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Monday, 20 April 2020

गुलमोहर तुझसे मेरा रिश्ता क्या है!


गुलमोहर अचानक खिलते हैं। किसी सुबह उठो तो पता चलता है कि वह पेड़ जो बीते कल तक सिर्फ हरी पत्तियों और टहनियों का पर्याय था, अचानक फूलों से लद गया होता है। फूलों का रंग भी ऐसा कि सबका ध्यान अपनी ओर खींच ले लेकिन वैसा चटक भी नहीं जैसे पलाश के फूल होते हैं! एक संतुलन भरा सम्मोहन! इसलिए भी गुलमोहर, गुलमोहर है। वह एक सरप्राइज़ की तरह आता है!
लेकिन मुझ जैसों के लिए जिसे इस मौसम में अपने पुराने कैंपस (हैदराबाद विश्वविद्यालय) के गुलमोहर की याद शिद्दत से आ रही हो, यह किसी भी सरप्राइज़ से बड़ा; वाकई बहुत बड़ा सरप्राइज़ था कि आज सुबह खिड़की खोलने पर लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर पेड़ पर लदे फूल जैसे कह रहे थे, विश्वास करो मैं गुलमोहर ही हूँ! यह एक ऐसा अद्भुत अनुभव था; जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। मैं गुलमोहर के पेड़ पहचानती हूँ; लेकिन इतने दिनों से पता नहीं क्यों उस पेड़ पर कभी नज़र ही नहीं पड़ी और इसलिए इस बार गुलमोहर के फूलों ने ही उस पेड़ से परिचय करवाया। वैसे भी गुलमोहर के पेड़ों की साल भर की तपस्या का हासिल इन दिनों में खिलने वाले ये फूल ही तो होते हैं! जो देखा उसे खिड़की से ही कैमरे में उतारने की कोशिश की, जैसा उतर सका साझा कर रही हूँ।

Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Monday, 23 March 2020

कोरोना काल में असंवेदनशीलता

महामारी (Covid19) के समय में काम/ सेवा करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के लिए हमारे देश की जनता ने कल शाम जिस जोश के साथ तालियाँ-थालियाँ बजाई थीं; वो देखने लायक था! लेकिन क्या सच में हम ऐसे समय में उन लोगों को धन्यवाद कर रहे थे??
आँखों देखी घटना बता रही हूँ। पास के एक अपार्टमेंट के लोगों ने कल शाम पूरे उत्साह के साथ खूब थालियाँ-तालियाँ पीटीं थीं। आज सुबह उसी अपार्टमेंट के तीसरे-चौथे फ्लोर से कुछ लोग कूड़ा लेने आयी गाड़ी पर 'कोरोना' के डर से अपनी बालकनी से ही कूड़ा फेंकने लगे। कूड़ा इधर-उधर बिखर रहा था और गाड़ी के साथ आए सफाई कर्मचारियों पर भी गिर रहा था। कुछ लोग सड़कों पर कूड़ा फेंंक रहे थे, और सफाई कर्मचारियों को कह रहे थे; उठा के गाड़़ी में डाल दो! एक सफाई कर्मचारी नीचे से चिल्लाई- 'बेटा हम भी तो इंसान हैं!'
थाली-ताली और शंख की ध्वनियों से कल शाम गूँजने वाली कृतज्ञता आज कूड़े की शक्ल में इस तरह बरस रही थी!
ये मानवता के संकट की झलकी भर है। इस संकट के समय में आगे असंवेदनशीलता का न जाने कैसा-कैसा रूप देखना पड़े।

Sunday, 5 January 2020

पंकज कपूर की 'हैप्पी'


लम्बे अरसे से पंकज कपूर अभिनीत फिल्म हैप्पीका इंतज़ार कर रही थी; बहुत साल पहले इस फिल्म का सिर्फ पोस्टर भर देखा था। फिर सालों तक सर्च करती रही; लेकिन न तो उस फिल्म की चर्चा कहीं सुनी, न ही ट्रेलर वगैरह देखने को कहीं मिला। लेकिन अभी कुछ दिन पहले ज़ी5 पर ये फिल्म अचानक से दिखाई दी। पता चला कि कई तरह की दिक्कतों से जूझते हुए इस फिल्म को परदे पर रिलीज़ करना संभव नहीं हो सका तो अंतत: 25 दिसम्बर को यह फिल्म ज़ी5 पर रिलीज़ की गयी। साल 2019 ने बेहतर हिंदी फिल्मों के ख़याल से लगभग निराश ही किया; ऐसे में साल के अंत तक पहुँचते-पहुँचते हैप्पीदेखना संतोषप्रद रहा।
पंकज कपूर अपनी हर फिल्म में कुछ अलग, कुछ नया करने के लिए जाने-जाते हैं। इस फिल्म में भी उनका अभिनय बेहतरीन है। उल्लेखनीय यह है कि इसकी कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। निर्देशक भावना तलवार ने काबिले तारीफ काम किया है। इससे पहले धर्मफिल्म से भी वो अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। फिल्म हैप्पीपूरी की पूरी ब्लैक एंड व्हाइट इफैक्ट के साथ बनायी गयी है। फिल्म के मुख्य किरदार हैप्पी पर और फिल्म पर चार्ली चैपलिन और उनकी फिल्मों का प्रभाव भी महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म का मुख्य किरदार एक बहुत ही सकारात्मक संवाद को फिल्म में कई बार दोहराता है। उसे यहाँ लिख देने का लोभ मुझसे छूट नहीं रहा है- दोस्तों ये जो ज़िन्दगी नाम की डिश है न, इसमें सबसे ज़रुरी मसाला होता है स्माइल का। इस्माइल प्लीज़ :)  

Saturday, 9 March 2019

सफाई पसंद चायवाला

हमारी यूनिवर्सिटी (हैदराबाद विश्वविद्यालय) की एक कैंटीन के बाहर एक छोटे से कोने में ये चाय की दुकान है। इस दुकान पर मैं जब-जब जाती हूँ, वहाँ की साफ़-सफाई और उसके चमचमाते बर्तनों को देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब होता है! मैंने अक्सर चाय की दुकानों पर देखा है कि उनके बर्तनों और चूल्हे पर उबली हुई चाय की निशानी दिनभर बनी रहती है बल्कि उसमें लगातार इज़ाफा होता रहता है, लेकिन इस दुकान के पतीले, केतलियाँ, चूल्हे इस मामले में अपवाद हैं। 
दुकान पर दिनभर चाय बनती रहती है, एक साथ दो-तीन पतीलों और केतलियों में चाय-दूध हर वक्त उबलता रहता है। ग्राहक भी दिनभर आते रहते हैं और एक ही लड़का है, जो ये सब सम्भालता है। इस दुकान की एक और खासियत ये है कि पूरी यूनिवर्सिटी में सबसे अच्छी चाय यहीं मिलती है। मैं जब भी यहाँ चाय पीने जाती हूँ तो अक्सर उसकी साफ़-सफाई की तारीफ किये बिना नहीं रह पाती। मुझे लगता है कि ये मैं इतनी बार दोहरा चुकी हूँ कि अब मेरी तारीफ के बाद उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आती! जैसे कि आज शाम फिर मैंने तारीफ करते हुए पूछा कि भैया आप इतना साफ़ कैसे रख लेते हैं, मेरे तो घर के बर्तन भी इतने साफ़ नहीं रहते! उसने बड़ी सादगी से उत्तर दिया कि इनका ज़रा सा भी गन्दा रहना मुझे पसंद नहीं है!

Saturday, 22 December 2018

"ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, यह तो सिर्फ किताब है"

ग्रैजुएशन के दिनों में जब मैं लाइब्रेरी में किसी किताब को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते परेशान हो जाती थी और अपनी यह परेशानी लाइब्रेरियन को जाकर बताती थी तो वे किताब ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मेरे साथ किताबों के रैक तक आते थे और किताब ढूंढ़ते हुए अक्सर हर बार कहा करते थे कि 'अरे ढूंढ़ने से तो भगवान भी मिल जाते हैं, ये तो सिर्फ किताब है।' और कुछ देर बाद वह किताब मिल ही जाती थी।
इस मामले में मैं खुद को बहुत हद तक खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अक्सर लाइब्रेरियों में वो सामग्रियां भी बड़ी सहजता से मिल जाती हैं, जो साधारणतया लोगों की नज़रों से चूक जाती हैं और कई बार तो लाइब्रेरी के केटलॉग में भी शामिल नहीं होतीं! लेकिन अब भी कभी-कभी कुछ सामग्रियां ढूंढ़ते हुए बहुत परेशान हो जाती हूं और कई बार तो निराश भी! लेकिन जब-जब ऐसी स्थिति होती है तो मुझे लाइब्रेरियन सर की कहीं हुई वहीं बात याद आ जाती है कि 'ढूंढ़ने से तो...' और इसे इत्तेफाक ही कहूंगी कि इसके बाद जब मैं फिर से ढूंढ़ने के काम में जुटती हूं, तो अक्सर मुझे इच्छित सामग्री मिल ही जाती है!

Wednesday, 28 November 2018

आंवला नहीं आंवड़ा!

यह आंवला नहीं है और जो मुझे स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया और मैंने सही-सही याद रखा है, तो यह आंवड़ा है। सुविधा के लिए इसे आंवले का छोटा भाई मान लीजिए, जो अपने बड़े भाई से कई मायनों में अलहदा है।
मुरब्बे के अलावा आंवले से बना कुछ और मुझे पसंद नहीं, फिर कच्चे आंवले को नमक-मिर्च पाउडर के साथ खाने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। आंवले में भरपूर खटास ही नहीं एक कसैलापन भी होता है, जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त है।
बात आंवडों की करते हैं। मैसूर के टूरिस्ट प्लेसेज़ पर डिस्पोजेबल ग्लास में नमक और मिर्च पाउडर में सने छोटे-छोटे आंवड़ों को ऊपर तक भरकर बेचा जा रहा था। हालांकि सौरभ ने इसे खरीदा आंवला समझ कर ही था, लेकिन जब खाकर इसका स्वाद कुछ अलग लगा तो उन्होंने मुझे और हमारे साथ घूमने निकले दो और साथियों प्रमोद और अजित को भी इन्हें चखने के लिए दिया। यह हम सभी को इतना मज़ेदार लगा कि हमने इसे जमकर खाया और दिलचस्प यह था कि उस दस या बीस रूपये में खरीदे गए ग्लास में छोटे-छोटे इतने आंवड़े थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
आंवले का कसैलापन इसमें बिल्कुल भी नहीं था और आंवले की तुलना में यह मुलायम भी था। हल्का मीठापन लिए और ढेर सारा खट्टापन लिए यह आवड़ा खाने में इतना मज़ेदार था कि अभी जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूं, तब भी इसे सोच-सोचकर मेरे मुंह में पानी आ रहा है।
आंवड़े की तस्वीर तब तो नहीं उतार पाई थी, लेकिन संयोग से कुछ देर बाद इस आंवड़े का एक पेड़ ही कहीं दिख गया और नीचे कुछ आंवड़े भी गिरे हुए थे। आंवड़े और उसके पेड़ की तस्वीर यहां साझा कर रही हूं। ताकि आप इसे पहचान लें और जब कभी मैसूर जाने का मौका मिले तो इसे ज़रूर चखें।

Monday, 26 November 2018

जॉन ज़ोफ्फने की बनाई टीपू सुल्तान की पेंटिंग

मैसूर के दरिया दौलत बाग महल (जिसे अब एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है) में टीपू सुल्तान की एक तस्वीर लगी हुई है, जिसे जॉन ज़ोफ्फने (John Zoffany) ने 1780 में तब बनाया था, जब टीपू तीस साल के युवा थे। देखने में साधारण लगने वाली इस पेंटिंग की खासियत यह है कि इसे आप दायें-बायें या सामने कहीं से भी देखें, आपको ऐसा लगेगा कि टीपू सुल्तान की आँखें आपकी ओर ही देख रही हैं। चाहे तो आप खुद आज़मा लें!


Thursday, 22 November 2018

राजा रवि वर्मा की कुछ मूल कला कृतियों का दीदार


पिछले दिनों मैसूर यात्रा का संयोग बना और इसी दौरान यह संयोग भी बना कि राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई कुछ मूल कलाकृतियों को पहली बार अपनी आंखों से देख सकी। यह मेरे लिए रोमांचित करने वाला क्षण था। हालांकि रवि वर्मा की बनाई बहुत सी मूल पेंटिंग्स 'जगमोहन पैलेस' और 'आर्ट गैलरी', मैसूर में लगी हुई हैं, लेकिन रिनोवेशन के कारण ये दोनों ही जगहें आम लोगों के लिए बंद थीं और इसलिए मैं इन्हें देखने से चूक गई, इस बात का मुझे बेहद मलाल है।
खैर उनकी बनाई कुछ पेंटिंग्स 'मैसूर पैलेस' की गैलरी में भी लगी हुई हैं। यहां लगी अधिकांश पेंटिंग्स में उन्होंने राज परिवार के सदस्यों को चित्रित किया है। रवि वर्मा द्वारा बनाई गई उन्हीं पेंटिंग्स में से एक, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है, यहां साझा कर रही हूं।

Wednesday, 24 October 2018

'तुम्बाड' का रोमांच


जिन सिनेमा प्रेमियों ने तुम्बाडसिनेमाघरों में जाकर नहीं देखी है, हो सकता है उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहे। मेरे खयाल से टीवी या लैपटॉप स्क्रीन पर इस फिल्म के पूरे रोमांच को महसूस नहीं किया जा सकता। वैसे अभी भी कई सिनेमाघरों में तुम्बाडलगी हुई है, इच्छा हो तो इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। इस फिल्म को देख कर लौटने वाले कुछ लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनने के बाद मैं यह सलाह ज़रूर दूंगी कि इस फिल्म को जब देखने जाएँ तो यह सोचकर बिल्कुल भी न जाएँ कि यह एक हॉरर मूवी है, यह पूर्वाग्रह आपका मज़ा खराब कर सकता है।
इस फिल्म में सबकुछ बहुत वास्तविक दिखाने के लिए छ: सालों तक जबरदस्त टीमवर्क किया गया है। लोकेशन का चयन, सेट की पूरी परिकल्पना, मेकअप, डिजाइन वगैरह के लिए अथक मेहनत की गयी है। फिल्म में प्रभावी बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए डेनिश म्यूजिशियन जेस्पर किड जेकॉब्सन (Jesper Kyd Jakobson) से संपर्क किया गया, जिन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ लॉस एंजल्स (यूएसए) स्थित अपने स्टूडियो में इस फिल्म के लिए म्यूजिक तैयार किया। इस फिल्म में एक ही गीत है, और वो बेहद प्रभावी है। इस गीत के कुछ-कुछ अंश पूरी फिल्म में कई बार बजते हैं। राजशेखर के लिखे हुए इस गीत का म्यूजिक अजय-अतुल की जोड़ी ने कंपोज़ किया है और इसी जोड़ी में से एक अतुल गोगावाले ने इसे बेहद खूबसूरती से गाया है।
बहरहाल इस फिल्म से जुड़ी एक ऐसी जानकारी यहाँ साझा कर रही हूँ, जो मेरे लिए तो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। अभी एक-दो दिन पहले यह जानकारी मुझे फ़िल्मी फीवरनामक एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित हुए चाइल्ड एक्टर मोहम्मद समद के एक इंटरव्यू से मिली। इस फिल्म में विनायक (सोहम शाह) के नन्हें बेटे का किरदार निभा रहे मोहम्मद समद ने ही विनायक की बूढ़ी दादी का भी किरदार निभाया है। विनायक की दादी का किरदार एक बूढ़ी अभिशप्त महिला का है, जिसका पूरा शरीर शक्ल-ओ-सूरत बेहद जुगुप्सा पैदा करने वाला और बेहद डरावना है। एक 9-10 साल के बच्चे का एक ही फिल्म में दोहरा किरदार निभाना, जिसमें से एक सामान्य बच्चे का और दूसरा बेहद असामान्य बुढ़िया का वाकई बहुत चकित करने वाला है। बाकी इन किरदारों की क्या खासियत है और कितना अलग-अलग रेंज है, यह फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है।
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Monday, 8 October 2018

ग्लो ऑफ़ होप

ग्लो ऑफ़ होप
इस मशहूर और बेहद खूबसूरत पेंटिंग को कुछ समानताओं के कारण लोग अक्सर राजा रवि वर्मा की बनाई पेंटिंग समझ लेते हैं। गूगल पर राजा रवि वर्मा की कृतियों को सर्च करने परयह पेंटिंग भी एकदम शुरूआती परिणामों में दिखाई देती है!
लेकिन असल में इस वाटर कलर पेंटिंग को एक पेंटर पिता ने अपनी बेटी को देखकर तब बनाना शुरू किया थाजब एक दिवाली की रात हाथ में दीप लिए और हथेली के सहारे उसकी लौ को हवा से बचाने का यत्न करतीवह अपने पिता के सामने आकर खड़ी हो गयी थी। इस दृश्य ने पिता एस.एल. हलदणकर को इस कदर प्रभावित किया कि तीन दिनों तक लगातार जुटे रहकर उन्होंने इसे कैनवस पर उतार लिया। इन तीन दिनों तक कई बार घंटों इसी पोज़ में खड़े रहकर बेटी भी अपने पिता का सहयोग करती रही।
इस पेंटिंग में उतारी गयी लड़की का नाम गीता हलदणकर है। गीता का पिछले हफ्ते (2अक्टूबर को) 102 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इसके बाद ही मीडिया के ज़रिए मुझे पहली बार इस पेंटिंग के पीछे की कहानी जानने का मौका मिला। इससे पहले तक इस कालाकृति को मैं भी राजा रवि वर्मा की बनायी पेंटिंग ही समझती थी!

Tuesday, 2 October 2018

कैंपस गाँधीजी, दो अक्टूबर से जुड़े संयोग!

आज से ठीक एक साल पहले इसी दिन कैंपस में टहलते हुए सामने से अचानक मुझे धोती पहने, हाथ में लाठी पकड़े, नंगे पाँव चल रहे एक बाबा दिखे थे। उनके पास से गुजरते ही मुझे कुछ ध्यान आया। मुड़ कर देखा तो बाबा की छवि मुझे गांधी जी जैसी लगी थी। मैंने झट से अपने मोबाइल कैमरे से पीछे से उनकी एक तस्वीर उतार ली। 2 अक्टूबर के दिन ऐसा घटित होना मुझे खूबसूरत संयोग लगा था। मैंने इसे हमारे कैंपस में गांधी जीशीर्षक के साथ पोस्ट किया था।
इसके बाद कभी-कभार वे बाबा टहलते-टहलते दिख जाया करते थे। लेकिन पिछले बहुत दिनों से उन्हें नहीं देखा था। कल शाम टहलते हुए वे मुझे सामने से आते हुए दिखे। मुझे लगा सामने से उनकी तस्वीर उतारूँ, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उन्हें यह पता चले। इस कोशिश में फोटो बहुत ब्लर आई!
लेकिन आज देर रात कहिये या एकदम सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मैं फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी कि हमारे इन गाँधी बाबाकी तस्वीर मुझे फेसबुक पर दिख गयी! वे हमारे कैंपस की एक दुकान के बाहर बैठ कर आराम कर रहे थे। कैंपस में चुनावी मौसम है, और उसी सिलसिले में किसी की खींची गयी तस्वीर में बाबा उतर आए!

[यहाँ तीनों तस्वीरें लगा रही हूँ। एक सबसे पहली जो पिछले 2 अक्टूबर को खींची थी। दूसरी तस्वीर कल शाम की है, और तीसरी तस्वीर जो सुबह के साढ़े तीन बजे अचानक से मुझे फेसबुक पर दिखाई दी।]

Saturday, 8 September 2018

वक्त काटने की चीज़ नहीं है सिनेमा

हम कल रिलीज़ हुई फिल्म गली गुलियाँदेखने गये थे। इस फर्स्ट डे फर्स्ट शो में हम दो लोगों के अलावा छः और लोग थे, यानी लगभग डेढ़ सौ लोगों की क्षमता वाले हॉल में लगभग 140 सीटें खाली थीं। इस तरह का अनुभव पहली बार नहीं हुआ है। हैदराबाद के सिनेमा घरों में इससे पहले भी हमने कुछ ऐसी फिल्में देखी हैं, जिन्हें देखने के लिए इससे भी कम लोग पहुँचे थे, और इससे भी अधिक सीटें खाली थीं। लेकिन कल पहली बार मुझे मल्टिप्लैक्स कर्मचारियों के एक अजीब किस्म के अनुरोध का सामना करना पड़ा। हुआ यह कि जब फिल्म 25-30 मिनट बीत चुकी थी, और हम उससे पूरी तरह जुड़ चुके थे, तब कुछ कर्मचारी हमारे पास आए और उनमें से एक ने कहा : ‘Ma’am because very few people watching this movie, so can you shuffle to any other movie?' यह सुनकर मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, क्यूंकि मैंने कभी इस तरह के किसी प्रस्ताव की कल्पना तक नहीं की थी। खैर मैंने उससे दृढ़तापूर्वक कहा : No! thank you. We have paid and come for this movie. शुक्र था कि उसने मुझ ही से पूछ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और हॉल में बैठे बाकी लोगों से यही सवाल पूछने की उसकी हिम्मत नही हुई या उसने ज़हमत नहीं उठाई। जो लोग फिल्में पसंद करके व प्लान करके देखने जाते हैं, वे इस तरह के प्रस्ताव भर को अपनी तौहीन समझ बैठें तो कुछ ग़लत नहीं होगा।
मुझे लगता है कि आज भी इस सोच से बहुत सारे फिल्मकार, सिनेमा हॉल वाले और ख़ुद कई दर्शकभी इत्तेफाक रखते हैं कि फिल्में समय काटने का माध्यम भर हैं, यानी आँखों के आगे किसी कहानी पर फिल्माए गये ठीक-ठाक सीन चलते रहें और कानों तक समझ में आने वाले डायलॉग पहुँचते रहें तो वक्त कट ही जाएगा! जबकि हक़ीकत यह है कि सिनेमा का असली दर्शक वक्त काटने नहीं, वक्त निकालकर सिनेमा देखने पहुँचता है।
अब फिल्म पर आती हूँ गली गुलियाँका ट्रेलर पिछले हफ्ते ही देखा था। ट्रेलर देखकर फिल्म देखने की इच्छा हुई, दूसरा कारण यह रहा कि फिल्म में मनोज वाजपेयी, रणवीर शौरी और नीरज कबी जैसे अक्सर पसंद किये जाने वाले अभिनेता हैं। फिल्म बाल उत्पीड़न और बाल मनोविज्ञान की कोमल से लेकर विस्फ़ोटक जटिलताओं तक को उभार पाने में सफल हुई है, लेकिन इसमें कुछ कमजोर कड़ियाँ भी हैं, और यह मुझे किसी साधारण फिल्म से बेहतर श्रेणी की फिल्म नहीं लगी। फिल्म का अभिनय पक्ष भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इस फिल्म में मनोज वाजपेयी के अभिनय की नाहक ही अधिक तारीफ हो रही है, वे इससे बहुत बेहतर काम कर सकते थे। अभिनय की तारीफ करनी हो तो अपेक्षाकृत कम चर्चित शहाना गोस्वामी के अभिनय की तारीफ होनी चाहिए। मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक नीरज कबी ने नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई सेक्रेड गेम्समें अपने अभिनय से मुझे निराश किया था, लेकिन गली गुलियाँमें उन्होंने निराश नहीं किया है। इसके अलावा रणवीर शौरी के हिस्से जितनी भूमिका आयी है, उन्होंने भी उसे अच्छे से निभाया है।

Wednesday, 5 September 2018

गुरु कुम्हार शिष कुंभ

हमें हायर सेकेंडरी स्कूल के दिनों में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने वाले सर को आज याद कर रही हूँ। वे क्लास में जब-जब किसी बच्चे को किसी बात पर डांटते या पीटते (हालांकि वे पीटते बहुत कम थे, और वह भी सिर्फ लड़कों को बल्कि ढीठ लड़कों को) तो उसके तुरंत बाद वे कबीर का एक दोहा लगभग हर बार सुनाया करते – “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि गढि काढैं खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
मैं अब सोचती हूँ कि वे डांट तो देते थे, लेकिन उसके बाद उनके भीतर शायद कोई अपराध बोध रह जाता था, या उन्हें इसका अफ़सोस होता था या कम से कम यह कि मार-फटकार का काम उनके लिए आनंद का विषय नहीं था, जैसा कई शिक्षकों के लिए हुआ करता है! वे न केवल कबीर का यह दोहा सुनाया करते थे, बल्कि हर बार इसका अर्थ भी बताया करते थे। वे कहते थे कि गुरु जब डांटता है, या आपको कड़ाई से कुछ समझाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपसे प्यार नहीं करता बल्कि ऐसा वो इसलिए करता है कि आप के गढ़े जाने में कोई कमी न रह जाये!
वे अच्छा पढ़ाते थे, लेकिन आज मैं उन्हें उनके पढ़ाने के लिए याद नहीं कर रही हूँ, न ही उनके डांटने-फटकारने के लिए बल्कि कबीर का दोहा सुनाते हुए और उसका अर्थ समझाते हुए उनके चेहरे पर जो भाव उभरा करते थे मैं उन भावों को याद कर रही हूँ। उनमें जैसे पीड़ा, विवशता, सद्भावना, पारंपरिक कर्त्तव्यबोध और भय सब मिले-जुले होते थे। शिक्षक के रूप में यह उनकी अपनी सीमा का भी परिचायक था लेकिन साथ ही उनकी संवेदनशीलता का भी!

Friday, 8 June 2018

प्रेमी जोड़ों के प्रति घृणा का एक रूप यह भी!

हैदराबाद का लुम्बिनी पार्क मेरी पसंदीदा जगहों में से एक है।‌ हुसैन सागर के बीचों-बीच खड़ी बुद्ध की बेहद विशाल प्रतिमा मन को मोह लेती है।
पिछले दिनों लुम्बिनी पार्क जाना हुआ था। इस बार वहां ऐंट्री गेट के पास एक बड़ा सा पोस्टर टंगा दिखा। दूर से मुझे लगा कि इसपर पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार की अपील करने वाला कोई संदेश लगा होगा। लेकिन नजदीक जा कर जो देखा और पढ़ा वह मन को दुखाने वाला था। कुंठाएँ कितने-कितने रूपों में अभिव्यक्त होती हैं! वास्तव में यह प्रेम के प्रति बेहद घृणा प्रदर्शित करने वाला और प्रेमी जोड़ों के प्रति बेहद अपमानजनक पोस्टर है। मनुष्य ही नहीं पशुओं का प्रेम भी इस घृणा की जद में है!
सार्वजनिक और एकांत जगहों का भेद प्रेमी जोड़ों को भी अच्छी तरह से मालूम होता है। यह उन्हें सिखाने की ज़रूरत नहीं होती! उनसे उनका एकांत तक छीन लेने को आमादा लोग, सार्वजनिक जगहों पर भी उनका साथ होना, साथ बैठना, हाथ पकड़ कर चलना और बातें करना तक बर्दाश्त नहीं कर पाते!
ऐसे लोग इस तरह के हज़ारों पोस्टर लगा दें तब भी उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। जोड़े कुंठित दुनिया की परवाह नहीं किया करते। यह पोस्टर बुद्ध को समर्पित एक खूबसूरत जगह को बदनुमा बनाने का काम ज़रूर कर रहा है। दरअसल इस तरह की सोच पूरी दुनिया को बदनुमा बना देने के अभियान का ही तो हिस्सा है!!

Saturday, 12 May 2018

पापा की किसानी

मेरे पापा को हमेशा से शौक रहा कि वे खेती करें किसान बनेलेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक रूप से कमज़ोर और लगभग भूमिहीन पृष्ठभूमि से होने के कारण वे कभी अपने इस सपने को साकार नहीं कर सके। बहुत छोटी सी उम्र से ही उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से पढ़ाई छोड़ बहुत मेहनत वाले छोटे-मोटे काम-धंधे में घुस जाना पड़ा लेकिन इसके बावजूद वे हमेशा एक खुशमिजाज़ और जिंदादिल इंसान बने रहे और अपनी मेहनत और लगन के बल पर लगातार उन्नति करते रहे।
पापा बहुत अधिक पढ़-लिख नहीं सके लेकिन कोई उन्हें देखकर और उनसे बात करके यह नहीं समझ सकता कि वे कम पढ़े-लिखे हैं। वे हम लोगों की पढ़ाई-लिखाई तक की अच्छी खासी समीक्षा कर देते हैं और कड़ी पूछताछ कर हर चीज़ की कमजोरियाँ और खूबियाँ भी गिना पाने में सक्षम हैं। जीवन और समाज के गहरे अनुभव और व्यक्तियों के चरित्र की उन्हें गहरी पकड़ है।
आजकल वे अपने चिर लंबित सपने को पूरा कर रहे हैं। खेती कर रहे हैं। ब्रज के इलाके में कुछ खेत उन्होंने किराए पर लिये हैं। इन दिनों उनका उत्साह देखने लायक है। दिन भर मजदूरों के साथ खेतों में खुद भी जुटे रहते हैं। उनके जोश और उत्साह के आगे तो हम पानी भरते हैं! आज माँ ने उनके एक छोटे से खेत की तस्वीरें मुझे भेजी जिसमें सीताफलकरेलेकद्दूटमाटरझींगा आदि सब्जियां उगी हुई हैं। मैंने पहले कभी इन सब्जियों के पौधे नहीं देखे! आज इन्हें देखकर मन खुश हो गया। ये तो उनकी छोटी सी बागबानी का नमूना है। फिलहाल उन्होने कुछ और बड़े खेतों में कपास बोयी है और अच्छे परिणामों की उम्मीद में खूब मेहनत कर रहे हैं। 

Monday, 23 April 2018

ताकि किताबों की संस्कृति बची रहे

पाठ्यक्रम की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा कभी बहुत सरोकार नहीं रहा था। घर में भी ऐसा कोई माहौल नहीं था। पापा की थोड़ी-बहुत रूचि चूँकि धार्मिक साहित्य को पढ़ने में थी, तो किताबों के नाम पर घर में सिर्फ कुछ एक धार्मिक किताबें ही होती थीं। इसके बावजूद साहित्य मुझे बचपन से आकर्षित करता था। नए सत्र के शुरू होने से पहले ही मैं पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब पूरी पढ़ जाया करती थी, इसके अलावा स्कूल की छोटी सी लाइब्रेरी से कभी-कभार एक-आध किताब पढ़ने के लिए मिल जाती थी।
लेकिन वास्तव में साहित्य से मेरा मजबूत रिश्ता कॉलेज में जाकर ही बना। एक समृद्ध लाइब्रेरी तब मैंने पहली बार देखी। मैं जो भी किताब चाहूँ, यहाँ से इश्यू करवा सकती थी। ये मेरे लिए एक बड़ा ही रोमांचक ख़याल था और अगले तीन सालों में मैंने उस लाइब्रेरी से लेकर इतनी किताबें पढ़ी, जिस गति से मैंने फिर बाद में कभी किताबें नहीं पढ़ी। अच्छी किताब के रूप में जिस किताब का भी ज़िक्र अपने शिक्षकों, सीनियर्स वगैरह से सुनती उसी दिन वो किताब ढूंढकर उसे इश्यू करवाती और दो-तीन दिन में पढ़कर ख़त्म कर देती। उस समय लाइब्रेरी से मेरा नाता ऐसा बना कि कौन सी किताब किस रैक में, कहाँ मिलेगी ये मैं किसी को एक झटके से बता सकती थी। कुछ दोस्तों का तो मानना था कि किताबों की जगह की सटीक जानकारी के मामले मैं लाइब्रेरी के कर्मचारियों से भी दो कदम आगे थी। खुशकिस्मती से लाइब्रेरी में किताबों का ठिकाना पहचानने और बहुत से साथियों को किताबें ढूँढने में मदद करने का यह सिलसिला आज तक कायम है।
किताबों से जुड़े कई यादगार प्रसंग हैं, लेकिन बहरहाल उनमें से एक प्रसंग का ज़िक्र कर रही हूँ, जो मुझे अक्सर ध्यान हो आता है। एम.ए में नया-नया एडमिशन हुआ था। शुरूआती दिनों में बहुत कम ही लोगों से परिचय हुआ था। शुरुआती परिचित लोगों में से एक जैनेन्द्र नाम का लड़का भी था। क्लास का शायद दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा। उसके पास मैंने कुछ किताबें देखीं। उनमें से एक किताब मुझे अच्छी लगी। किताब का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा, शायद कोई उपन्यास ही रहा होगा। मैंने उससे पूछा कि तुम यदि इस समय इस किताब को नहीं पढ़ रहे हो, तो क्या मुझे दे सकते हो, मैं इसे पढ़कर कल तक लौटा दूंगी। मुझे ख़ुशी हुई कि उसने बिना हिचक वह किताब मुझे दे दी। लेकिन किताब देने के ठीक बाद एक ऐसी घटना घटी जो मुझे तब बहुत ही अजीब लगी थी। उसने मेरे सामने ही एक नोटबुक निकाली और उसमें किताब का शीर्षक, मेरा नाम और तारीख लिख ली। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पूछा कि तुम ये क्या लिख रहे हो ? उसने ज़वाब दिया कि तुम्हें किताब दी है, यह नोट कर रहा हूँ ताकि भूल न जाऊं।
उसकी ये बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। इतना बुरा किसी से कोई चीज़ लेकर मुझे पहले कभी नहीं लगा था। मेरे स्वाभिमान को जैसे ठेस पहुँच गयी हो। मैंने कहा तुम्हारी किताब लेकर मैं भाग जाउंगी क्या! रखो अपनी किताब मुझे नहीं चाहिए। उसने कहा - अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी बहुत सी किताबें इधर-उधर बहुतों के पास रहती हैं, इसलिए मुझे नोट करना पड़ता है ताकि कोई किताब लेकर वापस करना भूल जाये, तो मैं भी भूल न जाऊं और तगादा कर सकूँ। तुम ले जाओं, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है! मैंने किताब ले तो ली, लेकिन उसके इतना बोल लेने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाई थी कि कोई किसी की किताब वापिस करना क्यों भूल जायेगा या क्यों रख लेगा!
खैर अगले दिन पढ़कर मैंने उसे वह किताब लौटा दी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि सचमुच मैंने एक दिन में किताब पढ़ भी ली। इस बार ताव खाने की बारी मेरी थी। उसे शुक्रिया कहने की बजाय मैंने यह कहा कि अपनी वो नोटबुक निकालो और मेरा नाम उसमें से काटो। नहीं तो बाद में किसी दिन कहोगे कि तुमने मेरी किताब दबा रखी है। अपने सामने ही मैंने उसकी नोटबुक से अपना नाम कटवाया।
समय के साथ-साथ लेकिन यह अनुभव हुआ कि किसी को किताब देते हुए नोट कर लेने का जैनेन्द्र का जो तरीका था, वह बहुत ही ज़रूरी और व्यावहारिक तरीका था। बाद के दिनों में अपने अनुभवों से जाना और कई जगह पढ़ा भी कि अच्छे से अच्छे लोग भी किताबों के चोर होते हैं। देने वाले को याद न रहे तो किताबों को दबा जाना, उन्हें खो देना और अगर कभी देने वाले को याद आ जाए तो उसके आगे खींसे निपोर देना, किताबों के पन्ने फाड़ लेना, या किताबों पर अपनी कलाकारियाँ कर देना आम बात है। इतने खतरे उठाते हुए भी यदि कोई अपनी किताब आपको दे रहा हो तो वह वाकई बड़ी बात होती है।
हर किताब हर कोई नहीं खरीद सकता, लेकिन मित्रों के बीच आपसी सहयोग और भागीदारी से कई किताबें खरीदी जा सकती हैं और एक-दूसरे में बाँटकर, उन सभी किताबों को पढ़ा जा सकता है। इसके लिए लेकिन बहुत ज़रूरी है कि हम एक ज़िम्मेदार पाठक बनें और किताबों के लेन-देन की भावना की कद्र करने वाले हों। हम सब किताबों से बहुत कुछ हासिल करते हैं, इसलिए यह हमारा नैतिक दायित्व भी है कि किताबों के मामले में हम कभी भी बेईमान न बने। किताबों की संस्कृति फलती-फूलती रहे उस दिशा में हम अपना यह छोटा सा योगदान तो दे ही सकते हैं!

Tuesday, 10 April 2018

होम्योपैथी की ज़रूरत

दवाइयां खाना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता। फिर भी ज़रूरत पड़ने पर दवाइयां लेनी पड़ती हैं और तब मैं एकसाथ बीमारी और दवाई दोनों का दुष्प्रभाव झेलती हूं। ख़ासतौर पर किसी भी तरह के एंटीबायोटिक मुझे सूट नहीं करते और इनके साइड-इफेक्ट्स से मुझे अक्सर जूझना पड़ता है।
लेकिन दवाइयों का एक ऐसा प्रकार भी है, जिन्हें मैं तब भी खा सकती हूं जब मैं बीमार न रहूं। मैं हौम्योपैथिक दवाइयों की बात कर रही हूं। ये दवाइयां मूल रूप में तो लिक्विड फॉर्म में होती हैं लेकिन इन्हें अक्सर मीठी गोलियों में डालकर दिया जाता है और यही वह बात है जो हौम्योपैथिक दवाइयों को बच्चों की भी प्रिय बना देती हैं।
रंग-बिरंगी छोटी-छोटी बोतलों में मीठी-मीठी सफेद गोलियां देखकर ही मन खुश हो जाता है। इसके अलावा मेरे अनुभव का निचोड़ यह है कि हौम्योपैथिक दवाइयां यदि कुशल चिकित्सक के द्वारा दी जाएं तो यह बहुत असरदार होती हैं और जिन बीमारियों के लिए ऐलोपैथिक चिकित्सा सीधे-सीधे उपलब्ध नहीं है उन बीमारियों में हौम्योपैथिक दवाइयां न केवल असर करती हैं बल्कि उन्हें जड़ से हटा पाने में भी कामयाब होती हैं।
हौम्योपैथिक चिकित्सा निदान के लिए प्रर्याप्त धैर्य की मांग करती है और तेजी से भागते इस समय में धैर्य को बनाए रख पाना बहुत कठिन हो गया है, इसलिए हौम्योपैथिक चिकित्सा की लोकप्रियता में लगातार गिरावट हुई है और अब तो हौम्योपैथिक चिकित्सकों का भारी अभाव भी दिखने लगा है। इस दिशा में गंभीरतापूर्वक ध्यान दिए जाने और पहल किए जाने की ज़रूरत है। यह सस्ती और संभावनाओं से भरी चिकित्सा पद्धति है।
आज विश्व हौम्योपैथी दिवस है। मेरी यही कामना है कि हौम्योपैथी के क्षेत्र में नवीन अनुसंधान हों और इसके द्वारा होने वाले इलाज पर लोगों का यकीन बने।

Sunday, 8 April 2018

'सुकून' मेले में इस बार

   हैदराबाद विश्वविद्यालय में हर साल मार्च-अप्रैल के महीने में तीन दिन के लिए लगने वाले सुकून मेले का आज तीसरा दिन था। पहले दिन मैं कुछ व्यस्तताओं के कारण मेले में नहीं जा सकी। दूसरी शाम पहुँचते ही तेज आँधी और बारिश आ गयी जिस वजह से सारे स्टॉल और झूले वगैरह बंद कर देने पड़े और निराश होकर भीग-भाग कर सबको हॉस्टलस और घरों को लौटना पड़ा। आज मौसम अच्छा था इसलिए आज की शाम मेले में रौनक थी और सभी ने मेले का अपने-अपने तरीके से आनंद उठाया।
मैं मेले के अपने प्रिय इलाके जहाँ बलून पर निशाना लगाने और जुआ खेलने का काम होता है पहुंची। जमकर निशाना साधा और जुए में अधिकाँश रकम डूब गयी फिर भी प्लास्टिक बॉल वाले जुए में एक की-रिंग जीता।इसके बाद पचास रूपए लगाकर कुल 20 रिंग्स फेंके, लेकिन इस बात का मुझे बहुत दुःख है कि सिर्फ एक बार रिंग निशाने पर लगा, वह भी संयोग से और एक प्लास्टिक की स्प्रिंग चूड़ियाँ मेरे हिस्से आयीं।

इस मेले में यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी तरह-तरह के स्टॉल लगाते हैं। इस बार खाने-पीने के दो स्टॉल बहुत ख़ास थे। मोमोज़ मुझे बेहद पसंद हैं लेकिन हैदराबाद में यह बहुत कम ही मिलते हैं। दो-चार लड़कियों ने मिलकर मोमोज़ का स्टॉल लगाया था और उनके स्टॉल पर उचित दर पर बेहद लज़ीज़ मिक्स वेज पनीर मोमोज़ मिल रहे थे। इस स्टॉल के पास ही एक लिट्टी-चोखे का स्टॉल था जिसे  दो-तीन लड़के मिलकर चला रहे थे। जो लिट्टी वहाँ मिल रही थी वह सेकी हुई लिट्टी नहीं थी, बहुत हलके तेल में फ्राइड थी लेकिन स्वादिष्ट थी और साथ में जो चटनी और चोखा मिल रहा था वह भी लाजवाब था।

इस बीच सुकून के मेन स्टेज पर लगातार कार्यक्रम चल रहे थे। इन तीन दिनों में पर्याप्त सांस्कृतिक महत्त्व के कार्यक्रमों के अतिरिक्त धूम-धड़ाके वाले कार्यक्रम भी खूब चलते रहते हैं। कल की आँधी और बरसात से प्रतिभागी कलाकारों, विक्रेताओं और विद्यार्थियों का जो हर्जा हुआ उसकी भरपाई के लिए मेले की अवधि एक दिन और बढ़ा दी गयी है। यानि जिस मेले को आज ख़त्म हो जाना था वह कल ख़त्म होगा और लोगों को एक और दिन मेले को एन्जॉय करने का मौका मिलेगा।

Tuesday, 3 April 2018

लिखना मेरे लिए ज़िन्दा बने रहने की कोशिश है

मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) का एक बहुत ही प्रसिद्द कथन है कि हमारी ज़िन्दगी उस दिन ख़त्म होनी शुरू हो जाती है, जिस दिन से हम उन चीज़ों को लेकर चुप रहना शुरू कर देते हैं, जो हमारे लिए मायने रखती हैं। मुझे लगता है कि ज़िन्दगी के खत्म होने लगने की इस तरह की शुरुआत को लेकर हमें सतर्क रहना चाहिए, मेरे खयाल से मेरा लिखना इसी सिलसिले में किया जाने वाला प्रयास है।
मायने रखने वाली बातों पर हमारी ज़रूरी प्रतिक्रिया का सिर्फ दर्ज होना काफी नहीं है। ज़रूरी है कि ऐसी बातें निकलकर दूर तलक भी जाएं। ऐसी बातें हमखयालों तक ही नहीं, असहमत लोगों तक भी पहुंचे ताकि संवाद बना रहे, कुछ बेहतर परिणाम की गुंजाइश बची रहे। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी पहुंच आसान हुई है।
सीधे किसी सामाजिक-राजनीतिक मसले पर लिखने के अतिरिक्त जब मैं फिल्मों, अन्य कलाओं, साहित्य और संस्कृति पर भी लिखती हूं, तब भी इसके लिए मुझे जो बात सबसे अधिक लिखने के लिए प्रेरित करती है, वह इन क्षेत्रों में मौजूद जनपक्षधर धाराएं हैं। समाज की बेहतरी के बजाय सामाज का दोहन करने के लिए तैयार कला, साहित्य और सांस्कृतिक उत्पाद की चमक-दमक मुझे भारी कोफ्त होती है।
सवाल यह है कि हमारे लिखने का क्या कोई असर होता है? मैं सोचती हूं कि बहुत कम ही सही, तब भी असर तो होता है। जब कुछ लोग असहमति जताते हुए अपनी प्रतिक्रियायों में बेहद अतार्किक और असभ्य होने लगते हैं, तब लगता है कि जो अभिव्यक्त करना चाहा था वह सही तरह से अभिव्यक्त हुआ है। जब कुछ पाठकों को लगता है कि इस तरह से सोचना भी ज़रूरी है, तब भी सार्थकता का बोध होता है।
हमारा उद्देश्य तब भी सफल होता है जब हमारी बातें हमारी तरह से सोचने वाले लोगों को थोड़ी और हिम्मत देती हैं, और उन्हें लगता है कि वे अकेले नहीं हैं। जब इन बातों में से कुछ भी नहीं हो तब भी एक संतोष होता है कि हमने अपनी वह अभिव्यक्ति सार्वजनिक की जो सार्वजनिक करना हमारा दायित्व था। यह कुछ और नहीं तो हमें थोड़ा और मज़बूत तो बना ही देता है।रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियों में इस बात को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है- कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा/ न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का/ मेरे अंदर एक कायर टूटेगा।
ज़ुल्मतों के दौर में प्रतिबद्धता को बचाए रखना सबसे कठिन चुनौती होती है, लेकिन इसे हर हाल में बचाए रखना ज़रूरी है।
[ मूल रूप से वेब पोर्टल 'यूथ की आवाज़' के 10 वर्ष पूरे होने पर लिखी गयी टिप्पणी। यहाँ उसका संशोधित अश प्रस्तुत किया जा रहा है।]