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Wednesday, 18 November 2020

नहीं रहीं मृदुला सिन्हा

 

अपने पीएचडी शोधकार्य के अंतिम चरण में जब मैं उन साहित्यकारों से बात कर रही थी, जिनकी कृतियों पर हिन्दी में फिल्में बनी हैं; तब उसी सिलसिले में मैंने मृदुला सिंहा जी से भी संपर्क किया था। उन दिनों वे गोवा की राज्यपाल थीं लेकिन बिना किसी मध्यस्थ के उनसे बात हुई और यह तय हुआ कि मैं उन्हें अपने सवाल ईमेल से भेजूंगी और वे लिखित रूप में उनके जवाब मुझे भिजवा देंगी। मुझे लग रहा था कि चूँकि वे एक बड़े पद पर हैं और काफी बुज़ुर्ग भी हैं तो शायद हो सकता है कि ये बात आई-गई हो जाए; लेकिन सिर्फ एक-आध बार मुझे रिमांइडर भेजना पड़ा और उसका जवाब भी यह आया कि वे जवाब तैयार कर रही हैं और फिर एक दिन ईमेल से उनके जवाब आ गए।

मुझसे बातचीत में मृदुला जी ने इस बात पर बेहद खुशी ज़ाहिर की थी कि उनकी कृति और उसपर बनी फिल्म पर विशेषरूप से कोई बात करना चाह रहा है। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा था कि वे राज्यपाल बाद में हैं; साहित्यकार पहले हैं। आमने-सामने बातचीत की योजना हो तो उन्होंने गोवा आने का आमंत्रण भी मुझे दिया था। मतलब यह कि यह पूरा प्रसंग एक सकारात्मक अनुभव की तरह मेरे ज़हन में दर्ज है।

मृदुला जी के साहित्य को बहुत पढ़ने का मौका मुझे नहीं मिल सका; लेकिन वृद्ध जीवन पर केंद्रित उनकी कहानी 'दत्तक पिता' और उसपर बनी फिल्म 'दत्तक' दोनों ही बेहतरीन काम हैं। गुलबहार सिंह के निर्देशन में 2001 में  बनी यह फिल्म मूल कृति के बेहद सफल और उम्दा सिनेमाई रूपांतरण का उदाहरण है। मौका मिले तो यह फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

आज खबर आई कि मृदुला सिंहा नहीं रहीं। मुझे अफसोस रहेगा कि उन्होंने जो विचार मुझसे साझा किए वे उनके रहते एक किताब के अंश के रूप में प्रकाशित नहीं हो पाए। बहुत कुछ की तरह किताब के प्रकाशन पर भी हम जैसों का कोई अख्तियार नहीं है! मृदुला सिंहा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

Friday, 31 July 2020

सद्गति

आज हिन्दी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का 140वाँ जन्मदिन है। मुझे सुबह से बार-बार 'सद्गति' का ध्यान आ रहा है। इस कहानी को हिंदी की चुनिंदा प्रभावी और उम्दा कहानियों में शामिल किया जाता है।

'सद्गति' पर भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध निर्देशक सत्यजीत रे ने 45 मिनट की एक छोटी सी फिल्म बनाई है। जो शुरू से लेकर आखिर तक आपको बांधे रखती है और मात्र 45 मिनटों में उन सारी यंत्रणाओं, उन सारे अत्याचारों का अनुभव आपको करवा देती है; जो हमारे समाज में दलित कही जाने वाली जातियों पर होते रहे हैं। हिन्दी साहित्य पर बने सिनेमा में मैं 'सद्गति' को सबसे बेहतर रूपांतरणों में गिनती हूँ। मेरे खयाल से सभी को यह फिल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। मुझे इस बात का भी पूरा भरोसा है कि जब यह फिल्म बनी थी; उस समय यदि प्रेमचंद जीवित होते तो वे भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। दुर्भाग्य से अपने जीवनकाल में सिनेमा की दुनिया से जुड़े उनके अनुभव कड़वे रहे थे। इतने अधिक की उन्होंने विस्तार से लिखे अपने एक लेख में साहित्य को दूध कहते हुए तत्कालीन सिनेमा को ताड़ी की संज्ञा दे डाली थी!


Thursday, 6 February 2020

लेखक कृष्ण बलदेव वैद का निधन


एम.ए. के दिनों में पढ़ा था उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी'। तब इसने चमत्कृत किया था। जुदा कथ्य, सहज-सरल-प्रवाहमयी भाषा और बेहद प्रभावित करने वाला शिल्प। इसके लेखक थे- कृष्ण बलदेव वैद। उन्होंने विभिन्न गद्य विधाओं में प्रचुर मात्रा में लेखन किया है और हिन्दी साहित्य जगत में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही है। साथ ही वे हिन्दी के उन लेखकों की परंपरा से भी थे; जिनकी पढ़ाई-लिखाई और आजीविका की भाषा अंग्रेज़ी थी, लेकिन जिन्होंने लेखन के लिए हिन्दी को अपना माध्यम चुना। आज उनका निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्हें श्रद्धांजलि।

Wednesday, 20 February 2019

नामवर सिंह का निधन

हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह जितने दशकों तक सक्रिय और प्रभावी रहे वह आश्चर्यचकित करता है! एक प्राध्यापक के बतौर भी उनकी जो प्रतिष्ठा रही है वह भी किसी अन्य अध्यापक के लिए रश्क का विषय हो सकती है। हिन्दी में बिरले ही ऐसे प्रोफेसर होंगे जो इतनी तैयारी और विशेषज्ञता के साथ क्लासरूम में आते हों कि उनके बोलकर पढ़ाए गए लगभग हर शब्द को किताब की शक्ल में ढाला जा सके! 
इस विद्वता और प्रतिष्ठा के अलावा नामवर सिंह का एक पक्ष हिन्दी विभाग की अकादमिक राजनीति से भी जुड़ता है।‌‌‌‌‌ हमने जब से विश्वविद्यालयों में पढ़ना शुरू किया, इसे किंवदंतियों की तरह सुनते रहे कि एक लम्बे दौर तक नामवर सिंह देशभर के विश्वविद्यालयों में होने वाली नियुक्तियों को प्रभावित करते रहे थे, इसलिए उनसे उपकृत लोगों की लम्बी सूची है तो निश्चित रूप से तिरस्कृत लोगों की भी लम्बी सूची होगी! दुखद रूप से उपकार और तिरस्कार का यह सिलसिला नियुक्ति प्रक्रियाओं में आज भी बदस्तूर जारी है। नामवर सिंह को याद करते हुए लोगों को यह पहलू भी याद आना ही चाहिए।
एक लम्बी ज़िन्दगी उन्हें मिली और सबसे बड़ी बात कि अंतिम कुछ दिनों को छोड़कर वे लगभग इस पूरी अवधि में स्वस्थ और सक्रिय रहे। वे कुछ दिनों से बीमार थे। आज सुबह ही यह खबर पढ़ी की कल रात उनका निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि!

Friday, 25 January 2019

नहीं रहीं कृष्णा सोबती

मुझे लगता है कि पंजाबी समाज और उसके लोक व्यवहार को उतना मैंने अपने अनुभवों से नहीं जाना, जितना कृष्णा सोबती के उपन्यासों से जानने का मौका मिला।
कृष्णा जी एक भरपूर और सार्थक ज़िन्दगी जी कर आज विदा हुईं। जीवन के आखिरी दिनों तक उनके जैसी सक्रियताप्रतिरोधी मुखरता और ज़िंदादिली कम लोगों को मिलती है।कृष्णा सोबती एक श्रेष्ठ रचनाकार के बतौर ही नहीं एक शानदार व्यक्तित्व के तौर पर भी याद रखी जाएंगी। विनम्र श्रद्धांजलि।

Sunday, 18 November 2018

निराश करती है विनोद कापड़ी की फिल्म 'पीहू'!

आने वाले हफ्ते के बाकी दिनों की व्यस्तता पहले से निर्धारित थीइसलिए कल शाम पीहू’ और मोहल्ला अस्सी’ दोनों ही फ़िल्में बैक टू बैक देखनी पड़ी। ज़िन्दगी में पहली बार बड़े पर्दे पर एक ही दिन में दो फ़िल्में देखीं। दरअसल दोनों ही फिल्मों का लम्बे समय से इंतज़ार था और मुझे लग रहा था कि इनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
जो पहली फिल्म देखी वो विनोद कापड़ी निर्देशित पीहू’ थी। इससे पहले विनोद कापड़ी मिस टनकपुर हाज़िर हों’ बनाकर तारीफें बटोर चुके हैं। इसलिए पीहू’ से अपेक्षाएं स्वाभाविक थी लेकिन इस फिल्म ने निराश किया। मुझे नहीं पता कि कुछ लोग किन भावनाओं में बहकर इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैंमुझे तो यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ भावनाओं को भुनाने वाली लगी। सुनने में यह भी आया है कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इस फिल्म को पुरस्कार और तारीफें भी मिली हैं, यह भी मेरे लिए आश्चर्य की बात ही है! फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि इस पूरी घटना को महज़ एक सम्वेदनशील रिपोर्ट के रूप में भी छापा या दिखाया जाता तो वह इस फिल्म से कम प्रभावी नहीं होता। यह फिल्म जो सन्देश देना चाहती हैवो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैलेकिन इस सन्देश को ग्रहण करने के लिए आपको इस फिल्म को अनावश्यक रूप से लगभग दो घंटे तक झेलना पड़े तो यह बेमानी लगता है।
एक ही लोकेशन और सिचुएशन पर पूरी फिल्म को शूट करना कम खर्चीला ज़रूर होता हैलेकिन वह सचमुच बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता हैउसमें बहुत सावधानी की जरुरत होती है। विनोद कापड़ी और उनकी टीम इस मसले पर काफी लचर साबित हुई है। इस फिल्म में एक से बढ़कर एक असंगत दृश्यों की भरमार है। कई बार तो ऐसा लगा कि जब जिस चीज़ को दिखाना होता है वो चीज़ उस दृश्य में हाज़िर हो जाती है। मसलन बीच घर में बच्ची को फिनायल की बोतल मिल जाती हैइसी तरह बच्ची के हाथ से दूध की बोतल गिर जाने पर उसे वहीं पर पोछा भी मिल जाता है! मुझे लगता है कि निर्देशक ने सोचा होगा कि इन पहलुओं पर कोई बारीकी से ध्यान नहीं देगा जबकिसच यह है कि फिल्म के दौरान यह सारी चीज़ें बहुत डिस्टर्ब करती हैं और यह कोई बारीक नहीं बल्कि साफ़ दिखने वाला अंतर है। एक दृश्य में बच्ची अपनी मृत माँ के ज़ख़्मी चेहरे पर बहुत सारी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाती है और अगले कुछ दृश्यों में वह क्रीम कभी चेहरे पर दिखाई देती हैऔर कभी गायब हो जाती है। ये कुछ संकेत भर हैंइस फिल्म में ऐसी गलतियों की भरमार है। गौर से देखेगें तो इस फिल्म के कई दृश्य और घटनाएँ आपको अतार्किक लगेंगी। एक दृश्य को लेकर हालांकि मैं कोई एक्सपर्ट कमेंट नहीं कर सकती लेकिन मेरे लिए यह ताज्जुब और जिज्ञासा का विषय ज़रूर है कि क्या नींद की चार गोलियां खाकर भी दो साल की बच्ची को महज़ तीन-चार घंटे की नार्मल नींद ही आएगीऔर उसके बाद उठकर वह पूरी तरह एक्टिव हो सकती हैइस फिल्म में ऐसा हुआ है और हो सकता है कि यह मेडिकली प्रूव्ड होमुझे इसकी जानकारी नहीं है। मेरे खयाल से फिल्म की पटकथा बहुत दुरूस्त नहीं है। इस पर बहुत मेहनत करने की जरूरत थी जिसे शायद बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। शायद बहुत सारा ध्यान एक छोटी बच्ची को फिल्माने की चुनौतियों से निपटने पर ही लगा दिया गया।
एक छोटी बच्ची से प्रभावी अभिनय करवाना सचमुच बहुत कठिन काम है। इस फिल्म की बड़ी खासियत भी यही बताई जा रही थी वो कि एक बहुत छोटी बच्ची से निर्देशक ने चुनौती भरा अभिनय करवाया है। इसमें कोई शक नहीं कि पीहू विश्वकर्मा सचमुच बहुत प्यारी बच्ची हैऔर हर बच्चे की तरह उसकी सहज हरकतें लोगों को पसंद आती हैं और इसे उतारने के लिए निर्देशक और पूरी टीम ने बहुत मेहनत भी की होगीलेकिन मुझे कहना चाहिए कि इसके बावजूद निर्देशक ने फिल्मांकन का कोई बहुत महीन काम नहीं किया है। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों ने छोटे-छोटे बच्चों से बहुत असाधारण काम करवाए हैं। एक उदाहरण के लिए 1966 में प्रदर्शित हुई चेतन आनंद की एक बहुत ही साधारण फिल्म आखिरी ख़त’ का जिक्र किया जा सकता है जिसमें महज़ सवा साल के बच्चे से बहुत बेहतरीन अभिनय करवाया गया है। वास्तव में बहुत साधारण स्तर के निर्देशकों ने भी चाइल्ड आर्टिस्ट्स से बहुत बेहतर काम करवाए हैं।
पीहू’ के प्रमोशन में इस तरह की भावनात्मक अपील की जा रही है कि जो अपने परिवार से प्यार करते हैं वो यह फिल्म देखने ज़रूर जाएँ। लेकिन फिल्म देखने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि आर्थिक लाभ के लिए यह एक किस्म का भावनात्मक दोहन भर है। इस फिल्म को वो लोग ज़रूर देखने जाएँ जो फ़िल्में देखकर अपनी राय बनाने में यकीन करते हों और हर बार की तरह कहूँगी कि हो सकता है उनकी राय मुझसे अलग हो। जहाँ तक परिवार से प्यार करने का प्रश्न है और यदि आप वो करते हैंतो आपके लिए कोई समस्या ही नहीं है। हम सबको अपने-अपने जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए। शकमतभेदमामूली झगड़ों की वज़ह से इसे तबाह नहीं कर लेना चाहिए। हमें इन सारी चीजों से निपटना आना चाहिए। यहाँ तक कि संबंधों के बीच जब यह लगने लगे कि जीवनयापन दूभर हो रहा हैतब जीने के नए और उत्साहजनक तरीके और रास्ते तैयार कर लेने चाहिए। यह जीवन जीने के लिए मिला हैइसके साथ कुछ उत्तरदायित्व बंधे हुए हैंहमें उन सबका सम्मान करना चाहिए।
दूसरी देखी गयी फिल्म मोहल्ला अस्सी’ ने निराश नहीं किया। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म बहुत सारे प्रक्रियागत झंझटों और व्यावहारिक चुनौतियों से जूझते हुए प्रदर्शित हुई है। इसपर विस्तार से दूसरे पोस्ट में लिखूँगी। बहरहाल इतना जरूर कहूँगी कि यह फिल्म देखने लायक है। साहित्य पर फिल्म बना पाने की हिम्मत कम फिल्मकार करते हैं। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी न सिर्फ हिम्मत करते हैं बल्कि इसे एक अच्छी फिल्म में तब्दील करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। उनकी पहली फिल्म पिंजर’ भी इसका उदाहरण है। हम अपने पैसे खर्च कर इस तरह कि फिल्में देखेंगे तभी फिल्माकारों में इस तरह की फिल्में बनाने की हिम्मत बची रहेगी।

Saturday, 22 September 2018

ये वो मंटो तो नहीं!

हैदराबाद के किसी मल्टिप्लैक्स में यदि किसी हिन्दी फिल्म के (ख़ास तौर पर लीक से हट कर बनायी गयी फिल्म के) रिलीजिंग डे के दूसरे शो में अच्छी खासी भीड़ जुटी हो तो कोई शक नहीं रह जाता कि यह फिल्म ठीक-ठाक बिजनेस कर लेगी। कल रिलीज हुई फिल्म मंटोको लेकर मेरा यही अनुभव रहा। मेरे खयाल से इसमें मंटोके प्रमोशन के लिए की गयी मेहनत की बड़ी भूमिका है।
2012 से नंदिता इस विषय पर काम कर रही थीं। उनके मुताबिक काफी रिसर्च करके उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की। नंदिता को फिल्म जगत से जुड़े कुछ एक बौद्धिकों में शुमार किया जाता है। उन्होंने बेहद चुनिंदा फिल्मों में अभिनय किया है। बेहतरीन अभिनय के लिए उनकी खूब तारीफ भी होती रही है। निर्देशक के बतौर नंदिता को लोगों ने 2008 में तब जाना जब गुजरात दंगों पर आधारित उनकी फिल्म फ़िराकरिलीज़ हुई। यह बहुत ही संजीदगी के साथ बनायी गयी एक ज़रूरी और उम्दा फिल्म है। मंटोउनके द्वारा निर्देशित दूसरी फिल्म है।
यह फिल्म उर्दू के मशहूर अफसानानिग़ार सआदत हसन मंटो के जीवन और उनकी रचनाओं पर आधारित है। फिल्म के लिए इस तरह के विषय का चयन ही चुनौतीपूर्ण होता है। मेरे खयाल से नंदिता का दृष्टिकोण उन्हें इस तरह की चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह मंटो की जिंदगी, उनकी सोच और उनके रचनात्मक कार्यों के महत्व से नयी पीढ़ी को परिचित कराती है।
इन सब बातों के होते हुए भी मुझे यही लगा कि यह फिल्म मंटो पर किया गया कोई महीन काम नहीं है। यहाँ तक कि मंटो के मन की उथल-पुथल और रचनात्मक बेचैनियों को जिस शिद्धत से उकेरा जाना चाहिए था, उसका अभाव खटकता है। नवाज़ुद्दीन भले ही मंझे हुए अभिनेता हैं, लेकिन मंटो को अपने भीतर उतारने में वह उस तरह से कामयाब नहीं हो सके हैं, जैसी कामयाबी उन्होंने फैज़ल, स्कूल मास्टर श्याम, रमन राघव या गायतोंडे जैसे किरदारों को अपने भीतर उतार पाने में हासिल की है। इसे नवाज़ से अधिक नंदिता की निर्देशकीय कमज़ोरी कहा जा सकता है।
फिल्म में मंटो की कुछ कहानियों का फिल्मांकन यदि प्रभावित करने वाला है, तो कुछ कहानियों का फिल्मांकन बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि नंदिता दो घंटे में बहुत कुछ दिखा देने के लालच से खुद को नहीं बचा नहीं पायी हैं। कई जगहों पर जहाँ धैर्य और ठहराव की ज़रूरत महसूस होती है, फिल्म भागती नज़र आती है, वहीं कहीं-कहीं मामूली दृश्यों को अनावश्यक ही लम्बा कर दिया गया है।
बहुत सारे चर्चित अभिनेताओं की झलक इस फिल्म में आप देख सकते हैं, लेकिन इससे कोई प्रभाव उत्पन्न किया जा सका हो, ऐसा मुझे नहीं लगता है। रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी के किरदार को अच्छे से निभाया है। मंटो के ख़ास दोस्त श्याम चड्ढा का किरदार निभा रहे, ताहिर राज़ भसीन भी प्रभावित करते हैं। मुझे तो यह भी लगा कि बहुत से किरदारों के साथ ज़्यादती हुई। मसलन अशोक कुमार और फैज़ अहमद फैज़ का किरदार बेजान लगता है।
इन सब बातों के अलावा इस फिल्म में एक बात जो मुझे बेहद अखरी वो है भाषाको लेकर बरती गयी लापरवाही। मंटो लुधियाना के एक गाँव में पैदा हुए थे। वे कश्मीरी मूल के मुसलमान थे, लेकिन उनका परिवार पीढ़ियों पहले पंजाब में आकर बस गया था। लिहाज़ा पंजाबी उनकी मादरी जबान की तरह थी। मंटो अपने सम्बंधियों और पंजाबी दोस्तों से अक्सर पंजाबी में बात किया करते थे। उनकी कहानियों में पंजाबी शब्दों, वाक्यों की भरमार देखने को मिलती है, लेकिन इस फिल्म में पंजाबीपन सिरे से गायब कर दिया गया है, यहाँ तक कि लाहौर के बाज़ार में भी कोई पंजाबी नहीं बोलता! ठंडा गोश्तकहानी की बुनावट में चूँकि पंजाबी है इसलिए मात्र इसके फिल्मांकन में पंजाबी शामिल है। हालांकि इसे यह कह कर जस्टिफाई करने की कोशिश की जा सकती है कि एक हिन्दी फिल्म के लिए भाषा की यह छूट ली जा सकती है, लेकिन तब भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इससे फिल्म कमज़ोर हुई है। हिन्दी में ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जब किसी ऐतिहासिक पात्र को कहानी का आधार बनाया गया तो रहन-सहन और भाषाई स्तर पर वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश की गयी। नंदिता चाहती तो मंटो से उनकी पत्नी, उनकी बहन या उनके दोस्त श्याम चड्ढा से बातचीत करते हुए पंजाबी के कुछ छोटे-मोटे वाक्य बुलवाकर इस ओर कम से कम संकेत संकेत कर सकती थीं। खुद अपनी पहली फिल्म फ़िराकमें नंदिता ने अपने कुछ गुजराती पात्रों से गुजराती बुलवाई है।
खैर इन कमज़ोरियों के बावज़ूद इस फिल्म को देखने ज़रूर जाना चाहिए। एक तो यह ज़रूरी नहीं कि मुझे जो बातें खटकी वह सबको खटके, दूसरी बात यह कि इस तरह की फिल्मों का बनना ही बड़ी बात है। इस तरह की फिल्मों के पीछे समाज की बेहतरी का जो उद्देश्य निहित होता है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण और पवित्र होता है। ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की फिल्में बनाने का साहस किया जा सके। स्वाभाविक है कि कुछ फिल्में थोड़ी कमज़ोर बनेंगी तो कुछ बहुत उम्दा भी बनेंगी। सिनेमा की यह समानांतर संस्कृति जिंदाबाद रहनी चाहिए।

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Tuesday, 27 February 2018

चिड़ियाँ दा चंबा

पंजाबी का एक बेहद खूबसूरत और प्रसिद्ध लोकगीत है -'साड्डा चिड़ियां दा चम्बा वे बाबुल असां उड़ जाना'। बेटियां शादी के बाद अपने पिता के घर से विदा होकर जब पति के घर जाती हैं, उस समय यह गीत गाया जाता है। विवाह समारोह में अक्सर यह गीत बजता है और इसे सुन सुन कर रोने वाले लोगों को देख-देख कर मैं बड़ी हुई हूं।
कल यूट्यूब चैनल 'हिन्दी कविता' पर इसे सुनने का मौका मिला। दरअसल कल ही यह जाना कि इस लोकगीत को आधार बनाकर 'पाश' ने भी 'चिड़ियाँ दा चंबा' शीर्षक से एक कविता लिखी थी।
हालांकि पाश की यह कविता मुझे पहली बार सुनते हुए ही बहुत मर्मस्पर्शी और अलग लगी, लेकिन इसका अर्थ समझने के लिए मुझे इसे पांच-सात बार और सुनना पड़ा। तब भी जो समझ आया ज़रूरी नहीं कि वही सही समझ हो। कविता का असली मर्म तो कविता की बारिकियों को समझने वाले लोग ही बेहतर बता सकते हैं।
दरअसल मुझे यह कविता इसलिए भी अलग लगी कि पाश ने लड़कियों की विदाई के इस लोकगीत का जो यथार्थवादी पाठ इस कविता में किया है, वह बेहद प्रभावित करने वाला है। लोकगीत में लड़कियों को चिड़िया की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि विवाह होगा तो यह चिड़िया बाबुल के घर से एक लंबी उड़ान भरकर दूर देश चली जाएगी। लेकिन पाश इस कविता के माध्यम से कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। लम्बी उड़ान भरने का सुख उसके हिस्से में ही नहीं है। वह एक जगह से उड़ाकर दूसरी जगह एक पिंजरे में कैद कर दी जाएगी और उसका पूरा जीवन उसी पिंजरे में निकल जाएगा! स्त्री जीवन का एक बड़ा मार्मिक यथार्थ इस कविता में व्यक्त हुआ है।
प्रियंका सेतिया की आवाज़ में प्रसिद्ध लोकगीत का यह मुखड़ा और पाश की कविता दोनों को सुनना सच में बहुत करूणा से भर देने वाला है।

Sunday, 14 January 2018

‘1084वें की माँ’ की माँ

इस बात का ज़िक्र मैंने पहले भी एक लेख में किया है कि गोविन्द निहलानी निर्देशित हज़ार चौरासी की माँमैंने पहले देखी और महाश्वेता देवी के जिस मूल बांगला उपन्यास पर यह फिल्म आधारित है, उसका हिंदी अनुवाद ‘1084वें की माँ’ मैंने बाद में पढ़ा। यह फिल्म रूपांतरण इतना संतोषप्रद है कि इस फिल्म को देख लेने के बाद मूल साहित्यिक कृति को पढ़ने की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं होती! लेकिन मूल उपन्यास पढ़ लेने के बाद, इसके सिनेमाई रुपांतरण को नये सिरे से समझने का अधिक अवसर मिल सकता है। महाश्वेता देवी का लेखन इतना उम्दा और प्रभावशाली है, कि उनका यह उपन्यास अपने आप में एक सिनेमा है। इसलिए मुझे लगता है कि फिल्म के रूप में इसकी परिकल्पना करते हुए गोविन्द निहलानी को बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी।
महाश्वेता देवी के इस उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की केन्द्रीय संवेदना यह है कि समाज की विषमताओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान देने वाले एक पात्र की माँ उसके बलिदान के कारणों और महत्त्व को समझने की कोशिश करती है और जब वह इसे समझ लेती है, तब वह इन्हें मूल्य के बतौर आत्मसात करने की कोशिश भी करती है। यह इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि पुत्र के इस बलिदान को उसके अभिजात्य पिता और अन्य सम्बन्धियों सहित पूरा का पूरा बुर्जुवा समाज न सिर्फ ख़ारिज करता है, बल्कि उसके वजूद को भी मिटा देना चाहता है! इन प्रपंचों को समझ लेने के बाद माँ को अपने ही रक्त सम्बन्धियों और अपने ही अभिजात्य समाज से घृणा होने लगती है। उपन्यास के लगभग अंतिम हिस्से में घर में चल रही एक पार्टी में शराब में डूबे, झूमते-नाचते, बौद्धिकता और प्रतिबद्धता की दिखावटी बहसों में शामिल लोगों को देखकर उसे बहुत गहरी बेचैनी और वेदना होती है और उन क्षणों में वह सोचती है- “धरती की सब कविता, कविता के बिम्ब, लाल गुलाब के गुच्छे, हरी घास, नियॉन की रोशनी, माँ के चेहरे पर फैली हंसी, शिशु का क्रंदन....हमेशा अनंत काल तक इन सबका भोग करती रहेंगी ये लाशें! अपने सड़े गले-गँधाते अस्तित्व के लिए धरती के हर सौन्दर्य और माधुर्य को हथियाए रहेंगी, क्या इसीलिए व्रती मर गया? सिर्फ इसलिए?”
महाश्वेता देवी खुद एक एक्टिविस्ट लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। सिर्फ अपने लेखन से ही नहीं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर प्रविरोध के मोर्चों पर डट जाना उनका स्वाभाव था। महाश्वेता देवी की वाम प्रतिबद्धता जगजाहिर रही है, लेकिन जब बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के रहते हुए सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जनविरोधी घटनाएँ हुईं तब वे सरकार की नीतियों के सबसे मुखर आलोचकों और सत्याग्रहियों में शामिल रहीं।
मेरे ख़याल से उपन्यास ‘1084वें की माँ’ की प्रेरणा महाश्वेता देवी की वही पक्षधरता रही है, जो उनके उपन्यास के पात्र व्रती की है और इस उपन्यास के इतने प्रभावी होने का एक बड़ा कारण भी यही है कि महाश्वेता के खुद के विचारों और आचरण में कोई दोहरापन नहीं था। चूँकि महाश्वेता देवी इस उपन्यास की सर्जक हैं, इसलिए उन्हें 1084वें  की माँ की माँ भी कह सकते हैं। उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहे लगभग डेढ़ वर्ष हो गये हैं, यदि वे जीवित होतीं तो आज जीवन के 93वें वर्ष में प्रवेश करतीं। जनपक्षधरता के प्रति समर्पित इस सशक्त लेखिका को उनके जन्मदिन पर सलाम।

Saturday, 30 December 2017

नयी पीढ़ी तक दुष्यंत

दुष्यंत कुमार (01.09.1933 से 30.12.1975)

फिल्म मसानमें दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल की कुछ पंक्तियों के साथ प्रयोग करके जब वरुण ग्रोवर ने एक सुन्दर गीत बनाया, तब स्वाभाविक रूप से इस गीत के साथ जगह-जगह दुष्यंत कुमार का ज़िक्र भी हुआ। हो सकता है कि बिल्कुल नयी पीढ़ी के कई लोगों को इससे यह जानने का अवसर मिला हो कि ‘एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ / तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ’ जैसी खूबसूरत पंक्तियाँ दुष्यंत कुमार की कलम से निकली हैं। 
हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं है कि इस ज़िक्र के बिना भी देर-सवेर दुष्यंत के लिखे शेर हिन्दी बोलने, समझने और लिखने वाली नयी पीढ़ी तक पहुँच ही जाते। इस बात की तसल्ली करनी हो तो कहीं स्कूली बच्चों या कॉलेज के नव युवाओं के लिए रखे गये भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगितायों में कभी पहुँचिये। वहाँ तय किये गए विषय भले कुछ भी हों, इस बात की भरपूर संभावना है कि आप को वहाँ दुष्यंत के शेर सुनने को ज़रूर मिल जाएँगे। दुष्यंत की ग़जलों की यह ख़ासियत है कि यह सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों से हमेशा नये लगते हैं। दुर्भाग्य का ज़िक्र इसलिए कि जिन परिस्थितिथियों ने दुष्यंत को व्यथित किया वे सौगात के बतौर न जाने हम सब को कब तक मिलती रहेंगी।! पीर के पर्वत हो जाने का यह सिलसिला न जाने कब थमेगा!
दुष्यंत के शेर विकट परिस्थितियों से जूझने का जज़्बा देते हैं। वे पीर के पर्वत को पिघलाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं, बुनियाद के हिलाए जाने की ज़रूरत पर जोर देते हैं, वे आकाश के तारों के बजाय घर के अंधेरों पर ध्यान देने की बात करते हैं, वे अपने बाजुओं पर भरोसा करने की ज़रूरत पर इस तरह बल देते हैं कि कट चुके हाथों में तलवारें देखना खुद को भ्रम में रखने के अलावा कुछ भी नहीं है। दुष्यंत असंभव को इस तरह नकारते हैं कि तबीयत से उछाला गया पत्थर आसमां में भी सुराख कर सकता है, और भी बहुत कुछ!
दुष्यंत की गज़लों के संकलन साये में धूपसे जब आप गुज़रेंगे, तब आपको महसूस होगा कि इस पतली सी किताब में शायद ही ऐसा कुछ हो, जो छूट गया हो! इसलिए कहा जाता है कि देश की सभी भाषाओं को बरतने वाले लोग चाहते हैं कि उनका भी अपना एक दुष्यंत हो!
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1 जनवरी 2018 को 'यूथ की आवाज़' (YKA) पर भी प्रकाशित 

Tuesday, 19 December 2017

_____ कविता की बात सुनाती कविताएँ _____

वेणु गोपाल की कविताओं में विचार का पक्ष अधिक मुखर रहा है। मेरी समझ से इसका कारण उनकी स्पष्ट पक्षधरता है। नक्सल जैसी उग्रवामपंथी विचारधारा से सक्रिय तौर पर सम्बद्ध कवि की वैचारिक प्रखरता स्वाभाविक है। कविता को शोषण के विरूद्ध और साम्यवाद के पक्ष में इस्तेमाल करने की जो तकनीक प्रगतिशील कविता के दौर में विकसित हुई थी, नक्सल क्रांति के दौर में उसे पर्याप्त व्यावहारिक आधार मिला। हिन्दी साहित्य में वेणु गोपाल की पहली मुकम्मल पहचान इसी दौर के दायित्वबोध से आबद्ध, अभिव्यक्ति के भारी खतरे उठा सकने वाले कवि के बतौर हुई थी।
(मासिक पत्रिका ‘अक्षरपर्व’ के दिसम्बर'2017 अंक में प्रकाशित)

Saturday, 9 September 2017

वे गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहते थे!

एम.ए के दिनों में पाश (09 सितम्बर 1950 - 23 मार्च 1988) से परिचय हुआ था, उनकी कुछ कविताएँ हिन्दी में पढ़ी सुनी, लेकिन उन्हें जब गंभीरता से पढ़ना चाहा तब पता चला कि वे पंजाबी भाषा के कवि हैं। (यह मेरे लिए फक्र करने की बात थी!)
हिन्दी में उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा ही नहीं था, कि अनूदित कविताएँ पढ़ रही हूँ! बल्कि इसके विपरीत जब उन्हें पंजाबी में पढ़ने की कोशिश करती हूँ, तो वे कविताएँ मुझे अनूदित लगती हैं।
मुझे लगता है, एक सच्चे, जुझारू और ईमानदार व्यक्ति की रचनाएँ जिस भाषा में भी अनूदित कर दी जाएँ, वह उसी भाषा की लगने लगती हैं। यह संयोग था कि मैंने पाश को पहले हिन्दी में पढ़ा! निसंदेह इसमें एक बड़ी भूमिका चमनलाल सहित उन सभी अनुवादकों की भी है, जिन्होंने बड़े मनोयोग से पाश की कविताओं का अनुवाद कर उन्हें हिंदी पाठकों के समक्ष रखा।
पाश यदि जीवित होते तो आज अपने जीवन के 68वें साल में प्रवेश करते। वे बेशक एक लम्बा जीवन नहीं जी सके, लेकिन उन्होंने एक बड़ा जीवन जिया! इसलिए तो वे हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं। 

पाश की कविता अब विदा लेता हूँ’ (अनूदित) से कुछ अंश 
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"धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूँज जाना-
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया"
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"सब भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक ज़िन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना।"

#PASH #BIRTHDAY #23MARCH #PUNJABI KAVI #CHAMANLAL

Wednesday, 30 August 2017

ऐसे शुरू हुई थी हिन्दी फिल्मों में टाइटल गीत की परम्परा

शैलेन्द्र, राजकपूर के चहेते गीतकार थे । मेरे खयाल से इसका एक कारण राजकपूर और शैलेन्द्र के बीच का वैचारिक साम्य भी था । तब राजकपूर भी सिनेमा की दुनिया में नये ही थे । जवान खून था और वामपंथी संगठनों विशेषकर इप्टा और प्रलेस की काव्य गोष्ठियों में अक्सर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ जाया करते थे । वहीं उन्होंने पहली बार शैलेन्द्र को सुना था । वहाँ शैलेन्द्र पूरे जोश के साथ मेरी बगिया में आग लगाये गयो रे गोरा परदेसीगा रहे थे । राजकपूर इसे सुनकर, इतने प्रभावित हो गये थे कि उन्होने अपनी फ़िल्म आगके लिए गीत लिखने का प्रस्ताव शैलेन्द्र के समक्ष रख दिया ।
तब शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गीत लिखने से साफ़ इनकार कर दिया था । राजकपूर ने यह कहते हुए उनसे विदा ली कि वे जब भी फिल्मों में लिखने के लिए मन बना पाएँ, राजकपूर उनका स्वागत करने के लिए तैयार मिलेंगे । कुछ दिनों बाद आर्थिक दिक्कतों के कारण शैलेन्द्र को फिल्मों में गीत लिखने का मन बनाना पड़ा और राजकपूर ने अपने किये वादे को निभाते हुए उनका स्वागत किया । यहीं से सिलसिला शुरू हुआ एक कवि के सिनेमा के गीतकार बनने का ।

सबसे पहला गीत जो शैलेन्द्र ने सिनेमा के लिए लिखा, वह था फ़िल्म बरसात का – ‘हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम बरसात में ।पहले ही गीत से शैलेन्द्र ने सिनेमा जगत में अपनी पहचान बना ली । यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसे हिंदी फ़िल्मों का सबसे पहला टाइटल गीतहोने का श्रेय प्राप्त है, इससे पूर्व फ़िल्मों में टाइटल गीत की परंपरा नहीं थी । इसी गीत के साथ यह परंपरा शुरू हुई, जो आज तक बदस्तूर जारी है ।


#Shailendra #Rajkapoor #Barsaatmehumsemiletum #BirthdayofShalendra #IPTA #Prithvirajkapoor

Friday, 28 July 2017

हज़ार चौरासी की माँ

‘हज़ार चौरासी की माँ’ मेरी अब तक देखी गयी साहित्य आधारित कुछ बेहतरीन फिल्मों में से एक है। यह फिल्म मैंने बहुत पहले देख ली थी, और उससे इतनी अधिक प्रभावित हुई, कि बाद में भी कई बार देखती रही हूँ। इसे बार-बार देखने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है, यह इसे देखने के बाद ही जाना जा सकता है। 
महाश्वेता देवी के लिखे मूल बांग्ला उपन्यास का हिन्दी अनुवाद बहुत बाद में, बल्कि हाल ही में पढ़ पायी हूँ। उपन्यास को इतनी देर से पढ़ने का एक कारण यह भी था कि फिल्म देख लेने के बाद, इतना संतोष मिला था कि इसकी बहुत ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी। अब उपन्यास पढ़ लेने के बाद, मुझे इसके सिनेमाई रुपांतरण को नये सिरे से समझने का अधिक अवसर मिला है।
मेरे खयाल से महाश्वेता देवी (जिन्हें मूल कथानक की लेखिका होने के कारण मैं 'हज़ार चौरासिवें की माँ' की माँ भी कहती हूँ) का लेखन इतना उम्दा और प्रभाशाली है, कि उनका यह उपन्यास अपने आप में एक सिनेमा भी है। इसलिए मुझे लगता है कि सिनेमा के रूप में इसकी परिकल्पना करते हुए गोविन्द निहलानी को बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी फिल्म को देखने और इसकी आधार साहित्यिक कृति को पढ़ने के बाद यह लगे कि फिल्म और मूल कृति एकाकार हो गये हों। उपन्यास के पात्रों की मन:स्थिति, उनके हाव-भाव, स्थिति विशेष में उनकी क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ सभी को फिल्म निर्देशक गोविन्द निहलानी ने बेहद सूक्ष्मता और गहराई के साथ समझा है, और बहुत ही कुशलता से उनका फिल्मांकन किया है।
अक्सर इस बात की शिकायत की जाती है कि किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाते हुए फिल्मकार उस कृति के साथ अनुचित और अनावश्यक छेड़-छाड़ करते हैं, और इससे मूल कृति की आत्मा ही गायब कर दी जाती है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कई बार फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्में बनाते हुए उनमें कुछ फेर-बदल किये और वे फेर-बदल मूल कृति को और बेहतर बनाकर प्रस्तुत करने वाले साबित हुए। मेरे खयाल से ऐसा तब संभव हुआ जब फिल्मकारों ने मूल कथा के साथ कुछ प्रयोग व्यावसायिक लाभ के दृष्टिकोण से नहीं किये बल्कि फिल्म को अधिक सम्प्रेषणीय  और अधिक प्रभावशाली बनाने के दृष्टिकोण से किये। 
निर्देशक गोविन्द निहलानी ने ‘हजार चौरासवें की माँ’ की मूल कथा के साथ इसी दृष्टिकोण से कुछ रचनात्मक प्रयोग किये हैं। उन्होंने इस फिल्म के अंत को उपन्यास के अंत से थोड़ा अधिक विस्तार दिया है, और यह विस्तार इसे और भी सार्थक बनाता है। यह विस्तार मूल कथा के जुझारू पात्रों के जुझारूपन को विस्तार देता है और नयी परिस्थिति में क्रूर व्यवस्था के खिलाफ उनके संघर्ष को नया आयाम भी प्रदान करता है। यानी यह फिल्म उपन्यास को स्वाभाविक और सकारात्मक विस्तार देती है। साहित्य और सिनेमा के खूबसूरत रिश्तों का यदि कोई उदाहरण देना हो तो निसंकोच 'हज़ार चौरासी की मां' का उल्लेख किया जा सकता है।

Sunday, 20 November 2016

'मुझसे पहली सी मुहब्बत' के पीछे का हादसा !

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी नज़्म मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांगको नूरजहाँ की आवाज़ में सुनकर, इतने अधिक भावुक हो गए थे कि उन्होंने नूरजहाँ से कहा था कि ये नज़्म अब हमारी नहीं रही, तुम्हारी हो गयी ।
इस नज़्म के बारे में एक और बात यह कि फैज़ ने इसे अपने विवाह के बाद नहीं लिखा था, जैसा कि अक्सर समझ लिया जाता है । फ़ैज़ की मानें तो उन्होंने यह नज़्म किसी महबूब के लिए भी नहीं लिखी थी, इसके पीछे यदि कोई था तो वो कार्ल मार्क्स थे और था उनका कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो! बकौल फ़ैज़ : इस नज़्म के पीछे का हादसा सिर्फ कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पढ़ना था । सिर्फ मैनिफेस्टो पढ़ने से लगा कि हम कहाँ पड़े हैं । तब यह नज़्म लिखी गयी थी ।

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#FaizAhmadFiaz #NoorJahan #MujhsePehliSiMuhobbat #KarlMarx