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Saturday, 28 March 2020

कोरोना काल का कड़वा सच


महान भारत की आखिरी पंक्ति के इंसानों की किसे सुध है? जिन मजदूरों के कंधों पर शहर टिका होता है, उन्हें बेहद असुरक्षित हजारों किमी की पैदल यात्रा कर गाँव-कस्बों की ओर जाना पड़ रहा है। उनके मालिकों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया, सरकारों ने मुँह मोड़ लिया और यदि अब इन्हें बसों में ठूँस ठूँस कर घर पहुँचा भी दिया गया तो उनके गाँवों-कस्बों का क्या जहाँ संक्रमण का भारी खतरा बढ़ेगा और वहाँ इलाज की न्यूनतम सुविधा भी नहीं है। क्या ऐसे रोकेंगे महामारी? ऐसे में सफल होगा लॉकडाउन?
विपदा के दिनों की भी एक अच्छी बात ये होती है कि बची-खुची धुंध भी पूरी तरह छंट जाती और सब कुछ साफ-साफ दिखने लगता है। समानता के संकल्प के साथ बढ़ने वाला देश जैसे अपना संकल्प भूल कर असमानता को ही लक्ष्य बना बैठा है। सरकारी नौकरों को लॉकडाउन के दिनों में भी भत्ते सहित उनका पूरा का पूरा वेतन बाइज्ज़त दिया जायेगा। अच्छी बात है; लेकिन बाकी लोगों का क्या अपराध है? उदाहरण के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों में परमानेंट और एडहॉक पढ़ाने वाली फैक्ल्टी बिना बाधा हज़ारों-लाखों का वेतन भोगेगी! उनमें से अधिकांश के लिए यह लॉकडाउन इसलिए आनंद का अवसर बना हुआ है। वहीं इन्हीं जगहों पर गेस्ट बेसिस पर चुनिंदा क्लास पाने वालों को पारिश्रमिक से तो महरूम किया ही गया है; बिना पारिश्रमिक छात्रों तक पाठ्य सामग्री वितरित करने के लिए भी बाध्य किया जा रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी विश्वविद्यालय के नॉन कॉलेजिएट या ओपन स्कूल जैसे संस्थानों ने गेस्ट फैकल्टी के पिछले सत्र के पारिश्रमिक तक का इस संकट में भी भुगतान करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है।
मजदूरों के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। किसानों को कोई देखने वाला नहीं। छोटे कारोबारियों का कोई रहनुमा नहीं! बेरोजगारों के प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं। क्या इस संकट काल में किन्हीं सांसदों-विधायकों का वेतन या उनकी सुविधाएँ कम होंगी?
हम सब इस देश के नागरिक हैं, लेकिन सरकार और व्यवस्था हमारी हैसियत और स्थिति के हिसाब से हमसे व्यवहार करती है। कुछ लोग इस लॉकडाउन में कितना अच्छा खाएँ- कितना अच्छा पीएँ, कौन सा डाइट उन्हें फिट रखेगा की चिंता कर रहे हैं, तो वहीं कई लोग पानी के संकट, और भुखमरी की कगार पर हैं। सारी कवायद; सारे ताम-झाम ही समर्थ लोगों के हित में होते हैं। जो समर्थ नहीं हैं; वे भगवान भरोसे हैं। वे तमाशा हैं और वे उन चूहों की तरह भी हैं, जिन पर मनचाहा प्रयोग किया जा सकता है!

Sunday, 22 December 2019

ईशनिंदा के आरोप में ज़ुनैद को फाँसी की सजा


जिस समय भारत में सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कानून हमारे संविधान द्वारा प्रस्तावित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ़ है; ठीक उसी समय पाकिस्तान की एक जिला अदालत ने 33 साल के युवक जुनैद हफीज़ को इसलिए मौत की सजा सुनाई है, क्योंकि उनपर ईश-निंदा का आरोप है!
2013 में जब जुनैद सिर्फ 27 साल के थे और बहाउद्दीन ज़कारिया विश्वविद्यालय, मुल्तान में लेक्चरर थे; तभी ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। पाकिस्तान की भयावह स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुनैद की पैरवी करने के लिए तैयार हुए वकील की 2014 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके केस की पैरवी के लिए वकील तक मिलना बेहद मुश्किल हो गया। इतना ही नहीं इन छ: सालों में जुनैद पर जेल में कई बार जानलेवा हमले हुए। ये है मानवाधिकार के चैम्पियन बनने की होड़ में लगे इमरान खान के नए पाकिस्तान की हकीक़त!
जुनैद को अमेरिकी साहित्य, फोटोग्राफी और थिएटर में विशेषज्ञता हासिल है। अमेरिका में फुल-ब्राइट स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपना मास्टर्स पूरा किया था। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक को जिससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो सकता था, धर्म की आड़ में मौत दे दी जाएगी! कल रात जब से ये खबर पढ़ी है, तब से बहुत डिस्टर्ब्ड हूँ।
हमें किसी भी तरह की धर्मांधता और कट्टरपंथ से इसीलिए डर लगता है। इसलिए हम 'पाकिस्तान' होते जाने से डरते हैं। हम सबकी पहली खुश-नसीबी तो यही है कि हम किसी 'पाकिस्तान' में नहीं; हिन्दुस्तान में रहते हैं। इस हिन्दुस्तान को 'हिन्दुस्तान' बनाए रखने की फिक्र इसलिए हमें बराबर बनाए रखनी होती है!
दुनिया भर के देशों का यह दायित्व है कि वे जुनैद के मानवाधिकार के लिए सख्ती के साथ खड़े हों और पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर कर दें कि वो जुनैद को रिहा करे। साथ ही दुनिया भर में ईशनिंदा जैसे कानून का कोई अस्तित्व न रहे; इसके लिए भी सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए।

Sunday, 26 May 2019

बेहद अफ़सोसनाक है पायल ताडवी की 'आत्महत्या'


मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की 23 साल की छात्रा पायल की आत्महत्या की घटना बेहद-बेहद दुखद है। यह और भी अधिक अफसोसनाक है कि पायल को आत्महत्या के लिए उकसाने का इल्ज़ाम जिन तीन लोगों पर है, वो तीनों कथित तौर पर जातीय अहंकार से ग्रस्त 'लड़कियाँ' ही हैं! खबरों के मुताबिक पायल ताडवी ने इन्हीं तीन लड़कियों के जातिसूचक और आरक्षण के प्रति अपमानजनक तानों और प्रताड़ना से परेशान होकर यह कदम उठाया। प्रशासन से पायल ने समय रहते शिकायत भी की थी, लेकिन उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया।
आवश्यकता है कि इस घटना की निष्पक्ष तरीके से जाँच हो और दोषियों को कोई रियायत न बरती जाए। यदि तीनों लड़कियों पर लगा आरोप सही है तो कहा जा सकता है कि वास्तव में एक संभावना से भरी भावी डॉक्टर को उन लड़कियों ने मौत के मुँह में धकेल दिया, जिन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ज़रूर मिला था, लेकिन वो कहीं से डॉक्टर बनने लायक नहीं थीं। जातिवादी कॉलेज प्रशासन पर भी सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए!

Saturday, 11 May 2019

अलवर गैंग रेप और न्याय का संघर्ष

अलवर में गैंगरेप की शिकार हुई महिला ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक साथ उदास भी करती हैं और प्रेरित भी। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीती और जिस स्थिति से वह गुज़र रही हैं, उसे सिर्फ वही समझ सकती हैं। उन्होंने एक और बात यह कही कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह किसी और के साथ न हो, इसलिए दोषियों को बेहद कड़ी सजा दी जाए। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने एक बार भी गुस्सा नहीं दिखाया। वह गहरे दुःख में बोल रही हैं, बावजूद इसके वह अपनी मजबूती को बटोरने का प्रयास भी कर रही हैं।
महिला के पति की हिम्मत भी प्रेरित करती है, जो अपनी पत्नी के साथ न सिर्फ डट कर खड़े हैं, बल्कि अपराधियों को दंड दिलाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं। पति के साथ भी मारपीट हुई थी और उन्हें बंधक बनाकर उनके सामने ही उनकी पत्नी का बारी-बारी से बलात्कार किया गया, उसका विडियो बनाया गया और बाद में उसे वायरल भी कर दिया गया। पति का कहना है कि घरवाले माने या न माने लेकिन वे न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।
इस घटना के बाद भी अलवर जिले में ही रेप की कुछ और जघन्य घटनाएँ सामने आयीं। अपराधियों का हौसला आखिर इतना बुलंद कैसे है? कानून का डर किसी अपराधी में रह ही नहीं गया है। अपराधियों को बिना देरी सख्त से सख्त सजा दी जाए और इस तरह का एक भी अपराधी कानून की गिरफ्त से न छूटे तभी इस तरह के अपराध रुकेंगे। होता यह है कि ऐसे कई अपराधी बार-बार अपराध भी करते हैं और छुट्टे घूमते भी रहते हैं!

Friday, 3 May 2019

'फोनी' के सामने डटा ओडिशा

ओडिशा के पुरी तट से टकराने के बाद चक्रवाती तूफ़ान फोनी (fani) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। तटीय इलाकों में मूसलाधार बारिश हो रही है और 200 कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से तेज हवाएँ चल रही हैं। ख़बरों के मुताबिक ओडिशा में बीस साल बाद इतना बड़ा तूफ़ान आया है। हमारे परिवार के कई सदस्य भी कल दोपहर तक पुरी में थे। वापसी की उनकी ट्रेन कल रात की थी, जो रद्द कर दी गयी। लेकिन कल दोपहर को चलायी गयी एक स्पेशल ट्रेन से उन्हें वापसी की टिकट मिल सकी, तो हम लोगों की जान में जान आई। पर्यटक तो फिर भी अपने-अपने घरों को वापस लौट गए होंगे, लेकिन असल चिंता उन लोगों की है, जिनका घर ही पुरी या अन्य तटीय इलाकों में है।
बहुत खूबसूरत और प्राकृतिक सम्पदा के धनी ओडिशा के साथ इस तरह की त्रासदी बार-बार न होती तो वह भारत के संपन्न राज्यों में गिना जाता। लेकिन जिस जीवटता से ओडिशा के लोग इस तरह की आपदाओं का सामना करते हैं, इसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। चूँकि मौसम विभाग ने समय रहते अलर्ट जारी कर दिया था और समय रहते लाखों लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दिया गया है, इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नुकसान कम से कम होगा। लेकिन इसके बावजूद पेड़ों, बिजली वगैरह के खंभों और कच्चे घरों-दुकानों के उखड़ने-टूटने से होने वाले नुकसान को तो नहीं ही रोका जा सकेगा। जो लोग अब भी खतरे वाले इलाकों में रहने के लिए विवश हैं, उन्हें हिम्मत, धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। इस कठिन वक्त में पूरा देश ओडिशा के साथ खड़ा है। हम प्रार्थना कर रहे हैं कि यह तूफ़ान आपकी मजबूती से टकराकर बेहद कमज़ोर हो जाए और जान-माल की कोई हानि न हो!

Saturday, 27 April 2019

पेप्सिको वालों की बपौती नहीं है 'आलू'

पेप्सिको ने एक खास किस्म (FC5) के आलू की खेती करने पर गुजरात के चार किसानों पर करोड़ों रूपये के हर्जाने का मुकद्दमा दायर किया है। पेप्सिको का कहना है कि इस खास किस्म के आलू को उसने रजिस्टर्ड करवा रखा है, और उससे अनुमति लिए बिना कोई इसे नहीं उगा सकता। लेकिन पेप्सिको इंडिया ने जो अपनी आंतरिक इच्छा ज़ाहिर की है वो ये है कि यदि ये किसान उससे एग्रीमेंट करके इस किस्म के आलू उगाएं और फिर उन्हें ही बेच दें तो वे अपना मुकद्दमा वापस ले लेंगे। किसानों का पक्ष है कि उन्हें यदि पता होता कि इस किस्म के आलू पर किसी का पेटेंट है, तो वो इसकी खेती कभी नहीं करते। लेकिन इसके साथ ही इन किसानों ने ये भी कहा है कि पेप्सिको ने उनसे पहले भी संपर्क किया था और ये कहा था कि वे उन्हें आलू बेचें, लेकिन वे इतनी कम दर देने को तैयार हैं, जो किसानों को मुनासिब नहीं लगता।
मैं अपनी छोटी सी बुद्धि से जो समझ पा रही हूं, वो ये है कि जिस तरह से अंग्रेज किसानों से नील की खेती जबरदस्ती करवाया करते थे, और फिर उससे पैसा बनाते थे, वास्तव में पेप्सिको भी कुछ वैसा ही चाह रही है।
पेप्सिको के पोटेटो चिप्स की खपत भारतीय बाज़ारों में लगातार बढ़ रही है और इसलिए अधिक उत्पादन और अधिक मुनाफे के लिए उनकी बड़ी चाहत है कि उन्हें सस्ती दरों पर आलू मुहैया कराने वाले एक तरह से बंधुआ किसानों की फौज मिल जाए।
सुनो पेप्सिको वालों, बेहतर यह है कि अपने पोटेटो चिप्स और कोक की दुकान समेटो और दफा हो जाओ। यहां के किसान तुम्हारे गुलाम नहीं हैं! वे आलू भी सदियों से उगा रहे हैं और ऑर्गेनिक पोटेटो चिप्स बनाने की तकनीक भी उनके पास सदियों से है। एक तो तुम किसानों का हक मार रहे हो, तुर्रा यह कि उन्हीं को चोर बताकर, उन्हीं से सीनाज़ोरी कर रहे हो, ये सब नाकाबिले बर्दाश्त है!

[नोट - विडंबना यह है कि नील की खेती से किसानों को मुक्त कराने वाले गांधी के गुजरात के किसानों के साथ यह सब हो रहा है और 56 इंच का सीने रखने का दावा करने वाले और देश के किसानों की उदारता का बखान करने वाले हमारे प्रधानमंत्री भी वहीं के हैं।]

Monday, 22 April 2019

ईस्टर के मौके पर श्रीलंका में आत्मघाती बम हमले

ईस्टर के दिन‌ श्रीलंका में आतंकवादियों ने चर्च और होटलों को निशाना बनाते हुए सिलसिलेवार आत्मघाती बम हमले किए। 300 के लगभग निहत्थे-निर्दोष लोग मारे गए और सैंकड़ों अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इनमें सभी उम्र के लोग शामिल थे। इनमें से अधिकांश लोग प्रार्थना के लिए आए थे, या सद्भावना से उत्सव मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे। शुरूआती जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि इन हमलों को एक इस्लामिक आतंकी संगठन ने अंजाम दिया है।
कितना बर्बर और कितना कायरना कृत्य है ये! इसका हासिल क्या होगा? निर्दोष-निहत्थे नागरिकों को मारकर ऐसे संगठन अपने होने का सिर्फ और सिर्फ अहसास कराते रह सकते हैं, इसके अलावा इनका कोई न्यायसंगत लक्ष्य नहीं है, और यदि कोई पागलपन भरा लक्ष्य है भी तो वो कभी हासिल नहीं होने वाला। यदि इस तरह के काम किसी 'जन्नत' की चाह में और 'उनहत्तर कुंवारी रूहों' को भोगने की लालसा में किए जा रहे हों तो उस जन्नत का तो किसी को नहीं पता लेकिन उन जहन्नुमों में आग लगे, जहां ऐसी लालसाएँ जगा-जगा कर इस तरह के 'जिहादी' तैयार किए जाते हैं!!

Friday, 1 March 2019

फिल्म निर्माताओं में देशभक्ति, युद्ध और आतंकी हमले भुनाने की होड़

फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइककी कमाई थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बात से सिनेमा का व्यापार करने वाले बाकी लोग प्रेरणा न लें, यह भला कैसे हो सकता है! अभी पुलवामा में हुई हमले की दर्दनाक घटना को कुछ दिन भी नहीं बीतें हैं, भारतीय वायुसेना के एयर स्ट्राइक के दावे के बाद सीमा पर बनी तनाव की स्थिति ख़त्म भी नहीं हुई है, कई विमानों के क्रैश होने और सेना के जवानों सहित कई लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं, ठीक उसी समय यह खबर आ रही है कि पुलवामा की घटना, बालाकोट एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तानी हिरासत में लिए जाने की घटना पर फिल्में बनाने के लिए प्रोडक्शन हाउसों के बीच टाइटल रजिस्टर करवाने की होड़ मची हुई है! 

मतलब हिंदी सिनेमा के निर्माताओं के लालची दिमाग इस दुखद समय को भी भुनाने के लिए पूरी तरह तत्पर और प्रयत्नशील हैं। इस तरह की घटनाएँ उनके लिए मसाला भर हैं। इसमें और अधिक नमक-मिर्च लगाकर परोसने में तो उन्हें महारत हासिल है ही। इन मुनाफाखोरों के लिए यह सिर्फ अकूत पैसा कमाने का मौका है। देशभक्ति का टॉनिक मिलाकर ये लोग सेना के प्रति देश की जनता की भावनाओं को भुनाएंगे और सोने पे सुहागा यह होगा कि ये बैठे-बिठाये मि. प्राइम मिनिस्टर को फिल्म का हीरो भी बना देंगे! यानी हर तरह से फील गुड एंडिंग!
इतना सब कहने का एक मतलब यह भी है कि देशप्रेम के जज़्बे से प्रेरित होकर जब आप ऐसी फ़िल्में देखने का प्लान बनाते हैं, तो आप सिर्फ आर्थिक ठगी का शिकार ही नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि भावनाओं से खेलने वाले लोगों के द्वारा बेवकूफ भी बन रहे होते हैं। इस तरह का खेल समझ लेने बाद कोई पूछे ‘how’s the josh’? तो क्या कहेंगे भला!!

Monday, 19 November 2018

विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती है फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सीके एक खंड पांड़े कौन कुमति तोहें लागींपर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सीबनकर हालाँकि कई सालों पहले तैयार हो गयी थी, लेकिन इस फिल्म को लगातार कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था। सेंसर बोर्ड ने इसपर आपत्ति की, विरोधों का सामना करना पड़ा, अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो कभी पूरी की पूरी फिल्म ही लीक हो गयी। इन सब अवरोधों को झेलते हुए सालों बाद अखिरकार इस शुक्रवार यह फिल्म रिलीज़ हुई है। फिल्म युनिट खासकर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सकारात्मक दृष्टिकोण का ही परिणाम कहा जा सकता है कि उन्होंने हार नहीं मानी, निराश नहीं हुए और डटे रहे।
दरअसल पूरी फिल्म उपन्यास काशी का अस्सीके साथ किया गया एक बेहद सकारात्मक सृजनात्मक प्रयोग है। फिल्म दर्शकों को न सिर्फ लगातार बांधे रखती है, बल्कि हमारे समय की बहुत सारी समस्यायों और चिंताओं से भी रू-ब-रू करवाती है। एक ओर संस्कृति को बचाने और दूसरी ओर संस्कृति को उदात्त और व्यवहारिक बनाने के बीच की जो कशमकश इस फिल्म में दिखाई गयी है, वह मूल उपन्यास के कथ्य से कहीं आगे निकल जाती है।
निर्देशक ने उपन्यास के कई अन्य खंडों से भी काम की चीजें निकालकर उन्हें इस फिल्म का हिस्सा बनाया है। चाय की दुकान पर कहने को बकैती करने वाले लोग काशी के इतिहास से लेकर अमेरीकी साम्राज्यवाद, बाजारवाद, बेकारी, साम्प्रादायिकता और जातिवाद जैसे विषयों पर बातों बातों में इस तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, जो आंखें खोलने वाली होती हैं। उदाहरण के लिए यह कि 1992 के बाबरी विध्वंस की देन यह है कि इसने इस देश का बंटवारा किये बिना ही फिर से देश को बांट कर रख दिया! या यह कि युवा उम्र के अधिकांश विदेशी सैलानी जो बनारस में जमे रहते हैं वे मनी और मशीन से उबे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि बेरोजगारी भत्ते पर यहाँ आकर मौज उड़ाने वाले लोग हैं। बदलते दौर के और भी बहुत सारे आयाम बहुत सारे पक्ष- धर्म, बाजार, पाखंड, साधारण जन, जीवनयापन की चुनौतियाँ आदि सबके सब इस फिल्म में शामिल हैं। फिल्मांकन, दृश्य संयोजन, निर्देशन, और फिल्मकार की संवेदना का पक्ष सब प्रशंसनीय है। जहाँ तक अभिनय पक्ष की बात है तो मुझे सन्नी देओल का अभिनय जरूर थोड़ा कम प्रभावी लगा! लेकिन इसके अलावा हर किसी का काम मन पर छाप छोड़ने वाला है। सौरभ शुक्ला, साक्षी तंवर, रवि किशन, अखिलेन्द्र मिश्र, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, फैसल रशीद सहित सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है।
फिल्म की बड़ी खासियत यह है कि वह बड़ी से बड़ी बातें बहुत मनोरंजक तरीके से समझा देती हैं। लेकिन मोटी बुद्धि की कसम खाए लोगों को फिर भी कई बार स्पष्ट बातें भी समझ में नहीं आती! आप फेसबुक खंगालेंगे तो अपनी पूरी बुनावट में साम्प्रादायिकता विरोधी और समरसता का समर्थन करने वाली इस फिल्म को एक खास विचारधारा के लोग अयोध्या में रामंदिर निर्माण का समर्थन करने वाली और हिंदूवाद की पताका उठाए फिल्म कह कर प्रचारित कर रहे हैं! या तो यह मूर्खता या कोई शातिर एजेंडा! जो भी है विस्मय में डालने वाला है!
मेरे खयाल से इस खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म को देखने के लिए जरूर जाना चाहिए। ऐसी फिल्में कम बनती हैं। इस फिल्म में गंगा का घाट ही नहीं, किनारे का पूरा जनजीवन है, पारंपरिक भदेसपन है, राजनीति है, पप्पू की चाय की वह दुकान है, जहाँ बहस का दुर्लभ लोकतंत्र कायम है। लेकिन मोहल्ला अस्सी में दाखिल होते हुए यह भी ध्यान रहे कि इसी फिल्म की एक पात्र कैथरीन के मुंह से कहलवाया गया है, कि ज़लील होना और ज़लील करना अस्सी की संस्कृति है।

Sunday, 14 October 2018

प्रश्नपत्र तैयार करने वालों की बीमार मानसिकता!

हाल ही में सम्पन्न दिल्ली नगर निगम की प्राइमरी टीचर भर्ती परीक्षा के लिए तैयार प्रश्नपत्र में जाति सम्बंधित आपत्तिजनक प्रश्न पूछा गया है। पिछले दिनों इसी तरह का एक प्रश्न हरियाणा में आयोजित किसी परीक्षा में भी पूछा गया था। इन प्रश्नों को सूक्ष्मता से देखने पर इनमें जातिवाद ही नहीं लिंग, रंग और नस्ल से जुड़े दुराग्रह एकसाथ नज़र आते हैं। ऐसे प्रश्न तैयार करने वाले कौन लोग हैं? किस सोच के तहत ऐसे प्रश्न तैयार किये जाते हैं? इससे चयन समितियों की खतरनाक मानसिकता और पूर्वाग्रह के साथ-साथ दुस्साहस का भी पता चलता है! संविधान का क्या खूब मखौल उड़ाया जा रहा है। जिम्मेदार लोगों पर कड़ी अनुशासनात्मक कारवाई होनी चाहिए। इस तरह की बीमार मानसिकता का उन्मूलन बहुत आवश्यक है।

Thursday, 27 September 2018

मेरठ की साम्प्रदायिक पुलिस

हमारे देश का संविधान बताता है कि भारत एक धर्म/पंथ निरपेक्ष देश है, इसलिए संवैधानिक दायित्व से बंधी हुई किसी भी संस्था या व्यक्ति का पदों पर रहते हुए धर्म निरपेक्ष होना अनिवार्य है। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक लड़की के साथ पुलिस वैन में मारपीट करते हुए और भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए पुलिस वाले कह रहे हैं : एक हिन्दू होकर मुसलमान से प्यार करती है? हिन्दू कम पड़ गये हैं क्या?’!
ख़बरों के मुताबिक यह मेरठ का वीडियो है और एक हिन्दू युवती के एक मुसलमान युवक के साथ होने की खबर सुनकर कुछ कट्टरवादी हिन्दू संगठन के सदस्यों ने जमा होकर उन्हें घेर लिया था। कहने को तो पुलिस उन दोनों को यहाँ से अलग-अलग वैन में बचाकर ले जा रही थी, लेकिन वास्तव में पुलिस की वर्दी पहने ये लोग खुद सांप्रदायिक गुंडों जैसी सोच रखने वाले थे और इस सच का सामना करना उस लड़की के लिए कितना भयावह रहा होगा, इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है।
इस तरह के क्रूर या अभद्र तरीके तो छोड़िये, पुलिस को किसी को प्यार या अपनेपन से भी यह समझाने का हक़ नहीं है, कि किसे किस धर्म के लोगों से प्यार या दोस्ती करनी चाहिए और किससे नहीं। यह तय करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी तरह की बाधा को ख़त्म करना सरकारी तंत्र और न्याय तंत्र का काम है। जब ऐसी संस्थाएं ही लोगों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने लगें, तो क्या किया जाना चाहिए? इसे साधारण अपराध की बजाय असाधारण अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिये और दोषी व्यक्ति या व्यक्तियों को न सिर्फ पदों से हटा देना चाहिए, बल्कि बेहद सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।

Thursday, 20 September 2018

कितने सैराट !

जातीय, वर्गीय या किसी अन्य तरह की 'प्रतिष्ठा' के नाम पर प्रेमी जोड़ों की हत्या करवाने वाले परिजनों की प्रतिष्ठा कभी बढ़ी हो, ऐसा शायद इतिहास में कभी नहीं हुआ है। कुकर्मी हत्यारों के रूप में उनकी बदनामी चारों तरफ जरूर फैल जाती है। पता नहीं क्यों फिर भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता और न जाने किस प्रतिष्ठा या अहंकार के लिए यह सब किया जाता है!
पिछले दिनों तेलंगाना में घटी एक बेहद क्रूर घटना में कथित तौर पर एक करोड़ रुपये की सुपारी देकर एक पिता ने अपने दामाद की हत्या करवा दी। लड़की का पिता तथाकथित ऊंची जाति का है, जबकि उनकी बेटी ने जिससे प्रेम विवाह किया था, वह तथाकथित निचली जाति का था।
यह सोचने की बात है कि करोड़ों रुपए खर्च करके एक पिता ने क्या हासिल किया? एक निर्दोष लड़के की हत्या, अपनी बेटी की हंसती-खेलती ज़िन्दगी की तबाही और अपने लिए जेल की सलाखें! तो जिस 'प्रतिष्ठा' के लिए यह सब किया गया वो कहां है? बहरहाल तो इस हत्यारे पिता और अन्य परिजनों पर हर कोई थूक ही रहा है और खुद उनकी पीड़ित बेटी उनके खिलाफ न्याय के लिए डट कर खड़ी है!
इस घटना के बारे में सुनते ही मुझे 'सैराट' फिल्म का ध्यान आया था। 2016 में रिलीज़ हुई नागराज मंजुले की मराठी फिल्म 'सैराट' ने लगभग इसी तरह की घटना को अपना विषय बनाया था, और इस फिल्म ने दर्शकों की संवेदना को झकझोर कर रख दिया था। असल ज़िन्दगी में सैराट के यूं घटने और लगातार घटते रहने से अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा!!

Thursday, 6 September 2018

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाली आईपीसी की धारा 377 को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला है। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी इस बेतुकी धारा को निरस्त करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में आये ऐसे ही फैसले को खुद सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में रद्द कर दिया था। देर से ही सही लेकिन अपनी उस गलती को सुधार कर सुप्रीम कोर्ट ने एक दुरुस्त काम किया है।
इस मामले को सिर्फ समलैंगिकों के अधिकारों से जुड़े मामले के रूप में देखना एक संकुचित नज़रिया होगा, वास्तव में यह मानवाधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा मसला है। मुझे खुशी है कि हमारा देश थोड़ा और प्रगतिशील, थोड़ा और बेहतर हुआ है। सिर्फ LGBTQ+ समुदाय ही नहीं पूरे देश को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर का देहांत!


एक पत्रकार के बतौर कुलदीप नैयर आज़ाद भारत के निर्माण से लेकर अब तक के उतार-चढ़ाव के मुखर साक्षी रहे। सक्रिय पत्रकारिता की इतनी लम्बी यात्रा बिरले ही किसी के हिस्से आती है। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवार का एक नवयुवक जब पंजाब से उखड़कर दिल्ली पहुंचा था, तब शायद उसको भी यह अनुमान नहीं होगा कि वह एक दिन भारतीय पत्रकारिता के दिग्गजों में शुमार किया जाएगा। भारतीय पत्रकारिता को दिशा देने में जिन लोगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, कुलदीप नैयर उनमें से एक हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में जब कद बहुत बड़ा हो जाता है और बड़े-बड़े मिनिस्टरों तक सीधी पहुंच हो जाती है, उसके बाद पत्रकारिता के मूल्यों को बचाए रख पाना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन कुलदीप नैयर ने इसे संभव बनाया। प्रेस की आज़ादी के लिए वे आजीवन मुखर रहे और इमरजेंसी के दौरान अपनी इसी प्रकृति के कारण वे इंदिरा गांधी के कोपभाजन बने और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
कुलदीप ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनकी मदद के बिना आज़ाद भारत के राजनीतिक इतिहास को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके कॉलम देश की विभिन्न भाषाओं में छपने वाली अस्सियों पत्र-पत्रिकाओं में छपा करते थे! हाल-हाल तक वे सार्वजनिक गोष्ठियों और प्रतिरोध सभाओं या जलसों में हिस्सा लेते रहे।
उनका व्यक्तित्व मुझे बेहद प्रभावित करता था। मुझे जो उनकी सबसे बड़ी खासियत लगती थी वो यह कि पत्रकारिता के शीर्ष पर होने या वरिष्ठतम होने का कोई अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया था, वे बेहद सहज इंसान थे और कहीं भी उन्हें सुनने पर साफ पता चलता था कि उनके भीतर वो पंजाबियत उम्र भर बरकरार रही, जिसे साथ लिए कम उम्र में ही उन्हें पंजाब छोड़ देना पड़ा था!
95 वर्ष की आयु में आज उनका निधन हो गया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर जब-जब चर्चा होगी, कुलदीप नैयर का नाम बहुत ही अदब से लिया जाएगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Monday, 20 August 2018

यह तंगदिली क्यों?

एक राजनेता के बतौर नवजोत सिंह सिद्धू मुझे कहीं से प्रभावित करने वाले नहीं लगते लेकिन इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित किये जाने पर सिद्धू का पाकिस्तान जाने का फैसला मेरे ख़याल से एक अच्छा फैसला था। वहां के सेना प्रमुख से उनका गले मिलना किसी भी दृष्टि से नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। समारोह के दौरान उन्हें किसकी बगल में जगह दी गयी या उन्होंने अपनी बगल में बैठे किस व्यक्ति से बात की, इसे आलोचना का विषय बनाना बेवकूफी है। जब से सिद्धू लौटकर आये हैं इन बातों को लेकर उनका भारी विरोध हो रहा है, उन्हें देशद्रोही सिर्फ कहा ही नहीं जा रहा बल्कि उनपर देशद्रोह का मुकद्दमा भी कायम किया गया है, यही नहीं उनका सिर काटकर लाने वाले के लिए इनाम भी रखे जा रहे हैं!
यदि भारत और पाकिस्तान दो दुश्मन देश हैं और यही सबसे बड़ी सच्चाई है, तो शपथग्रहण समारोह में सिद्धू को आमंत्रित करने के फ़ैसले और सेना प्रमुख द्वारा उन्हें गले लगाने का पाकिस्तान में भी तीखा विरोध होना चाहिए था, लेकिन मेरी जानकारी में वहाँ ऐसा नहीं हो रहा है। यदि विरोध हो भी रहा होगा, तो विरोध करने वाले गिने-चुने लोग ही होंगे! विकट से विकट परिस्थिति में भी दोस्ती, शान्ति और सौहार्द की पहल करना हमेशा स्वागत योग्य ही होता है। कायदे से यदि वहाँ सिद्धू मिलनसार दिखने की बजाय अकड़ दिखाते तो यह निंदनीय होता। हमें सोचना चाहिए कि क्या तंगदिली के कीर्तिमान स्थापित करने में हमारी दिलचस्पी बहुत बढ़ गयी है?

Saturday, 18 August 2018

केरल में बाढ़ की त्रासदी

केरल को लोग उसकी समृद्ध प्राकृतिक विरासत के लिए भी जानते हैं। नदियां, समुद्र, हरी-भरी धरती और पहाड़ों की अद्भुत खूबसूरती केरल को एक अलग पहचान देती है। केरल के विषय में किसी की यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि प्रकृति ने मानों एक बड़े कैनवास पर हरे रंग की सुंदर चित्रकारी की हो!
वही केरल इस समय बाढ़ की भारी विभीषिका से जूझ रहा है। कई लोग मारे गए हैं, बहुत सारे लोग विस्थापित हो रहे हैं। लोग भुखमरी और बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। कुल मिलाकर केरल की एक बड़ी आबादी भयंकर संकट का सामना कर रही है और जान-माल का बहुत नुकसान हो रहा है। केरल के लोग सामान्य: इस तरह की बाढ़ के आदी नहीं रहे हैं, इसलिए यह एक नए तरह का खतरा है! आशंका होती है कि वहां के सहज पारितंत्र के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ की जा रही है और व्यावसायिक दोहन या लाभ के इस तरह की गलतियां की जा रही हैं जो नहीं की जानी चाहिए थीं! इसके अलावा जो स्थिति है उससे यह भी पता चलता है कि किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी कम तैयारियां की गई थीं!
जो भी हो इस समय एकजुट होकर केरल को इस आपदा से उबरने में मदद करना हम सबकी प्राथमिकता में होना चाहिए। इसके बाद केरल को उसी स्वाभाविक केरल की स्थिति में लाने की ज़रूरत होगी जहां प्रकृति केरलवासियों की सबसे सच्ची सहचरी होती है, संहार करने वाली नहीं!! 

Wednesday, 8 August 2018

लफंगे उपद्रवियों की कांवड़ यात्रा!

दिल्ली कावड़ियों को सर आँखों पर बिठाती रही है। कांवड़ यात्रा शुरू होने से महीनों पहले उनके आराम के लिए जगह-जगह पंडाल बनने शुरू हो जाते हैं। सावन के महीने में दिल्ली की लगभग हर गली हर नुक्कड़ पर कांवड़ यात्रियों के लिए विश्राम शिविर, भंडारे वगैरह के आयोजन होते रहते हैं।
इतना मान-सम्मान इन कावंड यात्रियों को इन दिनों मिलता है, जिनके इनमें से अधिकांश पूरे जीवन हक़दार नहीं हो सकते! इसलिए ऐसे अवसरों का लाभ लुच्चे-लफंगे, वेल्ले लोग खूब उठाते हैं। टोलियाँ बना-बना कर ये भी कांवड़ियों का चोला ओढ़कर निकल पड़ते हैं या कांवड़ियों की टोलियों में शामिल हो जाते हैं। इस तरह होता यह है कि कुछ सज्जन श्रद्धालुओं की तुलना में उन्मादी और उत्पाती लोगों का एक बड़ा काफिला कांवड़ियों के लिवास में चल रहा होता है। इनमें से कई समूह न सिर्फ तमाम ट्रैफिक और सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देते हैं, बल्कि छेड़खानी और मारपीट तोड़-फोड़ का जैसे लाइसेंस लिये घूमते हैं! लोगों की असुविधा का ध्यान रखे बगैर लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स लगाकर विभिन्न पड़ावों पर और रास्ते भर भी इनका नाचना-गाना चलता रहता है। इनकी हरकतों से ट्रैफिक में भारी दिक्कत आती है और सामान्य लोग बेबस और सहमे हुए नजर आते हैं।
धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इनकी गुंडागर्दी को क्यों चलने दिया जाना चाहिए? हर साल ऐसी घटनाएँ क्यों दोहराने की इजाजत दी जाती है? इस तरह की अप्रिय और बेहद असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए ज़रूरी गाइडलाइन्स क्यों नहीं बनाई जाती या पालन की जाती? इस तरह की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए दुरुस्त सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किये जाते? उपद्रवी कांवड़ियों की पहचान कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुँचाया जाता?
धर्म की आड़ लेकर की जाने वाली ऐसी उदंडता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए!

Tuesday, 7 August 2018

कितने मुज़फ्फरपुर!

कई फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपनी फिल्मों और रचनाओं के माध्यम से इस बात की ओर बार-बार ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि बेसहारा औरतों और बच्चों के लिए चलाई जाने वाली संस्थाओं और सुधारगृहों की आड़ में अक्सर इनके शारीरिक और मानसिक शोषण का दिल दहला देने वाला धंधा फलता-फूलता रहता है।
अनाथ बच्चों, मजबूर बेसहारा औरतों और आर्थिक हैसियत में बहुत पिछड़े हुए नाबालिगों या स्त्रियों के कल्याण का मुखौटा लगाकर एक ओर मसीहा बनने का अवसर मिलता है तो दूसरी तरफ इन्हें ही परोसकर और इन्हीं लोगों के शोषण से अकूत पैसे, ताकत और वासना पूर्ति के जुगाड़ किए जाते हैं। सरकारी संस्थाओं की हालत भी बेहद बद्दतर है। कई फिल्मों में तो यह भी दिखाया गया है कि जेल में बंद महिला कैदियों को बड़े-बड़े अफसरों, नेताओं और रसूखदारों के आगे परोसा जाता है। ऐसी महिलाएं और ऐसे बच्चे सॉफ्ट और सेफ टारगेट होते हैं। ये इतने बेबस और समाज से अलग-थलग होते हैं कि इनके विरोध या विद्रोह का खतरा नहीं के बराबर होता है और यदि किसी तरह इस तरह की बात बाहर‌ आ भी जाती है तो अक्सर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ऐसे मामलों में छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों और मंत्रियों तक की सीधी संलिप्तता होती है और इसलिए ये सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। ये सिर्फ फिल्मीं बातें नहीं हैं, बल्कि कड़वी हकीकत है, ये बात अलग है कि इस तरह की घटनाओं के प्रति समाज की मुख्यधारा के कथित शिष्ट लोगों को कभी कोई बहुत सरोकार नहीं होता!
मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में नाबालिगों के साथ लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जब खुलासा हुआ और मीडिया ने इसे बार-बार उठाया तब आम लोगों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश दिखा। इसके कुछ ही दिन बाद हाल ही में देवरिया में भी इसी तरह की घटना की बात सामने आई है। कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि सिर्फ मुजफ्फरपुर और देवरिया ही नहीं देश के लगभग हर इलाके में इस तरह की अधिकांश संस्थाओं में यही सब हो रहा होगा। अभी जिस तरह का आक्रोश उठ रहा है वह कुछ दिन में शांत हो जाएगा और यह सिलसिला चलता रहेगा। इस आक्रोश की सही दिशा यह है कि इस तरह की देशभर की सभी सरकारी गैर-सरकारी संस्थाओं की कड़ी जांच करवाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की नियमित रूप से इस तरह की जांच और निगरानी की जाए‌। यह आम लोगों की भी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वे अपने आसपास की ऐसी संस्थाओं की खोज-खबर लेते रहें और नियमित जांच और निगरानी की प्रक्रिया से भी सरोकार रखें। बेसहारा और मजबूर लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और हम अपने समाज के भीतर उनके उत्पीड़न के बेखौफ अड्डे तैयार होने नहीं दे सकते!

Friday, 8 June 2018

प्रेमी जोड़ों के प्रति घृणा का एक रूप यह भी!

हैदराबाद का लुम्बिनी पार्क मेरी पसंदीदा जगहों में से एक है।‌ हुसैन सागर के बीचों-बीच खड़ी बुद्ध की बेहद विशाल प्रतिमा मन को मोह लेती है।
पिछले दिनों लुम्बिनी पार्क जाना हुआ था। इस बार वहां ऐंट्री गेट के पास एक बड़ा सा पोस्टर टंगा दिखा। दूर से मुझे लगा कि इसपर पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार की अपील करने वाला कोई संदेश लगा होगा। लेकिन नजदीक जा कर जो देखा और पढ़ा वह मन को दुखाने वाला था। कुंठाएँ कितने-कितने रूपों में अभिव्यक्त होती हैं! वास्तव में यह प्रेम के प्रति बेहद घृणा प्रदर्शित करने वाला और प्रेमी जोड़ों के प्रति बेहद अपमानजनक पोस्टर है। मनुष्य ही नहीं पशुओं का प्रेम भी इस घृणा की जद में है!
सार्वजनिक और एकांत जगहों का भेद प्रेमी जोड़ों को भी अच्छी तरह से मालूम होता है। यह उन्हें सिखाने की ज़रूरत नहीं होती! उनसे उनका एकांत तक छीन लेने को आमादा लोग, सार्वजनिक जगहों पर भी उनका साथ होना, साथ बैठना, हाथ पकड़ कर चलना और बातें करना तक बर्दाश्त नहीं कर पाते!
ऐसे लोग इस तरह के हज़ारों पोस्टर लगा दें तब भी उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। जोड़े कुंठित दुनिया की परवाह नहीं किया करते। यह पोस्टर बुद्ध को समर्पित एक खूबसूरत जगह को बदनुमा बनाने का काम ज़रूर कर रहा है। दरअसल इस तरह की सोच पूरी दुनिया को बदनुमा बना देने के अभियान का ही तो हिस्सा है!!

Wednesday, 23 May 2018

ब्यास नदी त्रासदी

पंजाब की पांच प्रमुख नदियों में 'ब्यास' वह एकमात्र नदी है जिसे मैंने देखा है और एक से अधिक बार देखा है। यह अपने वात्सल्य के लिए जानी जाती है और इसकी खूबसूरती मन मोहने वाली है। पिछले दो-तीन दिन से लगातार एक खबर आ रही है कि बटाला के पास एक शुगर मिल में शीरे का टैंकर फट गया। शीरे का उपयोग शुगर रिफाइन करने में किया जाता है। कथित तौर पर इस लाखों लीटर केमिकल को ब्यास नदी में बहा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस केमिकल की वजह से ब्यास नदी में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो गई लिहाजा कई जलीय जीव खासतौर पर लाखों मछलियां मरकर नदी के ऊपर तैरने लगीं। यही नहीं एक बड़े दायरे में ब्यास नदी का पानी गाढ़ा काला और बेहद दुर्गंधयुक्त हो चुका है। किनारे पर बसने वाले गांवों के सैकड़ों पालतू पशुओं की भी इस पानी को पीकर मौत हो गयी है और कई गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं।
कृषि के लिए इस नदी पर निर्भर एक बड़ी आबादी भी इससे बहुत अधिक प्रभावित हुई है। ब्यास चूंकि पंजाब से बहते हुए राजस्थान तक जाती है इसलिए बहुत बड़ी संख्या में जनजीवन इससे प्रभावित हुआ है।‌ इसके अतिरिक्त ब्यास नदी का धार्मिक महत्व भी है, उस दृष्टि से इस नदी में स्नान करने आने वाले लोग और पर्यटन के लिए आने वाले लोगों को भी भारी तकलीफ उठानी पड़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिनों तक यदि भारी मात्रा में लगातार इस नदी में जल नहीं छोड़ा गया, तब तक यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। विशेषज्ञों का हालांकि यह भी साफ़ मानना है कि इस त्रासदी के बाद नदी के पारितंत्र को पूर्व की स्थिति में आने के लिए कुछ वर्षों तक का समय लग जायेगा! यह मन को बहुत दुःख देने वाली स्थिति है।
हमारे देश में वैसे तो बिरले लोगों को ही पर्यावरण की परवाह होती है और उसमें भी विभिन्न औद्योगिक इकाइयां तो तमाम गाइडलाइंस के बावजूद पर्यावरण विशेष तौर पर जल स्रोतों को प्रदूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं। लेकिन बटाला के पास शुगर मिल प्रबंधन ने अपनी बेहद गैरज़िम्मेदाराना हरकत से एक ही बार में आसपास के पूरे पारितंत्र को जिस तरह से भारी संकट में डाल दिया है, वह बहुत अधिक चिंता का विषय है और प्रबंधन द्वारा अपने इस कृत्य को आसानी से अंजाम देने से यह संदेह गहराता है कि इस तरह की और भी घटनाएं हो सकती हैं। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि इस घटना के लिए जिम्मेदार प्रबंधन पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए और इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए कि प्रबंधन और प्रशासन की मिलीभगत की वजह से असली दोषियों की बजाय मजदूरों को प्रताड़ित न होना पड़े। फिलहाल इस बात की ज़रूरत है कि ब्यास नदी के उपचार के लिए युद्धस्तर पर उपाय किए जाएं और आगे से इस तरह की घटनाएं न हों इसके लिए तमाम सतर्कता उपाय अपनाए जाएं।