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Sunday, 5 April 2020

'शिकारा' देखने के बाद

कश्मीर का दर्द दशकों पुराना है। एक खुशहाल वादी में जो कई दशकों तक पर्यटन और हिन्दी फिल्मों की शूटिंग का पसंदीदा लोकेशन रहा- उस पर न जाने किस की नज़र लग गयी। धीरे धीरे वहाँ की फिज़ा में घृणा और असंतोष का जहर फैलता चला गया। इसके साथ ही पुलिस और फौज का हस्तक्षेप भी बढ़ता चला गया। हमारे पड़ोस के एक पाकदेश ने भी धरती की जन्नत को जहन्नुम की ओर धकेलने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे कश्मीर कभी नहीं सुलझने वाली समस्या की तरह स्थापित हो गया। कश्मीर दर्दगाह हो गया। दहशतगर्दी, मुठभेड़, पुलिसिया और फौजी अभियानों, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं आदि के बीच आम कश्मीरी पिसता चला गया। खैर 'दर्दगाह' ही सही इसकी अपनी अस्मिता रही है, यह गुमनाम नहीं रहा है। लेकिन इसके साथ गुमनामी की कथा भी जुड़ी हुई है।
इस दर्दगाह के बारे में सोचते हुए कई बार हम उन दर्दगाहोंके बारे में नहीं सोच पाते जो यहाँ से दरबदर हैं। वास्तव में कश्मीर समस्या में कश्मीरी पंडितों का दर्द हाशिये पर ही रहा है। एक मिथक की तरह इसके कई-कई संस्करण और कई-कई व्याख्याएँ मिलती हैं। इस समस्या की ठीक तस्वीर हमारे सामने कभी उभर ही नहीं पाई। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म शिकाराइस स्थिति में एक सार्थक हस्तक्षेप करती है।
1990 के दशक में कश्मीर में क्या हुआ था कि कश्मीरी पंडितों को अपना खूबसूरत आशियाना छोड़ कर प्रतिकूल जलवायु वाले शहरों की ओर पलायन करना पड़ा था? वहाँ सगे-सम्बंधियों जैसे और सहजीवियों की तरह रहने वाले हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन की रेखा कैसे खिंच गयी? कैसे पड़ोसी ही स्वार्थी होकर हैवानियत पर उतर आए? निर्वासित लोगों पर क्या-क्या बीती? कश्मीर की कश्मीरियत पर सिर्फ कश्मीरी मुसलमानों का हक़ है; यह कब से और क्योंकर प्रस्तावित किया जाने लगा? ऐसे कई सवालों के उत्तर इस एक फिल्म में हैं।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नहीं बनायी गयी है। प्रतिशोध की भावना इस फिल्म में कहीं नहीं है। यह फिल्म कश्मीरी पंडितों की समस्या का जिम्मेदार किसी धर्म को नहीं बल्कि भटके हुए लोगों को ठहराती है। यह फिल्म वास्तव में घृणा के खिलाफ है। इस फिल्म का मुख्यपात्र अमेरिका के राष्ट्रपति को बार-बार पत्र लिखकर मिलने की इच्छा जताता है ; मिलकर वह उनसे बस इतना पूछ लेना चाहता है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में वे हथियार क्यों भेजे जो वादियों तक पहुँचकर उसके सीने को छलनी करते गए!
फिल्म इस विश्वास के साथ खत्म होती है कि एक दिन अपने ही घर में भटके हुए लोग ठौर ठिकाने पा जाएँगे और कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पंडित भी अपने घरों को लौट पाएँगे। एक खूबसूरत प्रेमकथा के सहारे जैसे घृणा को सात परत नीचे पाताल में दफन कर दिया गया हो। अभिनय, कहानी, फिल्मांकन सब बेहतरीन है। ऐसी फिल्में उजाले की ओर ले जाती हैं।

Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Sunday, 17 March 2019

मोहर पर्रिकर का असमय निधन


 मनोहर पर्रिकर लम्बे समय से बीमार थे। उनकी बीमारी जितनी गंभीर थी, उस हिसाब से उन्हें लगातार गहन चिकित्सा और पूरे आराम की ज़रूरत थी, लेकिन हो यह रहा था कि नाक में नली लगाकर भी वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे। मनोहर पर्रिकर चूँकि सादगी भरा जीवन जीते थे, ईमानदार थे, कर्तव्यनिष्ठ थे इसलिए भारी अस्वस्थता में भी उन्हें काम करने की फ़िक्र थी और वे डॉक्टरी सलाह को दरकिनार कर लगातार सक्रियता बनाये हुए थे, यह सोचना सरासर बेमानी है। मेरे ख़याल से उनपर लगतार सक्रिय दिखने का भारी दबाव था। गोवा विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला था लेकिन सत्ता बीजेपी की हो, इसे मैनेज करने के लिए पार्टी ने उन्हें रक्षामंत्री के पद से मुक्त कर, मुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए गोवा भेज दिया। सख्त बीमारी की हालत में भी काम करना अमानवीय है लेकिन गोवा में अपनी साख बचाने के लिए पार्टी उनका भरपूर दोहन करती रही। राफेल डील वाले मुद्दे का तनाव भी उन्हें अंत अंत तक झेलना पड़ा। कुल मिलाकर असमय एक ऐसे नेता का देहान्त हो गया जिसके बारे में अमूमन लोगों की राय अच्छी थी। राजनीति ने तो उन्हें चैन लेने नहीं दिया, प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति मिले। श्रद्धांजलि!

Tuesday, 20 November 2018

कई कसौटियों पर खरी उतरती है 'मोहल्ला अस्सी'


'पीहू' की कमाई की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' का पिछड़ना इस बात का संकेत नहीं है कि 'मोहल्ला अस्सी' पसंद नहीं की जा रही। दरअसल इसका उल्टा है, सारा खेल प्रमोशंस का है। 'पीहू' के प्रमोशंस और प्रमोशनल स्टंट्स की तुलना में 'मोहल्ला अस्सी' के प्रमोशंस आपको दिखेंगे ही नहीं होंगे! आखिर कब तक प्रमोशंस फिल्म को चलाएंगे! कम से कम फिल्म रिलीज़ के शुरुआती तीन दिनों तक तो हम प्रमोशंस के धोखे से लूटे ही जा सकते हैं!
'मोहल्ला अस्सी' के फिल्मांकन का सूक्ष्म से सूक्ष्म अन्वेषण भी आपको निराश नहीं करेगा। धर्मनाथ पांडे की ग़रीबी आपको उनके साफ-सुथरे कुर्ते में नहीं बल्कि उसके टूटे हुए बटनों में दिखेगी! इसी तरह उनकी पत्नी सावित्री को उनकी दोहराई जाने वाली मामूली किस्म की साड़ियों में देखेंगे। पप्पू की दुकान पर कुल्हड़ में मिलने वाली चाय दौर बदलने पर कांच के गिलास में मिलने लगती है! यही नहीं फिल्म के बैकग्राउंड में बजने वाले श्लोक, अध्यापकीय व्याख्या के लिए लिए गए श्लोक, रामचरितमानस की चौपाइयां और कई बार बहुत साधारण से लगने वाले संवाद भी गूढ़ और व्यापक अर्थों को व्यंजित करते हैं, अगर इन्हें समझा जा सके। बहरहाल कहने को ऐसी बहुत सी बातें हैं लेकिन इन्हें किसी और से सुनने की बजाय खुद देखकर ज़्यादा अच्छे से महसूस किया जा सकता है। इस फिल्म के कैमरामैन विजय अरोड़ा के काम की तारीफ इस रूप में भी हो रही है कि उन्होंने बनारस या अस्सी को बहुत ही जीवंत रूप से उतारा है।
कुछ लोगों को इस फिल्म का कई-कई पहलुओं को छूना इसकी कमज़ोरी लग रही है, लेकिन वास्तव में यह इस फिल्म की खासियत है कि वो बहुत सारे पहलुओं को सफलतापूर्वक समेट पाती है और एक के बाद एक आने वाले दृश्य कहीं से असंगत नहीं लगते। हां ये ज़रूर है कि इन सभी पहलुओं को समझने के लिए आपके पास देश, समाज, इतिहास, राजनीति, धर्म आदि की बुनियादी जानकारी का होना ज़रूरी है।
साहित्य और सिनेमा की विद्यार्थी होने के नाते मेरी दिलचस्पी जिस बात में सबसे अधिक रही मैं अब उस पर आती हूं। मूल उपन्यास के लेखक काशीनाथ सिंह ने फिल्म देखने के बाद यह प्रतिक्रिया दी है कि फिल्मकार ने मूल कथानक के साथ बिना कोई तोड़-मरोड़ किए एक उम्दा फिल्म बनाई है जो उनके उपन्यास से भी अधिक जीवंत है।

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Wednesday, 26 September 2018

हर तरह की कट्टरता खतरनाक है!

मुंबई के एक गणपति पूजा पंडाल में AIMIM पार्टी के विधायक वारिस पठान ने एक कार्यक्रम में सम्मिलित होकर लोगों को पूजा की शुभकामनाएं दीं और अपने वक्तव्य का समापन गणपति बप्पा मोरेया कहकर किया। एक मुसलमान विधायक को हिन्दुओं के धार्मिक आयोजन में आमंत्रित करना और उस विधायक का उत्सव में सहर्ष शामिल होकर उनके धर्म के प्रति सम्मान प्रकट करनाधार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता का अच्छा उदाहरण कहा जा सकता थालेकिन इसके बाद जो कुछ घटा वह निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
कथित तौर पर वारिस पठान‌ को सोशल मीडिया और अन्यत्र इस बात के लिए ट्रोल किया गया कि वे न केवल मूर्तिपूजा के आयोजन में सम्मिलित हुए बल्किउन्होंने एक हिन्दू देवता के सम्मान में नारा भी लगाया! इसके बाद वारिस पठान पर इतना दबाव बना कि उन्होंने एक वीडियो जारी कर अपने इस आचरण पर शर्मिंदगी जताई और कहा कि 'अल्लाह ताला से उन्होंने माफी मांगी है और वे उन्हें माफ कर देंगे। गलती इंसानों से ही होतीलेकिन आईंदा वे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे।'
कल्पना करिए कि वारिस पठान को उनके मुसलमान होने के कारण गणेश पूजा के पंडाल में जाने या संबोधित करने से रोक दिया जातातो हम इसे बेहद शर्मनाक और असहिष्णुता भरा कृत्य बताकर इसकी तीखी आलोचना करते।
मेरे खयाल से वारिस पठान का गणेश उत्सव में शामिल होने के अपने आचरण को गुनाह कहना और उसके लिए अफ़सोस जतानाउससे कम तीखी आलोचना का विषय नहीं है। उन्होंने वीडियो जारी करके किसी धर्म विशेष के सम्मान को बढ़ाया या घटाया नहीं हैबल्कि धार्मिक सौहार्द के प्रति जघन्यता दिखाई है। ऐसा कहा जा रहा है कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें माफी मांगने के लिए बाध्य किया। पार्टी मुखिया असदुद्दीन ओवैसी को शर्म आनी चाहिए कि एक ओर तो वे संघ और भाजपा की साम्प्रदायिकता की तीखी आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ अपनी पार्टी के विधायक को बेहद घटिया स्तर के असहिष्णु साम्प्रदायिक आचरण के लिए प्रेरित करते हैं। सिर्फ संघी कट्टरता ही नहींहर तरह की कट्टरता ख़तरनाक हैऔर इसका तीखा विरोध होना चाहिए।

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Monday, 20 August 2018

यह तंगदिली क्यों?

एक राजनेता के बतौर नवजोत सिंह सिद्धू मुझे कहीं से प्रभावित करने वाले नहीं लगते लेकिन इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित किये जाने पर सिद्धू का पाकिस्तान जाने का फैसला मेरे ख़याल से एक अच्छा फैसला था। वहां के सेना प्रमुख से उनका गले मिलना किसी भी दृष्टि से नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। समारोह के दौरान उन्हें किसकी बगल में जगह दी गयी या उन्होंने अपनी बगल में बैठे किस व्यक्ति से बात की, इसे आलोचना का विषय बनाना बेवकूफी है। जब से सिद्धू लौटकर आये हैं इन बातों को लेकर उनका भारी विरोध हो रहा है, उन्हें देशद्रोही सिर्फ कहा ही नहीं जा रहा बल्कि उनपर देशद्रोह का मुकद्दमा भी कायम किया गया है, यही नहीं उनका सिर काटकर लाने वाले के लिए इनाम भी रखे जा रहे हैं!
यदि भारत और पाकिस्तान दो दुश्मन देश हैं और यही सबसे बड़ी सच्चाई है, तो शपथग्रहण समारोह में सिद्धू को आमंत्रित करने के फ़ैसले और सेना प्रमुख द्वारा उन्हें गले लगाने का पाकिस्तान में भी तीखा विरोध होना चाहिए था, लेकिन मेरी जानकारी में वहाँ ऐसा नहीं हो रहा है। यदि विरोध हो भी रहा होगा, तो विरोध करने वाले गिने-चुने लोग ही होंगे! विकट से विकट परिस्थिति में भी दोस्ती, शान्ति और सौहार्द की पहल करना हमेशा स्वागत योग्य ही होता है। कायदे से यदि वहाँ सिद्धू मिलनसार दिखने की बजाय अकड़ दिखाते तो यह निंदनीय होता। हमें सोचना चाहिए कि क्या तंगदिली के कीर्तिमान स्थापित करने में हमारी दिलचस्पी बहुत बढ़ गयी है?

Wednesday, 8 August 2018

लफंगे उपद्रवियों की कांवड़ यात्रा!

दिल्ली कावड़ियों को सर आँखों पर बिठाती रही है। कांवड़ यात्रा शुरू होने से महीनों पहले उनके आराम के लिए जगह-जगह पंडाल बनने शुरू हो जाते हैं। सावन के महीने में दिल्ली की लगभग हर गली हर नुक्कड़ पर कांवड़ यात्रियों के लिए विश्राम शिविर, भंडारे वगैरह के आयोजन होते रहते हैं।
इतना मान-सम्मान इन कावंड यात्रियों को इन दिनों मिलता है, जिनके इनमें से अधिकांश पूरे जीवन हक़दार नहीं हो सकते! इसलिए ऐसे अवसरों का लाभ लुच्चे-लफंगे, वेल्ले लोग खूब उठाते हैं। टोलियाँ बना-बना कर ये भी कांवड़ियों का चोला ओढ़कर निकल पड़ते हैं या कांवड़ियों की टोलियों में शामिल हो जाते हैं। इस तरह होता यह है कि कुछ सज्जन श्रद्धालुओं की तुलना में उन्मादी और उत्पाती लोगों का एक बड़ा काफिला कांवड़ियों के लिवास में चल रहा होता है। इनमें से कई समूह न सिर्फ तमाम ट्रैफिक और सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देते हैं, बल्कि छेड़खानी और मारपीट तोड़-फोड़ का जैसे लाइसेंस लिये घूमते हैं! लोगों की असुविधा का ध्यान रखे बगैर लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स लगाकर विभिन्न पड़ावों पर और रास्ते भर भी इनका नाचना-गाना चलता रहता है। इनकी हरकतों से ट्रैफिक में भारी दिक्कत आती है और सामान्य लोग बेबस और सहमे हुए नजर आते हैं।
धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इनकी गुंडागर्दी को क्यों चलने दिया जाना चाहिए? हर साल ऐसी घटनाएँ क्यों दोहराने की इजाजत दी जाती है? इस तरह की अप्रिय और बेहद असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए ज़रूरी गाइडलाइन्स क्यों नहीं बनाई जाती या पालन की जाती? इस तरह की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए दुरुस्त सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किये जाते? उपद्रवी कांवड़ियों की पहचान कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुँचाया जाता?
धर्म की आड़ लेकर की जाने वाली ऐसी उदंडता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए!

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर

19वीं सदी के शुरुआती दशकों की यह बात है, जब जर्मनी में रहने वाले एक यहूदी दम्पत्ति ने अपनी संतान के जन्म से कुछ वर्ष पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। कहते हैं कि उनकी संतान ने अपनी छह वर्ष की उम्र में ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया था। बाद के दिनों में यहूदी माता-पिता की इस संतान कार्ल मार्क्स ने, धर्म के अफीम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करते हुए लिखा।
मार्क्स के दुनिया को अलविदा कहने के दशकों बाद दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि जर्मनी में, हिटलर के दौर में धर्म के नाम पर नाज़ियों ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया, और वह इतिहास के सबसे बड़े और जघन्यतम नरसंहारों में से एक माना जाता है।
धर्म को अफीम होते हुए हमारे देश के लोगों ने भी लगातार देखा है। मुल्क की आज़ादी के साथ ही जब धर्म के नाम पर इस मुल्क के टुकड़े किए जाने लगे, तब अधिकांश प्रभावित लोगों ने देखा कि जो पहले अच्छे पड़ोसी और मित्र हुआ करते थे, धर्म के नाम पर एक-दूसरे के प्रति घोर अमानवीयता दिखाने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगा और थोड़ी भी हिचक नहीं हुई!
धर्म का यही अफीमी रूप हमारे देश के लोगों ने तब भी देखा जब पंजाब में धर्म के नाम पर अलग मुल्क तैयार करने के लिए गोलियां और बारूद इक्कट्ठे किए जाने लगे और भारी हिंसा का सहारा लिया जाने लगा। 
1984 में लोगों ने देखा कि किस तरह देश की राजधानी में एक धर्म विशेष के लोगों का कत्लेआम हुआ और इतिहास के सीने पर एक कभी नहीं भरने वाला ज़ख्म उभर आया।
अफीम खाए लोगों को आप उन तस्वीरों में भी देख सकते हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान ली गई थी। इसके अलावा समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से जूझने की इस देश को आदत सी हो गई है।
धर्म की अफीम अब भी दुनिया भर की हवा में तैर रही है और हमारे देश में तो इसका असर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यदि यह सच नहीं है तो यह सोचिए कि गुजरात के भीषण साम्प्रदायिक नरसंहार के समय नकारात्मक भूमिका निभाने वाले राज्य के मुखिया आज कैसे केन्द्र की सत्ता संभाल रहे हैं? कि आखिर कैसे नकारात्मक भूमिकाओं में उनके सबसे बड़े सहयोगी वर्तमान लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं?
इसे भी धर्म की अफीम का असर ही तो कहेंगे कि ठीक अभी जिस समय उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था तबाह की जा रही है, तब लोग अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लगी दशकों पुरानी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर भारी विवाद खड़ा करने की जुगत में हैं। मकसद यही है कि इस उन्माद में बुनियादी समस्याएं कहीं दब जाएं।
मार्क्स ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से इतिहास और अपने समकाल पर विचार किया था, इसलिए उनके विश्लेषण सटीक भविष्यवाणी की तरह साबित हुए। बहुत ही श्रमपूर्वक, बहुत ही ईमानदारी और मनुष्य की बेहतरी की नीयत से किए गए मार्क्स के चिंतन और लेखन का ही यह असर है कि आज वे अपने जन्म के 200 साल बाद भी इस दुनिया की बेहतरी के लिए सोचने वाली युवतम से युवतम पीढ़ी के सबसे बड़े वैचारिक मित्र और मार्गदर्शक बने हुए हैं और इसमें कोई शक नहीं कि यह सिलसिला कभी थमने वाला नहीं है।

Thursday, 3 May 2018

जश्न में कटिहार एसपी की हवाई फायरिंग गंभीर प्रकृति का अपराध है

बिहार के कटिहार जिले में एसपी और डीएम की फेयरवेल पार्टी में 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' गीत गाते, झूमते डीएम के साथ गलबहियां किए एसपी के द्वारा ताबड़तोड़ हवाई फायरिंग करने का एक वीडियो सामने आया है। जब सार्वजनिक उत्सवों में गैर कानूनी हवाई फायरिंग की वजह से लगातार निर्दोष लोगों की जानें जा रही हैं, तब कानून व्यवस्था का जिम्मा उठाने वाले एक पुलिस अधिकारी का ऐसा आचरण और जिलाधिकारी का इस आचरण से अप्रभावित रहना, दोनों ही दुखद और शर्मनाक ही नहीं ताकत के नशे में किये गये बेहद गंभीर अपराध हैं।
यदि इसके बाद इन अधिकारियों के सस्पेंशन का ऑर्डर आता है तो वह काफी नहीं है। इन अधिकारियों का टर्मिनेशन होना चाहिए और कम से कम एसपी को तो सलाखों के पीछे होना चाहिए। इन अधिकारियों ने साबित किया है कि यह अपने पदों को संभालने के कत्तई योग्य नहीं हैं। यदि इनपर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई तो समाज में इस घटना का नकारात्मक असर पड़ेगा। उत्सवों में हवाई फायरिंग करने वाले प्रोत्साहित होंगे और निर्दोष लोगों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेगा!!

[नोट : आजकल मीडिया में इस तरह की फायरिंग को 'हर्ष फायरिंग' कहने का चलन चल निकला है! यह भाषा से लेकर विचार के स्तर तक भारी दिवालियेपन को दिखाता है। इससे भी बाहर आने की सख्त ज़रूरत है।]

Monday, 16 April 2018

सीरिया के आम नागरिकों के पक्ष में

सीरिया के भीतर पहले रासायनिक हमला हुआ जो कथित तौर पर वहां की सरकार ने ही करवाया है, इसमें कई लोगों की जान गई और कई लोग इससे बुरी तरह प्रभावित हुए। उसके बाद इस हमले के खिलाफ अमेरिका ने सीरिया पर बम बरसाए, फिर कई आम नागरिकों की मौत हुई और कई गंभीर रूप से घायल हुए।
कहने के लिए ये दोनों ही हमले सीरिया की बेहतरी के लिए हो रहे हैं। लेकिन साफ-साफ दिख रहा है कि इन दोनों ही पक्षों का सीरिया की बेहतरी से कोई सरोकार नहीं है! ये अपना-अपना हित साध रहे हैं और इन्हें खुली छूट मिली तो ये सीरिया को मलबे का ढेर बना देंगे!
पूरी दुनिया का यह कर्तव्य है कि वह सीरिया के हित के नाम पर किए जा रहे हिंसक और बर्बर हमलों का विरोध करे। वहां शांति स्थापित करने के लिए तमाम प्रयास करे और सीरिया को बिलखते-मरते-डर के साए में जी रहे बच्चों और वयस्कों का देश होने से तत्काल रोके।

Thursday, 8 March 2018

इतिहास से अनभिज्ञ हैं महिला दिवस पर चुटकियाँ लेने वाले लोग!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जिन लोगों ने किसी भी तरह की चुटकियाँ लेते हुए लिखा है, मुझे इस दिवस पर उनकी समझ को लेकर संदेह है। पहली बात अच्छे से समझ लीजिए कि यह दिवस बाज़ार केन्द्रित नहीं है और दूसरी बात कि यह दिवस सरकारों का दिया हुआ 'उपहार' भी नहीं है! 1975 में मिली संयुक्त राष्ट्र संघ की स्वीकृति भी इस दिवस का उद्गम स्थल नहीं है। इसके पीछे खुद महिलाओं का संघर्ष है और उनके दीर्घकालीन संघर्ष की एक लम्बी परंपरा है।
औरतों ने सड़कों पर संघर्ष करके अपने हक सुनिश्चित किए हैं। कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है‌ कि विभिन्न देशों में अपने अन्य अधिकारों के अलावा मताधिकार हासिल करने के लिए भी महिलाओं को लंबा संघर्ष करना पड़ा है। दुनिया के आधुनिक समझे जाने वाले कई देशों में भी महिलाओं को यह हक अपेक्षाकृत बहुत बाद में और बहुत संघर्षों के बाद मिला है।
इस दिवस पर सोशल मीडिया पर विशेषज्ञ व्यंग्य करने की बजाय अपनी उंगलियों को थोड़ा कष्ट देकर गूगल सर्च तक पहुंचे तो, अधिक दूर नहीं तो कम से कम सौ साल पीछे तो ज़रूर पहुंचेंगे जब 8 मार्च 1917 को रूस की मजदूर महिलाएं, रूस की तब की राजधानी पेट्रोग्राड (अब सेंट पीटर्सबर्ग) की सड़कों पर थीं और ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर इन विरोध प्रर्दशन करने वाली महिलाओं से भर गया हो। 'रोटी और शांति' के लिए विरोध प्रदर्शन और हड़ताल पर उतरी इन महिलाओं की इस पहलकदमी को ज़ारशाही के खिलाफ रूसी क्रांति की शुरुआत भी माना जाता है! वैसे अगर आप और पड़ताल करेंगे तो इस दिवस के बारे में कई-कई और परतें खुलती जाएंगी बशर्ते आपकी यह सब जानने में रूचि हो!
कुल मिलाकर मेरे यह सब लिखने का ध्येय यह है कि जो यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, यह हमें मिला कोई 'कोमल उपहार' नहीं है। यह दिन इस बात पर विचार करने के लिए नहीं है कि, पुरूषों से कम से कम आज के दिन महिलाओं को सहानुभूति मिलनी चाहिए या इस दिवस से प्रेरणा लेकर पुरुषों को महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए! जब आप यह सब लिखते हैं, तो आप महिलाओं के संघर्षों की लम्बी परम्परा की जलती हुई मशाल पर पानी डालने की नाकाम कोशिश कर रहे होते हैं। 
सहानुभूति, अच्छे व्यवहार की भीख जैसे शब्दों का इस दिवस से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। यह दिवस महिलाओं के संघर्षों के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है, इस संघर्ष को अनवरत बनाए रखने के लिए उर्जा हासिल करने का दिन है और साथ ही साथ यह याद दिलाने का दिन है कि महिलाएं बराबरी का अपना हक सुनिश्चित करवाने का माद्दा रखती हैं। कृपया कर इस दिवस को इसी रूप में समझें तो किसी और पर नहीं, आप खुद पर ही उपकार करेंगे।

Saturday, 3 March 2018

शादी के बारे में तेजस्वी की पिछड़ी सोच पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व नहीं करती!

हाल ही में बीबीसी के एक इंटरव्यू में बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालूप्रसाद यादव और राबड़ी देवी के छोटे पुत्र, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव से जब यह पूछा गया कि ‘क्या वे अंतर्जातीय विवाह करेंगे?’ तो उन्होंने बहुत ही गंभीरता से जवाब देते हुए कहा : इंटर कास्ट मैरिज करना या नहीं करना या किस लड़की से हम शादी करेंगे, ये मेरा फैसला है ही नहीं न! हम बिहारी लोग हैंये हमारे माता-पिता का अधिकार है’!
तेजस्वी को इससे कोई रोक नहीं सकता कि वे अपना विवाह अपने माता पिता की ही मर्ज़ी से करें, लेकिन उनके बयान में जिस तरह से बिहार के सभी युवाओं को जेनरलाइज़ करने की कोशिश की गयी है, वह बेहद अफसोसनाक है। तेजस्वी को यह ध्यान रखना चाहिए था, कि उन्हें किसी ने पूरे बिहार की सांस्कृतिक ठेकेदारी नहीं दे रखी है। उनके इस विचार से जहाँ विवाह को लेकर रूढ़िवादी मानसिकता प्रोत्साहित होगी, वहीं बिहार की एक अनावश्यक पिछड़ी तस्वीर लोगों के सामने पेश होगी। इस बयान से इतना ज़रूर तय हो जाता है, कि तेजस्वी कहीं से भी आधुनिक सोच रखने वाले बिहार के युवाओं का प्रतिनिधित्व करने के काबिल नहीं हैं।
विवाह के नाम पर माता-पिता (या अन्य परिजनों) की पसंद को अपनी संतानों पर थोपे जाने की परिपाटी बिहार में ही नहीं कमोबेश पूरे देश मे रही है। लेकिन इसके दुष्परिणामों ने और समय के साथ हुई वैचारिक प्रगति ने इस तरह की परिपाटी को बहुत हतोत्साहित किया है। समय के साथ यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि पारंपरिक तरीके से तय होने वाली शादियों में भी उन लोगों के पसंद-नापसंद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिन्हें साथ मिलकर जीवन जीना है। एक दौर ऐसा भी था जब बिना तस्वीरें देखे दो परिवारों के बीच रिश्ता तय हो जाया करता था, लेकिन अब पारंपरिक विवाहों में भी अक्सर ऐसा होने लगा है कि लड़का-लड़की विवाह से पहले न सिर्फ मिलते हैं, बल्कि संचार की नयी तकनीकों के माध्यम से संवाद कर एक दूसरे को जानने-समझने की कोशिश भी करते हैं। यह बदलाव पूरे देश के साथ बिहार में भी हो रहा है। इसके बावज़ूद इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि अब भी बहुत सारी शादियाँ रूढ़िवादी तरीके से होती हैं। यह दुखद है और इस बात की ज़रूरत है कि इस तरह की परिपाटी के खिलाफ व्यापक जागरूकता लायी जाए। लेकिन जब किसी राज्य के उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद को संभाल चुके एक युवा नेता इस तरह का जेनरलाइज़्ड बयान दें कि विवाह के बारे में फैसला लेने का अधिकार युवाओं के बजाय उनके माता पिता को है तो इसका सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक प्रभाव ही पड़ सकता है।    
तेजस्वी के इस बयान से बिहार के उन लाखों युवाओं की तौहीन हुई है, जिन्होंने अपने विवेक से अपने जीवनसाथी का चयन किया है, या करना चाहते हैं। इस बयान में बिहार के उन लोगों के संघर्षों के प्रति तो बड़ी ही हिकारत और संवेदनहीनता प्रकट हुई है, जिन लोगों ने परिवार और समाज के भारी विरोध के बावज़ूद सामाजिक बंधनों और कुरीतियों को धत्ता बताते हुए प्रेम विवाह किया है।
बिहार के लड़के ही नहीं बिहार की लड़कियाँ भी अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनने को लेकर पर्याप्त मुखरता दिखा रही हैं। शिक्षा तक लगातार बढ़ रही पहुँच और आत्मनिर्भरता बढ़ने के साथ-साथ जीवन साथी के चयन के अधिकार को लेकर आत्मविश्वास में भी लगातार वृद्धि हो रही है, और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले वर्षों में इस मसले पर पूरी बदली हुई तस्वीर दिखाई देने लगेगी।
यह एक कड़वा सच है कि अपनी पसंद से शादी करने वाले लोगों को कई बार अपने परिजनों और समाज का भारी असहयोग और विरोध झेलना पड़ता है, लेकिन हमेशा ऐसा ही हो, यह ज़रूरी नही है। यह मैं अपने अनुभव से भी जानती हूँ। मेरे पति भी बिहार के हैं, और उन्होंने यह खुद तय किया था कि उन्हें किससे शादी करनी है। हमारे अन्तर्जातीय और अन्तर्प्रांतीय प्रेम को लेकर शुरूआत में परिजनों को थोड़ी बहुत असहजता जरूर हुईं, लेकिन बाद में सभी ने न सिर्फ हमारे फैसले को स्वीकारा बल्कि विवाह समारोह को लेकर हमारी आडंबरविहीन और किफायती एप्रोच को भी सभी ने सहर्ष स्वीकारा और सराहा। मैं अपने छोटे से व्यक्तिगत परिचय और सीमित जानकारी के बावज़ूद बिहार के ऐसे कई युवक-युवतियों से परिचित हूँ, जिन्होंने प्रेम विवाह किया है या प्रेम विवाह करने को लेकर बेहद स्पष्ट हैं।
तेजस्वी ज़रूरी है कि आप बिहार की बदलती हुई तस्वीर के साथ ताल-मेल बैठाना सीखें। अपने ही समाज में हो रहे उस बदलाव को महसूस करें जो दशकों से बिहार की सत्ता में बैठे लोगों के मंसूबे पर पानी फेर रहा है। इसके अलावा एक सलाह यह भी है कि अपने समाज के पिछड़ेपन को भी ईमानदारी से महसूस करें और उसके निवारण का अगुवा बनने की कोशिश करें न कि पिछड़ेपन का ब्रांड एम्बेसडर बनने की, नहीं तो इसका परिणाम यह होगा कि आप अप्रासंगिक होते चले जाएँगे।

Thursday, 8 February 2018

दरअसल प्रधानमंत्री को दिक्कत एक स्त्री के ठहाके से हुई!

कल राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने लम्बे भाषण के एक हिस्से में आधार कार्ड का ‘बीज रहस्य’ खोल रहे थे। ठीक उसी वक्त उनके दाहिने तरफ की कुर्सियों से एक ठहाके की आवाज़ आई। यह ठहाका सदन की गरिमा के खयाल से निश्चित रूप से अशोभनीय था और इस ठहाके के लिए राज्यसभा के सभापति वेंकैय्या नायडू ने तुरंत कड़ी आपत्ति और नाराज़गी जताई।
ठीक उसी वक्त प्रधानमंत्री ने उन्हें टोकते हुए कहा, “सभापति जी रेणुका जी को कुछ मत कीजियेरामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का आज सौभाग्य मिला है।” इस टिप्पणी का साफ मतलब यह है कि रेणुका चौधरी के ठहाके की तुलना रामानंद सागर निर्देशित ‘रामायण’ के खल पात्रों के ठहाकों से की गई। प्रधानममंत्री के ऐसा कहते ही उनके इर्द-गिर्द बैठे सत्ताधारी दल के बहुत सारे नेता एकसाथ डेस्क पीटते हुए ठहाके लगाने लगे। सामूहिक ठहाकों का यह दौर देर तक चला और ठहाके लगाने वाले नेता हंस-हंस कर लोटपोट हुए जा रहे थे। लेकिन इस पर किसी ने कोई आपत्ति जताई होकम से कम यह अब तक मेरी जानकारी में नहीं है। 
इस बात को समझने की ज़रूरत है कि आखिर क्यों रेणुका चौधरी का ठहाका इतना नागवार गुज़रा जबकि सत्ताधारी दल के सदस्यों का सामूहिक अट्टहास अपत्तिजनक नहीं माना गया। अफसोस होता हैलेकिन यह सच बार-बार उभरकर सामने आता है कि हमारे प्रधानमंत्री अपने विचार और व्यवहार में घोर पुरुषवादी हैं। वैसे पुरुषवादी मानिसकता अपवाद को छोड़कर हमारे पूरे समाज का कटु यथार्थ है। सदन ही नहींकहीं भी स्त्रियों का ठहाका लगाना अच्छा नहीं माना जाता। कल्पना करिए कि रेणुका चौधरी की बजाय यह ठहाका विपक्ष के किसी पुरुष सदस्य का होतातो क्या प्रधानमंत्री की ऐसी ही प्रतिक्रिया होती?
मेरी ये दलीलें रेणुका चौधरी के ठहाके को उचित ठहराने के लिए नहीं हैं। यह उनकी जानबूझकर की गई गलती हो सकती है या हो सकता है कि न चाहते हुए भी वह किसी कारण से अपनी हंसी नहीं रोक पाई हों। लेकिन दोनों ही सदनों के इतिहास में बैठकों के दौरान ठहाके पहली बार लगे हों ऐसा नहीं है। यह ज़रूर है कि इन ठहाकों की ठेकेदारी अक्सर पुरुष सदस्यों की रही हैइसलिए इनका आपत्ति से परे होना कोई अचरज की बात नहीं है। यही कारण है कि रेणुका चौधरी प्रधानमंत्री की जिस टिप्पणी का शिकार हुईंउस टिप्पणी ने प्रधानमंत्री की कुत्सित मानसिकता को ही एकबार फिर से बेनकाब किया है।
मेरे खयाल से सदन की गरिमा के प्रति निष्ठा दिखाते हुए रेणुका चौधरी को अपने बेवक्त ठहाके के लिए माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री भी अपने पद की मर्यादा और सदन की गरिमा के प्रति निष्ठा दिखाते हुएअपनी अनुचित टिप्पणी के लिए न सिर्फ रेणुका चौधरी से बल्कि इस देश की सभी स्त्रियों से माफी मांगे। उनकी टिप्पणी पर अट्टहास करने वाले सत्ताधारी दल के सभी नेता भी सामूहिक रूप से पूरे देश से क्षमायाचना करें।
स्त्रियों के लिए ठहाकों के वर्जित होने की धारणा पर बात चली हैतो प्रसंगवश सदन में कल हुई घटना के एक विशेष पहलू पर ध्यान देना ज़रूरी है। जब प्रधानमंत्री के आस-पास बैठे सत्ताधारी दल के सभी पुरुष सदस्य ठहाके लगाकर लोटपोट हो रहे थेठीक उसी वक्त प्रधानमंत्री से दो बेंच पीछे बैठी साध्वी उमा भारती को कुछ खयाल आया और वह मुंह पर हाथ रखकर दबी हंसी हंसती रहीं। ऐसा करके दरअसल उमा भारती प्रधानमंत्री और हमारे समाज की पुरुषवादी मानसिकता की उस अपेक्षा पर ही खरा उतरने का प्रयास कर रही थीजिसमें स्त्रियों का ठहाका लगाना वर्जित होता है।

Thursday, 25 January 2018

पद्मावत : सिनेमा हॉल में भी कायम रही सिरदर्दी

'पद्मावत' की वजह से इतने दिनों से जो सिरदर्दी मची हुई थी, वह कम से कम मेरे लिए तो सिनेमा हॉल के भीतर भी कायम रही! खुद संजयलीला भंसाली की 2015 में रिलीज़ हुई 'बाजीराव मस्तानी' की तुलना में भी यह फिल्म मुझे बेहद कमज़ोर लगी‌।
मेरे इस नज़रिये से सभी सहमत हों, यह ज़रूरी नहीं, लेकिन इस बात से सभी ज़रूर सहमत होंगे कि राजपूतों की आन-बान और शान को स्थापित करने में इस फिल्म में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया गया है। देखने वालों को इस बात पर ताज्जुब होगा कि करणी सेना वाले और कई अन्य राजपूत संगठन विरोध आखिर कर किस बात का रहे थे! जिस तरह से धारणा बनाई जा रही थी, मामला इससे ठीक उलट है। राजपूतों का ऐसा महिमा मंडन तो बिरले ही किसी फिल्म में हुआ होगा। 
एक और बात, मेरा खयाल है कि इस फिल्म को संघ समर्थक निश्चित ही सकारात्मक रूप से ग्रहण करेंगे!

Thursday, 30 November 2017

किरण जी इसे धूर्तता और बेहयायी कहा जाता है

       मुझे बहुत अधिक गुस्सा तब आता है, जब स्त्रियाँ और खासकर जिम्मेदार पदों पर बैठी स्त्रियाँ, यौन उत्पीड़न जैसी किसी घटना के बाद असंवेदनशील बयान देती हैं । 17 नवम्बर को चंडीगढ़ में एक लड़की के साथ हुए गैंगरेप के बाद वहीं की सांसद किरण खेर का बयान आया है । उन्होंने कहा कि आजकल ज़माना बहुत खराब है, लड़कियों को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए । जब तीन लड़के पहले से ऑटो में बैठे थे, तो लड़की को उस ऑटो में बैठना ही नहीं चाहिए था!
मोहतरमा किरण खेर जी को कौन समझाए कि सबके पास आपकी तरह गाड़ियाँ और बॉडीगार्ड नहीं होते । सबके पास इतना पैसा भी नहीं होता है कि अपने लिए टैक्सी बुक करवा लें । अक्सर हम सबको शेयर ऑटो लेना ही पड़ता है, और कई बार उसमें भी यह विकल्प नहीं होता कि हम अपनी पसंद से तय कर लें कि किस तरह की सवारियों वाले ऑटो का चयन करें । सच तो यह है कि कई बार घंटों तक ऑटो नहीं मिलते और मिलते हैं तो जाने को तैयार नहीं होते ।
     किरण के सोचने विचारने की क्षमता को कमज़ोर समझ कर तो फिर भी उनके इस बयान को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, लेकिन तब नहीं जबकि वे उस इलाके की सांसद हैं और केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी की एक प्रतिष्ठित सदस्य भी हैं । किरण को जब चरमराई हुई पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम और लचर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर माफी मांगनी चाहिए थी और जब इन सब को लेकर काम करने की ज़रूरत थी, तब अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़कर, भद्दे उपदेश देने में लग जाना कम समझ का नहीं धूर्तता और बेहयायी का मामला होता है । पता नहीं क्या सोचकर चंडीगढ़ के लोगों ने गत लोकसभा चुनाव में गुलपनाग के ऊपर किरण खेर को तरजीह दी थी !!

Monday, 27 November 2017

हर्षिता दहिया की हत्या और न्याय का प्रश्न

हर्षिता दहिया उस समाज की लड़की थी, जहाँ लड़कियों का घर से बाहर निकलना, जींस पहनना, फोन रखना तक बुरी बात समझी जाती है, ऑनर किलिंग जहाँ आम बात है, ऐसे समाज की कोई लड़की पंचायत में बैठकर सामाजिक उत्तरदायित्व और राजनीतिक मसलों पर मुखर होकर बात करे तो यह असाधारण घटना ही है ।
17 अक्टूबर 2017 को हर्षिता किसानों के हकों के लिए आयोजित की गई एक सभा को संबोधित करने गई थी । वहाँ उसने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि किसानों के हक़ छीने जा रहे हैं और यदि हम समय रहते उनके साथ खड़े नहीं हुए तो हम सब भूखे मरेंगे । उसने लोगों से किसानों के हक़ में जात-पाँत से ऊपर उठकर इंसानियत के नाते एकजुट होने का आग्रह किया । सभा सम्पन्न होने के बाद जब वह लौट रही थी, तब बीच रास्ते में उसकी कार को रोक कर उसपर ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर, उसकी हत्या कर दी गयी ।
हर्षिता कई मोर्चों पर संघर्षरत थी । हरियाणा की लोक गायिका और डांसर होने के नाते वह कलाकारों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष कर रही थी । खबरों के मुताबिक अपने निजी जीवन में भी वह कई तरह के संघर्षों से गुजर रही थी । अपनी बेबाकी, अपनी चेतना और साहस के कारण हर्षिता एक सशक्त महिला के बतौर उभर रही थी । कायरों ने उसकी हत्या करके अपनी बहादुरी तो साबित कर दी, लेकिन हरियाणा ने एक बहादुर और संभावनाशील लड़की को खो दिया ।
हरियाणा के लोगों को इस हत्या के बाद उबल पड़ना चाहिए था और सरकार और कानून के रखवालों से हिसाब मांगना चाहिए था । उन्हें समाज की सड़ी हुई और हिंसक मानसिकता वाले तत्वों का बहिष्कार शुरू कर देना चाहिए था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । एक बार यह फिर से सिद्ध हुआ कि हत्या भले ही एक ज़िंदा लड़की की हुई हो, लेकिन बेशक वह मुर्दापरस्तों की बस्ती में रहा करती थी!
हर्षिता दहिया की हत्या की जाँच भी आनन-फानन में बहुत ही अजीब तरीके से हुई । हरियाणा पुलिस ने एक हफ्ते के भीतर इस मामले को सुलझा लेने का दावा किया था । हर्षिता की माँ की हत्या के मामले मेंपहले से जेल में बंद हर्षिता के बहनोई से यह कबूल करवा लिया गया कि उसी ने हर्षिता की भी हत्या करवायी है । खबरों के मुताबिक हर्षिता अपनी माँ की हत्या की एकमात्र चश्मदीद गवाह थी । जेल में पहले से बंद संगीन अपराध के एक आरोपी से यह कबूल करवा लेना कि उसी ने उसपर लगे आरोप के एक चश्मदीद की हत्या करवा दी, क्या बहुत कठिन काम है?
हर्षिता ने अपने कुछ पिछले फेसबुक लाइव में कुछ लोगों से उसे मिल रही धमकियों की बात की थी। उसे फेसबुक प्रोफाइल पर सार्वजनिक रूप से भी धमकियाँ दी जा रही थीं । उसकी बातों से यह संकेत मिलता है, कि उसे धमकियाँ देने वाले उसके रिश्ते के लोग नहीं थे । यह अफसोसनाक है कि इस मसले पर हरियाणा पुलिस ने सभी ज़रूरी कोणों से जाँच करने की ज़रूरत नहीं समझी ।  मुमकिन है कि अपने प्रतिरोधी स्वभाव, साहस और अपनी बढ़ रही लोकप्रियता की वज़ह से वह कुछ लोगों के निशाने पर हो । बहुत मुमकिन है कि हरियाणा पुलिस इस घटना के असल अपराधियों को उनके रसूख की वज़ह से बचा रही हो ।
हरियाणा पुलिस के निष्कर्षो पर यकीन कर लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हाल ही में हरियाणा पुलिस के द्वारा गुड़गाँव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के एक छात्र प्रद्युम्नकी हत्या का मामला सुलझाने का दावा भी ग़लत साबित हुआ है । स्कूल के बस कंडक्टर अशोक को हरियाणा पुलिस ने न सिर्फ पीडोफ़ाइल और हत्यारा बताया बल्कि कथित तौर पर अशोक को टॉर्चर करते हुए ज़ुर्म भी कबूल करवा लिया था। बाद के सीबीआई जाँच में अशोक को निर्दोष पाया गया और एकदम अलग ही थियरी सामने आयी ।
इस घटना का एक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू मीडिया की खराब रिपोर्टिंग है । हर्षिता दहिया की हत्या को लेकर संवेदनशीलता के साथ न्याय की ज़रूरत पर बात करना तो दूर मीडिया में हर्षिता को लेकर घटिया, अपमानजनक और पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिपोर्टिंग की गयी। उदाहरण के लिए न्यूज चैनल आजतककी वेबसाइट पर लगायी गयी रिपोर्ट की भाषा पर ग़ौर कीजिए, जो कहती है कि-'दिल्ली और हरियाणा की महफिलों की जान हुआ करती थी हर्षिता'! स्त्री विरोधी और असंवेदनशील भाषा का प्रयोग तो खैर हमारे देश की मीडिया के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन पूर्वाग्रह और घटियापने की हद देखिए, जब रिपोर्टिंग आगे कहती है कि 'हत्या से पहले भी एक शानदार कार्यक्रम देकर लौट रही थी हर्षिता'!
सच्चाई यह है कि वह हरियाणा के पानीपत जिले में ऐसी सभा को सम्बोधित कर के लौट रही थी, जो विभिन्न जाति बिरादरियों में एकता स्थापित कर किसानों के हक़ में संघर्ष को तेज करने के उद्देश्य से आयोजित की गयी थी । उसकी हत्या से दो घंटे पहले के फेसबुक लाइव हर्षिता की फेसबुक वॉल पर मौजूद है, कोई चाहे तो इन्हें देख सकता है ।
हरियाणा पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था और जाँच प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय 'आजतक' हरियाणा पुलिस के हवाले से खबरें छाप रही थी कि, हर्षिता एक गैंगेस्टर थी और अपने लिए इंतकाम चाह रही थी! कितनी कमाल की थियरी है, एक इंतकाम चाहने वाली गैंगेस्टर निहत्थी गोलियाँ खाने के लिए निकल पड़ी थीं!
हर्षिता हरियाणा की उभरती लोक गायिका थी लेकिन उसकी जघन्य हत्या के मामले में सत्ता और विपक्ष तो छोड़िये वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाले हरियाणा के मुखर नेताओं में से भी किसी ने संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देना तक ज़रूरी नहीं समझा । इस घटना को अब एक महीने से अधिक बीत चुका है। मीडिया से तो इस घटना से जुड़ी ख़बरें तीन-चार दिन बाद ही ग़ायब हो गयी थी,हम सबने भी यह मानकर कि इस मामले में अब कुछ भी नहीं बचा है और यह मामला सुलझाया जा चुका है, उधर से ध्यान हटा लिया है । इस मामले में यदि कुछ बचा रह गया है, तो वह न्याय का प्रश्न है । कानून व्यवस्था का प्रश्न है । जीने के अधिकार का प्रश्न है । इस घटना के ज़िम्मेदारों कोचिह्नित करने का प्रश्न है । आगे से ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या उपाय किये गये, इसका प्रश्न है ।
वैसे हम सब को आदतन यह सब भुला कर प्रसन्न हो जाना चाहिए! एक 'नाचने गाने वाली' की जिंदगी के वैसे भी क्या मायने! इंतकाम लेने निकली निहत्थी गैंगेस्टर लड़की का तो यही हश्र होना ही चाहिए था! सच यह है कि हरियाणा पूरी तरह सुरक्षित है । पूरा देश ही बहुत सुरक्षित है । हर तरफ न्याय ही न्याय है! सत्यमेव जयते!

[‘स्त्रीकाल’ पर 28 नवम्बर 2017 को प्रकाशित
#Brutal Murder Of Harshita Dahiya #Dancer Harshita Dahiya #Hariyana

Monday, 28 August 2017

*****हिन्दी सिनेमा में उच्च शिक्षा का संकट*****

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एक सवाल यह उठ सकता है कि उच्च शिक्षा की समस्याएं या संकट फिल्मकारों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण होने चाहिए? इसका सरल सा उत्तर एक प्रश्न है, और वह यह है कि उच्च शिक्षा की समाज के लिए जो महत्वपूर्ण भूमिका होती है, या होनी चाहिए उसकी तुलना में आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी ऐसी स्थिति क्यों है, कि समाज को उसका वाज़िब परिणाम नहीं मिल रहा? यदि यह समस्या है, तो इसकी तह तक जाने की ज़रूरत है।
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