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Thursday, 3 December 2020

अलविदा; मसालों के शहंशाह

 

मेरी पीढ़ी के लोग जब से पैदा हुए थे, महाशय धर्मपाल गुलाटी जी को MDH मसालों के विज्ञापन में देखते आ रहे थे। महाशय जी की खास बात यह थी कि मैंने बचपन से लेकर आज तक उनको वैसा का वैसा ही देखा है।

पिछले कई सालों से उनके देहांत की अफवाहें बीच-बीच में उड़ती रही हैं; लेकिन हर बार हर अफवाह को वे झूठा साबित कर देते थे; लेकिन इस बार ऐसा ही नहीं हुआ। कोरोना से तो वे जंग जीत गए; लेकिन उसके बाद दिल का दौरा पड़ने से आज सुबह उनका देहांत हो गया।

महाशय धर्मपाल का जीवन प्रेरणादायक रहा है। उनका जीवन वास्तव में शून्य से शिखर तक की यात्रा का एक बड़ा उदाहरण है। भारत विभाजन के बाद लुटे-पिटे लगभग खाली हाथ सीमा पार कर भारत पहुँचे लोगों में से वे भी एक थे। शुरूआती दिनों में तांगा चलाया। बाद के दिनों में सड़क किनारे एक खोखा लगाकर मसाले बेचे और फिर ऐसा दौर भी आया जब उन्हें मसालों का शहंशाह कहा जाने लगा। उनके ब्रांड का नाम एमडीएच यानी 'महाशयां दी हट्टी' मसाले के उनके शुरूआती कारोबार से ही निकला नाम है। उनके बारे में एक विशेष बात यह भी है कि जीवन के लगभग अंतिम समय तक वे अपने ऑफिस पहुँचते रहे और कामकाज देखते रहे। शानदार और सक्रिय लम्बी पारी खेलकर विदा हुए मसालों के शहंशाह को हार्दिक श्रद्धांजलि।

Tuesday, 4 August 2020

अलविदा अल्काज़ी साहब! आप याद किए जाते रहेंगे

इब्राहिम अल्काज़ी भारतीय रंगमंच की दुनिया के शीर्षस्थों में शुमार थे। रंगमंच की दुनिया और उसकी शख्सियतों की मैं बेहद मामूली जानकार हूँ। लेकिन अल्काज़ी साहब का नाम इतने शीर्षस्थ अभिनेताओं को इतने आदर के साथ लेते देखा कि मान लेना पड़ा कि वे निश्चित तौर पर बहुत खास व्यक्ति हैं। नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, गोविंद नामदेव, हिमानी शिवपुरी, डॉली आहलूवालिया और भी कई दिग्गज अभिनेता-निर्देशक अपने कौशल के विकास में उनकी बड़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं। इन सबकी बातों से जो एक कॉमन बात उभर कर आती है, वह यह है कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों में अल्काज़ी साहब कठोर अनुशासन के हिमायती होने के बावजूद अपने एक-एक छात्र की प्रगति, बॉडी लैंग्वेज, व्यवहार आदि पर ध्यान रखते थे, और अपने ऑब्जर्वेशन के आधार पर ही उनसे अकेले में बुलाकर बात करते और उनकी समस्या के समाधान का प्रयास करते थे। उनकी सही प्रतिभा को पहचान पाने में मदद करते थे।

एक-एक छात्र पर ध्यान देना, उनकी कमियाँ-कमज़ोरियाँ देख पाना और उन्हें ठीक करने का प्रयास करना, हर एक छात्र की असली प्रतिभा को पहचान जाना; ये एक बहुत बड़ी बात होती है। अल्काज़ी साहब के बारे में जब जब सुना हमेशा मन में आया कि काश मैं भी किसी ऐसे गुरू, किसी शिक्षक से मिल पाती। यह एक सौभाग्य है, जो सबको नहीं मिलता। लेकिन हाँ, मन में यह ज़रूर आता है कि कमोबेश ऐसी शिक्षक ज़रूर बन सकूँ।

श्रद्धांजलि अल्काज़ी साहब! आप याद किये जाते रहेंगे।

Thursday, 4 June 2020

अलविदा बासु दा!

साल 2018 के आखिरी महीने की बात है। किसी सुबह करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे का समय रहा होगा। मैंने अपने मोबाइल से मुंबई के एक लैंडलाइन नंबर पर फ़ोन लगाया। घंटी बजी। एक महिला ने फ़ोन उठाया। अभिवादन के बाद मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि क्या मेरी बासु दा से बात हो सकती है?’ महिला ने जवाब दिया- वे अब फ़ोन पर किसी से बात नहीं करते’ तो मैंने उन्हें कहा कि क्या उनसे मिलने का समय मिल सकता है?’ जवाब में वो महिला बोलीं कि नहीं! वे अब बिस्तर से उठ नहीं पाते और किसी से मिलते-जुलते भी नहीं हैं। ये कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया।
अब मैं सिर्फ अफ़सोस कर सकती थी। कभी-कभी यूँ ही आप देर कर देते हैं और फिर सिर्फ मलाल रह जाता है। 2014 में जब मैंने साहित्य और सिनेमा के सम्बन्धों पर शोध कार्य शुरू किया था; उन्हीं दिनों या शुरूआती वर्षों में ही मैंने बासु दा से बात करने की कोशिश की होती तो ऐसा बहुत कुछ जानने समझने को मिल जाता, जिससे मैं चूक गयी। 

साहित्य और सिनेमा के बीच की सबसे मजबूत जीवंत कड़ी थे- बासु चटर्जी; ख़ास तौर पर हिंदी सीहित्य और सिनेमा के बीच की। मथुरा के माहौल में पले बढ़े एक बंगाली युवक की दुनिया हिंदी सिनेमा, हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच से निरपेक्ष नहीं रह सकी थी। बल्कि उनमें इन सबके प्रति एक दीवानगी थी, और इसी दीवानगी ने उन्हें मुंबई पहुँचा दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने रेणु की कहानी पर बनी क्लासिक फिल्म तीसरी कसममें निर्देशक बासु भट्टाचार्य को असिस्ट किया था और शायद उन्हीं दिनों वे सिनेमा निर्माण की बारीकियाँ भी बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे।
इसके ठीक बाद उनकी निर्देशन यात्रा शुरू हुई और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस साहित्यिक कृति को चुना वो थी राजेन्द्र यादव का सारा आकाश’; जिसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुए थे। 1969 में रिलीज़ हुई उनकी यह पहली ही फिल्म कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मों की श्रेणी में रखी जाती है। इसके बाद वो लगातार फ़िल्में बनाते रहे। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही केंद्र में रहा। कम बजट की बेहद सरल, सहज और खूबसूरत फ़िल्में बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर उन्होंने रजनीगंधाबनाई। जब-जब हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों का नाम आता है तो हर किसी की जुबान पर रजनीगंधाका नाम ज़रूर होता है। साहित्यिक कृति के सफल रूपांतरण के बतौर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा पिया का घर’, ‘छोटी सी बात’, 'कमला की मौत', ‘चितचोर’, ‘खट्टा मीठा’, ‘स्वामीऔर त्रिया चरित्रजैसी कई खूबसूरत फिल्मों का निर्देशन बासु दा ने किया।

उनकी फिल्मों का अपना एक अलग व्यक्तित्व है। यानी कि फिल्मों की भीड़ में आप बासु चटर्जी निर्देशित फिल्मों को उनकी विशेषताओं के चलते आसानी से पहचान सकते हैं। उनकी फिल्मों में दृश्य उसी तरह चलते हैं; जैसे जीवन चलता है, जैसे हम और आप जीते हैं। उनकी अमूमन फ़िल्में जीवन का फिल्मीकरण नहीं है। उनकी फिल्मों के गीत-संगीत का भी एक अलग व्यक्तित्व है; न बहुत ऊँचा, न बहुत धीमा बल्कि मद्धिम गति वाला। ऐसे शब्द, ऐसी ध्वनियाँ जी सीधे ह्रदय में उतर जाती हैं। शायद यही मद्धिमउनके जीवन दर्शन का हिस्सा था। वही जीवन जिसकी अपनी कठिनाईयाँ भी हैं, अपने सुख भी हैं और सबसे बड़ी बात कि अदम्य जिजीविषा है।
आज सुबह उनका निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। बासु दा का काम मात्रा और गुणवत्ता दोनों में इतना अधिक और इतने आगे का काम है कि वे हमेशा बहुत आदर के साथ याद किये जाते रहेंगे। अलविदा बासु दा!

Friday, 22 November 2019

शौकत आज़मी का निधन



यदि आप शौकत आज़मी को कैफी आज़मी की पत्नी या शबाना आज़मी की माँ के बतौर ही जानते हैं; तो दरअसल आप एक बेहद मजबूत और बेहद प्रतिभाशाली शख्सियत से लगभग अपरिचित ही हैं। वे कमाल की अदाकारा, महिलाओं की बराबरी को व्यवहार में साबित करने वाली और जन नाट्य मंच के शुरुआती स्तंभों में से एक थीं। कह सकते हैं कि शबाना आज़मी ने अभिनय अपनी माँ की कोख से ही सीखना शुरू कर दिया था। शौकत की अभिनय क्षमता देखनी हो तो आप 'उमराव जान', 'गर्म हवा' और 'बाज़ार' जैसी फिल्मों में उन्हें देखिए।
शौकत आज़मी का आज देर रात निधन हो गया। वे 93वें वर्ष की थीं। लम्बे समय से कहीं उनका ज़िक्र होना भी लगभग बंद हो चुका था। अब उनकी मृत्यु के बाद शायद उनके योगदान की फिर से समीक्षा हो। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि!

Monday, 19 August 2019

अलविदा खय्याम साहब!


आप हमारे देश के शीर्षस्थ संगीतकार ही नहीं, एक बेहद ऊँचे दर्जे के इंसान भी थे। आप उमराव जान’, ‘कभी कभीऔर बाज़ारजैसी फिल्मों के गीतों को दिए उम्दा संगीत के लिए ही नहीं अपनी अंदरूनी खूबसूरती के लिए भी हमेशा याद किये जायेंगे। आपकी चिंता में सिर्फ आप नहीं थे; आपकी संवेदना का दायरा बहुत बड़ा था। ईश्वर जगजीत कौर जी को वियोग सह पाने का धैर्य दें। आप दोनों ने साम्प्रदायिक सीमाओं को तोड़कर साथ में सफ़र शुरू किया, सुख-दुःख के कई दशक साथ बिताये, साथ में काम किया, एक-दूसरे का सहयोग किया। आप दोनों ने मिलकर वह पहाड़ जैसा दुःख भी झेल लिया; जब आपका इकलौता जवान बेटा असमय आप लोगों से छिन गया। जिस तरह बेटे की स्मृति को आप दोनों ने अपना संबल बनाकर खुद को समाज के लिए समर्पित कर दिया, मैं प्रार्थना करती हूँ कि आपकी स्मृति भी जगजीत जी के लिए संबल बने और वे खुद को कभी अकेला महसूस न करें। नम श्रद्धांजलि।

Thursday, 15 August 2019

नहीं रहीं विद्या सिन्हा

70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा की मेनस्ट्रीम के बरक्स एक ऐसी धारा का विकास हुआ था, जो शहरी निम्न मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी। नौकरी की जद्दोजहद करने वाले, एक अदद छत के लिए संघर्ष करते, बसों और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले लोग इन फिल्मों की कहानियों के नायक-नायिका होते थे। अपने दुःख-दर्द-समस्याओं-खुशियों को केंद्र में रखकर बनायी गयी फिल्मों में अपने जैसे लोगों को देखकर; एक बड़े वर्ग ने यह महसूस किया कि सिनेमा उनसे बहुत दूर नहीं है। यदि यह कहा जाए कि इस धारा की फिल्मों के प्रमुख चेहरा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा थे, तो ग़लत नहीं होगा।
जिसने भी रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘तुम्हारे लिए’, पति पत्नी और वोजैसी फ़िल्में देखी होंगी, वे सब विद्या सिन्हा से परिचित होंगे। विद्या सिन्हा किसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मका हिस्सा नहीं रहीं। लेकिन मध्यम वर्ग की ऐसी कामकाजी महिला जो साड़ी पहने बसों, टैक्सियों में सफ़र करती है। कहीं क्लर्क, कहीं पर्सनल असिस्टेंट की भूमिका में नज़र आती हैं। ऐसे कई किरदारों को विद्या सिन्हा ने पर्दे पर जिया था। 80 के दशक के बाद वे फिल्मों से लगभग ओझल हो गयीं, इसका एक कारण शायद यह भी रहा हो कि, ऐसी फिल्में बननी भी लगभग बंद हो गयी थीं। लम्बे अंतराल के बाद वे टीवी पर प्रदर्शित होने वाले कुछ डेली सोप्स में माँ, दादी, बुआ आदि के किरदार में ज़रूर नज़र आ रही थीं। हालाँकि उनकी इन भूमिकाओं में शायद ही लोग उन्हें पहचान पा रहे हों कि वे एक समय की फिल्मों का बेहद जाना-पहचाना चेहरा थीं।
कुछ समय से फेफड़े और दिल की बीमारी से जूझ रही विद्या सिन्हा का आज निधन हो गया। इसे भी शायद संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की आज़ादी वाले वर्ष (15 नवम्बर 1947) में पैदा हुई विद्या सिन्हा ने आज देश को मिली आज़ादी वाले दिन ही इस दुनिया को अलविदा कहा। इस समय मुझे किसी फिल्म का वही दृश्य याद आ रहा है, जिसमें चुलबुली सी दिखने वाली विद्या सिन्हा, शिफॉन की प्रिंटेड साड़ी पहने बस स्टैंड पर अपने ऑफिस जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही है। उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

Monday, 10 June 2019

गिरीश कर्नाड के निधन पर


गिरीश कर्नाड बीमार थे, इसकी मुझे बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी, इसलिए आज सुबह जब उनके जाने की खबर सुनी तो मैं स्तब्ध रह गयी! गिरीश कर्नाड रंगकर्म के क्षेत्र से जुड़ी एक ऐसी हस्ती थे जिनके नाम से भारत में पढ़ने-लिखने से सम्बन्ध रखने वाला शायद ही कोई अपरिचित हो। कन्नड़ भाषी गिरीश की दक्षिण भारत ही नहीं शेष भारत में भी जितनी ख्याति थी, वह किसी बड़ी प्रतिभा के बल पर ही संभव होता है। गिरीश ने नाटक लिखे, नाटकों में अभिनय किया, नाटकों का निर्देशन किया। उन्होंने कई हिन्दी और कन्नड़ फिल्मों में अभिनय किया, कुछ फिल्मों के लिए लिखा और कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया।
गिरीश कर्नाड की बड़ी खासियत ये थी कि वे कन्नड़ भाषा साहित्य के मर्मज्ञ भी थे। कन्नड़ फिल्मों से कन्नड़ साहित्य का रिश्ता कायम करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यू.आर.अनंतमूर्ति के बहुचर्चित उपन्यास संस्कार’ (1970) पर इसी नाम से बनी कन्नड़ फिल्म में मुख्य भूमिका निभाकर उन्होंने सिनेमा में अपने अभिनय की शुरुआत की थी। बाद में हिन्दी सिनेमा के दर्शकों ने भी इस सौम्य व्यक्तित्व वाले सहज अभिनेता को कई बेहतरीन फिल्मों में देखा; जिनमें निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और स्वामी’ (1977) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। उनके एक चर्चित कन्नड़ नाटक अग्निमुत्तू माले’, जो महाभारत की कथा से प्रेरित होकर बिल्कुल एक नयी दृष्टि से एक नयी तरह की कथा की सृष्टि है, को आधार बनाकर हिन्दी में अग्निवर्षा’ (2002) नाम से एक फिल्म भी बनाई गयी थी।
गिरीश कर्नाड उन संस्कृतिकर्मियों में शामिल थे जो देश में सांप्रदायिक सौहार्द और वैज्ञानिक चेतना (Scientific temper) के प्रति समर्पित थे और इसके लिए काफी मुखर भी थे। वे कट्टरपंथी हिन्दुत्व के मुखर आलोचक थे और इसलिए पिछले कुछ सालों में उन्हें बहुत परेशान भी किया गया। गिरीश कर्नाड का निधन सचमुच एक बड़ा 'शून्य' पैदा करेगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Sunday, 17 March 2019

मोहर पर्रिकर का असमय निधन


 मनोहर पर्रिकर लम्बे समय से बीमार थे। उनकी बीमारी जितनी गंभीर थी, उस हिसाब से उन्हें लगातार गहन चिकित्सा और पूरे आराम की ज़रूरत थी, लेकिन हो यह रहा था कि नाक में नली लगाकर भी वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे। मनोहर पर्रिकर चूँकि सादगी भरा जीवन जीते थे, ईमानदार थे, कर्तव्यनिष्ठ थे इसलिए भारी अस्वस्थता में भी उन्हें काम करने की फ़िक्र थी और वे डॉक्टरी सलाह को दरकिनार कर लगातार सक्रियता बनाये हुए थे, यह सोचना सरासर बेमानी है। मेरे ख़याल से उनपर लगतार सक्रिय दिखने का भारी दबाव था। गोवा विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला था लेकिन सत्ता बीजेपी की हो, इसे मैनेज करने के लिए पार्टी ने उन्हें रक्षामंत्री के पद से मुक्त कर, मुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए गोवा भेज दिया। सख्त बीमारी की हालत में भी काम करना अमानवीय है लेकिन गोवा में अपनी साख बचाने के लिए पार्टी उनका भरपूर दोहन करती रही। राफेल डील वाले मुद्दे का तनाव भी उन्हें अंत अंत तक झेलना पड़ा। कुल मिलाकर असमय एक ऐसे नेता का देहान्त हो गया जिसके बारे में अमूमन लोगों की राय अच्छी थी। राजनीति ने तो उन्हें चैन लेने नहीं दिया, प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति मिले। श्रद्धांजलि!

Thursday, 22 November 2018

राजा रवि वर्मा की कुछ मूल कला कृतियों का दीदार


पिछले दिनों मैसूर यात्रा का संयोग बना और इसी दौरान यह संयोग भी बना कि राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई कुछ मूल कलाकृतियों को पहली बार अपनी आंखों से देख सकी। यह मेरे लिए रोमांचित करने वाला क्षण था। हालांकि रवि वर्मा की बनाई बहुत सी मूल पेंटिंग्स 'जगमोहन पैलेस' और 'आर्ट गैलरी', मैसूर में लगी हुई हैं, लेकिन रिनोवेशन के कारण ये दोनों ही जगहें आम लोगों के लिए बंद थीं और इसलिए मैं इन्हें देखने से चूक गई, इस बात का मुझे बेहद मलाल है।
खैर उनकी बनाई कुछ पेंटिंग्स 'मैसूर पैलेस' की गैलरी में भी लगी हुई हैं। यहां लगी अधिकांश पेंटिंग्स में उन्होंने राज परिवार के सदस्यों को चित्रित किया है। रवि वर्मा द्वारा बनाई गई उन्हीं पेंटिंग्स में से एक, जो मुझे बहुत प्यारी लगती है, यहां साझा कर रही हूं।

Monday, 8 October 2018

ग्लो ऑफ़ होप

ग्लो ऑफ़ होप
इस मशहूर और बेहद खूबसूरत पेंटिंग को कुछ समानताओं के कारण लोग अक्सर राजा रवि वर्मा की बनाई पेंटिंग समझ लेते हैं। गूगल पर राजा रवि वर्मा की कृतियों को सर्च करने परयह पेंटिंग भी एकदम शुरूआती परिणामों में दिखाई देती है!
लेकिन असल में इस वाटर कलर पेंटिंग को एक पेंटर पिता ने अपनी बेटी को देखकर तब बनाना शुरू किया थाजब एक दिवाली की रात हाथ में दीप लिए और हथेली के सहारे उसकी लौ को हवा से बचाने का यत्न करतीवह अपने पिता के सामने आकर खड़ी हो गयी थी। इस दृश्य ने पिता एस.एल. हलदणकर को इस कदर प्रभावित किया कि तीन दिनों तक लगातार जुटे रहकर उन्होंने इसे कैनवस पर उतार लिया। इन तीन दिनों तक कई बार घंटों इसी पोज़ में खड़े रहकर बेटी भी अपने पिता का सहयोग करती रही।
इस पेंटिंग में उतारी गयी लड़की का नाम गीता हलदणकर है। गीता का पिछले हफ्ते (2अक्टूबर को) 102 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इसके बाद ही मीडिया के ज़रिए मुझे पहली बार इस पेंटिंग के पीछे की कहानी जानने का मौका मिला। इससे पहले तक इस कालाकृति को मैं भी राजा रवि वर्मा की बनायी पेंटिंग ही समझती थी!

Tuesday, 2 October 2018

कैंपस गाँधीजी, दो अक्टूबर से जुड़े संयोग!

आज से ठीक एक साल पहले इसी दिन कैंपस में टहलते हुए सामने से अचानक मुझे धोती पहने, हाथ में लाठी पकड़े, नंगे पाँव चल रहे एक बाबा दिखे थे। उनके पास से गुजरते ही मुझे कुछ ध्यान आया। मुड़ कर देखा तो बाबा की छवि मुझे गांधी जी जैसी लगी थी। मैंने झट से अपने मोबाइल कैमरे से पीछे से उनकी एक तस्वीर उतार ली। 2 अक्टूबर के दिन ऐसा घटित होना मुझे खूबसूरत संयोग लगा था। मैंने इसे हमारे कैंपस में गांधी जीशीर्षक के साथ पोस्ट किया था।
इसके बाद कभी-कभार वे बाबा टहलते-टहलते दिख जाया करते थे। लेकिन पिछले बहुत दिनों से उन्हें नहीं देखा था। कल शाम टहलते हुए वे मुझे सामने से आते हुए दिखे। मुझे लगा सामने से उनकी तस्वीर उतारूँ, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि उन्हें यह पता चले। इस कोशिश में फोटो बहुत ब्लर आई!
लेकिन आज देर रात कहिये या एकदम सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मैं फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी कि हमारे इन गाँधी बाबाकी तस्वीर मुझे फेसबुक पर दिख गयी! वे हमारे कैंपस की एक दुकान के बाहर बैठ कर आराम कर रहे थे। कैंपस में चुनावी मौसम है, और उसी सिलसिले में किसी की खींची गयी तस्वीर में बाबा उतर आए!

[यहाँ तीनों तस्वीरें लगा रही हूँ। एक सबसे पहली जो पिछले 2 अक्टूबर को खींची थी। दूसरी तस्वीर कल शाम की है, और तीसरी तस्वीर जो सुबह के साढ़े तीन बजे अचानक से मुझे फेसबुक पर दिखाई दी।]

Sunday, 23 September 2018

कल्पना लाजमी का असमय निधन

चर्चित फिल्म निर्देशक कल्पना लाज़मी नहीं रहीं। वे लम्बे समय से लीवर और किडनी की समस्या से जूझ रही थीं। 64 वर्ष की कल्पना ने आज सुबह मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
कल्पना में कमाल की रचनात्मक प्रतिभा थी और सिनेमा को लेकर उनका नज़रिया उन्हें खास बनाता है, यही कारण है कि उन्होंने 'रूदाली', 'दरमियां', दमन' सहित स्त्री केन्द्रित कई उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण फिल्में बनायी। कल्पना उन स्त्री निर्देशकों में शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म निर्देशन की दुनिया में तब कदम रखा जब इस क्षेत्र में अमूमन पुरूषों का ही बोलबाला था, और अपने काम से यह साबित किया कि उनकी निर्देशकीय क्षमता बेमिसाल है। कल्पना का असमय निधन बहुत दुखद है। हिन्दी सिनेमा को चाहनेवाले उन्हें उनके काम से हमेशा याद करेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 22 September 2018

ये वो मंटो तो नहीं!

हैदराबाद के किसी मल्टिप्लैक्स में यदि किसी हिन्दी फिल्म के (ख़ास तौर पर लीक से हट कर बनायी गयी फिल्म के) रिलीजिंग डे के दूसरे शो में अच्छी खासी भीड़ जुटी हो तो कोई शक नहीं रह जाता कि यह फिल्म ठीक-ठाक बिजनेस कर लेगी। कल रिलीज हुई फिल्म मंटोको लेकर मेरा यही अनुभव रहा। मेरे खयाल से इसमें मंटोके प्रमोशन के लिए की गयी मेहनत की बड़ी भूमिका है।
2012 से नंदिता इस विषय पर काम कर रही थीं। उनके मुताबिक काफी रिसर्च करके उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की। नंदिता को फिल्म जगत से जुड़े कुछ एक बौद्धिकों में शुमार किया जाता है। उन्होंने बेहद चुनिंदा फिल्मों में अभिनय किया है। बेहतरीन अभिनय के लिए उनकी खूब तारीफ भी होती रही है। निर्देशक के बतौर नंदिता को लोगों ने 2008 में तब जाना जब गुजरात दंगों पर आधारित उनकी फिल्म फ़िराकरिलीज़ हुई। यह बहुत ही संजीदगी के साथ बनायी गयी एक ज़रूरी और उम्दा फिल्म है। मंटोउनके द्वारा निर्देशित दूसरी फिल्म है।
यह फिल्म उर्दू के मशहूर अफसानानिग़ार सआदत हसन मंटो के जीवन और उनकी रचनाओं पर आधारित है। फिल्म के लिए इस तरह के विषय का चयन ही चुनौतीपूर्ण होता है। मेरे खयाल से नंदिता का दृष्टिकोण उन्हें इस तरह की चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह मंटो की जिंदगी, उनकी सोच और उनके रचनात्मक कार्यों के महत्व से नयी पीढ़ी को परिचित कराती है।
इन सब बातों के होते हुए भी मुझे यही लगा कि यह फिल्म मंटो पर किया गया कोई महीन काम नहीं है। यहाँ तक कि मंटो के मन की उथल-पुथल और रचनात्मक बेचैनियों को जिस शिद्धत से उकेरा जाना चाहिए था, उसका अभाव खटकता है। नवाज़ुद्दीन भले ही मंझे हुए अभिनेता हैं, लेकिन मंटो को अपने भीतर उतारने में वह उस तरह से कामयाब नहीं हो सके हैं, जैसी कामयाबी उन्होंने फैज़ल, स्कूल मास्टर श्याम, रमन राघव या गायतोंडे जैसे किरदारों को अपने भीतर उतार पाने में हासिल की है। इसे नवाज़ से अधिक नंदिता की निर्देशकीय कमज़ोरी कहा जा सकता है।
फिल्म में मंटो की कुछ कहानियों का फिल्मांकन यदि प्रभावित करने वाला है, तो कुछ कहानियों का फिल्मांकन बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि नंदिता दो घंटे में बहुत कुछ दिखा देने के लालच से खुद को नहीं बचा नहीं पायी हैं। कई जगहों पर जहाँ धैर्य और ठहराव की ज़रूरत महसूस होती है, फिल्म भागती नज़र आती है, वहीं कहीं-कहीं मामूली दृश्यों को अनावश्यक ही लम्बा कर दिया गया है।
बहुत सारे चर्चित अभिनेताओं की झलक इस फिल्म में आप देख सकते हैं, लेकिन इससे कोई प्रभाव उत्पन्न किया जा सका हो, ऐसा मुझे नहीं लगता है। रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी के किरदार को अच्छे से निभाया है। मंटो के ख़ास दोस्त श्याम चड्ढा का किरदार निभा रहे, ताहिर राज़ भसीन भी प्रभावित करते हैं। मुझे तो यह भी लगा कि बहुत से किरदारों के साथ ज़्यादती हुई। मसलन अशोक कुमार और फैज़ अहमद फैज़ का किरदार बेजान लगता है।
इन सब बातों के अलावा इस फिल्म में एक बात जो मुझे बेहद अखरी वो है भाषाको लेकर बरती गयी लापरवाही। मंटो लुधियाना के एक गाँव में पैदा हुए थे। वे कश्मीरी मूल के मुसलमान थे, लेकिन उनका परिवार पीढ़ियों पहले पंजाब में आकर बस गया था। लिहाज़ा पंजाबी उनकी मादरी जबान की तरह थी। मंटो अपने सम्बंधियों और पंजाबी दोस्तों से अक्सर पंजाबी में बात किया करते थे। उनकी कहानियों में पंजाबी शब्दों, वाक्यों की भरमार देखने को मिलती है, लेकिन इस फिल्म में पंजाबीपन सिरे से गायब कर दिया गया है, यहाँ तक कि लाहौर के बाज़ार में भी कोई पंजाबी नहीं बोलता! ठंडा गोश्तकहानी की बुनावट में चूँकि पंजाबी है इसलिए मात्र इसके फिल्मांकन में पंजाबी शामिल है। हालांकि इसे यह कह कर जस्टिफाई करने की कोशिश की जा सकती है कि एक हिन्दी फिल्म के लिए भाषा की यह छूट ली जा सकती है, लेकिन तब भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इससे फिल्म कमज़ोर हुई है। हिन्दी में ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं, जब किसी ऐतिहासिक पात्र को कहानी का आधार बनाया गया तो रहन-सहन और भाषाई स्तर पर वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश की गयी। नंदिता चाहती तो मंटो से उनकी पत्नी, उनकी बहन या उनके दोस्त श्याम चड्ढा से बातचीत करते हुए पंजाबी के कुछ छोटे-मोटे वाक्य बुलवाकर इस ओर कम से कम संकेत संकेत कर सकती थीं। खुद अपनी पहली फिल्म फ़िराकमें नंदिता ने अपने कुछ गुजराती पात्रों से गुजराती बुलवाई है।
खैर इन कमज़ोरियों के बावज़ूद इस फिल्म को देखने ज़रूर जाना चाहिए। एक तो यह ज़रूरी नहीं कि मुझे जो बातें खटकी वह सबको खटके, दूसरी बात यह कि इस तरह की फिल्मों का बनना ही बड़ी बात है। इस तरह की फिल्मों के पीछे समाज की बेहतरी का जो उद्देश्य निहित होता है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण और पवित्र होता है। ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की फिल्में बनाने का साहस किया जा सके। स्वाभाविक है कि कुछ फिल्में थोड़ी कमज़ोर बनेंगी तो कुछ बहुत उम्दा भी बनेंगी। सिनेमा की यह समानांतर संस्कृति जिंदाबाद रहनी चाहिए।

Thursday, 30 August 2018

शैलेन्द्र और गुलज़ार

शैलेन्द्र गीतकार तो थे लेकिन फिल्मों के लिए नहीं लिखना चाहते थे। राजकपूर का आग्रह और उनकी आर्थिक परेशानियाँ उन्हें फिल्मों में खींच लायीं। गुलज़ार कविताएँ लिखते थे, गीत लिखते थे लेकिन फिल्मों के लिए लिखने के बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। वे खुद कहते हैं कि एक तरह से ज़बरदस्ती शैलेन्द्र उन्हें इस काम में ले आये। जिस तरह राजकपूर ने शैलेन्द्र को अवसर देकर हिंदी सिनेमा को एक बेहद उम्दा गीतकार उपलब्ध करवाया, उसी तरह खुद शैलेन्द्र ने गुलज़ार के रूप में हिंदी सिनेमा से एक ऐसे प्रतिभावान रचनाकार को जोड़ा जो सिनेमा के कई कालखंडों के लोकप्रिय गीतकार हैं और हर पीढ़ी उन्हें अपने अनुकूल पाती है।
शैलेन्द्र की उपलब्धियों में से इसे भी एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना या अवसर उपलब्ध करवाने में मदद करना भी एक ज़रूरी रचनात्मक कर्तव्य होता है, शैलेन्द्र ने इसी का निर्वाह किया था। आज शैलेन्द्र का जन्मदिन है उन्हें नमन।

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Saturday, 12 May 2018

पापा की किसानी

मेरे पापा को हमेशा से शौक रहा कि वे खेती करें किसान बनेलेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक रूप से कमज़ोर और लगभग भूमिहीन पृष्ठभूमि से होने के कारण वे कभी अपने इस सपने को साकार नहीं कर सके। बहुत छोटी सी उम्र से ही उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से पढ़ाई छोड़ बहुत मेहनत वाले छोटे-मोटे काम-धंधे में घुस जाना पड़ा लेकिन इसके बावजूद वे हमेशा एक खुशमिजाज़ और जिंदादिल इंसान बने रहे और अपनी मेहनत और लगन के बल पर लगातार उन्नति करते रहे।
पापा बहुत अधिक पढ़-लिख नहीं सके लेकिन कोई उन्हें देखकर और उनसे बात करके यह नहीं समझ सकता कि वे कम पढ़े-लिखे हैं। वे हम लोगों की पढ़ाई-लिखाई तक की अच्छी खासी समीक्षा कर देते हैं और कड़ी पूछताछ कर हर चीज़ की कमजोरियाँ और खूबियाँ भी गिना पाने में सक्षम हैं। जीवन और समाज के गहरे अनुभव और व्यक्तियों के चरित्र की उन्हें गहरी पकड़ है।
आजकल वे अपने चिर लंबित सपने को पूरा कर रहे हैं। खेती कर रहे हैं। ब्रज के इलाके में कुछ खेत उन्होंने किराए पर लिये हैं। इन दिनों उनका उत्साह देखने लायक है। दिन भर मजदूरों के साथ खेतों में खुद भी जुटे रहते हैं। उनके जोश और उत्साह के आगे तो हम पानी भरते हैं! आज माँ ने उनके एक छोटे से खेत की तस्वीरें मुझे भेजी जिसमें सीताफलकरेलेकद्दूटमाटरझींगा आदि सब्जियां उगी हुई हैं। मैंने पहले कभी इन सब्जियों के पौधे नहीं देखे! आज इन्हें देखकर मन खुश हो गया। ये तो उनकी छोटी सी बागबानी का नमूना है। फिलहाल उन्होने कुछ और बड़े खेतों में कपास बोयी है और अच्छे परिणामों की उम्मीद में खूब मेहनत कर रहे हैं। 

Sunday, 6 May 2018

नामवर सिंह पर प्रभात रंजन की अभद्र टिप्पणी

साल 2012 के शुरूआती महीनों की बात है हम लोगों का एम.ए. का फाइनल सेमेस्टर चल रहा था। हमारे कोर्स में मार्खेज़ का उपन्यास एकांत के सौ वर्षभी शामिल था। प्रभात रंजन ने मार्खेज़ पर एक किताब लिखी है मार्खेज़ की कहानी। यह एक अच्छी किताब है। तब अधिकांश विद्यार्थियों ने मार्खेज़ को समझने के खयाल से इसे पढ़ा था। उन्हीं दिनों हमें एक दिन यह सूचना मिली कि हमारे विभाग के प्रो. अपूर्वानंद ने प्रभात रंजन को मार्खेज और एकांत के सौ वर्षपर हमसे बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया है। हम लोग बड़े उत्सुक थे कि चलिए जिन्होंने किताब लिखी है उन्हें सुनने का मौका मिलेगा, बहुत कुछ जानने को मिलेगा जो परीक्षा में काम आएगा। प्रभात रंजन आये। लगभग एक घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी और हमसे बात की। यकीन मानिये उस एक घंटे में उन्होंने जो कुछ भी बोला, वह कहीं से महत्वपूर्ण या उपयोगी नहीं था। अफ़सोस हो रहा था कि फ़ालतू में हमने समय बर्बाद किया। उनका वक्तव्य बेहद सुस्त और उबाऊ था। पूछे गये सरल प्रश्नों पर भी वे क्या और क्यों बोल रहे थे वही जानें! लेकिन आज तक मैंने इस बात का कहीं जिक्र तक नहीं किया। इसका कारण यह था कि किसी का अच्छा वक्ता होना या नहीं होना उसकी योग्यता का परिचायक नहीं है। कुछ लोग कहने के बजाय लिखकर अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं! जो भी हो किसी का अच्छा वक्ता या अच्छा लेखक नहीं होना आज भी मेरे लिए उपहास करने का विषय नहीं है। मैं खुद भी अच्छा नहीं बोल पाती!
आज इस प्रसंग का जिक्र करने की वजह यह है कि कल प्रभात रंजन ने 90 वर्ष के हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह को एनडीटीवी पर प्रसारित उनके इंटरव्यू के बाद निशाना बनाते हुए एक पोस्ट लिखा कि उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा है। अपने गुरू सुधीश पचौरी को, जिनका बोला हुआ तो छोड़िये लिखा हुआ भी मुझे किसी काम का नहीं लगता और प्रशासनिक अधिकारी के नाते जिनके छात्र विरोधी दोहरे व्यक्तित्व के हम सब गवाह रहे हैं, को सम्मान के साथ कोटकरते हुए उन्होंने लिखा है कि नामवर सिंह तो कब के खाली हो चुके हैं!
अब उस इंटरव्यू की प्रकृति पर बात करते हैं जो अमितेश कुमार ने नामवर सिंह से लिया है। इसमें जो सवाल पूछे गये हैं वे इस तरह के हैं कि- आप संगोष्ठियों में अब नहीं जाते हैं कैसा लगता है, पान खाते हैं या नहीं, आप ने अभी भगवान को याद किया क्यों, इन तस्वीरों में कौन लोग हैं वगैरह! इन अनौपचारिक सवालों का जो जवाब दिया जा सकता है, वही तो दिया जाएगा या फिर उसमें साहित्य, आलोचना और देश की चिंता घुसेड़ दी जाएगी?
इस तरह की बातों का जवाब देते हुए भी नामवर सिंह बेहद संतुलित रहे! नहीं भी होते तो क्या इसे उम्र का तकाजा नहीं माना जाना चाहिए? प्रभात रंजन के वक्तव्य से परिचित होने के कारण मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ऐसी ही सवालों का तारतम्य जवाब दे पाने में भी प्रभात रंजन इस उम्र के नामवर जी से भी बहुत पीछे रह जाएँगे। अभी भी अगर किसी विषय पर नामवर जी के साथ प्रभात रंजन को वक्तव्य के लिए खड़ा कर दिया जाए तो निश्चित तौर पर तुलनात्मक रूप से प्रभात जी बहुत ही निष्प्रभावी साबित होंगे।
इंटरव्यू के द्वारा नामवर सिंह को एक्सपोज़ करने के लिए प्रभात रंजन ने अमितेश कुमार को धन्यवाद कहा है, जबकि असल सच यह है कि प्रभात रंजन ख़ुद इस तरह की टिप्पणी करके एक्सपोज़ हुए हैं।
हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने के कारण स्वाभाविक रूप से नामवर सिंह के लिखे हुए से मेरा परिचय रहा है। कोई दो मत नहीं है कि वे बहुत अच्छे आलोचक रहे हैं, और उन्होंने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय बनाने और समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसके बावज़ूद नामवर सिंह के लिखे और कहे की आलोचना हो सकती है और अकादमिक जगत से जुड़े मसलों पर उन्होंने जो भी अच्छा या बुरा किया है, उसकी आलोचना हो सकती है। इन पहलुओं पर मैं भी नामवर सिंह के प्रति आलोचनात्मक रही हूँ, फिर भी एक वयोवृद्ध आलोचक के लिए अकारण अपमानजनक बातें करने और अपने पोस्ट और कमेंट में उनकी ज़रूरी आलोचना करने या असहमति दर्ज करने के बजाय उनकी वृद्धावस्था का मखौल उड़ाना खराब संस्कार और अवसरवादी मानसिकता का परिचायक है। यानी नामवर सिंह के व्यक्तित्व और आलोचना दोनों में कई विरोधाभास खोजे जा सकते हैं, तीखी आलोचना और घोर असहमति की तमाम संभावनाएँ हैं और यह सकारात्मक भी होगा- लेकिन इतना तय है कि प्रभात रंजन जैसी मानसिकता के साथ इस तरह का कोई महत्वपूर्ण काम कभी नहीं किया जा सकता!

Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर

19वीं सदी के शुरुआती दशकों की यह बात है, जब जर्मनी में रहने वाले एक यहूदी दम्पत्ति ने अपनी संतान के जन्म से कुछ वर्ष पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। कहते हैं कि उनकी संतान ने अपनी छह वर्ष की उम्र में ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया था। बाद के दिनों में यहूदी माता-पिता की इस संतान कार्ल मार्क्स ने, धर्म के अफीम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करते हुए लिखा।
मार्क्स के दुनिया को अलविदा कहने के दशकों बाद दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि जर्मनी में, हिटलर के दौर में धर्म के नाम पर नाज़ियों ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया, और वह इतिहास के सबसे बड़े और जघन्यतम नरसंहारों में से एक माना जाता है।
धर्म को अफीम होते हुए हमारे देश के लोगों ने भी लगातार देखा है। मुल्क की आज़ादी के साथ ही जब धर्म के नाम पर इस मुल्क के टुकड़े किए जाने लगे, तब अधिकांश प्रभावित लोगों ने देखा कि जो पहले अच्छे पड़ोसी और मित्र हुआ करते थे, धर्म के नाम पर एक-दूसरे के प्रति घोर अमानवीयता दिखाने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगा और थोड़ी भी हिचक नहीं हुई!
धर्म का यही अफीमी रूप हमारे देश के लोगों ने तब भी देखा जब पंजाब में धर्म के नाम पर अलग मुल्क तैयार करने के लिए गोलियां और बारूद इक्कट्ठे किए जाने लगे और भारी हिंसा का सहारा लिया जाने लगा। 
1984 में लोगों ने देखा कि किस तरह देश की राजधानी में एक धर्म विशेष के लोगों का कत्लेआम हुआ और इतिहास के सीने पर एक कभी नहीं भरने वाला ज़ख्म उभर आया।
अफीम खाए लोगों को आप उन तस्वीरों में भी देख सकते हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने के दौरान ली गई थी। इसके अलावा समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से जूझने की इस देश को आदत सी हो गई है।
धर्म की अफीम अब भी दुनिया भर की हवा में तैर रही है और हमारे देश में तो इसका असर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है। यदि यह सच नहीं है तो यह सोचिए कि गुजरात के भीषण साम्प्रदायिक नरसंहार के समय नकारात्मक भूमिका निभाने वाले राज्य के मुखिया आज कैसे केन्द्र की सत्ता संभाल रहे हैं? कि आखिर कैसे नकारात्मक भूमिकाओं में उनके सबसे बड़े सहयोगी वर्तमान लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं?
इसे भी धर्म की अफीम का असर ही तो कहेंगे कि ठीक अभी जिस समय उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था तबाह की जा रही है, तब लोग अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लगी दशकों पुरानी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर भारी विवाद खड़ा करने की जुगत में हैं। मकसद यही है कि इस उन्माद में बुनियादी समस्याएं कहीं दब जाएं।
मार्क्स ने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से इतिहास और अपने समकाल पर विचार किया था, इसलिए उनके विश्लेषण सटीक भविष्यवाणी की तरह साबित हुए। बहुत ही श्रमपूर्वक, बहुत ही ईमानदारी और मनुष्य की बेहतरी की नीयत से किए गए मार्क्स के चिंतन और लेखन का ही यह असर है कि आज वे अपने जन्म के 200 साल बाद भी इस दुनिया की बेहतरी के लिए सोचने वाली युवतम से युवतम पीढ़ी के सबसे बड़े वैचारिक मित्र और मार्गदर्शक बने हुए हैं और इसमें कोई शक नहीं कि यह सिलसिला कभी थमने वाला नहीं है।

Monday, 30 April 2018

दादासाहेब फाल्के के फ़साने में राजा रवि वर्मा का ज़िक्र

भारतीय चित्रकला के बड़े प्रवर्त्तक राजा रवि वर्मा के जीवन पर बनी केतन मेहता की फिल्म 'रंगरसिया' में दो प्रसंग ऐसे हैं जो आधुनिकता और तकनीकी उन्नति के प्रति रवि वर्मा के सम्मान, अभिरूचि और उदारता को दिखाते हैं। रवि वर्मा ने जब कैमरे से खींची हुई तस्वीरों को पहली बार देखा तो चित्रकला की तुलना में श्रम और समय की भारी बचत और अधिक सटीक छायांकन को देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।
दूसरा प्रसंग यह है कि मुंबई (तब के बंबई) में जब 1896 में पहली बार ल्युमिरे बंधुओं ने फिल्म का प्रदर्शन किया था तो उन्होंने बंबई के तमाम गणमान्य नागरिकों को यह प्रर्दशन देखने के लिए आमंत्रित किया। राजा रवि वर्मा भी इस प्रर्दशन को देखने के लिए आमंत्रित किए गए थे। उन्होंने जब पर्दे पर चलती हुई तस्वीरों को देखा तो वे बहुत अधिक आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने बहुत प्रसन्नतापूर्वक कहा कि अब तक तो चित्र सिर्फ उतारे जाते थे, लेकिन इस अविष्कार में तो चित्र हम सब की तरह चल-फिर रहे हैं! वाह! लाजवाब।
उसी प्रर्दशन में उन्होंने देखा कि एक नवयुवक ल्युमिरे बंधुओं को फिल्म प्रर्दशन में बड़े उत्साह के साथ हर तरह से सहयोग कर रहा था। बाद में इस युवक ने रवि वर्मा के सहायक चित्रकार के रूप में भी काम किया। जब रवि वर्मा की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी तो उन्होंने अपना प्रेस बेच दिया था। इससे उन्हें जो राशि मिली उसका एक अच्छा-खासा हिस्सा अपने उस सहयोगी युवक को भी दिया था, जिसमें उन्होंने फिल्म कला के प्रति अभिरुचि और ललक देखी थी, ताकि वह अपनी इस अभिरुचि और ललक को दिशा दे सके‌। उस युवक की यात्रा आगे भी सरल नहीं रही लेकिन उस युवक में फिल्म कला के प्रति इतना अगाध समर्पण था कि उसने तमाम आर्थिक व अन्य चुनौतियों को पार करते हुए भारतीय फिल्म कला को स्थापित करने वाले व्यक्ति के रूप में ख्याति पाई। उस युवक का नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से भी जाना जाता है। आज दादासाहेब फाल्के का 148वां जन्मदिन है।
मुझे आज याद दादसाहेब को करना था लेकिन इस पोस्ट का एक बड़ा हिस्सा रवि वर्मा पर केन्द्रित हो गया, इसका कारण यह है कि रवि वर्मा की फाल्के को आर्थिक सहायता देकर फिल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की जो घटना है वह इसलिए भी हमेशा याद की जानी चाहिए, कि यह एक पारंपरिक कला विधा से जुड़ी बड़ी हस्ती का एक आधुनिक कला विधा को स्थापित करने में दिया गया योगदान भी है। ऐसा विरले ही होता है! इसलिए जब कभी भारतीय फिल्मों की चर्चा हो, उसके जनक दादासाहेब फाल्के के संघर्षों और योगदान की चर्चा हो तो उस चर्चा में राजा रवि वर्मा का ज़िक्र अनिवार्य रूप से होना चाहिए।

Saturday, 31 March 2018

एक संवेदनशील अभिनेत्री के जीवन की त्रासदी


मीना कुमारी एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील इंसान भी थीं। यह कहना उचित होगा कि उनका संवेदनशील व्यक्तित्व ही उनकी अदायगी में ताउम्र झलकता रहा। इस खूबसूरत अभिनेत्री के द्वारा शिद्दत से निभाए गये किरदारों में से अधिकांश के हिस्से त्रासदी हुआ करती थी और इसी ने उन्हें 'ट्रेजडी क्वीन' के बतौर स्थापित कर दिया था।
परदे की इस 'ट्रेजडी क्वीन' का अपना जीवन भी त्रासदियों से भरा हुआ था, यह तब उन्हें परदे पर देखने वाले कम ही प्रशंसकों को मालूम रहा होगा। बचपन से ही त्रासदियों से उनका जो नाता जुड़ा वह ताउम्र पीछा करता रहा। अठारह वर्ष की उम्र में अपने से लगभग दुगुने उम्र के लेखक-निर्देशक कमाल अमरोही से उन्होंने शादी की थी। मीना के ख्वाब तब बिखरने लगे जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को बात-बात पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वे मीना कुमारी को लगातार निगरानी में रहने वाली एक गुलाम की तरह अपनी जिन्दगी में रखना चाहते थे। उनके द्वारा कई शर्तें मीना कुमारी पर लाद दी गयी थीं। मीना इन सबको सहते हुए भी सम्बंध को बचाए रखने की लगातार कोशिश करती रहीं, लेकिन जब स्थितियाँ बर्दाश्त से बिल्कुल बाहर हो गयीं तो उन्होंने पति का घर छोड़ दिया। लेकिन यातना और प्रताड़ना का यह दौर यहीं खत्म नहीं हुआ। प्रेम की उनकी तलाश में मिले धोखे ने उन्हें शराब की बुरी लत लगा दी। उसी दौर में उनके मायके के कुछ रिश्तेदारों ने उनका भरपूर दोहन किया और धूर्ततापूर्वक उनकी कमायी सारी दौलत हड़पने में लगे रहे। अपने ही घर में वे भिखारियों की तरह जीने को मजबूर कर दी गयीं थीं। उन्हें ढंग से खाना तक नहीं दिया जाता था। शराब की लत ने उन्हें लीवर सिरोसिस की गंभीर बीमारी दी और वही उनकी मौत का कारण भी बनी।
मीना कुमारी अपने एकांत क्षणों में लिखा करती थीं। उनकी तमाम शेरो-शायरी में उनकी भोगी हुई गहरी वेदना को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। जैसे उनकी लिखी इन दो उम्दा ग़ज़लों को देखिए : चाँद तनहा है आसमां तनहा / दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहाया फिर टुकड़े-टुकड़े दिन बीता और धज्जी-धज्जी रात मिली / जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली!