की ओर धकेलने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे कश्मीर कभी नहीं सुलझने वाली समस्या की तरह स्थापित हो गया। कश्मीर दर्दगाह हो गया। दहशतगर्दी, मुठभेड़, पुलिसिया और फौजी अभियानों, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं आदि के बीच आम कश्मीरी पिसता चला गया। खैर 'दर्दगाह' ही सही इसकी अपनी अस्मिता रही है, यह गुमनाम नहीं रहा है। लेकिन इसके साथ गुमनामी की कथा भी जुड़ी हुई है।
इस दर्दगाह के बारे में सोचते हुए कई बार हम उन दर्दगाहोंके बारे में नहीं सोच पाते जो यहाँ से दरबदर हैं। वास्तव में कश्मीर समस्या में कश्मीरी पंडितों का दर्द हाशिये पर ही रहा है। एक मिथक की तरह इसके कई-कई संस्करण और कई-कई व्याख्याएँ मिलती हैं। इस समस्या की ठीक तस्वीर हमारे सामने कभी उभर ही नहीं पाई। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म शिकाराइस स्थिति में एक सार्थक हस्तक्षेप करती है।
1990 के दशक में कश्मीर में क्या हुआ था कि कश्मीरी पंडितों को अपना खूबसूरत आशियाना छोड़ कर प्रतिकूल जलवायु वाले शहरों की ओर पलायन करना पड़ा था? वहाँ सगे-सम्बंधियों जैसे और सहजीवियों की तरह रहने वाले हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन की रेखा कैसे खिंच गयी? कैसे पड़ोसी ही स्वार्थी होकर हैवानियत पर उतर आए? निर्वासित लोगों पर क्या-क्या बीती? कश्मीर की कश्मीरियत पर सिर्फ कश्मीरी मुसलमानों का हक़ है; यह कब से और क्योंकर प्रस्तावित किया जाने लगा? ऐसे कई सवालों के उत्तर इस एक फिल्म में हैं।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नहीं बनायी गयी है। प्रतिशोध की भावना इस फिल्म में कहीं नहीं है। यह फिल्म कश्मीरी पंडितों की समस्या का जिम्मेदार किसी धर्म को नहीं बल्कि भटके हुए लोगों को ठहराती है। यह फिल्म वास्तव में घृणा के खिलाफ है। इस फिल्म का मुख्यपात्र अमेरिका के राष्ट्रपति को बार-बार पत्र लिखकर मिलने की इच्छा जताता है ; मिलकर वह उनसे बस इतना पूछ लेना चाहता है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में वे हथियार क्यों भेजे जो वादियों तक पहुँचकर उसके सीने को छलनी करते गए!
फिल्म इस विश्वास के साथ खत्म होती है कि एक दिन अपने ही घर में भटके हुए लोग ठौर ठिकाने पा जाएँगे और कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पंडित भी अपने घरों को लौट पाएँगे। एक खूबसूरत प्रेमकथा के सहारे जैसे घृणा को सात परत नीचे पाताल में दफन कर दिया गया हो। अभिनय, कहानी, फिल्मांकन सब बेहतरीन है। ऐसी फिल्में उजाले की ओर ले जाती हैं।

Monday, 18 November 2019

डॉ. फ़िरोज़ की नियुक्ति का विरोध और जगन्नाथ-लवंगी प्रसंग


बीएचयू में संस्कृत के सहायक प्राध्यापक के रूप में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों में से कुछ छात्रों के विचार एक न्यूज़ चैनल की वीडियो फुटेज के माध्यम से जानने को मिले। अधिकांश छात्रों ने बताया कि वे काशी की परंपरा और गरिमा को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोई विधर्मी और अनार्य उन्हें धर्म पढ़ाए-सिखाए ये उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने पक्ष को अधिक मजबूती से पेश करने के लिए एक छात्र ने पंडितराज जगन्नाथ से जुड़े प्रसंग का ज़िक्र करते हुए कहा कि आचार्य जगन्नाथ भले ही बहुत प्रतिष्ठित विद्वान और धर्मज्ञ रहे हों, लेकिन काशी के समाज ने उनका भी इसलिए बहिष्कार कर दिया था; क्योंकि उन्होंने एक यवन (मुसलमान) कन्या से शादी की थी। अफसोस है कि उस छात्र ने इस प्रसंग का अधूरा ज़िक्र किया!
लोगों के बीच यह प्रसंग जिस रूप में सुरक्षित है, वास्तव में वह आत्मा की गांठे खोल देने वाला है। कहते हैं कि पंडितराज जगन्नाथ का लवंगी नाम की जिस लड़की से प्रेम हुआ था, वह शाहजहाँ के परिवार में पली-बढ़ी एक अनाथ कन्या थी। उसके माता-पिता मुसलमान थे।
लवंगी से विवाह के बाद आचार्य जगन्नाथ काशी लौटे। काशी के विद्वानों ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया, उनका बहिष्कार कर दिया और स्थिति यह हो गई कि एक बेहद योग्य और विद्वान व्यक्ति का जीवन-यापन तक दूभर हो गया। ऐसी स्थिति में बहुत क्षुब्ध होकर पंडितराज ने कहा कि काशी के पंडित उनका बहिष्कार करने वाले कोई नहीं होते; काशी के द्वारा उन्हें और उनके विवाह को स्वीकारने-अस्वीकारने का निर्णय सिर्फ माँ गंगा कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि काशी का समाज गंगा तट पर आकर खुद अपनी आँखों से देख सकता है कि माँ गंगा उन्हें ठुकराती हैं या स्वीकारती हैं।
तय तिथि को नियत घाट पर काशी निवासियों की पूरी भीड़ जमा हो गई। लवंगी के साथ पंडितराज जगन्नाथ भी घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठ गए। इसके बाद पंडितराज ने गंगा की स्तुति में श्लोक लिखने शुरू किए। कहा जाता है कि उनके एक-एक श्लोक रचने और पढ़ने के साथ गंगा का जल स्तर भी एक-एक सीढ़ी ऊपर आता जाता। इस तरह उन्होंने कुल 52 श्लोकों की रचना की और गंगा का जल उस अंतिम बावनवी सीढ़ी तक पहुँच गया जहाँ पंडितराज और लवंगी बैठे हुए थे। अपने आह्वान पर गंगा के उन तक पहुँचने पर पंडितराज भाव विह्वल हो गए और उनका गला रूंध गया। रूंधे गले से उन्होंने प्रार्थना की कि माँ गंगे उन्हें और लवंगी को स्वीकार कर अपनी शरण में लें। तब पूरी भीड़ के बीच से गंगा ने दोनों को इस तरह से समेटा जैसे कोई माँ अपने बच्चों को गोद में उठा रही हो। इसके बाद कुछ क्षणों में ही गंगा का जलस्तर सामन्य हो गया।
यह प्रसंग धर्म सम्प्रदाय के कृत्रिम कट्टर विभाजन को नकार कर मनुष्य की गरिमा को स्थापित करता है। कहा जा सकता है कि मनुष्यता को स्थापित करने के लिए जगन्नाथ और लवंगी ने अपना बलिदान दिया था!
लेकिन कहते हैं कि काशी के कट्टर विद्वान समाज पर इस बलिदान का भी कोई विशेष असर नहीं पड़ा था। डॉ.फिरोज की नियुक्ति का विरोध करते हुए एक छात्र द्वारा पंडितराज जगन्नाथ के प्रसंग का अधूरा जिक्र; इसी बात को साबित करता है कि वह कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी कायम है!!

Wednesday, 28 August 2019

अशांत कश्मीर, पाकिस्तानी सत्ताधारियों की दुर्भावना और आज़ादी का मतलब


कश्मीर को अशांत बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पाकिस्तान की सरकारों की है। इतिहास गवाह है कि कश्मीरियों के विश्वास को सबसे पहले पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने ही तोड़ा। और अब भी वे आज़ाद कश्मीर के नाटक के नाम पर एक गुलाम कश्मीर को भोग रहे हैं। अगर POK आज़ाद होता तो किस हक़ से इमरान खान पाकिस्तान के स्वंत्रता दिवस पर वहाँ पाकिस्तान का झंडा फहराने गए थे? अपने ही संकल्प से पीछे हटकर पाकिस्तान ने POK में बहुत सारे गैर कश्मीरियों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया हुआ है। कश्मीर से पाकिस्तानियों को इतना ही प्यार होता तो वे अक्साई चीन का हिस्सा चीन को उपहार में नहीं दे देते। अब जब पाकिस्तान में विपक्ष के नेता बिलावल भुट्टो और इमरान खान की पूर्व पत्नी का बयान आया है कि पहले पाकिस्तान के सत्ताधारी श्रीनगर को पाकिस्तान में मिलाने की बात किया करते थे लेकिन अब वो अपने POK को बचाने के लिए भी जूझ रहे हैं; तो साफ़ हो जाता है कि पाकिस्तान किस निगाह से कश्मीर को देखता रहा है। हे महानुभावों गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आतंकवाद से निपटो। मानवाधिकार की बहाली के लिए मन से प्रयास करो। दोनों ही मुल्कों की सत्ता के लिए युद्धोंन्माद, सीमा विवाद जैसे मुद्दे अपने ही देश की जनता के आवश्यक मुद्दों से ध्यान भटकाने की सबसे बड़ी साजिश है।
कश्मीर पर जोर-जबरदस्ती बंद होनी चाहिए। वहाँ पर मानवाधिकार को जिस तरह से ताक पर रख दिया गया है, वह बेहद तकलीफदेह है। यह भी ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट धारा 370 पर एक संतुलित और संवेदनशील निर्णय दे। कश्मीरी आवाम को भी इस बात पर विचार करना चाहिए कि कश्मीर की आज़ादी कोई झांसा तो नहीं है, जिसकी बदौलत हमेशा के लिए अशांति और पिछड़ापन बरक़रार रखा जा सके; और राजनीतिक रोटियाँ सिकती रहें। हम सब इसकी बहुत दर्दनाक कीमत चुकाते आ रहे हैं। कश्मीरियों के आज़ादी के नारों में लम्बे समय से एक यह नारा भी सुना जाता है; जिसमें कहा जाता है- आज़ादी का मतलब क्याऔर जो मतलब बताया जाता है; वह कश्मीरियततो कत्तई नहीं है! यह बात साफ़ होनी चाहिए कि अब यह उप-महाद्वीप एक और पाकिस्तानके निर्माण का सदमा और घाव बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है!
हम एक धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्र हैं। हमें न तो भारत पर कोई हिंदूवादी दावा मंजूर है, न कश्मीर पर कोई इस्लामी दावा। ये दोनों ही स्थितियाँ हमें नर्क की तरफ धकेलने वाली स्थितियां हैं। आज़ादी का मतलब- इस देश में अमन, चैन और नागरिक अधिकारों के साथ जीना है- यही हमारा ध्येय होना चाहिए और इसके  लिए हमें मिलजुल कर कदम से कदम मिलाकर संघर्ष करते रहना होगा।

Monday, 26 November 2018

जॉन ज़ोफ्फने की बनाई टीपू सुल्तान की पेंटिंग

मैसूर के दरिया दौलत बाग महल (जिसे अब एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है) में टीपू सुल्तान की एक तस्वीर लगी हुई है, जिसे जॉन ज़ोफ्फने (John Zoffany) ने 1780 में तब बनाया था, जब टीपू तीस साल के युवा थे। देखने में साधारण लगने वाली इस पेंटिंग की खासियत यह है कि इसे आप दायें-बायें या सामने कहीं से भी देखें, आपको ऐसा लगेगा कि टीपू सुल्तान की आँखें आपकी ओर ही देख रही हैं। चाहे तो आप खुद आज़मा लें!


Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर

19वीं सदी के शुरुआती दशकों की यह बात है, जब जर्मनी में रहने वाले एक यहूदी दम्पत्ति ने अपनी संतान के जन्म से कुछ वर्ष पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। कहते हैं कि उनकी संतान ने अपनी छह वर्ष की उम्र में ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया था। बाद के दिनों में यहूदी माता-पिता की इस संतान कार्ल मार्क्स ने, धर्म के अफीम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करते हुए लिखा।
मार्क्स के दुनिया को अलविदा कहने के दशकों बाद दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि जर्मनी में, हिटलर के दौर में धर्म के नाम पर नाज़ियों ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया, और वह इतिहास के सबसे बड़े और जघन्यतम नरसंहारों में से एक माना जाता है।
धर्म को अफीम होते हुए हमारे देश के लोगों ने भी लगातार देखा है। मुल्क की आज़ादी के साथ ही जब धर्म के नाम पर इस मुल्क के टुकड़े किए जाने लगे, तब अधिकांश प्रभावित लोगों ने देखा कि जो पहले अच्छे पड़ोसी और मित्र हुआ करते थे, धर्म के नाम पर एक-दूसरे के प्रति घोर अमानवीयता दिखाने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगा और थोड़ी भी हिचक नहीं हुई!
धर्म का यही अफीमी रूप हमारे देश के लोगों ने तब भी देखा जब पंजाब में धर्म के नाम पर अलग मुल्क तैयार करने के लिए गोलियां और बारूद इक्कट्ठे किए जाने लगे और भारी हिंसा का सहारा लिया जाने लगा। 
1984 में लोगों ने देखा कि किस तरह देश की राजधानी में एक धर्म विशेष के लोगों का कत्लेआम हुआ और इतिहास के सीने पर एक कभी नहीं भरने वाला ज़ख्म उभर आया।
अफीम खाए लोगों को आप उन तस्वीरों में भी देख सकते हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान ली गई थी। इसके अलावा समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से जूझने की इस देश को आदत सी हो गई है।
धर्म की अफीम अब भी दुनिया भर की हवा में तैर रही है और हमारे देश में तो इसका असर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यदि यह सच नहीं है तो यह सोचिए कि गुजरात के भीषण साम्प्रदायिक नरसंहार के समय नकारात्मक भूमिका निभाने वाले राज्य के मुखिया आज कैसे केन्द्र की सत्ता संभाल रहे हैं? कि आखिर कैसे नकारात्मक भूमिकाओं में उनके सबसे बड़े सहयोगी वर्तमान लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं?
इसे भी धर्म की अफीम का असर ही तो कहेंगे कि ठीक अभी जिस समय उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था तबाह की जा रही है, तब लोग अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लगी दशकों पुरानी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर भारी विवाद खड़ा करने की जुगत में हैं। मकसद यही है कि इस उन्माद में बुनियादी समस्याएं कहीं दब जाएं।
मार्क्स ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से इतिहास और अपने समकाल पर विचार किया था, इसलिए उनके विश्लेषण सटीक भविष्यवाणी की तरह साबित हुए। बहुत ही श्रमपूर्वक, बहुत ही ईमानदारी और मनुष्य की बेहतरी की नीयत से किए गए मार्क्स के चिंतन और लेखन का ही यह असर है कि आज वे अपने जन्म के 200 साल बाद भी इस दुनिया की बेहतरी के लिए सोचने वाली युवतम से युवतम पीढ़ी के सबसे बड़े वैचारिक मित्र और मार्गदर्शक बने हुए हैं और इसमें कोई शक नहीं कि यह सिलसिला कभी थमने वाला नहीं है।

Saturday, 14 April 2018

ओस्मानिया यूनिवर्सिटी और इफ्लू से लौटकर

कल एक परीक्षा के सिलसिले में सिकंदराबाद के पास के एक इलाके में जाना हुआ। विभाग के कई अन्य साथी भी वहां परीक्षा देने आये हुए थे। वापसी में हम छ: लोग एक साथ थे। लोकल ट्रेन लेने के लिए हम लोग बस से निकले और बस से उतरकर स्टेशन तक की दूरी हमने पैदल ही तय करने की सोची। इसका बहुत अच्छा परिणाम यह मिला कि चलते-चलते हम उस इलाके में दाखिल हुए जहाँ ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के किसी डिपार्टमेंट का रास्ता दिखाने वाला साइन बोर्ड लगा हुआ था, यानी कि हम ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के इलाके में थे। पिछले चार-पांच साल से हैदराबाद में होने के बावजूद यहाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय ओस्मानिया में जाने का मौका अब तक नहीं मिल पाया था। जबकि मेरी यह इच्छा हमेशा से रही है कि हैदराबाद के जितने भी प्रमुख विश्वविद्यालय हैं उन्हें कम से कम एक बार ज़रूर देख लूँ। कल का दिन इस लिहाज़ से बहुत सफल साबित हुआ। हमने तत्काल तय किया कि इस संयोग का फायदा उठाते हुए ओस्मानिया यूनिवर्सिटी घूम लिया जाये।
      टहलते हुए हमने कुछ डिपार्टमेंट और कुछ हॉस्टल्स देखे, लेकिन हमारे लिए जो महत्त्व का था वो आर्ट्स कॉलेज को देखना था जहाँ हम पूछ-पूछ कर पहुंच गये। यह आर्ट्स कॉलेज एक बहुत ही भव्य इमारत में है, इस भवन का निर्माण 1934 में शुरु हुआ था और 1939 में इसका उद्घाटन हुआ। इसका मॉडल तैयार करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों की एक टीम ने कई यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका, जापानमिस्र और तुर्की जैसे देशों का दौरा किया था और अंत में एक बहुत ही कलात्मक संरचना वाले भवन का निर्माण किया गयाजिसमें विभिन्न देशों की स्थापत्य कला का मिश्रण दिखाई देता है। मानविकी (Humanities) के सभी विभाग इसी भवन में स्थित हैंजिनमें हिंदी विभाग भी शामिल है।
हालांकि इतनी भव्य इमारत के बावजूद जो चहल-पहल इसके इर्द-गिर्द दिखनी चाहिए थी वह गायब थी और लड़कियाँ तो इक्का-दुक्का ही कहीं-कहीं दिख रही थीं। ओस्मानिया एक क्लोज़ कैंपस नहीं है और इस वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय की तरह यहाँ भी बाहर की गाड़ियाँ और लोग बेधड़क आ-जा रहे थे। जितनी देर हम ओस्मानिया घूमते रहे हमें यही लगा कि अच्छे-खासे क्षेत्रफल और अच्छे भौगौलिक परिवेश में होने के बावजूद शिक्षण संस्थानों का जैसा माहौल होना चाहिए उसका वहां अभाव है। यह भी हो सकता है कि यह सिर्फ उस दिन विशेष का अनुभव हो और जैसा मुझे महसूस हुआज़रूरी नहीं कि वही वास्तविकता हो।

ओस्मानिया में घूमते हुए ही हमें पता चला कि हैदराबाद का एक अन्य प्रमुख विश्वविद्यालय इफ्लू’ (English and Foreign Languages University) पास में ही ठीक सड़क के दूसरी तरफ स्थित है। यह एक और संयोग था तो हम सबने तय किया कि लगे हाथ वहाँ भी घूम लिया जाये। हैदराबाद विश्वविद्यालय से एम.ए करने वाला एक छात्र उस्मान जो अब वहाँ पीएचडी कर रहा है, उसने इफ्लू में हमारीअगवानी की और अपनी यूनिवर्सिटी में हमें घुमाया। इफ्लू बहुत बड़ा कैंपस नहीं है लेकिन वह जितने दायरे में फैला हुआ वह अपने आप में सम्पूर्ण और सुव्यवस्थित है। यहाँ आकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात पता चली, वह यह कि इस विश्वविद्यालय में लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा बहुत अधिक है (एक छात्र के मुताबिक लगभग चौगुनी) और इसीलिए यहाँ लड़कों के लिए एक हॉस्टल है वहीं लड़कियों के लिए तीन या चार हॉस्टल हैं। यह वाकई बड़े आश्चर्य और ख़ुशी की बात है। 
इस यूनिवर्सिटी की जो सबसे बड़ी खासियत है वह यहाँ का माहौल है, खासतौर पर लड़के-लड़कियों के साथ होने, घूमने, पसंद के कपड़े पहनने और सुरक्षा वगैरह को लेकर ये कैंपस बहुत ही अच्छा माना जाता है और यहाँ छात्रों के व्यक्तिगत जीवन की निगरानी करने या दखल देने जैसी बातें नहीं सुनने को मिलती। हालाँकि यह बात कुछ रूढ़िवादी शिक्षकों को चुभती भी है, लेकिन वे सिवाय चिढ़ने के कुछ कर नहीं सकते! ऐसी ही एक शिक्षिका से कल वहाँ रूबरू होने का मौका भी मिला। मेरे इतना भर कहने पर कि इफ्लू मुझे बहुत अच्छा कैंपस लगा, उन्होंने कहा कि हाँ कुछ ज्यादा ही अच्छा है! अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा! शाम के बाद तो यह विश्वविद्यालय इंग्लैंड बन जाता हैउन्होंने आगे कहा इतनी अधिक पश्चात्यता उचित नहीं’!
ओस्मानिया और इफ्लू एकदम पड़ोसी विश्वविद्यालय हैं जो बिलकुल आमने-सामने हैं, इसके बावजूद दोनों जगह के माहौल में जो बहुत बड़ा अंतर है उससे यह पता चलता है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के माहौल को मजबूत इरादों के साथ मनचाहे तरीके से ढाला जा सकता है। इफ्लू में छात्रों को जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता है उसका सकारात्मक परिणाम इस तरह भी दिखता है कि यहाँ अराजकता की बजाय छात्रों में एक तरह का अनुशासन है। लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं के बराबर है और उनके बीच असामनता या संदेह की बजाय दोस्ताना रिश्ता है। मेरे खयाल से हर विश्वविद्यालय को माहौल के स्तर पर इफ्लू जैसा ही होना चाहिए। इस तरह के माहौल में ही समुचित विकास और कुंठा रहित अच्छी सोच का निर्माण संभव है।

Thursday, 8 March 2018

इतिहास से अनभिज्ञ हैं महिला दिवस पर चुटकियाँ लेने वाले लोग!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जिन लोगों ने किसी भी तरह की चुटकियाँ लेते हुए लिखा है, मुझे इस दिवस पर उनकी समझ को लेकर संदेह है। पहली बात अच्छे से समझ लीजिए कि यह दिवस बाज़ार केन्द्रित नहीं है और दूसरी बात कि यह दिवस सरकारों का दिया हुआ 'उपहार' भी नहीं है! 1975 में मिली संयुक्त राष्ट्र संघ की स्वीकृति भी इस दिवस का उद्गम स्थल नहीं है। इसके पीछे खुद महिलाओं का संघर्ष है और उनके दीर्घकालीन संघर्ष की एक लम्बी परंपरा है।
औरतों ने सड़कों पर संघर्ष करके अपने हक सुनिश्चित किए हैं। कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है‌ कि विभिन्न देशों में अपने अन्य अधिकारों के अलावा मताधिकार हासिल करने के लिए भी महिलाओं को लंबा संघर्ष करना पड़ा है। दुनिया के आधुनिक समझे जाने वाले कई देशों में भी महिलाओं को यह हक अपेक्षाकृत बहुत बाद में और बहुत संघर्षों के बाद मिला है।
इस दिवस पर सोशल मीडिया पर विशेषज्ञ व्यंग्य करने की बजाय अपनी उंगलियों को थोड़ा कष्ट देकर गूगल सर्च तक पहुंचे तो, अधिक दूर नहीं तो कम से कम सौ साल पीछे तो ज़रूर पहुंचेंगे जब 8 मार्च 1917 को रूस की मजदूर महिलाएं, रूस की तब की राजधानी पेट्रोग्राड (अब सेंट पीटर्सबर्ग) की सड़कों पर थीं और ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर इन विरोध प्रर्दशन करने वाली महिलाओं से भर गया हो। 'रोटी और शांति' के लिए विरोध प्रदर्शन और हड़ताल पर उतरी इन महिलाओं की इस पहलकदमी को ज़ारशाही के खिलाफ रूसी क्रांति की शुरुआत भी माना जाता है! वैसे अगर आप और पड़ताल करेंगे तो इस दिवस के बारे में कई-कई और परतें खुलती जाएंगी बशर्ते आपकी यह सब जानने में रूचि हो!
कुल मिलाकर मेरे यह सब लिखने का ध्येय यह है कि जो यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, यह हमें मिला कोई 'कोमल उपहार' नहीं है। यह दिन इस बात पर विचार करने के लिए नहीं है कि, पुरूषों से कम से कम आज के दिन महिलाओं को सहानुभूति मिलनी चाहिए या इस दिवस से प्रेरणा लेकर पुरुषों को महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए! जब आप यह सब लिखते हैं, तो आप महिलाओं के संघर्षों की लम्बी परम्परा की जलती हुई मशाल पर पानी डालने की नाकाम कोशिश कर रहे होते हैं। 
सहानुभूति, अच्छे व्यवहार की भीख जैसे शब्दों का इस दिवस से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। यह दिवस महिलाओं के संघर्षों के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है, इस संघर्ष को अनवरत बनाए रखने के लिए उर्जा हासिल करने का दिन है और साथ ही साथ यह याद दिलाने का दिन है कि महिलाएं बराबरी का अपना हक सुनिश्चित करवाने का माद्दा रखती हैं। कृपया कर इस दिवस को इसी रूप में समझें तो किसी और पर नहीं, आप खुद पर ही उपकार करेंगे।

Thursday, 25 January 2018

पद्मावत : सिनेमा हॉल में भी कायम रही सिरदर्दी

'पद्मावत' की वजह से इतने दिनों से जो सिरदर्दी मची हुई थी, वह कम से कम मेरे लिए तो सिनेमा हॉल के भीतर भी कायम रही! खुद संजयलीला भंसाली की 2015 में रिलीज़ हुई 'बाजीराव मस्तानी' की तुलना में भी यह फिल्म मुझे बेहद कमज़ोर लगी‌।
मेरे इस नज़रिये से सभी सहमत हों, यह ज़रूरी नहीं, लेकिन इस बात से सभी ज़रूर सहमत होंगे कि राजपूतों की आन-बान और शान को स्थापित करने में इस फिल्म में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया गया है। देखने वालों को इस बात पर ताज्जुब होगा कि करणी सेना वाले और कई अन्य राजपूत संगठन विरोध आखिर कर किस बात का रहे थे! जिस तरह से धारणा बनाई जा रही थी, मामला इससे ठीक उलट है। राजपूतों का ऐसा महिमा मंडन तो बिरले ही किसी फिल्म में हुआ होगा। 
एक और बात, मेरा खयाल है कि इस फिल्म को संघ समर्थक निश्चित ही सकारात्मक रूप से ग्रहण करेंगे!

Thursday, 27 July 2017

फिलिस्तीन के प्रति सहानुभूति और समर्थन के कारण

इसे समझने के लिए फ़ैज़ अहमद फ़ैज के 7 मार्च 1984 को एशियन स्टडी ग्रुप के निमंत्रण पर इस्लामाबाद के एक सम्मेलन में दिये वक्तव्य के कुछ हिस्सों को उद्दृत किया जा सकता है। वे एफ्रो-एशिया लेखक संगठन के सक्रिय सदस्य थे। उन्हें इस संगठन की पत्रिका ‘Lotus’ के संपादन का अवसर भी मिला। उनके संपादन काल में ही पत्रिका का कार्यालय मिस्र की राजधानी काहिरा से लेबनान की राजधानी बैरूत स्थानांतरित कर दिया गया था। यहाँ वे 1976 से 1982 तक रहे। इस दौरान चल रहे फिलिस्तीन-इजराइल संघर्ष में उन्हें अपना रचनात्मक पक्ष तय करना था। फ़ैज़ के अनुसार – “यह अजीब बात थी कि इजराइली जिन्हें नाज़ियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पड़ी थी, वे अब फिलिस्तीनियों को उसी प्रकार के कष्ट देने पर उतारू थे, जबकि फिलिस्तीनियों ने इजराइलियों का कुछ नहीं बिगाड़ा था।
इसी वक्तव्य में आगे फिलिस्तीन के प्रति अपनी पक्षधरता का कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था - शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं, क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती। कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं, और उसमें केवल हानि ही होती है। मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था।
समय का चक्र वाकई विचित्र होता है। जिन यहूदियों ने खुद भयानक अमानवीय यातनाएँ झेली और संघर्ष किया वे इजराइल की स्थापना और अपने मजबूत होते जाने के साथ फिलिस्तीन के प्रति नृशंस और आक्रामक होते चले गये। यह उचित ही है कि इतिहास की कई घटनाएँ हमें यहूदियों के प्रति सहानुभूति से भर देती हैं। ठीक इन्हीं कारणों से वर्तमान में फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति रखते हुए उन्हें समर्थन देना हमारा नैतिक दायित्व है। फ़ैज ने ठीक ही कहा है कि हमें हमेशा उनके पक्ष में होना चाहिए जो कमज़ोर हैं। यानी उनके पक्ष में जो पीड़ित हैं, जो अन्याय के शिकार हैं।

Tuesday, 2 May 2017

बजवाड़े के किले तक पहुँच कर भी..

पिछले दिनों पंजाब के होशियारपुर कस्बे में जाना हुआ । सोचा कि आये ही हैं तो कोई घूमने लायक जगहें यहाँ हों, तो देख ली जाएँ । गूगल सर्च किया तो पता चला यहाँ एक किला है- बजवाड़ा किला। इसे देखने भरी दोपहरी भारी गर्मी में भी हम लोग बड़े उत्साह के साथ चल दिए! हम लोग टैक्सी से थे । पूछ-पूछ कर किसी तरह उस जगह तक पहुंचे, तो पता चला कि वहां तक गाड़ी नहीं जा सकती, लिहाज़ा हम लोग गाड़ी से उतर कर पैदल चल पड़े । हमारी सोच के एकदम विपरीत, किले का रास्ता बेहद संकरी सी गलियों से होकर जा रहा था । जैसे तैसे किले के पास पहुंचे । दरअसल उसे पास नहीं कहा जा सकता, बस ऐसी जगह पहुंच गए कि वहां से किला स्पष्ट दिख रहा था ।
इस ऐतिहासिक किले और उसके खंडित हिस्सों की देखकर रखरखाव का अभाव तो साफ दिखा ही, उस तक पहुँचने का कोई ठीक रास्ता तक नही था! किले से लगभग सौ मीटर के दायरे तक गेंहूँ के खेत थे । कह सकते हैं कि यह खेतों के बीच में खड़ा था । ये खेत लोहे के बाड़ों से घिरे हुए थे ।आसपास रिहायशी मकान तो थे लेकिन दूर-दूर तक कोई आदमी नज़र नहीं आ रहा था । कोई निर्देशिका, कोई सूचना पट्ट तक वहाँ उपलब्ध नहीं था । हमने किले के भीतर जाने का इरादा त्याग दिया । किसी ऐतिहसिक इमारत के इतना पास जाकर भी उसे पास से न देख सकने का मलाल मुझे हमेशा रहेगा । 

#Bajwara Fort,Hoshiarpur

Friday, 28 April 2017

******वर्चस्ववादी संस्कृति के विरूद्ध फ़ैज़******

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दुनिया भर के दुख-दर्द को महसूस करने और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से उसका विश्लेषण करने की प्रक्रिया किसी को भी वर्चस्ववादी संस्कृति का प्रबल विरोधी बना देने के लिए पर्याप्त होती   है। वर्चस्व किसी वर्ग का होकिसी समुदाय का होकिसी लिंग का होकिसी देश का अथवा किसी अराजक राजनितिक शक्ति का हो या किसी अन्य तरह का हो हर तरह के वर्चस्व के खिलाफफ़ैज़ अपनी संवेदना और अपने वैज्ञानिक साम्यवादी दृष्टिकोण के कारण प्रतिरोध की समानांतर संस्कृति रच पाने में कामयाब हो पाते हैं।
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Thursday, 13 April 2017

यहीं चली थी गोलियाँ

जलियांवाला बाग प्रवेश द्वार 
बैसाखी का दिन पंजाब के लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण दिन होता है । 13 अप्रैल 1919 को भी वैसाखी का दिन था। वर्षों से अमृतसर में इस दिन एक बड़ा मेला लगा करता था । इस मेले में शरीक होने पंजाब के दूरदराज के इलाकों तक से लोग आते थे ।
उस दिन हरमन्दिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) से थोड़ी ही दूरी पर (जलियाँवाला बाग में) एक शांतिपूर्ण सरकार विरोधी सभा आयोजित थी । नेताओं के भाषण होने थे । मेला देखने और शहर घूमने आए कई बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ तो इसलिए भी उस सभा में शामिल हो गये थे कि जाते-जाते वे इन नेताओं को देख लें, और उनका भाषण सुन लें ।
अचानक से उस सभा पर बिना चेतावनी दिये गोलियाँ चलवाई जाने लगी । निहत्थे लोगों पर कायर जनरल डायर के आदेश से तकरीबन 1650 राउंड गोलियाँ चलाई गयीं। सैकड़ों निर्दोष औरतें, बच्चे, बुजुर्ग और युवा मारे गये ।

शहीदी कुआं
जलियाँवाला बाग औपनिवेशिक भारत की जघन्यतम घटनाओं में से एक का उस दिन साक्षी बना था । देशभर में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश फैल गया था और तीव्रतम प्रतिक्रियाएं हुई थीं । ऐसा माना जाता है कि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन पर इस घटना का निर्णायक प्रभाव पड़ा । ये एक ऐसी घटना थी जिसकी दुनिया भर में निंदा हुई ।
दीवार पर बने गोलियों के निशान

#JaliyanwalaBagh #13April1919 #GeneralDyer #GoliyonkeNishaan #ShahidiKuan

Friday, 24 March 2017

‘मैं मौका परस्त नहीं हूँ’

एक मुशायरे में पाकिस्तान के इंकलाबी शायर हबीब ज़ालिब ने अपनी नज़्म दस्तूरसुनाने के क्रम में, उससे जुड़ा वाकया सुनाया था । यह वाकया पाकिस्तान में जनरल अयूब ख़ान के फौजी तानाशाही शासन के ख़ौफनाक दिनों का है । आज इस अज़ीम शायर का जन्मदिन है । उन्हें याद करते हुए यह वाकया साझा कर रही हूँ ! 
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पाकिस्तान बनने के बाद जब हमारे ख़्वाब एक-एक कर बिखरने लगे, टूटने लगे तो अपने हमख़यालों को हमने ढूँढना शुरू किया कि किस तरह से हम मुल्क में आज़ादी, ज़म्हुरियत (लोकतंत्र), मुआशी (आर्थिक) आज़ादी पैदा कर सकते हैं । तो ये नज़्म मैंने दस्तूरलिखी थी । जो मैंने एक मुशायरे में पढ़ी, मरी(पाकिस्तान का एक शहर) में, और तमाम.... पाकिस्तान की करीम(क्रीम) वहां मौजूद थी। खौफ़ से पत्ता नहीं हिलता था । और.... के मैंने एक नज़्म पढ़ दी – ....‘दीप जिसका महल्लात ही में जलेजब मैंने ये मिसरा पढ़ा तो करम हैदरी मेरा पाजामा खींचने लगा! वहाँ पाजामा ही पहनते थे तब तक, अब तो मैंने पतलून भी पहन ली यहाँ आकर, तो मैंने कहा कि भई अब पीछे हट जा!
'दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साए में हर मसलहत के पले
ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता..........'
जब मैंने ये नज़्म ख़त्म की, मुशायरा ख़त्म हो गया । और...... पब्लिक मेरे साथ मरी रोड पे आ गयी । एक सीनियर शायर ने कहा- मौका नहीं थामैंने कहा – ‘मैं मौका परस्त नहीं हूँ’!!”


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#HabibJalib #DeepJiskaMahallathiMeinJale #PakistaniShayar #InkalaabiShayar #24March1928 #BirthdayofHabibJalib

Tuesday, 27 September 2016

नांगलोई में शिक्षक की हत्या महज एक बानगी है

प्रतीकात्मक तस्वीर :एनडीटीवी से साभार
दिल्ली के नांगलोई इलाके के एक स्कूल में बारहवीं के दो विद्यार्थियों द्वारा अपने अन्य चार साथियों के साथ मिलकर अपने एक शिक्षक की हत्या का मामला सामने आया है । सुल्तानपुरी रोड का यह स्कूल इसके विद्यार्थियों के कारनामों की वजह से पूरे इलाके में कुख्यात है । यहाँ जब दोपहर की शिफ्ट के लड़कों की शाम को छुट्टी होती है, उस वक्त उस पूरे इतने बड़े रोड से पैदल या रिक्शे से निकल पाना बहुत भयावह होता है । झुण्ड के झुण्ड बेलगाम विद्यार्थी, सरेआम सड़क पर लड़कियो, औरतों से छेड़-छाड़ करते हुए, एक दूसरे को या किसी को भी गन्दी-गन्दी गालियाँ देते हुए, राह चलते लोगों को परेशान करते, मारपीट करते हुए, निकलते हैं । तब सड़कों पर इनका राज होता है । कोई पीसीआर वैन तक सड़क पर गश्ती के लिए नहीं होती है । यह सब मेरा अपना देखा-जाना हुआ है । यह कल्पना करना कठिन नही है कि इस स्कूल के शिक्षक किन परिस्थितियों में काम करते होंगे ।
दरअसल यह स्कूल और छात्रों द्वारा शिक्षक की हत्या की घटना महज एक बानगी है । ऐसे कई स्कूल हैं (कमोबेश दिल्ली के सारे सरकारी स्कूलों और खास तौर पर दोपहर की पाली के स्कूलों का यही हाल है) अगर समय रहते सचेत नहीं हुआ गया तो ऐसी कई घटनाएं और भी होंगी । इस तरह की अपराधिक प्रवृत्ति के पीछे कारण जो भी हो, इसको नज़रअंदाज करना ठीक नहीं है । इन स्कूलों में नियमित काउंसलिंग होनी चाहिए । मनोचिकित्सकों से मदद लेनी चाहिए । विद्यार्थियों के आचरण पर जरूरत भर निगरानी भी रखी जानी चाहिए । गलत करने पर इनमें कानून व्यवस्था के खौफ का होना भी जरूरी है । इन सब पर जितनी जल्दी हो सके सरकार को काम करना चाहिए अन्यथा और भी बुरे परिणाम सामने आएँगे ।

सम्बंधित ख़बर का लिंक : 
2. http://inkhabar.com 

# Nangloi School, Teacher murdered by students, Crime among teenagers, Unsafe Nangloi area, Need of attention and psychological assistance , 
Boys of evening schools, Violence in students

Thursday, 28 May 2015

किसकी दिल्ली

मैं दिल्ली में पैदा हुई । मेरे पिता पंजाब से उखड़ कर दिल्ली आये थे । दिल्ली से मुझे बहुत प्यार है । लेकिन लोगों को जब यह बताती हूँ कि दिल्ली की हूँ तो साथ में जोड़ देती हूँ कि मूलतः पंजाब से हूँ । दरअसल दिल्ली उखड़े-उजड़े लोगों का ही शहर है । दिल्ली शहर यूँ ही नहीं बस गया था, बसाया गया था । कई बार बसा कई बार उजड़ा। इसलिए दिल्ली में अपनी जड़ें तलाशना व्यर्थ है ।
दिल्ली में रह रहे लोग कहीं न कहीं बाहरी हैं । चूंकि दिल्ली का कोई सगा नहीं है, इसलिए दिल्ली सबको बड़े प्यार से गले लगाती है । लेकिन चूँकि दिल्ली सगे के मोह से मुक्त है, इसलिए किसी को वह खुद से चिपकाए रखने की गारंटी भी नहीं देती। इतिहास गवाह है कि दिल्ली किसी की होकर नहीं रही । तोमर राजाओं, चौहानोंसुल्तानों और बादशाहों की भी नहीं । दिल्ली सबकी है लेकिन दिल्ली पर अधिकार का अहंकार कोई नहीं पाल सकता ।
मैंने शुरू से यह अहंकार नहीं पाला । इसलिए जब दिल्ली-बदर हुई तो इसे ख़ुद के विस्तार और विकास का अवसर माना । विभिन्न कारणों से दिल्ली-बदर होने वाले मुझ जैसे कई लोग हैं । बहरहाल कुछ लोगों को यह भ्रम होता है (यह भ्रम इतिहास में कई लोगों को कई बार हुआ है।) कि दिल्ली उन्हीं की है । दुख इस बात का है कि दिल्ली ऐसे ही लोगों के हाथों में पड़ती रही, जो यह मानते हैं कि दिल्ली उन्हीं की जागीर है । दिल्ली की स्वाभाविक मिठास में कड़वाहट घोलने वाले लोगों की एक बड़ी जमात है । भगवत रावत की कविता दिल्ली की 'दिल्ली' इसी लिए तो ग़मगीन है ।


# Bhagvat Rawat, Dilli, Claim on Delhi, History of Delhi

Sunday, 28 September 2014

भगत सिंह हममें हमारे घरों में हो


भगत सिंह आज ही के दिन 1907 में जब पैदा हुए होंगे तब उनके परिवार वालों ने कहाँ सोचा होगा कि उनका यह बेटा एक दिन इतना महान बन जायेगा कि भारत की आने वाली नस्लें उसकी वीरता और राष्ट्र प्रेम की मिसालें देंगी । भगत सिंह पर बनी फ़िल्में देखते हुए, मुझे रौंगटे खड़े होने के वास्तविक अनुभव हुए हैं । कुछ देर के लिए खुद को भूल कर उसी दौर में चली जाती हूँ, भगत सिंह जैसा बनने की इच्छा होती है । लेकिन यह इच्छा बहुत देर तक नहीं रहती । कभी-कभी सोचते हुए खुद पर शर्म आने लगती है कि मेरी उम्र तक भगत सिंह ने वो सब कर दिया जिसकी भविष्य में भी अपने लिए कल्पना तक कर सकने की ताक़त मुझमें नहीं है । भगत सिंह के घरवालों के बारे में सोचती हूँ । भगत सिंह के बलिदान से कमतर नहीं है उनका बलिदान । 
भगत सिंह को भगत सिंह बनाने में उनके माता-पिता, चाचा और अन्य परिवार वालों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी । यह कहावत यूँ ही नहीं बनी कि लोग चाहते हैं कि भगत सिंह उनके पड़ोसी के यहाँ पैदा हो । भगत सिंह के लेख -मैं नास्तिक क्यों हूँ’ को पढ़ते हुए, भगत सिंह के आत्मविश्वास, बुद्धिमता और तार्किक स्वभाव से परिचित होने का अवसर मिलता है । आज मैं इसे पढ़कर समझने की कोशिश कर रही हूँ । भगत सिंह का संक्षिप्त जीवन कितना विराट है । भगत सिंह और उनके घर वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम खुद में उन जैसा चरित्र विकसित करने का प्रयास करें, अपने घरों में भगत सिंह को पलने-बढ़ने दें । कहीं किसी में भगत सिंह दिखाई दे तो उसे हतोत्साहित करने के बजाय उसके साथ खड़े हो जाएँ ।


 # Bhagat Singh, Main Nastik Kyon Hun, Remembering Bhagat Singh