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Monday, 28 September 2020

'इतनी शक्ति हमें देना दाता' के रचयिता को श्रद्धांजलि

 

"इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न"

पूरा बचपन स्कूलों में हम ये प्रार्थना गाते हुए ही बड़े हुए। और मेरे खयाल से हर किसी को यह प्रार्थना सुंदर लगती होगी। आज भी शायद कुछ स्कूलों में दिन की शुरुआत इसी प्रार्थना से होती है। गीतकार अभिलाष ने फिल्म 'अंकुश' के लिए जब यह गीतनुमा प्रार्थना लिखी होगी, तब उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी लिखी यह प्रार्थना देशभर के शैक्षणिक संस्थानों का हिस्सा बन जाएगी। जब कभी विद्यालयों में लंबी-लंबी कतारों में करबद्ध होकर आँखें मूँदे खड़े विशाल युवा जनसमूह को वे अपनी लिखी पंक्तियाँ दोहराते; सुनते-देखते होंगे तो निश्चय ही उनका ह्रदय गर्व से प्रफुल्लित हो उठता होगा!

एक लंबे अरसे से कैंसर से लड़ते हुए आज गीतकार अभिलाष का निधन हो गया। उन्हें उनकी प्रार्थना की पंक्तियों के साथ श्रद्धांजलि। वे हमेशा इस प्रार्थना के जरिए, याद किए जाते रहेंगे। नमनय़

"जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे"!

Monday, 19 August 2019

अलविदा खय्याम साहब!


आप हमारे देश के शीर्षस्थ संगीतकार ही नहीं, एक बेहद ऊँचे दर्जे के इंसान भी थे। आप उमराव जान’, ‘कभी कभीऔर बाज़ारजैसी फिल्मों के गीतों को दिए उम्दा संगीत के लिए ही नहीं अपनी अंदरूनी खूबसूरती के लिए भी हमेशा याद किये जायेंगे। आपकी चिंता में सिर्फ आप नहीं थे; आपकी संवेदना का दायरा बहुत बड़ा था। ईश्वर जगजीत कौर जी को वियोग सह पाने का धैर्य दें। आप दोनों ने साम्प्रदायिक सीमाओं को तोड़कर साथ में सफ़र शुरू किया, सुख-दुःख के कई दशक साथ बिताये, साथ में काम किया, एक-दूसरे का सहयोग किया। आप दोनों ने मिलकर वह पहाड़ जैसा दुःख भी झेल लिया; जब आपका इकलौता जवान बेटा असमय आप लोगों से छिन गया। जिस तरह बेटे की स्मृति को आप दोनों ने अपना संबल बनाकर खुद को समाज के लिए समर्पित कर दिया, मैं प्रार्थना करती हूँ कि आपकी स्मृति भी जगजीत जी के लिए संबल बने और वे खुद को कभी अकेला महसूस न करें। नम श्रद्धांजलि।

Thursday, 15 August 2019

नहीं रहीं विद्या सिन्हा

70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो ग़लत नहीं होगा।
जिसने भी रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे लिए’, पति पत्नी और वोजैसी फ़िल्में देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या सिन्हा किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मका हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों, टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

Thursday, 25 October 2018

होप और हम

कई फिल्मों के बारे में हम प्रमोशन के ज़रिये नहीं बल्कि उनके ट्रेलर रिलीज़ होने पर जानते हैं। इसके बाद वो फिल्म कब रिलीज़ होती है, किन सिनेमाघरों में लगती है, बहुत बार तो पता ही नहीं चलता! ऐसी कुछ फ़िल्में बाद में किसी दिन यूट्यूब पर दिख जाती हैं और इनमें से कई फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें देखने के बाद लगता है कि ऐसी फिल्मों को सिनेमाघरों में अच्छे-खासे दर्शक मिलने चाहिए थे।
पिछले दिनों एक ऐसी ही फिल्म आई थी ‘होप और हम’। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सोनाली कुलकर्णी, आमिर बशीर, नवीन कस्तूरिया और बाल कलाकार कबीर शेख जैसे लोकप्रिय कलाकारों ने काम किया है। इनके अलावा भी जो कलाकार हैं सबने अपने हिस्से का अभिनय बेहद संजीदगी के साथ किया है। लेकिन इस फिल्म की जो सबसे बड़ी खासियत है, वह है इसकी सकारात्मकता। सुदीप बंदोपाध्याय ने एक अच्छे कथानक को बहुत सादगी से फिल्माया है।
मुझे यह फिल्म बहुत विशिष्ट लगी हो ऐसा नहीं है, लेकिन यह मुझे खूबसूरत ज़रूर लगी। ऐसी फ़िल्में बहुत कम न सही तो बहुत ज़्यादा भी नहीं बनती। यह फिल्म निराशा और पलायन दोनों ही स्थितियों से दूरी बनाये रखने का सन्देश देती है। इस फिल्म में हर आयुवर्ग के लोगों के लिए कुछ न कुछ प्रेरणादायक है। फिल्म का टाइटल ट्रैक है- ‘होप और हम साथ रहें हर दम’। वाकई ज़िन्दगी में आशाओं का साथ बना रहना चाहिए, इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

Wednesday, 24 October 2018

'तुम्बाड' का रोमांच


जिन सिनेमा प्रेमियों ने तुम्बाडसिनेमाघरों में जाकर नहीं देखी है, हो सकता है उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहे। मेरे खयाल से टीवी या लैपटॉप स्क्रीन पर इस फिल्म के पूरे रोमांच को महसूस नहीं किया जा सकता। वैसे अभी भी कई सिनेमाघरों में तुम्बाडलगी हुई है, इच्छा हो तो इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। इस फिल्म को देख कर लौटने वाले कुछ लोगों की प्रतिक्रियाओं को सुनने के बाद मैं यह सलाह ज़रूर दूंगी कि इस फिल्म को जब देखने जाएँ तो यह सोचकर बिल्कुल भी न जाएँ कि यह एक हॉरर मूवी है, यह पूर्वाग्रह आपका मज़ा खराब कर सकता है।
इस फिल्म में सबकुछ बहुत वास्तविक दिखाने के लिए छ: सालों तक जबरदस्त टीमवर्क किया गया है। लोकेशन का चयन, सेट की पूरी परिकल्पना, मेकअप, डिजाइन वगैरह के लिए अथक मेहनत की गयी है। फिल्म में प्रभावी बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए डेनिश म्यूजिशियन जेस्पर किड जेकॉब्सन (Jesper Kyd Jakobson) से संपर्क किया गया, जिन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ लॉस एंजल्स (यूएसए) स्थित अपने स्टूडियो में इस फिल्म के लिए म्यूजिक तैयार किया। इस फिल्म में एक ही गीत है, और वो बेहद प्रभावी है। इस गीत के कुछ-कुछ अंश पूरी फिल्म में कई बार बजते हैं। राजशेखर के लिखे हुए इस गीत का म्यूजिक अजय-अतुल की जोड़ी ने कंपोज़ किया है और इसी जोड़ी में से एक अतुल गोगावाले ने इसे बेहद खूबसूरती से गाया है।
बहरहाल इस फिल्म से जुड़ी एक ऐसी जानकारी यहाँ साझा कर रही हूँ, जो मेरे लिए तो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। अभी एक-दो दिन पहले यह जानकारी मुझे फ़िल्मी फीवरनामक एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित हुए चाइल्ड एक्टर मोहम्मद समद के एक इंटरव्यू से मिली। इस फिल्म में विनायक (सोहम शाह) के नन्हें बेटे का किरदार निभा रहे मोहम्मद समद ने ही विनायक की बूढ़ी दादी का भी किरदार निभाया है। विनायक की दादी का किरदार एक बूढ़ी अभिशप्त महिला का है, जिसका पूरा शरीर शक्ल-ओ-सूरत बेहद जुगुप्सा पैदा करने वाला और बेहद डरावना है। एक 9-10 साल के बच्चे का एक ही फिल्म में दोहरा किरदार निभाना, जिसमें से एक सामान्य बच्चे का और दूसरा बेहद असामान्य बुढ़िया का वाकई बहुत चकित करने वाला है। बाकी इन किरदारों की क्या खासियत है और कितना अलग-अलग रेंज है, यह फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है।
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Thursday, 30 August 2018

शैलेन्द्र और गुलज़ार

शैलेन्द्र गीतकार तो थे लेकिन फिल्मों के लिए नहीं लिखना चाहते थे। राजकपूर का आग्रह और उनकी आर्थिक परेशानियाँ उन्हें फिल्मों में खींच लायीं। गुलज़ार कविताएँ लिखते थे, गीत लिखते थे लेकिन फिल्मों के लिए लिखने के बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। वे खुद कहते हैं कि एक तरह से ज़बरदस्ती शैलेन्द्र उन्हें इस काम में ले आये। जिस तरह राजकपूर ने शैलेन्द्र को अवसर देकर हिंदी सिनेमा को एक बेहद उम्दा गीतकार उपलब्ध करवाया, उसी तरह खुद शैलेन्द्र ने गुलज़ार के रूप में हिंदी सिनेमा से एक ऐसे प्रतिभावान रचनाकार को जोड़ा जो सिनेमा के कई कालखंडों के लोकप्रिय गीतकार हैं और हर पीढ़ी उन्हें अपने अनुकूल पाती है।
शैलेन्द्र की उपलब्धियों में से इसे भी एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना या अवसर उपलब्ध करवाने में मदद करना भी एक ज़रूरी रचनात्मक कर्तव्य होता है, शैलेन्द्र ने इसी का निर्वाह किया था। आज शैलेन्द्र का जन्मदिन है उन्हें नमन।

Friday, 9 March 2018

खलने वाले खालीपन में भी मौजूद रहेंगे प्यारेलाल वडाली

पंजाब के मशहूर सूफी गायकों की जोड़ी वडाली ब्रदर्स के छोटे भाई प्यारेलाल वडाली का आज सुबह हुआ आकस्मिक देहांत अत्यंत दुखद है। वडाली ब्रदर्स की गायकी को पसंद करने वाले लोगों के लिए यह खबर बहुत आहत करने वाली है, क्योंकि वडाली ब्रदर्स में से एक की भी अनुपस्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती।
मुझे वडाली ब्रदर्स के बड़े भाई पूरनचंद वडाली का ध्यान आ रहा है कि उनपर क्या बीत रही होगी, जब उनका छोटा भाई और वह जोड़ीदार इस दुनिया में नहीं रहा जिनके बिना उन्होंने शायद ही कभी कोई परफॉर्मेंस दी हो! छोटे भाई के बिना कहीं जाना ही नहीं कोई सम्मान ग्रहण करना भी उन्हें पसंद नहीं रहा! लेकिन जब औपचारिकताओं के कारण उन्हें अकेले ही पद्मश्री ग्रहण करना पड़ा तो उन्होंने बड़े ही बेमन से इसे ग्रहण किया और यही माना कि यह उनका नहीं उनकी जोड़ी का सम्मान‌ है।
वडाली ब्रदर्स की पृष्ठभूमि को अगर आप जानने की कोशिश करें तो आपको पता चलेगा कि ये लोग पंजाब के एक निर्धन ग्रामीण परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग हैं। जिनकी शिक्षा-दीक्षा किसी स्कूल में नहीं हो सकी बल्कि संगीत और जीवन ही उनके स्कूल रहे। एक लम्बें समय तक अखाड़े में कुश्ती लड़कर बड़े भाई और रासलीला में कृष्ण बनकर छोटे भाई घर-परिवार के लिए अर्थोपार्जन की व्यवस्था करते रहे थे।
वडाली ब्रदर्स गायकी के‌ आज जिस मुकाम पर पहुंचें, इसके पीछे भी इन लोगों का भारी संघर्ष रहा है। कहते हैं कि अपने छोटे भाई को साईकिल के पीछे बैठाकर और हारमोनियम लिए लम्बी-लम्बी दूरियां तय करके वे पंजाब के गांव-गांव और कस्बे-कस्बे तक गाने जाया करते थे।
पंजाबी पृष्ठभूमि से होने के कारण वडाली ब्रदर्स की गायकी से मैं बचपन से परिचित रही हूं और मुझे इनकी गायकी इतनी पसंद रही है कि जब-तब मौका मिलने पर मैं इन्हें सुनती रहती हूं। कल शाम भी मैं 'तनु वेड्स मनु' के लिए गाया इनका गाना 'ऐ रंगरेज़ मेरे' यूट्यूब पर सुन रही थी। 
2016 में जब वे कपिल शर्मा के टीवी शो पर आए थे तो, गायकी के अलावा उनके सेंस ऑफ ह्यूमर और उनकी निश्छलता के कई प्रसंगों से परिचित होने का मौका भी मिला। प्यारेलाल वडाली की उम्र सिर्फ 66 साल थी। वे अपने भाई से लगभग एक दशक छोटे थे और इसलिए भी तमाम सार्वजनिक अवसरों पर उन्हें अपने बड़े भाई के प्रति अदब का निर्वाह करते हुए देखा जा सकता था। वे अपने बड़े भाई की अपेक्षा कम मुखर थे, लेकिन जब गायकी का अवसर आता था, तो दोनों ही भाई मुकम्मल गायकी के बराबर के भागीदार नज़र आते थे।
प्यारेलाल वडाली को हार्दिक श्रद्धांजलि। किसी के जाने के बाद जिस रिक्तता की बात की जाती है, वह प्यारेलाल वडाली के जाने के बाद साफ-साफ दिखेगी भी। हमें यह कामना करनी चाहिए कि उनके बड़े भाई पूरनचंद वडाली इस दुख से उबर पाएं और इस रिक्तता के कारण अपना गायन नहीं छोड़ें। वे जब तक गाते रहेंगे, तब तक एक खलने वाली रिक्तता में भी लोगों को यह महसूस होता रहेगा कि प्यारेलाल वडाली भी कहीं न कहीं अपने बड़े भाई के साथ मौजूद हैं।

Sunday, 18 February 2018

खय्याम साहब के जन्मदिन पर


एक लम्बे दौर तक हिन्दी सिनेमा के लिए जादुई संगीत रचने वाले, लेकिन किसी भी तरह की ठसक से हमेशा दूर रहे, बेहद विनम्र और बहुत ही उम्दा इंसान खय्याम साहब का आज जन्मदिन है।
18 फरवरी 1927 को इनका जन्म अविभाजित पंजाब के नवाशहर जिले में हुआ था। 'फिर सुबह होगी', 'शगुन', 'कभी-कभी', 'उमराव जान', 'बाज़ार', 'थोड़ी सी बेवफाई' जैसी फिल्मों के गीतों में संगीत से जो अद्भुत प्रभाव पैदा किया गया है, वह खय्याम साहब के समर्पण, साधना और ईमानदार कलात्मक नज़रिये का ही परिणाम है।
अपने जीवन के 90वें वर्ष में प्रवेश करते हुए 18 फरवरी 2016 को अपनी पत्नी जगजीत कौर (जो इनकी संगीत सहायिका और बेहद कम गीत गाकर भी पर्याप्त प्रतिष्ठा हासिल करने वाली गायिका रही हैं) के साथ मिलकर खय्याम ने अपनी ज़िन्दगी भर की मेहनत से कमाई गई पूरी चल-अचल संपत्ति (जो दस करोड़ के लगभग है) को एक ट्रस्ट में तब्दील कर दिया है। यह ट्रस्ट इस उद्देश्य से बनाया गया है कि उनके जीवनकाल में और बाद में भी आर्थिक संकट से जूझ रहे और संघर्षरत कलाकारों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाये।
खय्याम साहब को जन्मदिन की बहुत शुभकामनाएं। जगजीत जी और आप, दोनों ही स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और सक्रिय रहें यही दुआ है।

Friday, 8 December 2017

सीक्वल के नाम पर प्रपंच है 'फुकरे रिटर्न्स'

गंभीर फ़िल्मों के अलावा हल्की-फुल्की मनोरंजक फ़िल्मों का भी अपना महत्व होता है । 2013 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘फुकरे’ एक ऐसी ही फ़िल्म थी । फ़िल्मकार ने इस फ़िल्म में दिल्ली की संस्कृति और ख़ास तौर पर वहाँ पलने-बढ़ने वाली निम्न मध्यवर्गीय युवा पीढ़ी की विशेषताओं और खामियों का बखूबी इस्तेमाल किया था । बिना वल्गेरिटी परोसे इस फिल्म ने थोड़े यथार्थ और अधिक कल्पना के मिश्रण से जो कमाल किया था, उसे दर्शकों ने ख़ूब पसंद भी किया था ।
पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी सिनेमा के सीक्वल्स बनाने की परंपरा खूब विकसित हुई है । सफल मनोरंजक फ़िल्मों के साथ ऐसे प्रयोग अधिक हो रहे हैं । अक्सर ऐसी फ़िल्में दर्शकों पर सफलता पूर्वक आजमा लिए गये फ़ॉर्मूले को अधिक भुना कर पैसा बनाने का साधन भर होती हैं । दुखद यह है कि इस शुक्रवार (8 दिसम्बर) प्रदर्शित हुई फ़िल्म फुकरे रिटर्न्सभी इसका अपवाद नहीं है ।  
  ‘फुकरे’ देख चुके जिन दर्शकों को चार वर्ष बाद रिलीज हो रही ‘फुकरे रिटर्न्स’ का ट्रेलर देखकर फिर से अच्छे मनोरंजन की अपेक्षा रही होगी, उन्हें निराश होना पड़ सकता है । ‘फुकरे’ को देखते हुए, दर्शकों ने महसूस किया होगा कि इसमें एक भी दृश्य ऐसा नहीं था, जिसे आप जबरन ठूँसा गया दृश्य कह सकते थे । ‘फुकरे’ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता और तारतम्यता थी, वह ‘फुकरे रिटर्न्स’ में लगभग ग़ायब है । फिल्म कई बार बहुत उबाऊ लगती है । इसमें कुछ पात्र और कुछ दृश्य भी जबरन ठूँसे हुए लगते हैं । इसके दृश्यों में बाघों और सांप के जो प्रसंग जोड़े गये हैं, वह भी अनावश्यक हैं, और इनका फिल्मांकन भी संवेदनशीलता के साथ नहीं हुआ है । ‘फुकरे’ में सभी फुकरों को लगभग बराबर की तवज्जो दी गयी थी, लेकिन इनमें से ‘चूचा’ नामक पात्र को मिली अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता को शायद भुनाने के लिए ही, इस बार पात्रों के महत्व को लेकर संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया है ।
मेरे खयाल से सीक्वल में फुकरेकी सृजनात्मकता को विस्तार देने के लिए, जितनी मेहनत और एकाग्रता की ज़रूरत थी, निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा ने उसमें भारी कोताही बरती है । बहुत संभव है कि भारी मुनाफे का सौदा समझ कर इस फिल्म पर जमकर पैसा लगाने वालों का भी निर्देशक पर दबाव रहा होगा । मुझे लगता है कि मृगदीप क्रियेटिव हैं, और संवेदनशील भी लेकिन इस फ़िल्म के बाद यदि वे अपने पतन को महसूस नहीं कर पाए तो बेहतर कर पाने की उनकी संभावना और भी कमज़ोर होती चली जाएगी।
          ‘फुकरे’ में एक बेहद सुन्दर गीत भी था ‘अम्बरसरिया मुंडया वे’। वो गीत आज भी लोगों की ज़ुबान पर है, लेकिन ‘फुकरे रिटर्न्स’ का कोई गाना भी प्रभावशाली नहीं है । ऐसा लगता है कि उम्दा कलाकारों के लिए भी अच्छे अभिनय का अवसर मुहैया करा पाने में यह फ़िल्म असफल रही है। कुल मिलाकर यह कहना सही होगा कि यह फ़िल्म एक साथ लगभग सभी मोर्चों पर कमज़ोर रह गयी है। संभव है कि ‘फुरकरे रिटर्न्स बॉक्स ऑफिस पर अच्छी खासी कमाई कर ले, लेकिन इससे यह सच बदल नहीं जाता कि यह फ़िल्म दर्शकों के साथ एक प्रपंच से अधिक कुछ नहीं है ।
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[9 दिसम्बर 2017 को सम्पादित शीर्षक के साथ 'यूथ की आवाज़' (YKA) पर भी प्रकाशित]

#Fukrey #FukreyReturns #MrigdeepSinghLamba 

Tuesday, 10 October 2017

उमराव जान रेखा

मैं करीब सात-आठ साल की रही होउंगी जब पहली बार टीवी पर ‘उमराव जान’ देखी थी। तब समझ में तो क्या ही आया होगा, लेकिन तब की देखी उस फिल्म की धुंधली स्मृतियाँ आज भी दिमाग में कहीं दर्ज हैं। करुणा की जिस पराकाष्ठा को इस फिल्म में उभारा गया है, उसने उस छोटी सी उम्र में भी मुझे प्रभावित बेहद किया होगा, और शायद इसीलिए आजतक मैंने जितनी भी बार उमराव जान देखी है, हर बार ऐसा लगता है, जैसे कभी अधूरी छूट गयी फिल्म को पूरा देखने बैठी हूँ!
एक तमिल भाषी लड़की जिसने हिंदी भी बेहद प्रयासों के बाद बोलनी सीखी, उसने इस फिल्म में उर्दू बोली है, और न सिर्फ बोली है, बल्कि उसके लखनवी लहज़े और भंगिमाओं को हुबहू उतार पाने में पूरी तरह सफल रही हैं। हिंदी सिनेमा के पास गर्व करने के लिए जो चुनिन्दा फ़िल्में हैं, उनमें ‘उमराव जान’ का नाम भी लिया जाता है। इस फिल्म के निर्देशक मुज्ज़फर अली ने हालांकि कई और फ़िल्में बनाई, लेकिन ‘उमराव जान’ जैसी फिल्म वे दुबारा कभी नहीं बना सके। ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपनी सारी निर्देशन कला इसी फिल्म में झोंक दी हो।
यह फिल्म मुझे इसलिए भी बेहद पसंद है, क्योंकि ये साहित्यिक कृति पर बनी है। उमराव जान’ किसी लेखक की कल्पना का पात्र* है, ये लगता ही नहीं है । हमेशा यही महसूस होता है कि किसी ज़माने में एक उमराव जान रही होगी, उसी की कहानी लेखक ने लिखी है।  हिंदी सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में ही ऐसी हैं जो साहित्यिक कृति को बखूबी सिनेमा में उतार सकी हैं। ‘उमराव जान’ इसमें भी एक कदम आगे हैं, क्योंकि ये फिल्म मिर्ज़ा हदी रुसवा के ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास से भी कहीं अधिक प्रभावी है।
इस फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोग उसी शिद्दत से सुनते हैं। ख़य्याम ने इस फिल्म के लिए संगीत दिया था। वे रेखा से इस कदर प्रभावित हैं, कि कहते हैं ‘अगर किसी को उमराव जान को देखना हो तो, वो रेखा को देख ले, क्यूंकि यही उमराव जान हैं’। शहरयार के लिखे गीत और ख़य्याम के संगीत ने इस फिल्म को सम्पूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस फिल्म में अमीर खुसरो के लिखे ‘काहे को ब्याहे बिदेस’ गीत का भी बहुत सार्थक उपयोग किया गया है।
रेखा बेहद ईमानदारी के साथ अपने साक्षात्कारों में ये कहती हैं कि, मैं अपनी निजी ज़िन्दगी में जिस समय जैसे हालातों से गुज़र रही होती हूँ, उसका रिफ्लेक्शन उस समय मेरे निभाए जा रहे किरदारों पर भी पड़ता है। वे बताती हैं कि जिस समय वो ‘उमराव जान’ कर रही थीं, उस समय शायद वे अपने निजी जीवन में कुछ ऐसे ही मिलते-जुलते अनुभवों से गुजर रही थीं, जिनसे उमराव गुजरती हैं। ‘उमराव जान’ में जान फूँक देने वाली रेखा ने कई अन्य फिल्मों में भी किरदारों की विविधता को उम्दा अदायगी से जीवंत बना कर हिन्दी सिनेमा को समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।


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[*कई लोग इस बात से मतांतर रखते हैं कि उमराव जान एक काल्पनिक पात्र है। इसकी वास्तविकता को लेकर उनके अपने तर्क भी होते हैं। इस लिहाज से उमराव जान की काल्पनिकता या वास्तविकता बहस का विषय हो सकती है, लेकिन अवध के इतिहास, संस्कृति और समाज के जानकार विद्वानों ने प्रायः अपनी किताबों और लेखों में उमराव जान को एक काल्पनिक पात्र ही माना है।]

#Rekha  #UmraoJaan #10October Rekha's Birthday #Khayyam #Shahrayar #AmirKhusro #MuzzafarAli #UmraoJaanAda #MirzaHadiRusva

Monday, 2 October 2017

कहीं दूर से आती सुकून भरी आवाज़

सचिन देव बर्मन के संगीत ने हिन्दी सिनेमा को जितना समृद्ध किया, समृद्धि देने की उतनी ही ताकत उनकी आवाज़ में भी थी। लेकिन अफसोस कि उनकी आवाज़ का हिन्दी सिनेमा में बहुत कम उपयोग हो पाया! मेरे खयाल से इसका बड़ा कारण हिन्दी सिनेमा का वो ट्रेंड रहा है, जहां पार्श्व गायन का अर्थ ही होता है फिल्म के नायक या नायिका के होंठों से उसका बुदबुदाया जाना और एस डी की आवाज़ ऐसी उन्मुक्त आवाज़ थी, जिसकी संगति हिन्दी सिनेमा के नायकों की बनी बनाई छवि के साथ बिठा पाना बहुत कठिन हो जाता होगा। लेकिन जब भी ऐसा संयोग बना कि एस.डी ने हिन्दी सिनेमा के लिए गाया, तो क्या अद्भुत प्रभाव पैदा हुआ।
उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है, जैसे कहीं बहुत दूर... से कोई सुकून भरी आवाज़ हमारी ओर चली आ रही हो। जैसे गाने वाला सिर्फ अपने भावों की अभिव्यक्ति ही न चाहता हो बल्कि सुनने वालों के दुख-दर्द भी बांट लेना चाहता हो! एस.डी के गाए गीत संख्या में भले ही बहुत कम हों लेकिन जितने भी हैं, हम सब के लिए अनमोल विरासत की तरह हैं। जिन्हें आनेवाली पीढ़ियां भी ढूंढ-ढूंढ कर सुनना चाहेंगी!

#SachinDevBurman #SunMereBndhuRe #HappyBirthdaySDBurman #BollywoodSongs

Monday, 18 September 2017

मैं कित्ती बार बोला न जी!

समानांतर सिनेमा से मेरा जितना परिचय है, उसके अनुसार उस दौर में जिन दो अभिनेत्रियों ने सबसे अधिक और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई वे हैं, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल।
हिन्दी सिनेमा में इन्होंने एक साथ और अलग-अलग सैंकड़ों भूमिकाएं निभाई हैं। ये दोनों ही अभिनेत्रियाँ इतनी प्रतिभाशाली हैं कि इन दोनों में से आप किसी को भी कमतर आंक कर नहीं देख सकते। यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि स्मिता पाटिल आकस्मिक मृत्यु के कारण बहुत जल्दी इस दुनिया को विदा कह गईं।
सौभाग्य यह है कि शबाना आजमी आज भी स्वस्थ और सक्रिय हैं और मौका मिलते ही बेहतरीन भूमिकाएं निभाते हुए अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा लेती हैं। यूं तो मुझे शबाना आज़मी की लगभग सभी फिल्में बेहद पसंद हैं खास तौर से समानांतर सिनेमा के दौर की फिल्में। लेकिन उनमें भी मेरी पसंदीदा फिल्म है 'मंडी'

‘मंडी’ मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि इसमें स्मिता और शबाना दोनों हैं। हैदराबाद की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म हैदराबादी (दक्खिनी) हिन्दी के कारण भी विशेष आकर्षित करती है। इस फिल्म में एक गीत है जिसे खुद शबाना ने गुनगुनाया है। वाद्य यंत्रों का प्रयोग किये बिना भी यह इतना खूबसूरत बन पड़ा है कि लोग इसे ढूँढ़-ढूंढ़ कर सुनते हैं। यह गीत एक ही बार सुनने पर आपकी ज़ुबान पर चढ़ जाने की ताकत रखता है, और स्मृतियों में शबाना की आवाज़ और गीत के बोल (जो कि दक्खिनी हिन्दी में हैं) जैसे टंक जाते हैं।

गीत का ऑडियो इस लिंक पर सुन सकते हैं: https://gaana.com/song/kitti-bar-bola-na
#ShabanaAzmi #SmitaPatil #MaintujhseKittiBaarBolaNaJi #Mandi

Friday, 8 September 2017

उनका वह गुनगुनाना

फिल्म इजाज़त के लिए गुलज़ार ने एक गीत लिखा और उसे फिल्म के संगीतकार आर.डी बर्मन के पास लेकर गये। गीत के बोल, उसका फॉर्म और नये तरह के रूपक आर.डी बर्मन के पल्ले नहीं पड़ रहे थे। वे बुरी तरह चिढ़ गये और बोले कि कल को तुम अखबार से कोई खबर उठा लाओगे और कहोगे कि इस पर धुन बना दो तो क्या मैं बनाने बैठ जाउंगा? गुलज़ार उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन जिद्दी पंचम दा को कौन समझा सकता था भला!
इन दोनों की बातचीत को कोई और भी सुन रहा था। बातचीत के दौरान ही लिखा हुआ गीत उनके हाथों में आया और उन्होंने यूँ ही उसे गुनगुनाने की कोशिश की। यह इतना प्रभावी था कि आर.डी बर्मन ने उनसे एक बार फिर इसे गुनगुनाने को कहा। एक संगीतकार ने इस गुनगुनाहट में इस गीत का मर्म पा लिया और आज वह गीत गुलज़ार के लिखे सबसे बेहतरीन गीतों में शुमार है।
'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' को गुनगुनाने वाले उस शख्स का नाम जानते हैं आप? वे थीं, मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोंसले। बाद में उन्होंने ही इस गीत को गाया भी। आशा की नैसर्गिक संगीत प्रतिभा का परिचय देने में अकेले यह प्रसंग भी समर्थ है।
आशा ने अनेक भाषाओं में हज़ारों गीत गाये हैं। माना जाता है कि उनकी गायकी का रेंज बहुत बड़ा है। उनका जबरदस्त एनर्जी लेवल भी उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके चाहने वालों की बड़ी तादाद है। हिन्दी सिनेमा को उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है और यह हमेशा ही उल्लेखनीय रहेगा। 


#AshaBhonsle #Birthday #RDBurman #PanchamDa #Gulzar #Ijazat #MerakuchSamaan

Wednesday, 30 August 2017

ऐसे शुरू हुई थी हिन्दी फिल्मों में टाइटल गीत की परम्परा

शैलेन्द्र, राजकपूर के चहेते गीतकार थे । मेरे खयाल से इसका एक कारण राजकपूर और शैलेन्द्र के बीच का वैचारिक साम्य भी था । तब राजकपूर भी सिनेमा की दुनिया में नये ही थे । जवान खून था और वामपंथी संगठनों विशेषकर इप्टा और प्रलेस की काव्य गोष्ठियों में अक्सर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ जाया करते थे । वहीं उन्होंने पहली बार शैलेन्द्र को सुना था । वहाँ शैलेन्द्र पूरे जोश के साथ मेरी बगिया में आग लगाये गयो रे गोरा परदेसीगा रहे थे । राजकपूर इसे सुनकर, इतने प्रभावित हो गये थे कि उन्होने अपनी फ़िल्म आगके लिए गीत लिखने का प्रस्ताव शैलेन्द्र के समक्ष रख दिया ।
तब शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गीत लिखने से साफ़ इनकार कर दिया था । राजकपूर ने यह कहते हुए उनसे विदा ली कि वे जब भी फिल्मों में लिखने के लिए मन बना पाएँ, राजकपूर उनका स्वागत करने के लिए तैयार मिलेंगे । कुछ दिनों बाद आर्थिक दिक्कतों के कारण शैलेन्द्र को फिल्मों में गीत लिखने का मन बनाना पड़ा और राजकपूर ने अपने किये वादे को निभाते हुए उनका स्वागत किया । यहीं से सिलसिला शुरू हुआ एक कवि के सिनेमा के गीतकार बनने का ।

सबसे पहला गीत जो शैलेन्द्र ने सिनेमा के लिए लिखा, वह था फ़िल्म बरसात का – ‘हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम बरसात में ।पहले ही गीत से शैलेन्द्र ने सिनेमा जगत में अपनी पहचान बना ली । यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसे हिंदी फ़िल्मों का सबसे पहला टाइटल गीतहोने का श्रेय प्राप्त है, इससे पूर्व फ़िल्मों में टाइटल गीत की परंपरा नहीं थी । इसी गीत के साथ यह परंपरा शुरू हुई, जो आज तक बदस्तूर जारी है ।


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Friday, 19 May 2017

एक फिल्म जिसमें विषय का उचित निर्वाह हुआ है

हिन्दी मीडियमफिल्म अपनी कसावट में कहीं-कहीं थोड़ी चूकी हुई जरूर लगती है, लेकिन ये चूक बेहद मामूली हैं । इस फिल्म के निर्देशक की इस बात के लिए तारीफ़ ज़रूर होगी कि उन्होंने इसे मनोरंजक बनाये रखने के लिए, लगभग सभी तत्वों का इस्तेमाल करते हुए भी, उस पर हिंदी फिल्मों के चालू फॉर्मूलों को हावी नहीं होने दिया है ।
इरफ़ान ख़ान, सबा क़मर और दीपक डोबरियाल सहित सभी कलाकारों का अभिनय बेहद उम्दा है । लेकिन सिर्फ इसीलिए नहीं, इस फिल्म को जीनत लखानी और निर्देशक साकेत चौधरी की लिखी एक अच्छी कहानी और पटकथा पर बनी फिल्म देखने के खयाल से भी जाना चाहिए । शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी समस्या पर यह फिल्म बनायी गयी है। इस तरफ हिन्दी फिल्म निर्माताओं का ध्यान नहीं के बराबर गया है । देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश की जो दुर्दशा है, उसके एक बड़े जिम्मेवार तबक़े को पहचानने में यह फिल्म बहुत मददगार है ।



#HindiMedium #IrfanKhan #SabaQamar #EducationSystem #HindiCinema

Tuesday, 4 April 2017

देख लो आज हमको जी भर के..

 ‘तुम अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दोऔर काहे को ब्याहे बिदेसजैसे कालजयी गीतों की गायिका जगजीत कौर (संगीतकार ख़य्याम की पत्नी) ने बहुत ही कम गीत गाये हैं । लेकिन जितने भी गाये, उनके लिए वे हमेशा याद की जाती हैं और आगे भी की जाती रहेंगी ।
फिल्म बाज़ार के लिए उनके गाये गीत देख लो आज हमको जी भर केके बारे में बात करते हुए ख़य्याम कहते हैं जब यह फिल्म सिनेमाघरों में लगती थी और यह गीत बजता था, जो कि बैकग्राउंड गीत है, फिल्म देखने आई महिलायें ढुसकियां (दहाड़े) मार-मार कर रोने लगती थीं । न केवल महिलायें पुरुष भी ज़ारो-ज़ार आँसू बहाते थे, ये इस गाने का असर था । इन्होंने इसे गाया ही इस अंदाज़ से है कि बड़े-बड़े गायकों को बेहद पसंद है ये गाना, कि क्या गाया है !

मिर्ज़ा शौक का लिखा यह कलाम, ख़य्याम के संगीत और जगजीत कौर की आवाज़ में आज भी उतना ही प्रभावशाली है।


#JagjitKaur #Khayyam #MirzaShauk #DekhLoAajHumkoJiBharKe #FilmBaazar

Wednesday, 8 February 2017

जन्मदिन पर : जगजीत सिंह से जुड़े कुछ प्रसंग

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जगजीत सिंह और ‘बिरहा दा सुल्तान’*
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पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी से शिमला में हुई एक मुलाकात के बाद से जगजीत सिंह के मन में यह इच्छा बनी रही कि काश उन्हें कभी बटालवी की कविताओं को गाने का मौका मिलता!
अपने कुछ शुरूआती ऑडियो रिकार्ड्स की अपार सफलता के बाद उन्होंने एचएमवी के समक्ष इसका प्रस्ताव रखा । 1978 में बटालवी की कुछ कविताओं का रिकॉर्ड जगजीत सिंह की आवाज़ में हमारे सामने आया । इसका नाम था बिरहा दा सुल्तान । मेरे खयाल से यह पंजाब के दो महान शिखरों की जुगलबंदी है । इसे संयोग ही कहेंगे कि बटालवी को बिरहा दा सुल्तानअमृता प्रीतम ने कहा था, और जगजीत के इस एल्बम का कवर अमृता से बेइंतिहा मोहब्बत करने वाले इमरोज़ ने तैयार किया था ।
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जगजीत की गायकी निदा के लिए अल्लाह की आवाज़ थी*
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मशहूर गीतकार निदा फ़ाज़ली जगजीत सिंह की गायकी को बहुत पसंद करते थे । वे उनके बड़े मुरीद थे । जगजीत सिंह के गुज़र जाने के बाद उन्होंने एक बार अपनी भावना इस तरह व्यक्त की थी– “लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान में एक गला ऐसा है, जिसमें मेरे भगवान का निवास होता है, उसका नाम मेहंदी हसन है । मैं उन्हीं के अल्फाज़ बदल कर यूँ कहूँगा कि पैरी रोड के पुष्पमिलान के दूसरी मंज़िल पर एक गला था, जिसमें मेरे अल्लाह की आवाज़ गूंजती थी, मेरे अल्लाह की अजान गूंजती थी और उसका नाम जगजीत सिंह था
निदा फाज़ली के लिखे कई गीतों को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी थी । फिल्म सरफ़रोशका बेहद लोकप्रिय गीत होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’ इन दोनों महान हस्तियों के जादुई असर वाले तालमेल का उत्कृष्ट उदाहरण है । इसे इत्तेफाक़ ही कहेंगे, कि आज ही के दिन (08.02.1941) जगजीत सिंह का जन्म हुआ था, और पिछले साल आज ही के दिन (08.02.2016) निदा फ़ाज़ली ने इस संसार को विदा कहा था । 

[*दोनों ही प्रसंग का संदर्भ : राज्य सभा टीवी के एक कार्यक्रम ‘विरासत’ का  जगजीत सिंह पर केन्द्रित पाँच भागों में प्रस्तुत विडियो श्रृंखला ]

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Wednesday, 20 July 2016

'हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का प्रश्न' पर केन्द्रित परिचर्चा

अपने एम.फिल. शोध कार्य के दौरान दो साक्षात्कारों के अलावा मैंने एक परिचर्चा भी तैयार की थी । कुछ बाध्यताओं के कारण यह परिचर्चा लघु शोध प्रबंध का हिस्सा नहीं बन सकी थी । यह परिचर्चा ‘परिवर्तन’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर' 2016 अंक में प्रकाशित हुई है, और अब इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से भी सार्वजनिक है । परिचर्चा में शामिल तीनों ही व्यक्ति हिन्दी फिल्म समीक्षा और आलोचना के जाने माने हस्ताक्षर हैं । इन सब ने समय निकाल कर इस परिचर्चा में हिस्सा लिया इसके लिए मैं आभार प्रकट करती हूँ ।
हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का सवाल हाशिये का सवाल रहा है । हिन्दी सिनेमा के गीत रचनात्मक, बहुआयामी, लोकप्रिय और प्रभावी होकर भी गंभीर चर्चाओं के दायरे में नहीं रहे हैं । हिन्दी की साहित्यिक आलोचना से तो ये चिर निर्वासित रहे हैं । क्या हिन्दी सिनेमा के गीतकारों का रचनात्मक अवदान कमतर है ? उनकी अभिव्यक्ति का संघर्ष कम महत्वपूर्ण है ? इस परिचर्चा में इस तरह के कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं को सम्बोधित करने की कोशिश की गयी है ।

सहभागी 

अरविन्द कुमार : जन्म -17 जनवरी 1930 ।  प्रथम संपादक के बतौर 1963 से 1978 तक अपने समय की चर्चित सिने पत्रिका माधुरी से सम्बद्ध रहे । उल्लेखनीय फिल्म पत्रकारिता के अलावा अनुवाद, सृजन व कोश निर्माण के लिए चर्चित । हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान, शलाका सम्मान (2010-2011) से सम्मानित ।                                                                             सम्पर्क : सी-18 चंद्रनगर, ग़ाजिबाद 201011.
                                             ई-मेल - arvind@arvindlexicon.com

अजय ब्रह्मात्मज : जन्म - 30 अक्टूबर 1959 । लगभग ढाई दशकों से फिल्म आलोचना और फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय और पर्याप्त प्रतिष्ठित । फिल्म समीक्षा के लिए ख्यात ब्लॉग चवन्नी चैप के संचालक ।
सम्पर्क : ई-मेल - abrahmatmaj@mbi.jagran.com
                        brahmatmaj@gmail.com
शशांक दुबे : जन्म -13 अक्टूबर 1962 । चर्चित युवा फिल्म आलोचक । ‘पहल’ और ‘ज्ञानोदय’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन । व्यंग्य और अनुवाद विधा में भी दखल ।
सम्पर्क : 37/801, एनआरआई कॉम्प्लेक्स, सी-वुड्स एस्टेट, नेरुल, नवी मुंबई 400 706
 ई-मेल:  s.dubey@idbi.co.in



परिचर्चा
 हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का प्रश्न


1. हिंदी सिनेमा के गीतों का मूल्यांकन आप किस तरह करते हैं?

अरविंद कुमार : कभी हिंदी कविता छंदबद्ध होती थी, फिर छंदहीन भी होने लगी । गीत और कविता में भी अंतर होने लगा । धीरे धीरे गीत लिखना निम्न श्रेणी की गतिविधि माना जाने लगा । कवि सम्मेलनों में केवल हँसोड़ों को जगह रह गई, तो आम आदमी के लिए काव्यानुभूति का स्रोत फ़िल्म गीत ही बचे ।
फ़िल्म गीत कविता से बढ़ कर बहुत कुछ और भी होता है । उसमें कविता के साथ-साथ संगीत होता है, जिसे बड़ी मेहनत से और पूरे धन व जन बल से तैयार किया जाता है । आम तौर पर वे किसी घटना विशेष पर पात्रों के भावों को अभिव्यक्त करते हैं । जिस तरह चंपू काव्य होता था, उसी परंपरा में फ़िल्म गीत होता है । कई बार वह किसी सीक्वेंस में एकाधिक पात्रों के बीच संवाद होता । उसके बोल दृश्य के बदलते क्रियाकलाप (ऐक्शन) के हिसाब से लिखे जाते हैं । इस लिए छोटे से कलेवर में वह नन्हा सा एकांकी नाटक भी होता है । जैसे:  अच्छा तो हम चलते हैं / फिर कब मिलोगे / जब तुम कहोगे ।

अजय ब्रह्मात्मज : फिल्‍मों में ध्‍वनि के आगमन के साथ गीतों की आवश्‍यकता महसूस की गई । इसका व्‍यापक प्रभाव और उपयोग दिखा । हिंदी फिल्‍मों के सफर में गीतों की गुणवत्‍ता समय के साथ बदलती रही है । एक दौर ऐसा भी आया जब गीत को संगीत ने ढँक दिया । अभी फिर से पांचवे-छठे दशक की तरह गीतों में प्रयोग हो रहे हैं । फिर भी यह स्‍वीकार करना होगा कि गीतों की साहित्यिकता कम हुई है ।

शशांक दुबे : हिन्दी सिनेमा की आत्मा गीतों में ही बसी है ।  जब दर्शक सिनेमा हॉल से फिल्म देखकर बाहर निकलता है, तब न तो उसे कहानी याद रहती है न संवाद । याद रह जाता है तो फिल्म का गीत-संगीत और यह गीत-संगीत महज उस तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि रेडियो, सीडी और अन्य माध्यमों के जरिये यह अगली पीढ़ी को भी अंतरित हो जाता है ।

2. सिनेमा से स्वतंत्र इन गीतों के महत्व पर आपकी क्या राय है?

अरविंद कुमार : फ़िल्म गीत का मर्म है, सीधी सच्ची बात । जितनी सीधी बात होगी, उतनी ही दूर तक वह पहुँचेगी । अपनी आसान बोली में वे देश काल की सीमाएँ लाँघने में सक्षम होते हैं, तभी हमारा फ़िल्म संगीत संसार के हर कोने तक, वहां भी जहाँ हिंदी जानने वाले नहीं हैं, पसंद किया जाता है ।

अजय ब्रह्मात्मज : सिनेमा भारतीय समाज का आधुनिकतम धर्म है । दर्शकों के अपने प्रिय गीत उन प्रिय भजनों की तरह हैं, जिन्‍हें वे अपने आराध्‍य के लिए गाते हैं । फिल्‍मी गीतों ने लोकोक्ति और मुहावरों का भी रूप लिया है ।

शशांक दुबे : गीतों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि सिनेमा से बाहर निकलकर भी ये हमारी पिकनिकों, उत्सवों, शादी-ब्याहों और पर्व-त्यौहारों में बारंबार सुने जाते हैं । इस प्रकार ये गीत हमारे अवचेतन का अनिवार्य हिस्सा बन जाते हैं ।

3. सिनेमा के गीतों ने जनता की अभिरूचि को विकसित परिवर्धित या परिवर्तित करने में कैसी भूमिका निभाई है?

अरविंद कुमार : सौभाग्यवश हिंदी फ़िल्मों को ढेर सारे समर्थ कवियों का सहयोग मिला । बहुत पहले अपने को महाकवि कहलाने वाले मधोक, कवि प्रदीप, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी, प्रेम धवन, शैलेंद्र, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, आनंद बख़्शी, गुलज़ार, जावेद अख़्तर आदिबहुत लंबी सूची है ।
ऐसे कवियों द्वारा लिखित, कुशल संगीतकारों द्वारा स्वरबद्ध, प्रभावशाली आवाज़ों के धनी गायकों द्वारा उच्चरित और दसों रसों से सराबोर हिंदी फ़िल्म गीत दर्शकों को तृप्त करने में सफल होते रहे हैं । कुछ गीतों को छोड़ दें, जिन में भौंडापन होता है (यह कुत्सितता तथाकथित साहित्यिक कविताओं में भी पाई जाती है ), फ़िल्म गीतों ने जनरुचि को सँवारा ही है ।
एक ग़लतफ़हमी यह है कि सुरुचि केवल पढ़े लिखों या पंडित ज्ञानियों में ही होती है । हमारी अधिसंख्य आबादी, चाहे वह दूरदराज़ के ग्रामीण हों, शहरी मज़दूर हों, या मध्यम वर्गीय सामान्य परिवार हों, सब में सौंदर्य और भावुकता की एक आंतरिक भूख होती है । हो सकता है वे गहन साहित्यिक क्लिष्ट शब्दावली न जानते हों । भावुक अनुभूतियों के लिए शब्दचातुर्य की आवश्यकता होती भी नहीं है ।

अजय ब्रह्मात्मज : यह व्यक्तियों के प्रभावग्रहण पर निर्भर है । हर व्‍यक्ति के दो-चार प्रिय गीत होते हैं, जिन्‍हें वह अकेले होने पर गुनगुनाता है । गीतों से बौद्धिक विकास से बौद्धिक विलास तक होता रहा है ।

शशांक दुबे : सिनेमाई गीतों ने हमारी भाषा को गहरे से प्रभावित किया है,  "मेरे यार शब्बा खैर" और "सायोनारा" से लगाकर "जय हो " और "मस्ती की पाठशाला" जैसे अनगिनत जुमले फिल्मी गीतों की ही देन  हैं ।

4. हिंदी सिनेमा सौ वर्षों का सफ़र पूरा कर चुका है. सिनेमा और सिनेमा के गीतों की विकासयात्रा को आप किस तरह से देखते हैं?

अरविंद कुमार : सिनेमा का सफ़र तो सौ साल का हुआ है, पर सवाक फ़िल्मों का, टाकीज़ का, सफ़र 1931 की आलम आरा से अब तक अस्सी ही पूरे कर पाया है । इंग्लिश की ही तरह पहली सवाक हिंदी फ़िल्म में गाने रखे गए थे ।

अजय ब्रह्मात्मज : गीत हमेशा फिल्‍मों की जरूरत पूरी करते रहे हैं । जैसी फिल्‍में,वैसे गीत । गीतों की यात्रा को फिल्‍मों की यात्रा से अलग नहीं किया जा सकता ।

शशांक दुबे : इन सौ सालों में संगीत ने मेलोडी युग भी देखा है और डिस्को युग भी; वाद्यों की संगत भी की है और इलेक्ट्रोनिक साज़ों का भी साथ निभाया है । हसरत साहब के शब्दों में कहें तो सिनेमा और संगीत के बीच का रिश्ता "सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा" वाला है ।  आज भी यह सिनेमा की सबसे बड़ी टेरिटरी है ।

5. हिंदी सिनेमा के पुराने गीतों और आज के सिनेमा के गीतों में बुनियादी अंतर क्या है? आप इसके क्या कारण मानते हैं?

अरविंद कुमार : पुराने गीतों में सादगी होती थी । मुझे बहुत पुराने ज़माने के कुछ गीत याद आ रहे है ।
‘तेरे पूजन को भगवान, बना मंदिर आलीशान । तुम को मुबारक हों ऊँचे महल ये (कुछ ऐसी ही पंक्ति थी) हम को हैं प्यारी हमारी गलियाँ, हमारी गलियाँ’ । या सहगल के अमर गीत ‘इक बंगला बने न्यारा’, ‘दुख के दिन अब बीतत नाहीं’ । पंकज मलिक के ‘पनघट पर कन्हैया आता है, आ के धूम मचाता है’ जैसे गीतों के मुक़ाबले आज के गीत पेचीदा होते जा रहे हैं । यह सब देश और समाज में आए बदलावों के अनुरूप हो रहा है । यह प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती । रोकनी भी नहीं चाहिए ।

अजय ब्रह्मात्मज : बुनियादी फर्क गीतकारों से आया है । पहले के गीतकार साहित्यिक और सांस्‍कृतिक रूप से अधिक संपन्‍न होते थे ।

शशांक दुबे : पुराने गीतों में शब्दों और मूल वाद्यों पर ज़ोर होता था, आज इलेक्ट्रोनिक वाद्यों के हावी हो जाने का यह परिणाम है कि सरसरी तौर पर सुनते समय गीतों के शब्द पल्ले ही नहीं पड़ते । भाषा के प्रति उपेक्षा बोध और हर काम के पीछे जल्दबाज़ी की प्रवृत्ति ने गीतों को काफी नुकसान पहुंचाया  है । बावजूद इसके , दस प्रतिशत ही सही, अच्छे गाने अब भी बन रहे हैं ।

6. क्या एक गीतकार के सृजनकर्म का संघर्ष सिनेमा के निर्माण से जुड़े अन्य प्रकार के सृजनकर्मों के संघर्ष से कमतर होता है? आप का किसी गीतकार या किन्हीँ गीतकारोँ के सृजनकर्म से व्यक्तिगत परिचय रहा हो तो कृपया बताएँ ।

अरविंद कुमार : सौभाग्यवश मुझे ढेर सारे फ़िल्म गीतकर्मियों से निकटतम संपर्क और परिचय का अवसर मिला । इंदीवर, गुलज़ार, जावेद अख़्तर । इंदीवर और गुलज़ार के प्रस्फुटन का तो मैं साक्षी रहा हूँ । लेकिन सब से निकट थे शैलेंद्र । वे जल्दी ही संसार से विदा हो गए, इस लिए उनसे पारिवारिक घनिष्ठता कुल तीन साल चल पाई ।
लोग समझते हैं कि फ़िल्मी गीत लिखना बेहद आसान होता होगा, ऐसा है नहीं । फ़िल्म गीत रचना प्रक्रिया समझाए बग़ैर गीत लेखन की दुरूहता को समझा नहीं जा सकता । मैं एक उदाहरण देता हूँ । एक शाम अचानक मैं शैलेंद्र जी के घर पहुँच गया । उन दिनों गाइड के गीत बन रहे थे । उन्हें एक गीत की सिटिंग में जाना था । देव आनंद से अनुमति लेकर मुझे भी वे साथ ले गए । वहाँ निर्माता-अभिनेता देव आनंद थे, निर्देशक विजय आनंद थे, संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के सहायक की हैसियत से राहुल देव बर्मन थे । निर्माता-अभिनेता देव आनंद और निर्देशक विजय आनंद प्रस्तावित गीत के दृश्य का विवरण पहले ही दे चुके थे  - एक क़दम के बाद दूसरा क्या होगा नायक कहाँ होगा, नायिका कहाँ, उनके मनोभाव क्या होंगे, वे क्या करेंगे, सीनरी क्या होगी आदि । शैलेंद्र बोल पहले ही लिख कर दे चुके थे । अब उस का स्वरबद्ध कच्चा ख़ाका तैयार था । उस रात हारमोनियम पर बजा कर अपनी आवाज़ में गा कर सुनाते, हम सब सुनते । मेरी भूमिका मूक दर्शक मात्र ही थी, पर मेरे चेहरे की प्रतिक्रियाओं  पर भी उन की आँखें रहतीं । जो भी हो, यदि निर्माता-निर्देशक-गीतकार-संगीतकार चौकड़ी को वह पसंद आ जाता तो रिकार्ड कर लिया जाता, वरना फिर नए शब्द । यह क्रम चलता रहा जब तक बोल और धुन का लगभग पक्का ख़ाका तैयार नहीं हो गया ।

अजय ब्रह्मात्मज : गीतकारों का योगदान महत्‍वपूर्ण होता है । गीतकार की प्रतिभा का सदुपयोग फिल्‍मकार की योग्यता और पसंद से तय होता है । इन दिनों गीतकार फिल्‍मों के मनोभाव को शब्‍दों में व्‍यक्‍त करने से अधिक उसके मूल्‍यभाव बढ़ाने पर ध्‍यान देते हैं । उन पर कैच लाइन लिखने का दबाव रहता है,जो कॉलर ट्यून बन सके ।

शशांक दुबे : हमारे यहाँ नायक, नायिका, निर्देशक, संगीतकार और गायक के मुक़ाबले गीतकार को यश, धन और ग्लेमर कम ही मिल पाता है । संभवतः इसका कारण यह है कि सिनेमा के आर्थिक पक्ष से ऐसे लोग जुड़े हैं, जिन्हें भाषा और संवेदना से कोई मतलब नहीं ।

7. हिंदी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व को नकारा जाता रहा है, क्या इस विषय पर आप अपनी राय देना चाहेंगे?

अरविंद कुमार : साहित्यिक होने का मतलब दुरूह होना कतई नहीं है । मैंने आगे कुछ गीतों के उदाहरण दिये हैं । उन गीतों के बोल पढ़ने पर फ़िल्मी गीतों की साहित्यिकता अपने आप समझ में आ जाती है ।

अजय ब्रह्मात्मज : नकारने की बात तो तब की जाये कि जब उनपर कभी विचार किया गया हो, जब कभी उनकी चर्चा ही नहीं की गयी तो इनकार और स्वीकार की बात ही अलग हो जाती है । हिंदी साहित्य में सिनेमा को लेकर एक उदासीनता रही है और कहीं न कहीं साहित्य वाले जो शुद्धता प्रेमी लोग हैं, उन्हें लगता है कि साहित्य जो रचा जा रहा है वही श्रेष्ठ होता है बाकी किसी और चीज़ में साहित्य नहीं होता । लेकिन अब समय आ गया है कि अब इनपर विचार किया जाए और इन गीतों के साहित्यिक महत्व पर बात की जाए , चाहे साहित्य में एक अलग खंड बनाकर ही इनपर बात क्यों न हो । गीतों को साहित्‍य में जगह मिलनी चाहिए । कुछ गीत तो अपने समय के मनुष्‍य के संघर्ष और सुख की सशक्त अभिव्‍यक्ति हैं ।

शशांक दुबे : यदि साहित्य का मतलब मात्र लेखकों द्वारा लिखी और उन्हीं की बिरादरी के द्वारा पढ़ी और सराही जानेवाली कहानियों, कविताओं और लेखों से है, तो फिल्मी गीत साहित्य नहीं हैं । लेकिन यदि साहित्य का मतलब ऐसी रचनात्मक विधा से है, जो मन-आँगन को झकझोर कर रख दे, तो फिल्मी गीत निश्चित ही साहित्य हैं ।

8. सिनेमा के कुछ गीतों पर आप यहाँ चर्चा करना चाहेंगे?

अरविंद कुमार : हिन्दी सिनेमा के गीतों का अथाह सागर है । मेरे प्रिय गीत बहुत सारे हैं । बानगी के लिए आवारा के शैलेंद्र रचित तीन गीतों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा । पहला गीत है -
पतिवरता सीता माई को / तू ने दिया बनवास / क्यों न फटा धरती का कलेजा / क्यों न फटा आकाश / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी / जनक दुलारी राम की प्यारी / फिरे मारी मारी जनक दुलारी / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी / गगन महल का राजा देखो / कैसा खेल दिखाए / सीप का मोती, गंदे जल में / सुंदर कँवल खिलाए / अजब तेरी लीला है गिरधारी / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी ।
सशक्त मर्मस्पर्शी फ़िल्मांकन और गीत के भाव दर्शकों की संवेदनाओं को सीधा छूते हैं । दिलों पर गहरी चोट करते और पीड़िता के प्रति उनकी सहानुभूति जगाते हैं । जो कुछ गीत में सीता के लिए कहा जा रहा है,वह सीधे राम पर चोट कर रहा है । उसे अन्याई क़रार दे रहा है । सच कहें तो यही गीत आवारा फ़िल्म का मर्म था ।
आवारा का दूसरा गीत- आवारा हूँ / गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूँ / घरबार नहीं, संसार नहीं, मुझ से किसी को प्यार नहीं/ उस पार किसी से मिलने का इकरार नहीं / सुनसान नगर, अनजान डगर का प्यारा हूँ / आवारा हूँ ।
आवारा का मेरा तीसरा प्रिय गीत है तेरे बिना - आग - ये चाँदनी, तू आजा / तेरे बिना - बेसुरी बाँसरी, ये मेरी ज़िंदगी - दर्द की रागिनी / तू आजा, तू आजा ।
अंत में श्री चार सौ बीस के एक गीत का उल्लेख करना चाहूँगा, यह गीत उभरते भारत का प्रतीक बन गया था- मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी / सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी ।

अजय ब्रह्मात्मज : अनेक गीत हैं,जो मेरी मानसिक दशाओं को समय-समय पर अभिव्‍यक्‍त करते रहे हैं । मुगले-आज़मके गीत, पुरानी देवदासके गीत मुझे बेहद पसंद हैं । एक समय में फिल्मों की कव्वालियां बहुत पसंद थीं, जिनकी परंपरा ही आज खो गयी है । हाल की फिल्मों में थ्री इडियट्सका बहती हवा सा था वोया हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीका बावरा मन देखने चला इक सपनाआदि गीत अच्छे लगते हैं ।

शशांक दुबे : जब तक हमें "चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देस हुआ बेगाना", "राही मनवा दुख की चिंता क्यूँ सताती है, दुख तो अपना साथी है", "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार", "संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे", "तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धरा की धूल हूँ", "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना", "गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसम-ए-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता ", "खिलते हैं गुल यहाँ, खिलके बिखरने को", "कल तो सब थे कारवां के साथ-साथ, आज कोई राह दिखलाता नहीं, कोई सागर दिल को बहलाता नहीं", "तेरी ज़ुल्फों से जुदाई तो नहीं मांगी थी, क़ैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी"  जैसे गीत सुनने को मिलते रहेंगे, हमारा मन-आँगन महकता रहेगा ।

प्रस्तुति : प्रियंका

[*अप्रैल-मई 2014 में सभी सहभागियों से ईमेल द्वारा प्राप्त प्रश्नोत्त्तर पर आधारित ]

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